Archive for ‘हास्य-व्यंग्य’

अगस्त 3, 2015

फेसबुक से बाहर वास्तविक जीवन में फेसबुकीय सिद्धांतों का नतीजा

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फ़रवरी 8, 2015

दलाली … हरिशंकर परसाई की दृष्टि से

एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जाएेगा।

सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की,आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।

शाम तक वे इंतजार करते रहे कि अब मुनाफाखोर टांगे जाएेंगे- और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।

लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,”महाराज,आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।”

राजा ने कहा,”कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जाएेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही,सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।

भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,”पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।”

राजा ने कहा,”तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएेगा।”

तभी दूसरा बोल उठा,”पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।”

राजा ने जवाब दिया,”नहीं,ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।”

लोगों ने पूछा,” तो कितने दिन बाद वे लटकाये जाएेंगे।”

राजा ने कहा,”आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।”

लोग दिन गिनने लगे।

सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया,फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!

उन्हें खम्भे के पास एक मजदूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मजदूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।

उन्होंने शिकायत की ,”महाराज, आप मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे ,पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मजदूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।”

राजा ने मजदूर से पूछा,”क्यों रे,किसके हुक्म से तुम लोगोंने खम्भे उखाड़े?”

उसने कहा,”सरकार ,ओवरसियर साहब ने हुक्म दिया था।”

तब ओवरसियर बुलाया गया।

उससे राजा ने कहा,” क्यों जी तुम्हें मालूम है ,मैंने आज मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?”

उसने कहा,”जी सरकार!”

“फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?”

“सरकार,इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जाएें।”

अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।

बिजली इंजीनियर से कैफियत तलब की गयी,तो उसने हाथ जोड़कर कहा,”सेक्रेटरी साहब का हुक्म मिला था।”

विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा,खम्भे उखाड़ने का हुक्म तुमने दिया था।”

सेक्रेटरी ने स्वीकार किया,”जी सरकार!”

राजा ने कहा,” यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ,तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।”

सेक्रेटरी ने कहा,”साहब ,पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!”

राजा ने पूछा,”यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?

सेक्रेटरी ने कहा,”मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।”

राजा ने पूछा,”कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?”

सेक्रेटरी ने कहा,”बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार।घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।”

विशेषज्ञ ने निवेदन किया,” सरकार ,मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है ,पर मैं जानता हूँ कि इस वक्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे जमीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पावरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता ,न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।

लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफाखोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे ,जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।

उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं:-

सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये

श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख

श्रीमती इंजीनियर -१ लाख

श्रीमती विशेषज्ञ – २५ हजार

श्रीमती ओवरसियर-५ हजार

उसी सप्ताह ‘मुनाफाखोर संघ’ के हिसाब में नीचे लिखी रकमें ‘धर्मादा’ खाते में डाली गयीं-

कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये

विधवाश्रम को- १ लाख

क्षय रोग अस्पताल को- १ लाख

पागलखाने को-२५ हजार

अनाथालय को- ५ हजार

जनवरी 26, 2015

आर के लक्ष्मण : अलविदा ‘कॉमन मैन’ के रचियता

rk laxmanrklaxman2आर के लक्ष्मण ने दशकों तक हिन्दुस्तान को प्रभावित करने वाले सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों को अपने कार्टूनों के जरिये इस तरीके से उभारा कि मुद्दों को हास्य और व्यंग्य के तरीके से समझने की एक परम्परा ने लोगों के अंदर अपनी पकड़ बनाई| उनके कार्टूनों के शिकार बने नेता भी उनके कार्टूनों का उसी बेसब्री से इंतजार किया करते थे जैसा कि आम पाठक किया करता था|

अब आर के लक्ष्मण नहीं रहे और अब “You Said It” में नये कार्टून स्थान नहीं पायेंगे|

उनके कार्टूनों की विरासत से अनभिज्ञ पीढ़ी शायद उस जीनियस परम्परा को नहीं जान पायेगी जो आर के लक्ष्मण उन्होंने शुरू की थी|

 

नवम्बर 21, 2014

भारतीय प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्राओं का सूत्र : शरद जोशी

देश के लिए यह सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की, मगर यह सच है कि भारत के प्रधानमंत्री के पद का दर्जा कुछ महीनों से बहुत तेजी से उठ गया है। जो साधारण सड़कछाप वोटर इस गलतफहमी में थे कि वे अपने लिए एक एमपी या देश का प्रधानमंत्री चुन रहे हैं, उन्हें यह पता लगना चाहिए कि दरअसल उन्होंने एक विश्वनेता चुना था, जो इस समय संसार की समस्याएं सुलझाने में लगा है।

संसार में समस्याएं बहुत अधिक हैं, मगर खेद है कि यह देश अपनी संवैधानिक मजबूरियों के कारण केवल एक प्रधानमंत्री संसार को सप्लाई कर सकता है। काश, हमारे पास चार-पांच प्रधानमंत्री होते, तो हम उन्हें पूरी दुनिया में फैला देते। और तब शायद यह भी संभव होता कि उनमें से एक प्रधानमंत्री हम अपने देश के लिए भी रख लेते, जो असम समस्या, अकाली समस्या, सूखा समस्या, भूखा समस्या टाइप की जो छोटी-मोटी समस्याएं हैं, उनसे माथापच्ची कर लेता। हमारे पास सिर्फ एक प्रधानमंत्री है। इतने सारे देश हैं। उससे जितना बनता है, वही तो करेगा। मुहावरे में कहा जाए, तो अकेली जान क्या-क्या करे! ….

