Archive for ‘भ्रष्टाचार’

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

जून 8, 2011

भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?


बीते दिनों
सन्यासी, ठग, व्यपारी और
मसीहा के बीच
उलझे हुये
सत्य का
अजीब रूप देखने को मिला है।

खून-पसीने की चोरी का
हिसाब माँगने गए
निहत्थे आंदोलनकारियों पर
क्यों भांजी गयी लाठियाँ,
समझ से बाहर है।

फिर शुरू हो गया
आरोप प्रत्यारोप का दौर
बंदरों में होड़ मच गयी है
भ्रष्टाचार विरोध की सिकी
रोटी हथियाने की।

चक्की के दोनों बड़े पाट तैयार हैं
पिसे हुओं को और पीसने के लिए
जनसंवेदनाओं से मखौल कर
वोटों की राजनीती हुई है गर्म
कोयल के वेश में काग-राग से
असल मुद्दा–बेमुद्दा हो चला है।

हराम कमाई से हुए मुस्टंडे
नूरा-कुश्ती के माहिर
काले धन के बचाव का दाव
खेल गए हैं।

डर है डूबो न दी जाएँ
भ्रष्टाचार विरोधियों की नावें
इस गन्दी व्यवस्था के कीचड़ में
फिर धोखा खा न जाएँ
इन्साफ की बाट तकती
गीली आँखें।

(रफत आलम)

जून 4, 2011

बाबा रामदेव : भ्रष्टाचार मुर्दाबाद

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

(रफत आलम)

मई 21, 2011

वर्दी वाले गुंडे

रेल से नीचे धकेल दिये गये लोगों के समाचार गाहे-बेगाहे अखबारों की सुर्खियां बनने लगे हैं। एक महिला खिलाड़ी को रेल से नीचे फेंक दिये जाने की खबर छपी तो इस खबर को पढ़कर सुमीत को बरसों पहले की अपनी एक रेल यात्रा की याद हो आयी।
* * *

उस समय सुमीत को किसी भी यात्रा से पहले एक किस्म की बैचेनी होने लगती थी। बस की यात्रा तक तो गनीमत थी कि एक बस निकल जाये तो दूसरी मिल जायेगी पर रेल की यात्रा तो उसकी नींद उड़ा देती थी। घर से समय से निकलने के बावजूद उसे हमेशा संदेह लगा रहता कि वह रेल पकड़ भी पायेगा या नहीं। कई दिनों की छुट्टी अपने दोस्त के यहाँ व्यतीत करने के बाद उसे नौकरी पर वापिस जाना था और वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था। रेल उसे पकड़नी थी सहारनपुर से तकरीबन सौ किमी दूर देहरादून जिले में एक छोटी सी जगह पर। इस भय से कि कहीं रेल न छूट जाये सुमीत ने अपनी यात्रा के नियत दिन से एक दिन पहले ही बस से सहारनपुर जाकर रिहर्सल कर ली। वह सही वक्त्त पर सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गया। उसके पहुँचने के बाद ही एक्स्प्रैस रेल वहाँ आयी। रेल को विदा करके ही वह वापिस लौटा। उसे थोड़ी राहत महसूस हुयी।

अगले दिन सही वक्क्त पर सुमीत सहारनपुर पहुँच गया और रेलवे स्टेशन पर पूछताछ वाली खिड़की से यह पूछ कर कि उसकी वाली एक्सप्रैस रेल किस प्लेटफार्म पर आयेगी वह नियत प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हो गया। रिज़र्वेशन उसके पास था ही।

प्लेटफार्म पर अच्छी खासी भीड़ थी। एक कुली से उसने पूछ लिया कि S5 बोगी कहाँ आकर रुकेगी।

कुली ने उसे बता दिया और साथ ही पूछा कि वह रेल में सामान चढ़ा दे क्या? यूँ तो सुमीत के पास एक सूट्केस और एक बैग ही था और वह खुद आराम से रेल में सामान सहित चढ़ सकता था पर शायद कुली से बोगी के बारे में पूछने के कारण या किसी अन्य कारण से उसने उसे हाँ कह दिया।

रेल एक घंटे की देरी से आयी। रेल में मौजूद लोगों की भीड़ देखकर तो सुमीत के हाथ-पाँव फूल गये। लोग दरवाजे तक खड़े थे। सहारनपुर उतरने वालों और वहाँ से रेल में चढ़ने वालों के बीच दरवाजे पर खड़े लोग दीवार बने खड़े थे। हर तरफ चिल्ल-पौं मची हुयी थी।

सुमीत को लगा कि ऐसे कैसे वह चढ़ पायेगा रेल में?

