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अप्रैल 29, 2011

खौफ है बरपा

राह बेताब मुसाफिर है तैयार भी
खत्म हुआ अब हर इन्तेज़ार भी

पत्थर बन गए सारे सरोकार भी
गूंगी बहरी अंधी हुई सरकार भी

मंत्री गुंडा ही नहीं है चाटूकार भी
प्रजा त्रस्त बहरा हुआ दरबार भी

बिकने वाला ही यहाँ खरीदार भी
अजब है दुनिया का कारोबार भी

गरमी में खाली मटकी प्यासी है
और जान लेवा भूख की मार भी

शेख साहब आप की करतूतों से
शर्मिंदा है मुझ सा गुनहगार भी

मंदिरों मस्जिदों के झगडे यानी
नफ़े का है बन्दों ये कारोबार भी

अज़ान आरती की पाक सदा में
सुन सको तो सुन लो चीत्कार भी

पीने गए थे बंदगी की मय लोग
साथ लाये खुदाई का खुमार भी

अक्ल का कहा तो सदा माना है
कभी सुनना दिल की पुकार भी

हमें मालूम है फैसला क्या होगा
वही कातिल है जो के पैरोकार भी

कटने के खौफ से चुप हैं ज़बाने
और तेज है खंजरों की धार भी

ईमान की चिता जली थी आलम
उजाला ले आया सियाहकार भी

(रफत आलम)

अप्रैल 19, 2011

जिंदगी तेरे रूप अनेक

मंदिर की पावन आरती
मस्जिद की अज़ान जिंदगी

मजदूर की सोयी हुई थकन
अमीर की अनिद्रा से परेशान जिंदगी

भूखे पेट की तमन्ना
रोटी के टुकड़े की मुस्कान जिंदगी

विधवा की जवानी
जलता हुआ मसान जिंदगी

बूढ़े की खांसी
पूरी होती दास्तान जिंदगी

संतुष्टि की चरम सीमा
बच्चे की मुस्कान जिंदगी

वेश्या की जवानी
मजबूरी का बयान जिंदगी

नारी का अनमोल आभूषण
सिन्दूर की शान जिंदगी

जिंदगी तू गुल भी तू ही खार
जिंदगी तू बिके तू ही खरीदार

तू लम्हा भी सदी भी है
कहकहों का समंदर कहीं

आँसुओं की नदी भी है
तू ही नेकी तू ही बदी भी है

तू ही शैतान की जननी
तू ही अवतार-पैगम्बर

जिंदगी तेरे रंग हज़ार
जिंदगी तेरे रूप बेशुमार

बावफा इतनी के साँसों में बसती है
बेवफा ऐसी के पल में मौत बनती है

(रफत आलम)

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