Archive for ‘समीक्षा’

मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

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जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

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मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

जनवरी 27, 2011

भगवती चरण वर्मा : एक प्रेम कविता

पदमभूषण, राज्यसभा के सदस्य श्री भगवती चरण वर्मा ने चित्रलेखा, रेखा, भूले-बिसरे चित्र (साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), सामर्थ्य और सीमा, सबहि नचावत राम गोसाईं, सीधी सच्ची बातें, टेढ़े मेढ़े रास्ते, पतन, और तीन वर्ष आदि प्रसिद्ध पुस्तकें लिख कर अपनी गद्य-रचना से हिन्दी जगत को अपने लेखन का प्रशंसक बनाया था। उच्च स्तरीय गद्य के साथ साथ उन्होने उच्च कोटि के काव्य की रचना भी की।

स्त्री-पुरुष के मध्य पनपे प्रेम पर उच्च स्तरीय लेखन करने के भाव से दुनिया का हर लेखक एवम कवि गुजरता ही गुजरता है और यह इच्छा उसके जीवन में कई बार सिर उठाती है और कुछ रचियता उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर प्रेम के अलग- अलग रुपों को अपनी रचनाओं के माध्यम से खोजने का प्रयास करते हैं। साहित्य हो या फिल्में, प्रेम में वियोग की स्थिति में स्त्री की कोमल भावनाओं को प्रदर्शित करने वाली सामग्री बहुतायत में मिल जाती है पर पुरुष की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्त्ति कम ही मिलती है।

पुरुष भी वियोग में आँसू बहा सकता है। भगवती बाबू प्रस्तुत कविता में प्रेमिका के वियोग से पीड़ित प्रेमी के भावों को अभिव्यक्त्ति देते हैं। प्रेम किसी भी व्यक्त्ति (स्त्री या पुरुष) की ऊर्जा के स्तर को बदल डालता है, चाहे प्रेमीगण प्रेम में संयोग की खुशी से लबरेज़ हों या बिछोह की पीड़ा से गुजर रहे हों, उनकी ऊर्जायें अलग हो जाती हैं, दोनों ही परिस्थितियों में रात की नींद की गुणवत्ता, प्रकृति और अवधि बदल जाती है। दिमाग और मन की चेतना का स्तर अलग हो जाता है। देखने की, महसूस करने की और सहने की क्षमता अलग हो जाती है। संवेदनशीलता अलग हो जाती है।

वियोग में प्रेमीगण अपने प्रेम की भावनाओं को अपने प्रेमी तक किसी भी तरह पहुँचाना चाहते हैं। कभी उन्हे हवा से आस बंधती है कि जो हवा यहाँ उनकी खिड़की के बाहर बह रही है वह सीधे चलकर उनके प्रेमी के पास जायेगी और उनके प्रेम का संदेश पहुँचा देगी, कभी उन्हे आसमान में चमकते चाँद को देखकर ढ़ाढ़स बँधता है कि यही कुछ करेगा।

भावना के जगने की देर है कि नींद उड़ जाती है।

भगवती बाबू ने वियोग में जल रहे प्रेमी पुरुष के मनोभावों को बड़ी ही खूबसूरती से नीचे दी गयी कविता में उकेरा है!

क्या जाग रही होगी तुम भी?
निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये!
अपना यह व्यापक अंधकार,
मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;
मेरी पीड़ाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;
किस आशंका की विसुध आह!
इन सपनों को कर गई पार
मैं बेचैनी में तड़प रहा;
क्या जाग रही होगी तुम भी?

अपने सुख-दुख से पीड़ित जग, निश्चिंत पड़ा है शयित-शांत,
मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;
यदि एक साँस बन उड़ सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य
यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत

पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;
मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,
क्या जाग रही होगी तुम भी?