कुली ने सुमीत से कहा,” बाबू जी, भीड़ बहुत है आप अभी बीस रुपया दे दो, आपको अंदर चढ़ा देंगे। मेरा अंदर जाकर वापिस आना मुश्किल हो जायेगा। आप यहीं पैसे दे दो। आपको अंदर तो चढ़ा ही दूँगा। रास्ते में मौका देख आप अपनी सीट पर पहुँच जाना”।

सुमीत ने कुली को बीस रुपये दे दिये। उसे लग नहीं रहा था कि दरवाजे पर खड़ी भीड़ के अभेद लगते किले को भेदकर वह बोगी में अंदर प्रवेश कर पायेगा।

कुली ने सूटकेस और बैग उठाया और बोगी के दरवाजे पर खड़े लोगों को हटाने का प्रयास करते हुये सूटकेस अंदर उनके सिरों के ऊपर से अंदर फेक दिया। अंदर से गालियाँ सुनायी दीं, लोग इधर उधर हुये और समान के बोगी के फर्श पर पड़ जाने का अनुमान कुली को लग गया। अब उसने सुमीत को उसका बैग थमाया और उसे पीछे से इस तरह धकेलना शुरु किया जैसे किसी गाड़ी में धक्का लगा रहा हो। लोगों को अपनी बोली से चेतावनी देते हुये उसने जबरन सुमीत को बोगी के अंदर धकेल ही दिया।

सुमीत भीड़ में मूर्ति बना खड़ा हो गया। न पैर हिलते थे और न ही हाथ इधर उधर या ऊपर नीचे करने की ही गुंजाइश उसे दिखायी पड़ती थी। बैग उसके कंधे पर इस तरह से रखा हुआ था जैसे कैलेंडरों आदि में हनुमान जी को गदा लिये दिखाया जाता है। इस जड़ता में अपनी आरक्षित सीट तक जाने की बात सोचना भी दुस्साहस से बड़ी बात थी। उसका तो एक पैर भी फर्श पर पूरी तरह टिका हुआ नहीं था। भीड़ के कारण गरमी भी बहुत लग रही थी और साँस लेने के लिये हवा भी कम और कमजोर मालूम पड़ती थी। सुमीत समेत लोग रेल के चलने की दुआ कर रहे थे। रेल चलने से कम से कम हवा तो आयेगी।

रेल चली। जो बैग उसे पहले हल्का और बाद में ठीके-ठाक वजन वाला लग रहा था अब वही उसे  बेहद भारी लगने लगा था। हाथ और कंधें में दर्द की तरफ ध्यान जाता तो बार बार उसकी इच्छा होती कि बैग को उछालकर चलती रेल से नीचे फेंक दे। ऐसे ही कष्ट सहते-सहते अम्बाला कैंट तक की यात्रा पूरी हुयी। उसे अपनी सहन क्षमता पर कुछ गर्व भी हुआ। आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता से भरे हुये जैसे ही उसने पाया कि दो-तीन यात्रियों को अम्बाला कैंट स्टेशन पर उतरना है, उसने और दरवाजे पर खड़े लोगों ने उन यात्रियों को ऐसा स्वागत करते हुये नीचे उतारा जैसे बारातियों का स्वागत कर रहे हों। उन यात्रियों के उतरने के उपक्रम में सुमीत को जगह मिल गयी अपने कंधे पर सवार बैग को नीचे फर्श पर गिरा देने की।

बैग गिराते ही वह सूटकेस और बैग को लगभग भूल कर प्रभावित कंधे को गोल गोल घुमाने लगा। सामान को भूल जाने में ही राहत मिलनी थी हाल फिलहाल तो।