संसार के देश तो चाहते हैं कि हमारे भारत का प्रधानमंत्री पूरे वक्त उनके मुल्कों में ही घूमता रहे और विश्वशांति, परस्पर सहयोग, छोटे देशों की कड़की दूर करने में बड़े देशों का योग आदि नियमित विषयों पर पूरे उत्साह से भाषण देता रहे। अच्छे भाषण सुनना कौन नहीं चाहता! अच्छी अंगरेजी सुनना कौन नहीं चाहता! पर हमारी मजबूरी है कि हमारी प्रधानमंत्री पूरे साल बाहर नहीं रह सकतीं। उन्हें कुछ दिनों देश में भी रहना पड़ता है। लोकसभा का सेशन होता है, कश्मीर में चुनाव आ जाता है। या दीगर ऐसी कुछ बातें हैं, जब भारत के प्रधानमंत्री को भारत में रहना जरूरी है, मजबूरी है। कई बार जवाबी कार्रवाई करने किसी दूसरे देश का प्रधानमंत्री भारत में टपक पड़ता है। तू हमारे देश में भाषण देगा, तो हम तेरे देश में भाषण देंगे बदले की भावना के साथ। उस समय उसका स्वागत तथा दीगर औपचारिकताएं बरतने भारत के प्रधानमंत्री को भारत लौटना पड़ता है। …

भारत का प्रधानमंत्री ऐसी ऊंची चीज है कि वह अब दुनिया का नेता है। वह भारत के काम का नहीं रहा। एक तो ऐसी टुच्ची देसी समस्याओं में उसका माइंड खराब करवाना भी ठीक नहीं है। अगर चाहते ही हो कि भारत का प्रधानमंत्री भारत की समस्या पर ध्यान दे, तो समस्या का लेवल उठाओ। उसे इतनी बड़ी बनाओ कि वह भारत के प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के काबिल लगे। आप चाहते हो कि बंबई की कपड़ा मिलें बंद पड़ी हैं, तो भारत का प्रधानमंत्री उस छोटी-सी बात में लगा रहे। फिर तीसरी शक्ति के देशों की ओर पहली और दूसरी शक्ति का ध्यान कौन चौथी शक्ति खींचेगी, अगर प्रधानमंत्री की एनर्जी बंबई के मजदूरों पर सोचने में चली गई। समस्या का स्तर उठाओ। जब तक वह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का दर्जा नहीं प्राप्त कर लेती, तब तक कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का नेता उर्फ भारत की प्रधानमंत्री उस पर कैसे ध्यान देंगी?

दूसरा तरीका यह है कि आपस में निपट लो। शांति और सद्भाव से निपटो, तो अच्छी बात है। नहीं, तो कोई जरूरी नहीं, क्योंकि ये चीजें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में जरूरी होती हैं। जैसे चाहो निपट लो। जब हमारा प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मामले निपटाने में लगा है, तो हम आपसी मामले तो निपटा ही सकते हैं। एक व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उसके देश के निवासी इतना सहयोग तो कर ही सकते हैं। उसे तंग मत करो। खुद कर लो, क्या करना चाहते हो।

… वह (विदेश) जाता है। बार-बार एक ही बात को कहने जाता है। और न जाए तो बेचारा क्या करे! इस घटिया देश की दो कौड़ी की समस्याओं में सिर चटवाने से तो किसी अंतरराष्ट्रीय जमघट में बड़ी समस्या पर भाषण देना अच्छा है। भारत का प्रधानमंत्री यही करता है। देश की हालत कुछ भी हो, पर यही हमारी महानता है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है।

{शरद जोशी}

[(साप्ताहिक ‘रविवार’: 24-30 जुलाई, 1983 में “सारे जहां का दर्द ” शीर्षक से प्रकाशित)]

अक्टूबर 31, 2014

महात्मा गांधी बनाम अंग्रेज : कार्टूनिस्ट शंकर की निगाह से

गांधी विरोधी ‘अंग्रेजों’ की खिंचाई कार्टूनिस्ट शंकर स्टाइल

लाजवाब, ऐतिहासिक कार्टून

Gandhicartoon

कार्टून : साभार श्री ओम थानवी (जनसत्ता)

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दिसम्बर 9, 2013

शीला…शीला की ज़ुबानी …अरविन्द केजरीवाल की कहानी

AKSD

राजनीति में अहंकार विनाशकारी सिद्ध होता ही होता है|

मनुज  बली नहि होत है,

समय होत बलवान,

भीलन लूटी गोपिका,

वही अर्जुन, वही बान!