जुलाई 14, 2010

गालिब छुटी शराब : मयखाने से होशियार लौटते रवीन्द्र कालिया

बात सूफियों की हो तो उनकी मधुशाला तो भिन्न होती है, उनकी मधु ही कुछ अलग होती है और वहाँ ऐसा आदमी तो बेकार है जो इतनी न पी ले कि होश खो जाये। वे तो कहते हैं

वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा।

पर आम जीवन में जो मयखाने से होशियार लौट आये उसे भाग्यशाली ही समझा जायेगा। आम जन जीवन वाला मयखाना तो एक ही रास्ते पर भेजता है और मयकशी के रास्ते पर अत्यंत रुचि के साथ चलने वाले के लिये ही किसी ने कहा है कि

कारवां खड़ा रहा
और वे अपनी दुकान बढ़ा चले।

जीवन के कितने कामों को अधूरा छोड़कर, अति प्रिय सपनों को पूरा करने का प्रयास करे बगैर ही आदमी कूच कर जाता है। मयगोशी के ऐसे ही वन वे ट्रैफिक वाले रास्ते से वरिष्ठ साहित्यकार श्री रवीन्द्र कालिया न केवल वापिस घर आ गये बल्कि उन्होने वापसी के इस सफर में गुजारे क्षणों में, जब वे लगभग अकेले ही यात्रा कर रहे थे, सबको अकेले ही करनी पड़ती है ऐसी यात्रा, एक बहुत ही जीवंत किताब की रचना भी कर दी। किताब की अवधारणा तो तभी बन गयी होगी जब वे वापिस जीवन की ओर आने के लिये प्रयासरत रहे होंगे, किताब को लिखा भले ही कुछ समय बाद हो उन्होने।

गालिब छुटी शराब” एक जीवंत आत्मकथा है। यह शुरु से अंत तक रोचक है और कितने ही पाठक इसे एक ही बार में पढ़ गये होंगे और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे एक ही बार में पढ़ जाने के लिये विवश हो जायेंगे, जब भी पुस्तक उनके हाथ पड़ेगी। आत्मकथाओं के साथ ऐसा कम ही होता है और ज्यादातर पाठक इन्हे किस्तों में पढ़ते हैं क्योंकि भले ही बहुत अच्छी सामग्री इन किताबों में हो पर कहीं न कहीं वे बोझिल हो उठती हैं और लगातार पढ़ना थोड़ा भारी लगता है पाठकों को।

गालिब छुटी शराब” के साथ ऐसा नहीं है। हास्य तो हर पन्ने पर बिखरा पड़ा है और केवल दूसरों की ही खिंचाई रवीन्द्र कालिया जी ने इस हास्य बोध के द्वारा नहीं की है बल्कि बहुत निर्ममता से अपना और अपनी आदतों का पोस्ट-मार्टम भी किया है। इंसान का दिल तो दुखता ही दुखता है पर इस दुख को भी लेखक ने हास्य के आवरण में लपेट कर पेश किया है और अपनी तरफ से भरकस कोशिश की है कि सब कुछ पाठक हँसते हँसते हुये ही समझ जाये।

गालिब छुटी शराब” को पढ़ना “चार्ली चैप्लिन” की बेहतरीन मूक फिल्में देखने जैसा है जहाँ दर्शक उनके द्वारा घटनाओं को दर्शाने के तौर तरीकों पर हँसता भी रहता है और उनके द्वारा निभाये गये पात्र के दुखों को महसूस भी करता रहता है। ऐसा संतुलन बनाये रखना अत्यंत कठिन काम है। इस तरह की शैली में लिखी दूसरी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में याद नहीं पड़ती हाँ मराठी में जरुर रामनगरकर की आत्मकथा रामनगरी ऐसी ही शैली में लिखी गयी थी जहाँ जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी हास्यबोध के मुलम्मे से ढ़क कर प्रस्तुत किया गया था।

पुस्तक पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी सपाट चेहरे से हास्य उत्पन्न करने वाली बातें कहने में पारंगत होंगे। दिल्ली में अपने मित्र के साथ माता के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रसंग में उनकी यह प्रतिभा अपने विकट रुप में सामने आती है। ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पाठक पढ़ते पढ़ते हँसी से लोट पोट हो सकते है।

कन्हैया लाल नंदन जी के साथ इलाहाबाद पहुँचने वाला प्रसंग भी रवीन्द्र जी की कलम की श्रेष्ठता हास्य के क्षेत्र में दर्शाता है।

