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जुलाई 14, 2010

गालिब छुटी शराब : मयखाने से होशियार लौटते रवीन्द्र कालिया

बात सूफियों की हो तो उनकी मधुशाला तो भिन्न होती है, उनकी मधु ही कुछ अलग होती है और वहाँ ऐसा आदमी तो बेकार है जो इतनी न पी ले कि होश खो जाये। वे तो कहते हैं

वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा।

पर आम जीवन में जो मयखाने से होशियार लौट आये उसे भाग्यशाली ही समझा जायेगा। आम जन जीवन वाला मयखाना तो एक ही रास्ते पर भेजता है और मयकशी के रास्ते पर अत्यंत रुचि के साथ चलने वाले के लिये ही किसी ने कहा है कि

कारवां खड़ा रहा
और वे अपनी दुकान बढ़ा चले।

जीवन के कितने कामों को अधूरा छोड़कर, अति प्रिय सपनों को पूरा करने का प्रयास करे बगैर ही आदमी कूच कर जाता है। मयगोशी के ऐसे ही वन वे ट्रैफिक वाले रास्ते से वरिष्ठ साहित्यकार श्री रवीन्द्र कालिया न केवल वापिस घर आ गये बल्कि उन्होने वापसी के इस सफर में गुजारे क्षणों में, जब वे लगभग अकेले ही यात्रा कर रहे थे, सबको अकेले ही करनी पड़ती है ऐसी यात्रा, एक बहुत ही जीवंत किताब की रचना भी कर दी। किताब की अवधारणा तो तभी बन गयी होगी जब वे वापिस जीवन की ओर आने के लिये प्रयासरत रहे होंगे, किताब को लिखा भले ही कुछ समय बाद हो उन्होने।

गालिब छुटी शराब” एक जीवंत आत्मकथा है। यह शुरु से अंत तक रोचक है और कितने ही पाठक इसे एक ही बार में पढ़ गये होंगे और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे एक ही बार में पढ़ जाने के लिये विवश हो जायेंगे, जब भी पुस्तक उनके हाथ पड़ेगी। आत्मकथाओं के साथ ऐसा कम ही होता है और ज्यादातर पाठक इन्हे किस्तों में पढ़ते हैं क्योंकि भले ही बहुत अच्छी सामग्री इन किताबों में हो पर कहीं न कहीं वे बोझिल हो उठती हैं और लगातार पढ़ना थोड़ा भारी लगता है पाठकों को।

गालिब छुटी शराब” के साथ ऐसा नहीं है। हास्य तो हर पन्ने पर बिखरा पड़ा है और केवल दूसरों की ही खिंचाई रवीन्द्र कालिया जी ने इस हास्य बोध के द्वारा नहीं की है बल्कि बहुत निर्ममता से अपना और अपनी आदतों का पोस्ट-मार्टम भी किया है। इंसान का दिल तो दुखता ही दुखता है पर इस दुख को भी लेखक ने हास्य के आवरण में लपेट कर पेश किया है और अपनी तरफ से भरकस कोशिश की है कि सब कुछ पाठक हँसते हँसते हुये ही समझ जाये।

गालिब छुटी शराब” को पढ़ना “चार्ली चैप्लिन” की बेहतरीन मूक फिल्में देखने जैसा है जहाँ दर्शक उनके द्वारा घटनाओं को दर्शाने के तौर तरीकों पर हँसता भी रहता है और उनके द्वारा निभाये गये पात्र के दुखों को महसूस भी करता रहता है। ऐसा संतुलन बनाये रखना अत्यंत कठिन काम है। इस तरह की शैली में लिखी दूसरी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में याद नहीं पड़ती हाँ मराठी में जरुर रामनगरकर की आत्मकथा रामनगरी ऐसी ही शैली में लिखी गयी थी जहाँ जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी हास्यबोध के मुलम्मे से ढ़क कर प्रस्तुत किया गया था।

पुस्तक पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी सपाट चेहरे से हास्य उत्पन्न करने वाली बातें कहने में पारंगत होंगे। दिल्ली में अपने मित्र के साथ माता के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रसंग में उनकी यह प्रतिभा अपने विकट रुप में सामने आती है। ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पाठक पढ़ते पढ़ते हँसी से लोट पोट हो सकते है।

कन्हैया लाल नंदन जी के साथ इलाहाबाद पहुँचने वाला प्रसंग भी रवीन्द्र जी की कलम की श्रेष्ठता हास्य के क्षेत्र में दर्शाता है।

गालिब छुटी शराब” में सिर्फ हास्य ही नहीं है बल्कि जीवन के और भी दूसरे रंग अपनी छटा बिखेरते हुये सामने आते हैं। ग़ालिब का नाम शीर्षक में शामिल है तो शायरी की मौजूदगी पुस्तक में मौजूद होना भरपूर वाजिब है और मौकों पर बड़े माकूल शे’र सामने आते रहते हैं। पिछले पाँच दशकों में हिन्दी साहित्य में उभरे कितने ही नाम जीवंत होकर उभरते रहते हैं। एक ही व्यक्ति का अलग अलग व्यक्तियों से अलग अलग किस्म का सम्बंध हो सकता है और अब जब रवीन्द्र कालिया जी की पीढ़ी के रचनाकार आत्मकथायें लिखने की ओर अग्रसर हैं तो अलग अलग रचनाकार इन रचनाओं में अलग अलग रुपों में नजर आयेंगे। कितनी बातें प्रभावित करती हैं किसी भी व्यक्ति का रेखाचित्र लिखने में।