समय कब नाचीजों को महाबलियों को धूल चटाने लायक शक्ति दे दे इसके बारे में सिर्फ समय ही जान सकता है|

बड़े बोल बोलना किसी भी नेता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं इसे शीला दीक्षित की हार, कांग्रेस और भाजपा के द्वारा लगाए लाखों अड़ंगे  के बावजूद हुए अरविन्द केजरीवाल के रानीतिक उत्थान  ने सिद्ध कर दिया है|

मई 28, 2013

आम तो आम खटास के भी दाम

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‘आम के आम गुठलियों के दाम’ और ‘आम फलों का राजा है’ इन दो कथनों से हरेक हिंदी भाषी भली-भांति परिचित रहता है| ये भी सच है कि मौसम में आम ही नहीं बौराते बल्कि आम की आमद होने पर इसके प्रशंसक भी बौरा जाते हैं| जैसे ही आम के वृक्षों पर बौर आने शुरू होते हैं और हवा के संग संग इनसे उठने वाली भीनी भीनी सुगंध इधर उधर तैरने लगती है, आम के चाहने वालों के दिमाग की घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती हैं और भले ही वे दिन अब चले गये जब लोग ऐसी चाहतों का इजहार कर दिया करते थे, पर मन ही मन उस दिन का इन्तजार करने का समय तो अभी बीता नहीं है जब आम उनके मुंह के रास्ते दिमाग को शान्ति और आनंद प्रदान करेंगे| इतंजार की तीव्रता गहन होती जाती है डाल पर आमों को लटकता देख कर| आम के पेड़ों पर लदान करते ही एक भय यह भी समाने लगता है कि कहीं तोटे और अन्य पक्षी और बंदर कच्चे आमों को ही न नष्ट कर दें| या कही आंधी तूफ़ान ही आम के फसल को नष्ट न कर दे| इन सब भय को पार करके ही आनंदित करने वाले आम मिलने वाले होते हैं|
पर यह सब तो आम के उन भक्तों का आँखों देखा और खुद भुगता हाल है जो इतने सौभाग्यशाली हैं कि आमों को अपने आँखों से शून्य से प्रकट होते देखते हैं और अंत में उनका रस्सावादन करते हैं| अब तो तादाद उन भक्तों की ज्यादा है जो शहरों में कंक्रीट के जंगलों में वास करते हैं और ठेलों पर या सब्जी और फलों की दुकानों पर आम रखने होने से ही उन्हें आम की आमद का पता चल पाता है| इन भक्तों में ऐसे उत्सुक भी होते हैं जो अपने वाहन से कहीं की यात्रा करते हुए सड़क किनारे (ज्यादातर किसी आम के बाग-बगीचे के पास) लगे आम के ठेलों के पास रुकने और आम खरीद कर उन्हें खाने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं|
पर मार्के की बात यह कि ताजा फसल वाला आम तो बहुत कम लोगों को नसीब हो पाता है| बागों के बाहर भी लोग वही आम बेचते पाए जाते हैं जो वे मंडी से खरीदते हैं और मंडी को नियंत्रित करते हैं व्यापारी और व्यापारी तो आम का भक्त है नहीं, वह तो भक्त है पैसे का और पैसा का मुरीद होने के नाते इतना रिस्क तो वह उठा नहीं सकता कि आम को पकने के लिए पेड़ों पर छोड़ दे और जब वे खाने लायक हो जाए तब उन्हें बेचे, या कम से कम अखबार और भूसे में कुछ दिन रख कर पकाने जैसे पुराने ग्रामीण और बहुत हद तक प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल करे| इतना धैर्य व्यापारी में कहाँ और इस विधि में उसका नियंत्रण बहुत रह नहीं पाता सो वह तो विश्वास करता है कच्चे आम को इकट्ठा करके रसायनों वाले कृत्रिम तरीके से पकाने में| इससे एक तो विधि पर उसका नियंत्रण रहता है और अब बाजार आम की पूर्ती और उसके मूल्य पर पूरा पूरा नियंत्रण रख सकता है और रखता है|
अब तो बिरले ही लोग हैं जो आम के प्राकृतिक स्वाद का आनंद ले सकते हैं| इन बिरलों में कुछ ऐसे हो सकते हैं जो बाग में काम कर रहे हैं वरना अधिकतर वे धनी लोग हैं जिनके पास आम के बाग हैं| अब धनी ही लोग ऐसे बचे हैं जो आम की भिन्न भिन्न किस्मों का आनंद उनके लिए अधिकृत विधि से ले सकते हैं| बाकी लोगों को तो अब बाजार से पिलपिले या एकदम ठोस किस्म के आम खरीद कर खाने पड़ते हैं और आम के हर टुकड़े के साथ निराश मन के साथ यह दोहराना पड़ता है –

क्यों तुझ संग प्रीत लगाईं बेवफा

बाजार में उपलब्ध ‘आम’ की हरेक किस्म का ऐसा ही बुरा हाल है| न केवल उनके रूप-रंग से बल्कि उनके स्वाद से भी खूबसूरती नदारद है|

कुछ ऐसे सब्जी और फल बेचने वाले समूह भी हैं जो दावे करते हैं कि उनके यहाँ फलों को रसायन या अन्य क्रत्रिम तरीकों से नहीं पकाया जाता पर क्या ये दावे वास्तविकता पर आधारित हैं? क्या संबधित सरकारी विभाग की जिम्मेवारी नहीं बनती कि ऐसे दावों की जांच करे?
ऐसे आउटलेट्स पर बिकने वाले आम खरीदिए उसे चाकू से काटिए, हो सकता है ऊपर से मीठा निकले पर जैसे जैसे आम खाने वाला गुठली की तरफ बढ़ेगा, आम के गुदे का रंग पीला होता जाएगा और स्वाद खट्टा और गुठली के एकदम ऊपर की परत तो एकदम पीली (कच्चे आम का रंग) और स्वाद में नींबू जैसी खटास लिए हो सकती है| प्राकृतिक तरीके से पकाए आम में ऐसे भेदभाव तो नहीं मिलते! फिर ये क्या गोरखधंधा है?
क्या यह भारत जैसे कृषि अर्थव्यस्था पर आधारित देश के लिए शर्मनाक बात नहेने है कि देशवासी ही अच्छा आम नहीं खा सकते| वैसे और बहुत सारी सब्जियों और और फलों की किस्मों की तरह अच्छे भारतीय आम पूरी शान से विदेशी बाजारों में उपलब्ध हो जायेंगे| मिट्टी पानी देश का और आम जैसे राष्ट्रीय फल आनंद दे विदेशियों को|
अब समय आ गया लगता है जब आम के बागों और आम की दुकानों के बाहर निर्देश पट्टिका लगा देना चाहिए