गालिब छुटी शराब” में सिर्फ हास्य ही नहीं है बल्कि जीवन के और भी दूसरे रंग अपनी छटा बिखेरते हुये सामने आते हैं। ग़ालिब का नाम शीर्षक में शामिल है तो शायरी की मौजूदगी पुस्तक में मौजूद होना भरपूर वाजिब है और मौकों पर बड़े माकूल शे’र सामने आते रहते हैं। पिछले पाँच दशकों में हिन्दी साहित्य में उभरे कितने ही नाम जीवंत होकर उभरते रहते हैं। एक ही व्यक्ति का अलग अलग व्यक्तियों से अलग अलग किस्म का सम्बंध हो सकता है और अब जब रवीन्द्र कालिया जी की पीढ़ी के रचनाकार आत्मकथायें लिखने की ओर अग्रसर हैं तो अलग अलग रचनाकार इन रचनाओं में अलग अलग रुपों में नजर आयेंगे। कितनी बातें प्रभावित करती हैं किसी भी व्यक्ति का रेखाचित्र लिखने में।

एक तो रचनाकार को उसकी रचनाओं के जरिये जानना होता है, और एक होता है उसे व्यक्तिगत रुप से जानना और दोनों रुप काफी हद तक अलग हो सकते हैं और होते हैं अगर ऐसा न होता तो प्रेमकहानियों की रचना करने वाले रचनाकारों के अपनी पत्नी या प्रेमिका/ओं से अलगाव न हुआ करते। व्यक्तिगत सम्बंध रचनाकार की समझ, दृष्टिकोण और कलम को भी कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में प्रभावित करते ही हैं।

गालिब छुटी शराब” पढ़कर ऐसा भी प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी की याददाश्त बहुत अच्छी होनी चाहिये या फिर हो सकता है कि वे अपने कालेज के दिनों से ही डायरी लिखते रहे हों क्योंकि बहुत पहले के प्रसंग भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आते हैं और एक अन्य खासियत इस पुस्तक की यह लगती है कि रवीन्द्र जी ने अपनी वर्तमान आयु की समझदारी का मुलम्मा पुराने प्रसंगों और काफी पहले जीवन में आये व्यक्तियों की छवि पर नहीं चढ़ाया है और जैसा तब सोचते होंगे उन लोगों के बारे में या जैसा उन्हे देखा होगा वैसा ही उनके बारे में लिखा है। चाहे पंजाब में गुजारे हुये साल हों या बम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद में गुजारे साल, यह बात सब जगह दिखायी देती है।

केवल व्यक्ति ही नहीं वरन वे सब जगहें भी, जहाँ रवीन्द्र जी ने अपने जीवन का कुछ समय व्यतीत किया, अपने पूरे जीवंत रुप में किताब के द्वारा पाठक के सामने आती हैं। खासकर इलाहाबाद के मिजाज को लेखक ने खास तवज्जो दी है। अमरकांत जी और राजेन्द्र यादव जी जैसे प्रसंगों के जरिये उन्होने इलाहाबादी माहौल और हिन्दी साहित्य के पिछले चालीस-पचास सालों के धुरंधर नामों के बीच बिछी, अदृष्य शतरंज की झलक भी दिखायी है। हर काल में समकालीनों के मध्य ऐसा ही होता है।

किताब में केवल शराब, लेखन, पार्टियाँ और धमाल आदि ही नहीं है वरन रवीन्द्र जी ज्योतिष और होम्योपैथी चिकित्सा शैली से अपनी मुठभेड़ और स्वाध्याय के आधार पर दोनों ही क्षेत्रों में कुछ समय तक डूबकर इन विधाओं के प्रति उत्पन्न अपने लगाव की भी चर्चा करते हैं। उनके जीवन में भविष्यवाणियों ने असर दिखाया, इस बात की पुष्टि उन्होने कुछ प्रसंगों द्वारा की है। संजय गाँधी की असमय मृत्यु की भविष्यवाणी हो या दिवंगत राजनेता चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा सत्तर के दशक में ही करने वाला प्रसंग हो या चेहरा देख कर ही व्यक्ति का भूत-वर्तमान और भविष्य बता सकने के प्रसंग हों, रहस्यवाद का जीवन में स्थान है यह बात आत्मकथा दर्शाती है।

