Archive for ‘साहित्य’

फ़रवरी 22, 2017

समर शेष है … रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

फ़रवरी 16, 2017

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे…

छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है|

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा

एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों  से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टान, तालाब

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव – गाँव, जंगल- गलियाँ जाऊँगा|

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फुरसत से नहीं

उनसे एक जरूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा|

(विनोद कुमार शुक्ल)

फ़रवरी 14, 2017

फीरोजी होठ … धर्मवीर भारती

purple-001इन फीरोजी होठों पर

बरबाद मेरी जिंदगी

इन फीरोजी होठों पर |

गुलाबी पांखुरी पर हल्की सुरमई आभा

कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर

इन फीरोजी होठों पर |

तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई

तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई|

तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पाँत शरमाई

किसी भी मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता

सिखाने को कहा

मुझसे प्रणय के देवताओं ने

तुम्हे आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

अंधरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन

मृणालो की मुलायम बांह ने सीखी नहीं उलझन

सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप-जैसा तन

पंखुरियों पर भँवर के गीत-सा मन टूटता जाता

मुझे तो वासना का

विष हमेशा बन गया अमृत

बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद

मेरी जिंदगी बरबाद!

गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग़ तरुणाई-

सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई ?

न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई

बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी

हमेशा आदमी

मजबूर होकर लौट आता है

जहां हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

(धर्मवीर भारती)

फ़रवरी 10, 2017

शून्य और अशून्य … कुँवर नारायण

संबंध में शून्यता को प्रेम भर देता है, संसार से कर्म संबंध जोड़ देता है, अथाह अकेलेपन में आस्था ईश्वर रूपी बंधन से जोड़कर भराव कर देती है पर आतंरिक शून्यता का क्या किया जाए? वह तो रहती ही है, पर उसका भी एक परम उपयोग है जो कुँवर नारायण अपनी इस छोटी लेकिन अनूठी कविता में सुझाते हैं|

एक शून्य है

मेरे और तुम्हारे बीच

जो प्रेम से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और संसार के बीच

जो कर्म से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और अज्ञात के बीच

जो ईश्वर से भर जाता है|

 

एक शून्य है

मेरे ह्रदय के बीच

जो मुझे मुझ तक पहुँचाता है|

(कुँवर नारायण)

फ़रवरी 8, 2017

कलिंग … श्रीकांत वर्मा

एक ही काल, समय और स्थान पर उपस्थित सभी मानवों के ऊपर एक ही बात का असर एक जैसा नहीं होता, बल्कि एक ही कृत्य में शामिल सभी कर्मियों का शामिल होना एक समान नहीं होता, बाहर से भले ही एक जैसा दिखाई दे पर भीतर से एक जैसा कतई नहीं होता| सब अपने तईं किसी घटना में सम्बंधित होते हैं, हो पाते हैं| सभी अपनी अपनी संवेदना, अपमे बोध के स्तर या अपनी नींद सी खुमारी की तीव्रता के कारण किसी बात से अलग- अलग ही स्तरों पर प्रभावित होते हैं| जकड़ना और छोड़ना, जकड़ना और फिर छोड़ना या छोड़ना और फिर पकड़ना, ये सारी प्रक्रियाएं निर्भर करती हैं कि कर्ता कितनी गहराई से इनसे जुड़ा हुआ था| आधे अधूरे स्तर पर पकडने वाले से छूटेगा भी हल्का सा ही, अपनी पूरी शक्ति से पूरी एकाग्रता से जकड़ने वाला ही छोड़ कर बंधन से मुक्ति पा सकता है, तभी सतह पर तैरते साधू पार नहीं हो पाते जीवन भर जबकि जिसे अपराधी या पापी कहता है समाज, वह एक झटके में पार हो जाता है, क्योंकि उसने अँधेरे को पकड़ा तो हुआ था पर जब इसे छोड़ प्रकाश में आया तो समूचा ही आया, कुछ भी उसने फिर अँधेरे में रहने नहीं दिया|

कवि श्रीकांत वर्मा ने अशोक, जिसे दुनिया कलिंग में भयंकर नरसंहार करके विजय प्राप्त करने वाले चक्रवर्ती सम्राट अशोक के रूप में याद रखती है, और जिसे इसलिए भी इतिहास याद रख पाया है कि उसने हिंसा को छोड़ा तो अहिंसा को गले लगा लिया, के बहाने इसी पूर्ण समाहित होने की बात को अपनी कविता “कलिंग में कहा है| लड़े तो अशोक के साथ उसके हजारों सैनिक, पर विरक्ति केवल अशोक को हुयी, बोधि की तरफ रुझान केवल अशोक का हुआ, क्योंकि उसने हिंसा का पूरा वर्तुल पूरा करके शांति और अहिंसा की ओर कदम बढ़ाए| उसने जो किया पूरे मन से किया|