यह ‘आम’ रास्ता नहीं है| कृपया, ‘आम’ आदमी दफा हो जाए

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अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

फ़रवरी 11, 2011

रेगिस्तान में हिमपात : कविराज की पहली पुस्तक

और अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे मित्रों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। बीसियों साल लगे हैं इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!

पहले कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और बाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई करके प्रबंधन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ने की व्यस्तता के कारण उन्हे ऐसा मौका नहीं मिल पाया कि वे किताब प्रकाशित करा पाते । पर एक दिन किताब छपवाने का ख्याल फिर से आ गया तो उसने जाने का नाम ही नहीं लिया। सर पर चढ़ कर बैठ गया विचार कि इससे पहले की तुम और गंजे हो जाओ उससे पहले किताब छपवा लो। बस विचार के आगे समर्पण करके उन्होने अपने पुराने हस्तलिखित कागज ढूँढे। हिन्दी में टाइप करना सीखा और युद्ध स्तर पर कम्प्यूटर में अपनी पुरानी कवितायें टाइप करके संग्रहित कर दीं।

विरोधाभासी बातें एक ही कविता में कहना उनका एक खास गुण रहा है और इसीलिये उन्होने अपनी किताब का शीर्षक भी ’रेगिस्तान में हिमपात’ रखा है।

तब हॉस्टल के समय वे बैठे बैठे, चलते चलते, नहाते नहाते, खाते खाते  कवितायें उवाचते रहते थे, बल्कि उनके रुम मेट तो कहा करते थे कि यह बंदा नींद में भी कवितायें गढ़ता रहता है। एक बार तो ऐसे ही मित्रों ने किसी अवसर पर खुद खाना बनाने का आयोजन किया तो प्याज काटते काटते कविराज के मुख से सुर झड़ने लगे।

नैनों में अश्रु आये प्याज जो काटी हाये
ऐसे में कोई आके मोहे चश्मा लगा दे

कविता में कैसी भी तुकबंदी कर दें पर कविराज गाते बहुत अच्छा थे। किशोर के गीत को उनके जैसी आवाज में खुले गले से गाने की कोशिश करते और मुकेश के गीत को उनके जैसी विधा में।

वैसे तुकबंदी की प्रेरणा उन्हे अभिनेता प्राण से मिली। हुआ यूँ कि उन्होने दिल दिया दर्द लिया फिल्म देखी और प्राण के बचपन की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकार के मुख से निकले एक  काव्यात्मक नारे ने उन्हे बहुत लुभाया था। वह पात्र दूध लेकर आये नौकर से गाकर कहा करता था

दूध नहीं पीना तेरा खून पीना है

कविराज को भी बचपन से ही दूध नापसंद था सो स्पष्ट है कि उन्हे उपरोक्त्त नारा पसंद आना था। हाँ खून पीने की बात उन्हे पसंद न आयी थी। सो उन्होने उसकी जगह चाय रख दी थी और अक्सर वे गुनगुनाते थे।

दूध नहीं पीना मुझे चाय पीनी है

और भी तमाम फिल्मों में प्राण कुछ न कुछ काव्यात्मक तकियाकलाम बोला करते थे और उनके अभिनय की यही बात कविराज को लुभा गयी। बाद में उन्होने प्राण के तरीके से ही बड़े अभ्यास के बाद सिगरेट के धुंये से हवा में छल्ले बनाना सीख लिया। हालाँकि वे धुम्रपान नहीं करते थे पर ऐसा करने वाले साथियों से कहते थे कि जब थोड़ी सी सिगरेट रह जाये तो मुझे छल्लों की प्रेक्टिस के लिये दे देना।

बकौल खुद उनके, कविता रचने के प्रति उनका प्रेम जीवन के पहले पहले प्रेम के कारण ही पनपा। आठवीं कक्षा में पढ़ते थे और साइकिल पर स्कूल जाते हुये उन्हे एक अन्य स्कूल की छात्रा से प्रेम हो गया। उनकी साइकिल बिल्कुल उसी गति और तरीके से चलने लगी जैसे कि उस लड़की की साइकिल के पहिये चलते।

घर में कविराज के पिता भी आरामकुर्सी पर आँखें बंद करके  देखा देखी बलम हुयी जाये गाती हुयी बेग़म अख्तर की आवाज में घंटों खोये रहते थे।

प्रेम का जीन तो पक्का पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहता है।

कविराज का प्रेम जब देखादेखी की हदों में सिमटने से इंकार करने लगा और पढ़ते हुये कॉपी किताबों के पन्नों में भी तथाकथित प्रेमिका का चेहरा दिखायी देने लगा और बैठे बैठे वे उसके ख्याल में खो जाने लगे तो उन्हे प्रेरणा मिली प्रेम पत्र लिखने की। कायदे से यही उनकी पहली रचना थी। दुनिया के बहुत बड़े बड़े लेखकों के लेखन की शुरुआत प्रेम पत्र लिखने से ही हुयी है।