आत्मकथा इस बात को स्थापित करती है कि जवानी में रवीन्द्र जी यारों के यार वाले ढ़ांचे में रहे होंगे और कुछ हद तक आदर्शवाद भी उनके मन मस्तिष्क पर छाया रहता होगा वरना डा. धर्मवीर भारती से जुड़े प्रसंग उनकी किताब में इस तरह से उभर कर न आते आखिरकार पुस्तक यही बताती है कि व्यक्तिगत रुप से डा भारती हमेशा अच्छे ही रहे रवीन्द्र जी के लिये परन्तु रवीन्द्र जी ने उनका विरोध उनकी सामान्य छवि के आधार पर किया।

किताब रवीन्द्र जी के जीवन में आये साहित्यकारों, राजनेताओं और अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करती है।

यह बात जरुर गौर करने वाली है कि क्या कोई भी साहित्यकार बिल्कुल निरपेक्ष रह पाता है जब वह अपने जीवन में आये लोगों और खासकर प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में लिखता है?

क्या लेखक की कलम भेदभाव करती है मित्रों, गहरे मित्रों, परिचितों और व्यक्तिगत रुप से अपरिचित लोगों के प्रति?

गालिब छुटी शराब में भी कहीं कहीं इस अंतर को महसूस किया जा सकता है।

आशा की जा सकती है कि पूर्ण रुप से स्वास्थ्य लाभ करके पुनः साहित्य की दुनिया में पुरजोर सक्रिय होने वाले श्री रवीन्द्र कालिया इस बाद के जीवन पर भी अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिखंगे।

जिसने न पढ़ी हो वे अवश्य पढ़ें इस बेहद रोचक ढ़ंग से लिखी आत्मकथा को।

जून 5, 2010

राग-विराग : श्रीलाल शुक्ला ने छोटा किया जीवन का विस्तार

तेज रफ्तार से भागती ज़िन्दगी और उसके पीछे भागते लोग। समय की कमी हर जगह दिखायी देती है। साहित्य रचते समय दोहा, हाइकू, त्रिवेणी, और चौपाई आदि लिखने के अलावा लेखक के ऊपर ऐसा दबाव नहीं होता कि उसे संक्षेप में अपनी कल्पना को संजोना है। लेखक विस्तार में जाना चाहता है, विस्तार से बताना चाहता है, खासकर जब उसे उपन्यास लिखना हो। उसे एक तरह का मोह हो जाता है अपने विषय से और अपने पात्रों से जुड़ी हरेक घटना उसे महत्वपूर्ण लगने लगती है।

श्रीलाल शुक्ला जी के उपन्यास राग-विराग की एक खासियत है कि यह कहानी को संक्षेप में कह जाता
है। पर 120 से कुछ कम ही पृष्ठों में सिमटी पुस्तक तीन दशकों से ज्यादा की कहानी कह जाती है और बदलते समाज, बदलते मूल्यों और न बदल सकने वाली सामाजिक बुराइयों की तरफ इशारे कर जाती है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में चल रहे भ्रष्टाचार की और ऊँगली उठा जाती है, और साथ ही साथ प्रेम को खंगाल कर सम्बंधों में आ रही और आ सकने वाली विशेष परिस्थितियों का विवरण भी दे जाती है।

राग-विराग पाठक के अंदर एक सन्नाटा सा उत्पन्न करती हुयी चलती है। पुस्तक एक तरह से लोगों की अकेले होते जाने की प्रवृति की ओर इशारा करती है। लोगों को दूसरों के साथ सम्बंध तो चाहियें पर ऐसा बिल्कुल उनकी शर्तों पर होना चाहिये। प्रेम सम्बंध जैसे सम्बंधों में भी दिल से ज्यादा दिमाग सक्रिय हो गया है। प्रेम की तरफदारी करने और आगे सब ठीक होगा जैसी बात लोगों को आश्वास्त नहीं करती उन्हे पक्की गारंटी चाहिये कि आगे इस प्रेम सम्बंध के कारण अच्छा ही होगा। जीवन में परिवर्तन तो चाहिये पर परिवर्तन इतना बड़ा न हो कि उथल पुथल मचा जाये।