तभी रेलवे पुलिस के सिपाहियों के साथ टी.टी.ई महोदय बोगी के दरवाजे पर अवतरित हुये। वर्दीधारी सिपाहियों की अकड़ और लाठियों के तांडव ने दरवाजे पर जमे खड़े यात्रियों को गतिमान बनाया और गुंजाइश न दीखने वाली जगह में भी टी.टी.ई और चार सिपाही अंदर घुस आये।

सिपाहियों की लाठियों के सहारे बोगी में लोगों की भीड़ के चक्रव्यूह को भेदते हुये टी.टी.ई आगे बढ़ा तो सुमीत भी अपनी सीट तक पहुँचने के लिये किसी तरह वहाँ खड़े लोगों से सहायता की गुज़ारिश करके अपना सूटकेस और बैग उठाये हुये इस सरकारी कारवां की पूँछ पकड़कर खिसक-खिसक कर आगे बढ़ने लगा। किसी तरह अपनी सीट पर पहुँचा तो पाया कि वहाँ बगैर आरक्षण के एक परिवार धरना दिये हुये था। परिवार में बच्चों और महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। वे लोग भी हर तरफ खड़ी भीड़ में किसी तरह से सीटों पर जमे हुये थे। नैतिकता जोर मारने लगी और सुमीत का साहस नहीं हुआ कि उस परिवार से कहता कि वे लोग उसकी सीट खाली कर दें। उसने हालात से समझौता करते हुये अपने बैठने के लिये कोने में ज़रा सी जगह देने की गुज़ारिश की।

बैठकर शरीर को कुछ राहत मिली तो इधर उधर खड़े लोगों की भीड़ से पता चला कि एक राजनीतिक दल की रैली थी दिल्ली में और पंजाब लौटने वाले लोगों ने रेल की कई जनरल बोगियों के साथ-साथ आरक्षित बोगियों पर भी कब्जा कर लिया और मजबूरन लोगों को जिस बोगी में जगह मिली उसी में घुस जाना पड़ा।

कुछ ही देर बाद सिपाही लौटे। जिनके पास आरक्षण  नहीं था उनसे वे इस आरक्षित बोगी में यात्रा करने की अनुमति के बदले उनकी आगे तय की जाने वाली दूरी के अनुसार रुपये ले रहे थे। सुमीत की आरक्षित सीट पर बैठे परिवार को जम्मू जाना था अतः सिपाहियों ने प्रति सदस्य पचास रुपयों की मांग की। परिवार के लिये शायद मुश्किल था इतने रुपये देना। उन्होने सिपाहियों से प्रार्थना की तो सिपाहियों ने उन्हे नीचे उतारने की चेतावनी दी। परिवार की मुश्किल देख कर सुमीत ने सिपाहियों से कहा कि वे उसकी आरक्षित सीट पर यात्रा कर रहे हैं, इतनी भीड़ में कहाँ जायेंगे महिलायें और बच्चे। उन्हे परेशान न किया जाये।

एक सिपाही गुर्रा कर बोला,” बाबू तू जुर्माना देगा क्या। बुलाऊँ टी.टी.ई को, अभी चालान काटेगा, अपनी सीट पर बिना आरक्षण वाले लोगों को साथ ले जाने के लिये। और इन सबको ले जावेंगें जेल”।

परिवार बेचारा क्या करता? उन्होने सिपाहियों को रुपये दे दिये।

लोगों को उस बोगी में बने रहने के लिये पुलिस फोर्स की स्वीकृति खरीदनी पड़ी। जिन बोगियों पर राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर लिया था वहाँ तो सिपाही घुस भी न पाये होंगे पर बाकी बोगियों से उन्होने हजारों के वारे न्यारे कर लिये होंगे।

सुमीत सोच रहा था कि अगर चोर डाकुओं को वर्दी पहना दी जाये तो शायद वे भी इस कुशलता से उगाही का काम न कर पायेंगे जैसा कि कानून के इन तथाकथित रखवालों ने अपने शौर्य से कर दिखाया है।