तो शुरुआत उनकी गद्य से हुयी। करुण हास्य का बोध उन्हे इस प्रेम गाथा से गुजरने के बाद ही हुआ। बाद में वे खुद ही चटकारे लेकर अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी का हाथों लिखा और आँखों देखा हाल सुनाया करते थे।

कुछ पंक्त्तियाँ तो अभी भी याद आती हैं। उस जमाने में उन्हे लड़की की नाक बहुत पसंद थी। मुमताज़ उनकी पसंदीदा नायिका थीं और उनके जैसी ही नाक उस लड़की की भी थी। पत्र में उसके प्रति प्रेम को विस्तार से स्वीकारने की औपचारिकता के बाद उन्होने अपनी कल्पनाओं को प्रदर्शित करते हुये लिखा था कि वे उसकी नाक को अपनी नाक से छूना चाहते हैं

तब तो उन्हे पता न था कि संसार के बहुत सारे कबीले ऐसे हैं जहाँ नाक से नाक छुआकर प्रेम को प्रदर्शित किया जाता है।

हंसते हुये लड़की के गाल सुर्ख लाल हो जाया करते थे और उनके अनुसार उन्हे लाल अमरुद याद आ जाते थे। दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह उन्हे भी बचपन में सफेद से ज्यादा लाल रंग वाले अमरुद बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे। लाल अमरुद उनके अंदर सौंदर्य बोध जगाता था जैसे कि बसंत में टेसू के फूल भी उन्हे आह्लादित कर जाते थे। नदी किनारे लगे अमलतास के पेड़ तो उन्हे इतना आकर्षित करते थे कि वे बहुत बार पेड़ से लटकी फूलों की झालरें तोड़ने के लिये नीचे नदी में गिर चुके थे। तैरना उन्हे थोड़ा बहुत आता था पर तैरने में कुशलता तो उन्होने अपनी इसी हरकत से हासिल की।

कहने का तात्पर्य यह है कि बचपन से ही वे कुदरती तौर पर एक प्रेमी थे। जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है,” Ohh! By nature he was a romantic person”, ऐसे वे हुआ करते थे। अभी भी हैं।

प्रेम करना या प्रेम में होना उनके लिये बहुत जरुरी था। वे भी कहते थे और बहुत सारे मित्र इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि भारत नामक देश में, खासकर हिन्दी भाषी प्रदेशों में, युवा लोग दो इच्छाओं का तहेदिल से पीछा करते हैं- एक थी किसी लड़की से प्रेम करना और दूसरी आई.ए.एस बनना। दूसरी इच्छा बहुत कठिन श्रम माँगती है तो उसे सम्भालने के लिये और जीवन की अन्य कठिनाइयों से उत्पन्न ऋणात्मक ऊर्जा को सम्भालने के लिये युवा प्रेम में आसरा खोजा करते थे। आजकल भी खोजा करते होंगे बस प्रेम अब कागजी और हवाई न रहकर देह से ज्यादा जुड़ गया है और अब जैसे भी हो जल्दी से जल्दी देह-सम्बंध बनाने की इच्छा कुलबुलाती रहती है।

बहरहाल कविराज ने कॉपी से पन्ने फाड़कर एक लम्बा सा रुक्का लिखा जिसमें उन्होने अपने पहले प्यार की सारी भावनायें बहा दीं और कई दिनों तक मौका तलाशते रहे कि लड़की उन्हे मिनट भर को भी अकेली मिल जाये। एक दिन सुबह स्कूल जाते हुये उन्हे ऐसा मौका मिल भी गया और उन्होने शीघ्रता से साइकिल लड़की की साइकिल के नजदीक लाकर रेलगाड़ी की रफतार से धड़कते दिल के साथ पत्र जेब से निकाला और हकलाते हुये लड़की से कहा,” तुम्हारे लिये है पढ़ लेना“।

चेहरा उनका डर के मारे लाल हो चुका था। पत्र को उसके हाथों में थमाकर उन्होने सरपट साइकिल दौड़ा दी।

दोपहर बाद स्कूल से लौटते हुये उसी जगह जहाँ उन्होने लड़की को पत्र सौंपा था एक बलिष्ठ युवक ने उन्हे रोका।

संयोग की बात कि इस घटना से पहले दिन उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने सबको Aftermath शब्द का अर्थ समझाया था पर कविराज उसे समझ नहीं पाये थे। हो सकता है कि उनका अंतर्मन प्रेमिका के ख्यालों में गुम हो और उनकी इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण न कर पायीं। पर उस युवक के रोके जाने के बाद हुयी घटना और उसके बाद मन में उठने वाले भावों ने उन्हे अंग्रेजी के शब्द का अर्थ बखूबी समझा दिया। कहते भी हैं कि जीवन में स्व: अनुभव का बड़ा महत्व है।

उस शाम उनके विचलित मन में प्रथम बार काव्य का प्रस्फुटन हुआ और उन्हे कक्षा में पढ़ी काव्य पंक्तियों के अर्थ ऐसे समझ में आने लगे जैसे उनकी कुंडलिनी जाग्रत हो गयी हो।