केवल अशोक लौट रहा है

और सब

कलिंग का पता पूछ रहे हैं|

केवल अशोक सिर झुकाए हुए है

और सब

विजेता की तरह चल रहे हैं|

केवल अशोक के कानों में

चीख गूँज रही है|

और सब

हँसते-हँसते दोहरे हुए जा रहे हैं|

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं|

केवल अशोक

लड़ रहा था|

(श्रीकांत वर्मा)

 

फ़रवरी 7, 2017

मैंने जीवन की शराब पी – त्रिलोचन

मैंने जीवन की शराब पी,

बार बार पी|

जब – जब होश हुआ तब-तब ले-लेकर

प्याला ओठों तक पहुँचाया|

अंतस्तल में ढ़ाला उस रस को,

जिसकी संचित सोद्वेग चाह थी सिरा-सिरा में|

जागा, जागकर एक आह को देखा,

मुझको लाकर किस दुनिया में डाला उसने,

जहां भले स्वप्नों तक का तो ठाला रहता है:

खीझा, फिर अपनी नई राह ली|

मैं इस जीवन की शराब को पीते-पीते

वर्षों का पथ,

क्षण की  छोटी-सी सीमा में तय करता चुपचाप आ रहा हूँ|

अंजाने और अपरिचित चेहरे अपने जैसे जीते

जीर्ण-शीर्ण मिलते हैं,

मैं उनका कर थामे देता हूँ जीवन,

जीवन के मधुमय गाने|

(त्रिलोचन)

 

दिसम्बर 15, 2016

आप मेरा क्या कर लेंगें … (भारतभूषण अग्रवाल)

एकल व्यक्ति पर सरकार का, सत्ता का, या कि समाज या परिवार का या कि किसी दूसरे का कितना नियंत्रण वाजिब है या कि तमाम तरह की बंदिशों और दिशा निर्देशों के मध्य एक अकेले व्यक्ति की कितनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है यह सदैव ही एक ज्वलंत प्रश्न रहा है| भले ही कोई लोक्तान्त्रिक देश का नागरिक हो पर सरकारें अपने नागरिकों के जीवन पर भारी  नियंत्रण रखना ही चाहती हैं| ऐसे नियंत्रण करने की कोशिशों से भरे काल में किसी समय कवि भारतभूषण अग्रवाल ने यह कविता लिखी होगी, जो कि मौजूदा समय में ज्यादा प्रासंगिक बन गई है|

आप क्या करेंगें मेरा अगर मैं,

यह जो सामने लैम्प रखा हुआ है,

इसे कह दूँ?

कि यह भारतीय गणतंत्र है?

बिना यह बताए कि यह करेंट मारता है?

तो भी आप मेरा क्या कर लेंगें?

सच, क्या कर सकते हैं आप मेरा

अगर कल मैं अचानक यह तय कर लूँ कि

मैं डी.टी.यू का इस्तेमाल नहीं करूँगा

और फिर क्यू फांदकर चलती बस में चढ़ जाऊं बताइये,

यह कैसे जरूरी है कि

आपकी योजनाओं से मुझे तकलीफ हो जब कि

मैं यूनीवर्सिटी में भर्ती होना ही नहीं चाहता?

आप चाहे मुझे फ़िल्म फेस्टीवल का निमंत्रण दें या लाटरी का इनाम?

पर आप दे ही सकते हैं|

मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते|

क्योंकि आप कितना ही परिवार नियोजन सुनाएँ

मैं विज्ञापन- कार्यक्रम पर कान लगाए रहूंगा|

आपकी मर्जी है आप छाप दें अखबार में हर सुबह

अपनी या उनकी तसवीर

मुझे आप आठ बजे उठने से नहीं रोक सकते|

आप मेरे सुख की चिंता करके मुझे तंग करने पर तुले हैं|

पर मैं ठीक जानता हूँ कि उससे मुझे कोई सरोकार नहीं|

क्योंकि अभी मेरी भाषा का विकास कहाँ हुआ है?