राग-विराग की नायिका सुकन्या, एक मेडिकल छात्रा, अपने सीनियर डा. शंकर, जो कि उसी मेडिकल कालेज से एम. डी कर रहा है, को पसंद करती है, उसे जीनियस मानती है परन्तु वह अंदर से डरती भी है कि कहीं शंकर उसके प्रति प्रेम का इजहार न कर दे। शंकर के प्रति अपने प्रेम के भाव पर ब्रेक उसने खुद ही लगाये हुये हैं। कहीं न कहीं उच्च जाति की सुकन्या को शंकर का निम्न जाति में जन्मा होना डराता है। उसे शायद इस बात का डर है कि यदि उसने शंकर से शादी कर ली तो उसकी सामाजिक स्थिति में अवांछित परिवर्तन न आ जायें और जीवन कठिनाइयों से न भर जाये।

पुस्तक जो शब्दों से नहीं बताती वह भी अपरोक्ष रुप से दर्शा ही देती है। रोचक ढंग से पुस्तक आगे दिखाती है कि वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्याओं से डर कर सुकन्या शंकर के प्रेम प्रस्ताव पर कान नहीं धरती पर समस्यायें सुकन्या के जीवन को घेर ही लेती हैं जब वह अपने पिता के कहने पर उनके एक मित्र के सुपुत्र सुबीर, जो कि सेना में मेजर हैं और दिखने में खूबसूरत हैं, से विवाह कर लेती है।

राग-विराग लोगों के ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टीकल होते जाने की ओर इशारा करती है। शुरुआत में ही एक प्रसंग में सुकन्या अपने पिता को उत्साहित होकर शंकर के बारे में बता रही है कि कैसे शंकर ने एम. एस. सी करके भी मेडिकल में प्रवेश लिया क्योंकि उसके अंदर गहरे में एक डाक्टर बनने की धुन थी और कैसे वह अपने अध्यापकों से ज्यादा जानता है। कैसे शंकर ने कार्डियोलॉजी में एम. डी करने के बाद फिर से एम.डी मेडिसिन में प्रवेश लिया क्योंकि उसे लगता है कि दिल की बीमारी के शिकार लोग अपना इलाज करा सकते हैं परन्तु लाखों गरीब लोगों को रोगी बनाने वाली कितनी ही बीमारियाँ हैं जिनके लिये भी उच्च शिक्षा प्राप्त डाक्टर्स का होना बहुत जरुरी है। सुकन्या के पिता अपनी पुत्री के मुख से शंकर की इतनी तारीफ सुनकर उसे टोकते हैं कि इतनी सब पढ़ाई करने वाला शंकर कम से कम पैंतीस साल का तो होना ही चाहिये और वह उससे तो काफी साल बड़ा होगा। वे इस बात से चिंतित होते हैं कि कहीं उनकी पुत्री शंकर के साथ प्रेम में तो नहीं पड़ गयी?

शंकर को विश्व प्रसिद्ध एक विदेशी शोध संस्थान में शोध करने के लिये फैलोशिप मिल जाती है। सुकन्या की मौसी उसे बताती है कि उसे शंकर के प्रति अपने तथाकथित प्रेम को अपने अंदर मान्यता देनी चाहिये और शंकर को भी बता देना चाहिये। पर सुकन्या अपने अंदर घर कर गयी जाति आदि से सम्बंधित पुरानी मान्यताओं को नहीं तोड़ पाती और शंकर देश छोड़ कर चला जाता है।

पर क्या शंकर को सुकन्या से गहरायी के स्तर पर प्रेम है? या वहाँ भी कुछ शर्ते हैं जिसके कारण वे दोनों केवल पसंद आने वाली हदों तक ही सीमित रहते हैं। सुकन्या के डा. पिता को वह बचपन से जानता है और पुस्तक का यह भाग प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी मंत्र की याद दिलाता है। सुकन्या के पिता द्वारा बचपन में दिखायी गयी बेरुखी उसे आज तक सालती है और वह डा. राय को भी अपने पिता की असमय मौत का कुछ हद तक जिम्मेदार मानता है।