वियोगी होगा पहला कवि विरह से उपजा होगा गान

जैसी पंक्त्तियों ने उनसे कहलवाया

वियोगी ही बन पाते हैं कवि विरह से ही उपजता है ज्ञान

तो उपरोक्त्त पंक्ति उनके द्वारा रची गयी पहली काव्यात्मक पंक्त्ति थी। पूरे चौबीस घंटे उनका दिमाग किसी और ही दुनिया में विचरण करता रहा। फिर जाने क्या हुआ कि उन्हे करुण – हास्य जैसे  मिश्रित भाव का बोध होने लगा। अगली रात के करीब दो बजे होंगे, जब पूरे मोहल्ले में शायद वे ही जाग रहे थे, उन्होने सिनेमा के परदे पर भावनात्मक रुप से लुटने-पिटने के बाद एक अजीब सी मुस्कान फेंकने वाले राज कपूर की भांति एक मुस्कान अपने चेहरे पर महसूस की और उनके हाथों में थमी कलम सामने मेज पर रखी कॉपी के पन्ने पर चलने लगी।

कलम रुकी तो उन्होने पढ़ा कि कुछ पंक्तियाँ पन्ने पर ठहाका मार रही थीं। उन्होने उन पंक्तियों को ऐसे पढ़ा जैसे कि इनका अस्तित्व उनके लिये अजनबी हो।

समझते रहे हम आज तक जिसे अपनी कविता
वह तो निकली सूरज पहलवान की बहन सविता
अब कभी न होने वाले साले ने, घुमा के थप्पड़ ऐसे मारे
लाल कर दिये गाल हमारे, आंखों में नचा दिये तारे

तो हास्य मिश्रित करुण भाव से यह उनका पहला साक्षात्कार था। पहले प्यार में खाये थप्पड़ों ने उन्हे यह साहस न करने दिया कि वे यह राज जान पाते कि कैसे लड़की के भाई को उनके प्रेम पत्र के बारे में पता चला। यह राज राज ही बना रहा और उन्हे सालों तक सालता रहा।

पहले प्यार ने उन्हे कवि बना दिया। बाद में उनकी लेखन प्रतिभा उन लोगों के बड़ी काम आयी जो प्रेम करने की जुर्रत तो कर बैठते थे पर प्रेम पत्र तो छोड़िये घर वालों को कुशल क्षेम का पत्र भी नहीं लिख पाते थे ऐसे सारे साक्षर अनपढ़ तथाकथित प्रेमियों के लिये प्रेम पत्र कविराज ही लिखा करते थे।

कविराज की काव्य रचने की क्षमता में सबसे खास बात थी कि जब ’बस दो मिनट’ जैसे विज्ञापन नूडल्स को भारतीयों पर थोप रहे थे वे मिनट भर में ही लुभाने वाली पंक्तियाँ लेकर हाजिर हो जाते थे। नारे बनाने में उनका कोई सानी न था।

सीनियर बुश ने इराक पर हमला किया और सैटेलाइट टी.वी की बदौलत जब दुनिया ने युद्ध का लाइव कवरेज देखा और भारत में बुश और सद्दाम हुसैन के पक्ष और विपक्ष में ध्रुवीकरण होने लगा तो उन्हे सद्दाम हुसैन से व्यक्तिगत कोई लगाव न था पर कविराज बुश की साम्राज्यवादी नीतियों के सख्त खिलाफ थे। एक रोज सुबह जब कुछ लोग जॉगिंग करते हुये नवाबगंज की दीवार के पास से गुजरे तो उन्होने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा पाया

सद्दाम उतरे खाड़ी में बुश घुस गये झाड़ी में

बीती रात कविराज खाना खाने के बाद से कुछ घंटों के लिये गायब थे। लौटने पर उन्होने बताया था कि वे पास के सिनेमा हॉल में नाइट शो देखने गये थे।
पहले तो कभी वे अकेले फिल्म देखने न गये थे। उन्होने कभी स्वीकार न किया परंतु मित्रों को संदेह था कि बुश और सद्दाम हुसैन के ऊपर बनाया गया नारा उन्होने ही गढ़ा था।

ऐसा नहीं कि वे केवल तुकबंदी वाली कवितायें ही रचते थे। वे बेहद ज़हीन और संवेदनशील कवितायें भी रचते थे। बस उन्हे देख पाने का सौभाग्य उनके केवल दो मित्रों को ही मिला था और वह भी इस आश्वासन के बाद कि उनके इस संवेदनशील रुप की बात जाहिर न की जाये। वे अमिताभ बच्चन के चरित्रों जैसी दिलजलों वाली धीर-गम्भीर छवि ही बनाये रखना चाहते थे, ऐसा दिलजला जो कॉमेडी का सहारा तो लेता है पर अंदर से अकेला है।

कितने ही साथियों के प्रेम सम्बंध कविराज की लेखनी के कारण मजबूती के जोड़ से जीवित रहे। कितनों के प्रेम सम्बंध शादी की परिणति पा गये। यह संदेहास्पद है कि किसी भी साथी ने अपनी पत्नी पर कभी यह राज खोला होगा कि उसे लिखे जाने वाले उच्च कोटि के प्रेम पत्रों में उसका योगदान बस इतना था कि वह कविराज के लिये चाय, फिल्म और खाने का इंतजाम करता था।

कविराज की कवितायें कॉपियों, रजिस्टरों एवम डायरियों के पन्नों में बंद होती गयीं।

सालों बीत गये। साथी दुनिया में इधर उधर बिखर गये। ईमेल का पर्दापण हुआ तो सम्बंध फिर से स्थापित हुये और फिर ऊर्जा जाती रही तो त्योहारों और नव वर्ष आदि के अवसरों पर शुभकामनायें भेजने तक संवाद बने रहे। यादें तो यादें हैं कभी जाया नहीं करतीं, जीवन कितनी ही और कैसी ही व्यस्तताओं में क्यों न उलझा ले पर ऐसे मौके आते हैं जब बीते हुये की स्मृतियाँ पास आकर बैठ जाती हैं।

और जब एक रोज़ सूचना मिले कि आखिरकार कविराज की कवितायें छप ही गयीं और पुस्तक डाक से पहुँचने वाली है तो प्रसन्नता तो होती है भाई!