एक तो रचनाकार को उसकी रचनाओं के जरिये जानना होता है, और एक होता है उसे व्यक्तिगत रुप से जानना और दोनों रुप काफी हद तक अलग हो सकते हैं और होते हैं अगर ऐसा न होता तो प्रेमकहानियों की रचना करने वाले रचनाकारों के अपनी पत्नी या प्रेमिका/ओं से अलगाव न हुआ करते। व्यक्तिगत सम्बंध रचनाकार की समझ, दृष्टिकोण और कलम को भी कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में प्रभावित करते ही हैं।

गालिब छुटी शराब” पढ़कर ऐसा भी प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी की याददाश्त बहुत अच्छी होनी चाहिये या फिर हो सकता है कि वे अपने कालेज के दिनों से ही डायरी लिखते रहे हों क्योंकि बहुत पहले के प्रसंग भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आते हैं और एक अन्य खासियत इस पुस्तक की यह लगती है कि रवीन्द्र जी ने अपनी वर्तमान आयु की समझदारी का मुलम्मा पुराने प्रसंगों और काफी पहले जीवन में आये व्यक्तियों की छवि पर नहीं चढ़ाया है और जैसा तब सोचते होंगे उन लोगों के बारे में या जैसा उन्हे देखा होगा वैसा ही उनके बारे में लिखा है। चाहे पंजाब में गुजारे हुये साल हों या बम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद में गुजारे साल, यह बात सब जगह दिखायी देती है।

केवल व्यक्ति ही नहीं वरन वे सब जगहें भी, जहाँ रवीन्द्र जी ने अपने जीवन का कुछ समय व्यतीत किया, अपने पूरे जीवंत रुप में किताब के द्वारा पाठक के सामने आती हैं। खासकर इलाहाबाद के मिजाज को लेखक ने खास तवज्जो दी है। अमरकांत जी और राजेन्द्र यादव जी जैसे प्रसंगों के जरिये उन्होने इलाहाबादी माहौल और हिन्दी साहित्य के पिछले चालीस-पचास सालों के धुरंधर नामों के बीच बिछी, अदृष्य शतरंज की झलक भी दिखायी है। हर काल में समकालीनों के मध्य ऐसा ही होता है।

किताब में केवल शराब, लेखन, पार्टियाँ और धमाल आदि ही नहीं है वरन रवीन्द्र जी ज्योतिष और होम्योपैथी चिकित्सा शैली से अपनी मुठभेड़ और स्वाध्याय के आधार पर दोनों ही क्षेत्रों में कुछ समय तक डूबकर इन विधाओं के प्रति उत्पन्न अपने लगाव की भी चर्चा करते हैं। उनके जीवन में भविष्यवाणियों ने असर दिखाया, इस बात की पुष्टि उन्होने कुछ प्रसंगों द्वारा की है। संजय गाँधी की असमय मृत्यु की भविष्यवाणी हो या दिवंगत राजनेता चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा सत्तर के दशक में ही करने वाला प्रसंग हो या चेहरा देख कर ही व्यक्ति का भूत-वर्तमान और भविष्य बता सकने के प्रसंग हों, रहस्यवाद का जीवन में स्थान है यह बात आत्मकथा दर्शाती है।

आत्मकथा इस बात को स्थापित करती है कि जवानी में रवीन्द्र जी यारों के यार वाले ढ़ांचे में रहे होंगे और कुछ हद तक आदर्शवाद भी उनके मन मस्तिष्क पर छाया रहता होगा वरना डा. धर्मवीर भारती से जुड़े प्रसंग उनकी किताब में इस तरह से उभर कर न आते आखिरकार पुस्तक यही बताती है कि व्यक्तिगत रुप से डा भारती हमेशा अच्छे ही रहे रवीन्द्र जी के लिये परन्तु रवीन्द्र जी ने उनका विरोध उनकी सामान्य छवि के आधार पर किया।

किताब रवीन्द्र जी के जीवन में आये साहित्यकारों, राजनेताओं और अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करती है।

यह बात जरुर गौर करने वाली है कि क्या कोई भी साहित्यकार बिल्कुल निरपेक्ष रह पाता है जब वह अपने जीवन में आये लोगों और खासकर प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में लिखता है?

क्या लेखक की कलम भेदभाव करती है मित्रों, गहरे मित्रों, परिचितों और व्यक्तिगत रुप से अपरिचित लोगों के प्रति?

गालिब छुटी शराब में भी कहीं कहीं इस अंतर को महसूस किया जा सकता है।

आशा की जा सकती है कि पूर्ण रुप से स्वास्थ्य लाभ करके पुनः साहित्य की दुनिया में पुरजोर सक्रिय होने वाले श्री रवीन्द्र कालिया इस बाद के जीवन पर भी अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिखंगे।

जिसने न पढ़ी हो वे अवश्य पढ़ें इस बेहद रोचक ढ़ंग से लिखी आत्मकथा को।

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