इतने प्रैक्टीकल लोगों के बीच पुस्तक शंकर के बचपन के मित्र के द्वारा इंसानियत के भाव को जिंदा रखती है। जवानी में सुकन्या शंकर के दोस्त को पसंद नहीं करती थी पर सालों बाद जब वह अस्पताल की प्रमुख बन जाती है तब शंकर का वही दोस्त, जो कि किसी सरकारी कार्यालय में चौथी श्रेणी का कर्मचारी है, उसे इंसानियत के पाठ पढ़ा जाता है अपने बर्ताव से।

सालों बाद शंकर के एक सेमिनार में मुख्य वक्ता के रुप में आने पर यह जानकर कि शंकर ने शादी नहीं की, सुकन्या की मौसी उन दोनों को मिलाने का प्रयत्न करती हैं और सुकन्या पर कटाक्ष भी उसकी जातिवादी सोच को लेकर। पर सुकन्या सेमिनार के बाद शंकर से मिलने की संभावना को ही खत्म कर देती है और पलायन करके देहरादून चली जाती है।

अगर उनके मध्य प्रेम था तो एक और मौका उनके सामने आया था मिलन का। शंकर के पास भी सेमिनार के दौरान एक मौका था सुकन्या के प्रति अपने प्रेम के इजहार करने का पर वह उसे गंवा देता है। कहीं न कहीं उन दोनों के मध्य अहं भी है। शंकर को भी शायद मालूम है कि उसके और सुकन्या के बीच एक खाई है और जो शायद भरी नहीं जा सकती। तब भी वह एक ऐसे स्थान पर जाता है जहाँ वह और सुकन्या सालों पहले जाया करते थे। उसे पता है कि सुकन्या नहीं आयेगी वहाँ पर वह जाता है और इंतजार करता है। वह नहीं आती। और वह भी लौटकर अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो जायेगा।

पुस्तक ढ़ेर सारे प्रश्न तो उठाती ही है। पर एक प्रेम कहानी के रुप में सबसे बड़ा प्रश्न जो यह उठाती है वह सुकन्या और शंकर के बीच पनपी हुयी हिचक का है। बात सुकन्या और शंकर के विवाह की ही नहीं है। अब तो दोनों अपनी अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हैं पर क्या वे इतने सालों बाद भी अपने प्रेम को स्वीकार नहीं कर सकते?

पुस्तक में दिखायी गयी प्रेम कहानी को समय के स्तर पर देखा जाये तो इसका ऐसा अंत इंटरनेट और मोबाइल युग से पहले के युग में सार्थक लगता है और इसके अंत को अस्सी के दशक के अंत के सालों में बीता हुआ माना जा सकता है।  इंटरनेट और मोबाइल युग का प्रवेश कथानक के अंत को निश्चित रुप से थोड़ा बदल देगा।

…[राकेश]

मई 31, 2010

श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते

श्याम, कान्हा, कृष्ण… कुछ भी कह लो उन्हे, वे जीवन के मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है। कृष्ण जीवन का उल्लास हैं, उत्सव हैं। उन्होने सिर्फ सैधान्तिक रुप में ही जीवनदर्शन नहीं उच्चारित किया वरन हरेक बात को खुद जीकर दिखाया। गीता तो एक बहुत छोटी सी कुंजी है उस विशालतम व्यक्तित्व द्वारा दिखायी लीला के दर्शन की।

मन में गहराई से भक्तिभाव से भरे एक आस्तिक को ऐसा बता दिया जाये कि ईश्वर नहीं है तो उस “विशेष” के न होने की कल्पनामात्र से ही उसका सारा अस्तित्व काँपने लगेगा। वह अपने को इतना निरीह पायेगा जितना उसने अपने को पहले कभी नहीं पाया था। जो उसके पास था सदा, जो उसकी पूँजी था, जिसके कारण उसे ऊर्जा मिलती थी आज वह नहीं है का अहसास किसी को भी हिला कर रख देगा।

