Posts tagged ‘कविता’

जून 9, 2010

प्रकृति के रंग में भंग डालता आत्महंता मनुष्य

सब नाटकों से बड़ा
बहुत बड़ा
एक नाटक जीवन में रचा जाता रहता है हर पल
जहाँ कुछ तो जाना पहचाना होता रहता है
और कुछ एकदम अनज़ाना घटता रहता है

इस नाटक का निर्देशन प्रकृति करती है
प्रकृति के इस नाटक के पात्र हमेशा बदलाव की तलाश में लगे रहते हैं

आकाश के असीमित नीलेपन को
हमेशा धरती को घूरने का काम मिला हुआ है

और धरती तो इतनी रंगीली है कि
बरस भर में जाने कितने तो रंग बदल लेती है

धरती और आकाश के मध्य बहने वाली हवा की तो बात ही क्या ?
कभी तो सूरज से दोस्ती करके तपा देती है पूरा चमन
और कभी ठंडी ठंडी साँसे भरा करती है

चाँद को भी अच्छी भूमिका मिली है
समुद्र से मिलकर अच्छी जुगलबंदी करता है रात भर
और समुद्र के पानी को उछाल उछाल कर मज़े में ख़ुश होता रहता है
पर सूरज आया नहीं कि चाँद गायब हुआ अंधकार की चादर साथ लिए

पानी को ही कहाँ चैन है?
भाप बनकर उड़ उड़ पहुँचता रहता है आसमान में
पर शांति से वहाँ भी नहीं टिक पाता
और फिर से बरस पड़ता है वापिस धरती पर

पहले तो प्रकृति के सब पात्र अपने निर्धारित समय पर ही
प्रवेश करते थे समय के मंच पर
और संयमित अभिनय ही किया करते थे
पर कभी किसी समय हम दर्शक
इतने शक्तिशाली और उपद्रवी हो गये कि
ये सब कलाकार अपना पात्र ढंग से निभा पाने में बाधा महसूस करने लगे
और अब ये बड़े ही अनियमित हो गये हैं
कभी कम तो कभी ज्यादा मेहनत कर डालते हैं

प्रकृति के नाटक से
मनुष्य की सामन्जस्यता गायब होती जा रही है।
प्रकृति के गाये गीत अब उतने सुरीले नहीं रहे
प्रकृति के बनाये इंद्रधनुष धुंधले पड़ते जा रहे हैं
प्रकृति अब गुस्सा दिखाने लगी है
पर गलती तो सौ प्रतिशत
मूर्ख इंसान की ही है।

चल रही हैं
सज रही हैं
कुछ समय और महफिलें
अंत में मनुष्य को
आत्म हत्या करने से तो
स्वयं प्रकृति भी नहीं बचा सकती।

 

…[राकेश]

जून 7, 2010

रंगमंच और जीवन

रंगमंच की दुनिया भी कैसी होती है?
वहाँ लोग उसका अभिनय करते हैं
जो वे वास्तविक जीवन में नहीं होते|


उनका अभिनय यह बताता है कि
एक मनुष्य कितने ही रूप धारण कर सकता है
या कि एक मनुष्य में कितनी संभावनाएँ हो सकती हैं|


नाटक एक कला है
जो अन्य कलाओं कि तुलना में
जीवन के ज़्यादा क़रीब है|


नाटक त्रिआयामी है अपने प्रदर्शन में
और बहुआयामी है अपने प्रभाव में|


नाटक सजीव है
और इस विद्या में सबकी भागीदारी हो सकती है|


नाटक सबके लिए है
नाटक एक खेल है
पर फिर भी जीवन से जुड़ा हुआ है
कुछ भी ना हो हमारे पास
न मंच ना परदा न साज़ न सज्जा
पर तब भी नाटक खेला जा सकता है|


नाटक विशुद्ध रचनात्मक प्रक्रिया है
नाटक विचार है
परदे के उठने और गिरने के मध्य
जो मंच पर घटता है
वह झलक दिखाता है कि
जीवन में माया का बहुत बड़ा प्रभाव हो सकता है
क्योंकि नाटक के दौरान
कुछ आभासी पहलू मिलकर
एक वास्तविकता का पुट सामने लाते हैं
नेत्र और कर्ण इंद्रियों के द्वारा सम्मोहित करके
नाटक हमें अपने कथानक के साथ बहा कर
कहीं और ले जाता है|


नाट्यशास्त्र ही बताता है कि
वास्तविक जीवन में जो दूसरों से ज़्यादा शक्ति रखते हैं
दूसरों से ज़्यादा दूर का सोच सकते हैं
वे अपने युग को प्रभावित करते हैं
और सबको अपनी विचारधारा में बहा ले जाते हैं|


यही जीवन में माया के होने का गवाह है
तब लगभग सारे लोग एक बड़े नाटक का हिस्सा बन जाते हैं
और अपना अभिनय शुरू कर देते हैं
अंतर केवल इतना होता है कि
रंगमंच की तरह यहाँ हमें अंत का पहले से पता नहीं होता|


मानव जाति का इतिहास गवाह है कि
समय समय पर ऐसे दिग्दर्शक हुए हैं
जिन्होने अपनी विचारधारा के अनुसार
जीवन के वास्तविक रंगमंच पर
बड़े बड़े नाटक रचे हैं|


हिटलर, मुसॉलिनी और स्टालिन आदि ने
विध्वंसकारी नाटकों की रचनाएँ कीं
और अपने अपने देश के समाज को
अपनी विचारधारा के साथ बहा ले गये|


गाँधी ने भी एक रचनात्मक नाटक की रूपरेखा तैयार की
और मानव जाति के इतिहास को ऊँचाईयाँ प्रदान कीं|


कहीं न कहीं रंगमंच के नाटक
हमें समझ देते हैं कि
जब भी हम वास्तविक जीवन में
किसी विशेष विचारधारा के साथ
बहने लगें तो
देख लें कि किस ओर जा रहे हैं
निर्माण की ओर या विध्वंस की ओर ?