हो सकता है आप मुझसे सहमत न हों|

पर असहमति कोई अश्रु – गैस नहीं हैं

कि मैं भाग कर गली में छुप जाऊं|

(भारतभूषण अग्रवाल, 31.7.1969)

 

 

दिसम्बर 12, 2016

थोड़ा सा … (अशोक वाजपेयी)

ashok vajpai-001एक संवेदनशील और जिम्मेदार कवि अपनी कविता में जीवन में जो कुछ अच्छा है उसकी देखरेख जरूर ही करता है और किसी भयानक दौर में उस अच्छे को बचाए रख पाने के आशावाद को भी अपनी कविता में समाहित करता चलता है|

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी दवारा अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में लिखी कविता – थोड़ा-सा, मनुष्य जीवन में सत्य, संवेदना, और  ईमानदारी, जैसे तत्वों के महत्व को रेखांकित करती है और उन्हें संजोये रखने पर जोर देती है|

अगर बच सका

तो वही बचेगा

हम सबमें थोड़ा-सा आदमी…

जो रौब के सामने नहीं गिडगिडाता,

अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर

सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,

जो अपने सामने हुई वारदात की

गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –

वही थोड़ा- सा आदमी –

जो धोखा खाता है पर प्रेम करते रहने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए

दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता-

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,

जो अपनी चुपड़ी खाते हुए

दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है –

वही थोड़ा-सा आदमी –

जो बूढों के पास बैठने से नहीं ऊबता

जो अपने घर को चीजों का गोदाम बनने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है

और दुनिया को नरक बना देने के लिए

दूसरों को ही नहीं कोसता|

 

वही थोड़ा-सा आदमी-

जिसे खबर है कि

वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,

आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,

पक्षी आँगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण-

वही थोड़ा-सा आदमी

अगर बच सका

तो वही बचेगा|

(अशोक वाजपेयी)

सितम्बर 26, 2016

अभी कई बातें …(Sándor Weöres)

sandorअभी तो कहने को कई बातें शेष हैं,

घटनाएं जिन्हें हमने जिया,

बातें जो हमने सीखीं,

वस्तुएं जिन्हें हमने देखा,

और मुलाकातें जो कई बार हुईं

और वे जो हुईं सिर्फ एक बार,

हर फूल इंतजार कर कर रहा है अपना जिक्र किये जाने का,

हर मुट्ठी भर धूल इस लायक है कि उस पर ध्यान दिया जाए,

मगर जब इन पर कुछ कहने का मौक़ा आएगा इनमें से सिर्फ एक,

और उस एक के भी कुछ टुकड़े समा पायेंगें कहने में,

जहां तक स्मृतियों का सवाल है मनुष्य करोड़पति होता है,

मगर जब उन्हें कलमबद्ध करने का वक्त्त आता है तो

वह पाता है खुद को कंगाल,

लगभग हर चीज किताब के बाहर छूट जाती है,

और अंदर रह जाते हैं चंद टुकड़े और स्वप्न|

(Sándor Weöres, हंगेरियन कवि)

प्रस्तुति – साभार विनोद शर्मा

 

सितम्बर 23, 2016

रचना बच जाना है … (रमेशचंद्र शाह)

rameshchandra-shahरचनात्मक घटने की प्रक्रिया की अनुभूति को हर कलाकार अपने स्तर पर देखता, स्वीकारता और ग्रहण करता है| कुछ सोचते और कहते हैं – उन्होंने रचा, कुछ कहते हैं – वे माध्यम बन गये और रचना रच गई| अपने देश, काल और वातावरण से जूझ कर बहुत कुछ ऐसा होता है जो कलाकार के रचनात्मक कार्य करने की इच्छा और बोध को उद्वेलित कर जाती है और वह उस सत्यांश को अपनी कला का रूप दे देता है|

कम ही कलाकार अपने रचनाकर्म की प्रक्रिया पर खुल कर बोलते हैं| वरिष्ठ कवि श्री रमेशचंद्र शाह इस पर एक कविता ही रच गये|

रचना बच जाना है|

अपने और तुम्हारे

सबके

विष का

पच जाना है|

मैं

जो रचता नहीं

न रच पाने की कुण्ठा

भी सह सकता नहीं

वही

मैं

कैसे

किस मुँह से

कह दूँ —

तुम सबसे ज्यादा

मैंने

हाँ मैंने

सच को

जाना है

रचना

बच जाना है|

(रमेशचंद्र शाह)

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