जब विराट व्यक्तित्व पास में हो, सदा सुलभ हो, सहज ही जिस तक पहुँच हो तब उस विशाल उपस्थिति से भी कुछ शिकायतें हो जाना स्वाभाविक है। मानव का स्वभाव ही कुछ ऐसा है पर अगर वही विशाल अस्तित्व यकायक जीवन का भौतिक रुप छोड़ दे और शून्य में विलीन हो जाये तो उसके आसपास रहने वालों के जीवन में एकदम से शून्य आ जाता है। उनके प्रिय की अनुपस्थिति उन्हे उनकी निर्बलता का अहसास कराने लगती है। सारे गिले शिकवे एकदम से गायब हो जाते हैं और बस एक इच्छा सारे समय चीत्कार करने लगती है कि एक बार बस एक बार उससे मिलना हो जाये।
यह कह लूँ
वह कह लूँ
गले लग जाऊँ
पैर पकड़ माफी माँग लूँ
बस एक बार और मिल जाऊँ।

उस अभाव में आँसू थमते नहीं। ऐसा तो साधारण मनुष्य के जाने से भी हो जाता है और अगर बात कृष्ण जैसे व्यक्तित्व के धरा से विलीन होने की हो तो उनके पीछे रह जाने वाले उनके प्रिय जनों की स्थितियों का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने की इसी पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है।

कृष्ण के पीछे छूट जाने वाले चरित्रों के दुख को, उनकी पुकार को शब्द देता है यह उपन्यास। अर्जुन, द्रौपदी, राधा, अश्वत्थामा, अक्रूर आदि व्यक्तियों की मनोदशा का जीवंत वर्णन करता है यह उपन्यास। यह उपन्यास पाठक को रुह की गहरायी तक भिगो जाता है।

एक अच्छी पुस्तक में उस देश में रची सब अच्छी रचनाओं का स्वाद आ जाता है। ऐसा अपने आप हो जाता है।

स्व. धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है।

गांधारी :

तो सुनो कृष्ण
प्रभू हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभू हो पर मारे जाओगे एक पशु की तरह

…………
कृष्ण :

माता!
प्रभू हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो
…..
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं वरन मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
……..
जीवन हूँ मैं तो मृत्यू भी तो मैं ही हूँ माँ
शाप तुम्हारा स्वीकार है।

एक असहनीय दुख है उपरोक्त गांधारी कृष्ण संवाद में। दुख और क्रोध से भरी गांधारी कृष्ण को शाप तो दे देती हैं परन्तु कृष्ण के इस प्रकार शाप को स्वीकार करने से स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं उनके लिये और गांधारी रोने लगती हैं।

गांधारी:

यह क्या किया तुमने
रोई नहीं मैं अपने सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार
तो क्या मुझे दुख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी
पुत्रहीना थी।

 

कृष्ण:

ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम।
प्रभू हूँ या परात्पर
पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो ।

जो दुख, जो भाव अंधायुग से लिये गये उपरोक्त प्रंसंग में है उसमें अगर ऐसा भी जोड़ दिया जाये कि कृष्ण वहाँ नहीं हैं और गांधारी को बाद में अपराध बोध होता है अपने द्वारा दिये गये शाप के कारण तो कृष्ण की अनुपस्थिति में गांधारी को हुयी छटपटाहट का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। गांधारी को तो साक्षात कृष्ण द्वारा ही संबल मिल गया पर बाकी चरित्र तो कृष्ण के बिना उनसे एक बार और मिलने के लिये छटपटाकर रह गये। और दिनकर जोशी जी की पुस्तक कृष्ण के पीछे छूट गये चरित्रों की विवशता का ही वर्णन करती है।

भावों को महत्व देने वाले जिस किसी भी भारतीय साहित्य प्रेमी ने इस पुस्तक को न पढ़ा हो उसके लिये इसका न पढ़ा जाना ऐसे ही है जैसे कि कोई बहुत मूल्यवान चीज थी हमारे आस पास और हम चूक गये उसके दर्शन करने से।

…[राकेश]

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