[ राकेश ]

जून 4, 2010

अभिनय

हे अभिनेता!

तुम अभिनय को
अपने द्वारा निभाए गये पात्र को
वास्तविक न मानने लगना|

तब अभिनय भी एक ऐसा नशा हो जाएगा
जो जीवन के वास्तविक स्वरूप को हटाकर
कहीं और व्यस्त कर देता है दिमाग को
और कुछ समय के लिए व्यक्ति
जो वह नहीं है
वही होने का भ्रम पाल लेता है|

जैसे कुछ लोग वास्तविक जीवन में साधु होने का
अभिनय करने लगते हैं
और अपने को वास्तव में साधु समझने लगते हैं
पर जीवन की वास्तविक रंगभूमि से पलायन करने वाले
ऐसे लोग साधुता का केवल चोगा ही पहन सकते हैं
और सन्यस्त होने का अभिनय ही कर सकते हैं
जैसे अभिनेता वहाँ मंच पर अभिनय करते हैं
ये यहाँ वास्तविक जीवन में छलिया बने रहते हैं
पर छलते तो वे खुद को ही हैं
यदि वास्तव में संतत्व उन्हे मिल गया होता तो
क्या यूँ अपनी जिम्मेदारियों से भागते?
गांजे से मिली शांति को असली मानते?
संसार की नश्वर्ता के भ्रम में सब कुछ भुलाए रखते?

हे अभिनेता!

तुम भी अपने को किसी भुलावे में न डाल लेना
अभिनय किसी भी पात्र का करो पर
अपने वास्तविक स्वरूप को ना भूल जाना!


[ राकेश ]

मई 27, 2010

मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है
कि खुशियों से भरे क्षण भी
पूरा सुकून नहीं ला पाते|


मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है,
एक भय सा बैठ जाता है मन में
ऐसा लगने लगता है
जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे
और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की
सिर उठा सामने खड़ी हो जायेंगी।

ऐसा क्यों होता है?
इसका पता तो चल नहीं पाता।

शायद साहस खोजना होता है गहरे में
अंदर कहीं अपने ही वजूद में
ताकि
कठिन वक्त के दौर में
व्यक्ति सीधा खड़ा हो सके पैरों पर,
दौड़ न भी पाए तो
कम से कम
धीरे धीरे चल तो सके।

…[राकेश]

मई 25, 2010

स्वयं की बुराइयों का भय

मन डरता है

गुलाब के उस फूल की भाँति

जिसे भय हो कि

जब उसे चाहने वाला

उसे छूने लगेगा

तो उसके हाथों में

कहीं काँटे न चुभ जायें

…[राकेश]

मई 23, 2010

मन के फरेब

सच कुछ भी हो
पर मन माने तब ना।

वह तो विचार ढूँढे रखता है
अपने आप को बहला कर रखने के लिये।

अपने मुताबिक शब्दों की खुराक से
मन का पेट तो भर जाता है
पर वक़्त की कसौटी पर
ऐसे बहलाव
ऐसे छलावे
खतरनाक ही साबित होते हैं।

पर मन की ये खूबी कि
वह तमाम तरह की खुद ही की
असफलताओं, गलतियों को
यूँ संभालता है कि
जानते हुए भी कि ये सब झूठ है
व्यक्ति उन्हे सच मान बैठता है !

…[राकेश]

मई 15, 2010

प्रेम का फूलना

कली से फूल

प्रेम से और प्रेम

खुद से आते !

…[राकेश]

मई 12, 2010

पूर्ण समर्पण

जो हुआ ठीक हुआ

बीत गया सो बात गयी

सुबह नयी है

फिर से आया है सूरज आकाश में

हवा भी तो इठलाती बल खाती चलती है साथ में

अपने हाथ फैला कर रख लो

होने वाली है सपनो की बरसात पास में

कदमों को यूँ उठा कर चलो

दिशाएं नृत्य करने लगें साथ में

आओ तुम एक गीत गा लो

जीवन को साकार बना लो

हृदय में अपनी ख़ुशियाँ भर लो

और आँखों में सितारे

कर दो पूर्ण समर्पण

वह खुदा है

सारे कारज वक़्त पर करेगा

…[राकेश]

मई 8, 2010

प्रेम और समय

जाने कैसे ऐसा होता है
जाने क्यों ऐसे होता है
बीते हुए की स्मृर्तियों के साथ साथ आकर
जाने कब तुम खिलवाड़ करने
लगते
हो
मेरे फुरसत के लम्हों से|

जाने कैसे हज़ारों मीलों लंबी दूरियाँ
यूँ पल भर में तय हो जाती हैं
और फिर समय बीतता तो है
पर इसका एहसास नहीं हो पाता|

समय को खोकर भी मन खुशी पाए
तो कुछ तो जरूर होता है इन भावनाओं में
वरना खर्च करके अपनी संपत्ति
कौन यहाँ खुश होता है?

…[राकेश]

मई 7, 2010

प्रेम और अंहकार

समय रहते
एक बार तो
जवाब दे दो
मेरी पुकार का|
बाद में
ऐसा ना हो
समय उलझा ले
अपनी व्यस्तता के
जाल में मुझे|
और
विवश मै
चाहकर भी
तुम्हारी आवाज ही न सुन पाँऊ
…[राकेश]
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