बोगी में जिस किसी ने रुपये देने में असमर्थता दिखायी या नियमों की दुहाई देने का दुस्साहस किया तो उसे सिपाहियों ने थप्पड़ों और घूँसों का प्रसाद देकर टॉयलेट के पास खड़ा होने के लिये भेज दिया। अगले स्टेशन पर उनके उतारने की बात सुनायी पड़ती रही।

रेल चली तो कुछ समय बाद टी.टी.ई टिकट चैक करता हुआ आया। सीट के आरक्षण के लिये लोग रुपये हाथ में लेकर उसे घेरे हुये थे। और वह भी किसी-किसी को उपकृत कर रहा था। शायद आदमी के हाथ की हरियाली देखकर वह निर्णय ले रहा था।

सिपाहियों के घमासान मचाने से लोग इधर उधर व्यवस्थित खड़े हो गये थे और गैलरी में इधर-उधर देखने लायक जगह दिखायी पड़ती थी।  टी.टी.ई टिकट चैक करके अपने लिये निर्धारित सीट पर पहुँचा तो पाया कि उससे पहले वहाँ पहुँच चुके सिपाहियों ने उसकी सीट का सौदा भी दो यात्रियों से कर लिया था। उसकी सीट पर जमे बैठे यात्रियों ने उठने से मना कर दिया। टी.टी.ई ने सिपाहियों से उन यात्रियों से अपनी सीट खाली करवाने की बात कही।

एक सिपाही ने खैनी मलते हुये कहा,” अरे अम्बाले में तो तू कह रिया था कि किसी तरह से बोगी में पहुँचा दो, अब कह रिया है कि सीट दिलवा दो, थोड़ी देर में कहेगा कि हिसाब भी समझा दो। हमारी तरह चुपचाप यहाँ टायलेट के पास खड़ा रह। बीड़ी-सिगरेट पी और ऐश कर। नहीं तो नीचे उतर जाइयो अगले स्टेशन पर। दूसरी बोगी में देख लियो, कहीं सीट मिल जावे बैठने की तो। हम भी तेरी तरह ड्यूटी पर हैं”।

सिपाही से दो टूक जवाब पाकर टी.टी.ई का चेहरा गुस्से और विवशता से अजीब सा हो गया।

पर कर भी क्या सकता था। अपमान का घूँट पीकर रह गया। सिपाहियों से चलती रेल में पंगा लेना खतरनाक था। इतनी भीड़ में कौन, कब, कैसे टपक गया चलती रेल से, बाद में कौन जान सकता है?

सरकारी अमले की आपसी मुठभेड़ को देखकर, सुमीत को अन्य यात्रियों, जो सिपाहियों और टी.टी.ई की धन-उगाही कार्यवाही के शिकार बने थे, की तरफ से भी कुंठा में कुछ राहत महसूस हुयी।

एक सिपाही टी.टी.ई से कहता सुनायी दिया,”अरे बाबू, ये रास्ता खोल दे दोनों बोगियों के बीच वाला। तू यहीं खड़ा रह आराम से, हमारा आदमी जावेगा दूसरी बोगी में और वहाँ से बिना आरक्षण वाले यात्रियों को यहाँ भेजेगा। तू भी कुछ कमा-धमा ले और हमें भी जेब भारी कर लेने दे। रोज़ रोज़ तो ऐसे मौके आते नहीं।”

सुमीत देख नहीं पाया कि टी.टी.ई पर इस प्रस्ताव की प्रतिक्रिया क्या हुयी।

कुछ समय बाद टॉयलेट की तरफ से गाली-गलौच और मार-पीट का शोर आने लगा। ऐसा लगा जैसे सिपाहियों का यात्रियों से झगड़ा हो रहा हो। या शायद यात्री ही आपस में लड़ रहे हों और सिपाही दोनों गुटों की ठुकाई में व्यस्त हों।

इस शोर-गुल में कई तरह की आवाजों के मध्य ऐसी पुकारें भी सुनायी दीं…अरे गिर गये… अरे कूद गये…अरे धकेल दिया।