प्रसन्नता होनी लाजिमी है।

…[राकेश]

फ़रवरी 2, 2011

मुल्ला नसरुद्दीन : लंका में सभी बावन गज के

बात उन दिनों की है जब मुल्ला नसरुद्दीन को एक प्रदेश के शिक्षा विभाग ने कुछ समय के लिये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर ससम्मान आमंत्रित करके नियुक्त्त किया था और नसरुद्दीन ने देश के विकास में शिक्षा के मह्त्व को देखते हुये यह जिम्मेदारी अपनाने की स्वीकृति दे दी थी। उन्होने शिक्षा विभाग को कहा कि विभाग को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहिये। वे प्रदेश भर के प्राथमिक स्कूलों के दौरे करने लगे। आज यहाँ तो कल वहाँ। साल के किसी दिन अवकाश न था उन्हे।

सारे दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर

उनका तो अटल विश्वास था ’कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत पर। किसी तरह की बाधा उन्हे न रोक पाती।

उसके बाद उन्होने दसवीं और बारहवीं तक के विद्यालयों के दौरे किये। उन्होने अपने इन तूफानी दौरों के दौरान सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, निजी, गरीब और धनी स्कूलों एवम विद्यालयों के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र के कला और विज्ञान को गहराई से खंगाला।

इन यात्राओं से उपजे ज्ञान को देश के चहुँमुखी विकास और इसकी एकता और अखंडता की मजबूती के लिये उपयोग में लाने के लिये उन्होने राज्य सरकार को बेशकीमती सुझावों से भरी रिपोर्ट सौंपी। अगर मुल्ला नसरुद्दीन की रिपोर्ट पहले राज्य और बाद में समूचे देश में लागू हो जाती तो देश की दशा और दिशा ही और होती। पर राजनीतिज्ञों से ऐसी आशा रखनी कि वे विशुद्ध देश हित में कोई काम करेंगे ऐसा है कि जैसे कोई बरसते सावन में बिना छाते के बाहर निकल पड़े और सोचने लगे कि भीगेगा नहीं या कोई शराब का तबियती शौकीन दूरदराज से आती बेग़म अख्तर की आवाज में सुनकर कि

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

हाथ में बड़े बड़े जग आदि लेकर बरसात में खड़े हो जायें और बाद में निराश होकर बरसात को और उस आदमी को गालियाँ दें जो बेग़म की गज़ल सुन रहा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की बुनियादी सिफारिशें थीं कि देश के बच्चे देश की जिम्मेदारी हैं और ये बच्चे ही आने वाले भविष्य की दुनिया को संवार सकते हैं और हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने की एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिये। अगर प्राथमिक स्कूल के स्तर पर ही बच्चों में धन, जाति और सम्प्रदाय के भेद होने लगेंगे तो यह बात भूल जानी चाहिये कि बड़े होकर वे इन भेदभावों से ऊपर उठ पायेंगे। ऐसा कभी नहीं हो पायेगा और देश के संसाधन, ऊर्जा और विचारशक्त्ति जैसे सभी बहुमूल्य गुण इन झगड़ों से निबटने में ही नष्ट होती रहेंगे और देश और इसके वासी पिछड़े ही रहेंगे।

शिक्षा सरकार का सबसे परम कर्त्तव्य होना चाहिये और सरकार को सबसे अच्छे स्कूल और विद्यालय खुद खोलने चाहिये और देश के सभी बच्चों को उनमें ही पढ़ाया जाये।

प्रदेश सरकार ने मुल्ला नसरुद्दीन की सिफारिशों पर कान न रखे।

सरकारें यदि देशहित में शिक्षा पद्यति लागू कर दें तो शिक्षा के क्षेत्र में घुसपैठ करके लाखों करोड़ रुपये कमा रहे माफियाओं का क्या होगा। समाज खुद नहीं चाहता कि बच्चों से भेदभाव खत्म हो अतः लोग खुद पसंद करते हैं कि आर्थिक, जाति और सम्प्रदाय के आधार पर बने स्कूल और विद्यालयों में ही उनके बच्चे पढ़ें ताकि उनके झूठे अहं बने रहें।

बहरहाल मुल्ला नसरुद्दीन ने जिस काम में अपना समय और अपनी ऊर्जा झौंकी वह प्रयास उस समय तो सफल न हो पाया, हो सकता है कि कभी ऐसा भी देश में हो जाये। आशा का साथ छोड़ना मनुष्य के लिये संभव नहीं।

नसरुद्दीन जीवन के किसी भी क्षेत्र से हास्य की बात खोज ही लेते थे। अपने इन दौरों से जुड़ी बहुत सारी मजेदार बातें वे बताया करते थे और उनमें से बहुत सारी बातें चुटकलों के रुप में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। भले ही लोग जानते न हों कि इन चुटकलों की शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन ने ही की थी।

अपने इन दौरों से जुड़ा एक मजेदार वाक्या वे सुनाते थे।

एक बार वे किसी पर्वतीय इलाके में बड़े ही दुर्गम स्थल पर स्थित एक स्कूल का दौरा करने पहुँच गये। उस दूरदराज के स्कूल में कभी कोई अधिकारी नहीं गया था पर मुल्ला तो कवियों एवम रवि से भी ज्यादा कुशल थे और जहाँ रवि और कवि भी न पहुँच पायें वे वहाँ भी पहुँच जाते थे।

नसरुद्दीन तो उस जगह के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गये। प्रकृति ने हर तरफ अपने सौंदर्य का ऐसा जलवा बिखेर रखा था कि आँखें हटती ही न थी। हवा में ऐसी ताजगी थी कि साँस लेने में भी आनंद की अनुभूति होती थी। आंनदविभोर नसरुद्दीन स्कूल में प्रवेश करते ही प्रधानाध्यापक के कक्ष में गये और उन्हे अपना परिचय देते हुये कहा कि वे अकेले ही कक्षाओं का मुआयना करेंगे और अध्यापकों को बताकर परेशान और सचेत न किया जाये।

छोटा सा स्कूल था। नसरुद्दीन कक्षाओं के बाहर से ही अध्यापकों एवम विधार्थियों को आपस में संवाद करते हुये देखते और सुनते रहे। तभी उनकी दृष्टि बाहर मैदान में पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर पड़ी। वे वहाँ पहुँचे और बच्चों से पूछा कि वे वहाँ क्यों बैठे हैं तो एक बच्चे ने बताया कि यहाँ उनकी अंग्रेजी की क्लास लग रही है।

नसरुद्दीन ने पूछा,” और आपके टीचर कहाँ हैं?”

जी, वे अभी आ जायेंगे। कल गिर गये थे हाथ में फ्रैक्टर हो गया था, उसी के लिये पास के अस्पताल से होकर स्कूल आने को बोल गये थे।

नसरुद्दीन बच्चों से बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होने ध्यान दिया कि बच्चे अंग्रेजी शब्दों को उनके मूल उच्चारण के साथ न बोलकर उन्हे उनके लिखने के आधार पर उच्चारित कर रहे हैं। मसलन ’अम्ब्रेला’ को कुछ ’यूम्बरेला’ बोल रहे थे और कुछ ’उम्ब्रेला’, ’स्टडी’ को ’स्टयूडी’ या ’स्टूडी’, ’गोट’ को ’जोट’ बोल रहे थे। अंग्रेजी की वर्णमाला में जो वर्ण जैसा उच्चारित किया जाता है वे शब्दों में भी उसे लगभग वैसा ही बोल रहे थे।

नसरुद्दीन ने सोचा कि टीचर से ही बात करेंगे। सो वे बच्चों से कहने लगे कि यहाँ चारों तरफ कितनी प्राकृतिक सुंदरता फैली हुयी है। उन्होने एक बच्चे से पूछा कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

’जी नेटूर’

’नेटूर’?

’जी हाँ नेटूर’

’इसकी स्पेलिंग बता सकते हो’?

जी हाँ… एन ए टी य़ू आर इ ।

तब तक टीचर भी हाथ में प्लास्टर चढ़वाये हुये वहाँ आ गये। प्रधानाध्यापक ने उन्हे मुल्ला नसरुद्दीन के दौरे के बारे में बता ही दिया था। आते ही वे नमस्कार करके मुस्कुराते हुये खड़े हो गये।

नसरुद्दीन ने उनका हाल पूछा, हाथ के बारे में पूछा और फिर उसी बच्चे से कहा कि अब फिर से बताये कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं और उस अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग क्या है?

बच्चे ने फिर से दोहरा दिया।

नसरुद्दीन ने टीचर की ओर देखा। टीचर बच्चे की तरफ गर्व से मुस्कुराकर देख रहे थे। शाबास बेटा।

नसरुद्दीन ने दोहराया, एन ए टी य़ू आर इ, इन सबसे मिलकर क्या बना।

सब बच्चों ने समवेत स्वर में नारा लगाया और उनके साथ साथ उनके टीचर ने भी स्वर मिलाया, ” एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर”।

नसरुद्दीन के मस्तक पर पसीने की नमी आ गयी। पर वे अपने भावों पर नियंत्रण कर गये।

अच्छा बच्चों पढ़ाई करो।

टीचर से विदाई लेकर नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक के कक्ष में आ गये। वे कुछ क्रोधित भी थे। उन्होने प्रधानाध्यापक से कहा,” महोदय आपके स्कूल के अंग्रेजी के अध्यापक, कैसी अंग्रेजी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”

अच्छी अंग्रेजी पढ़ाते हैं श्रीमान।

कैसी अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वे बच्चों को शब्दों का सही उच्चारण भी नहीं सिखाते। एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर, पढ़ाते हैं। इच्छा तो हो रही है कि उनकी शिकायत लिखूँ।

प्रधानाध्यापक निवेदन करने लगे,” नहीं श्रीमान ऐसा न करें, घर में अकेला कमाने वाला है। बेचारे का फुटूर बिगड़ जायेगा”।

’फुटूर’ सुनकर तो नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक का चेहरा देखते रह गये।

वहाँ सुधार का प्रबंध तो उन्होने किया ही। बाद में जब वे यह किस्सा सुनाते थे तो कहते थे कि इसलिये कहा जाता है कि लंका में सभी बावन गज के।

…[राकेश]

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