बहुत देर तक शोर होता रहा।

अगले दिन सुमीत को अखबार में ही एक छोटी सी खबर पढ़ने को मिली कि जिस एक्स्प्रैस रेल में वह यात्रा कर रहा था उसमें बिना टिकट यात्रा करने वाले दो युवक टी.टी.ई से झगड़ा करने लगे और सुरक्षा बल के सिपाहियों के आने पर अफरातफरी में चलती रेल से बाहर कूद गये और अपनी जान गँवा बैठे।
* * *

इंसानी जान की कोई कीमत है नहीं इस देश में…- ठंडी सांस छोड़कर अपने आप से कहते हुये सुमीत ने अखबार सामने मेज पर रख दिया।

…[राकेश]

मई 16, 2011

किसान: मैथिलीशरण गुप्त झूठे थे!

कविवर मैथिली शरण गुप्त झूठे थे। उन्होने पता नहीं क्या-क्या देख लिया भारत के किसानों में?

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, और थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है।

ज़रा उनकी मूर्खता तो देखिये क्या क्या कसीदे उन्होने किसानों के नाम कढ़ दिये।

किसान भी भला कुछ करता है क्या? निठल्ला किस्म का मानव होता है किसान।

न काम का न काज का दुश्मन विकास का।

देश ब्रांडेड चीजों को अपना रहा है और ये देहाती किसान देश को पीछे ढ़केल रहे हैं। न इन्हे ढ़ंग से रहने की तमीज होती है और न ही इन्हे बातचीत का ढ़ंग ही आता है। ये देश के मखमली भविष्य पर टाट के पैबंद सरीखे हैं।

भला इंडिया में किसानों का क्या काम? वे खुद आत्महत्या करके न मरते हों तो नेताओं के इशारे पर चलने वाली राज्यों की पुलिस तो है ही उन्हे निबटाने के लिये।

किसान खत्म हो जायेंगे भारत से तो इसे धनी इंडिया बनने से बाकी के सारे देश मिल कर भी न रोक पायेंगे। किसान का भारत से मिट जाना ही श्रेयकर है।

कुछ नेताओं, और बहुत सारे बिल्डरों, कोरपोरेट इंडिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने मिलकर यह पवित्र काम करने का ठेका ले लिया है। जाति, सम्प्रदाय, द्वेष की परम्परा का ईमानदारी से पालन करते राजनीतिक दलों के पिछलग्गू लोग भी इस यज्ञ में अपना योगदान दे सकते हैं। बहुत से दे ही रहे हैं।

कुछ दलों की तो नीति भी तय हो गयी है।

किसान है मक्कार
इसे लगाओ जूते चार

मई 15, 2011

साइकिल वाले खान साहब

खान साब सहायक से उप-सचिव पद पर सचिवालय के मलाईदार खान विभाग में पदोन्नत हुए तो सभी पड़ोसियों को एक जिज्ञासा होनी लाज़िमी थी कि सदा से साइकिल पर चलने वाले और मोबाइल जैसी सुविधाओं से परहेज़ करने वाले खान साब क्या अब अपनी सादा जीवन शैली में परिवर्तन करेंगे, या पहले जैसे सीधे सरल और ईमानदार बने रहेंगे?

खान साब की पत्नी अलबत्ता दुनियादार महिला थीं। इस चमचमाहट के दौर में खान साब जैसा सादा-सरल पति पाकर कुंठा से ग्रसित रहती थीं। घर में ऐशो-आराम की आधुनिक सुविधाए नहीं होने का उन्हें बड़ा मलाल था और इसका सारा दोष वे अपने पति की ईमानदारी को दिया करती थीं।

खान साब की पदोन्नति के बाद जल्दी ही उनकी पत्नी ने आस-पड़ोस की महिलाओं को अपने पति से जुडा एक रोचक किस्सा सुना भी दिया।

“कल तो इनके साथ अच्छा हुआ। ये तो आदत के मुताबिक छुट्टी होते ही ऑफिस से ६ बजे निकल आये। सैक्रेटरी साब ने तलब कर लिया। जनाब न तो घर में फोन लगाते हैं न मोबाइल रखते है सो खूब झाड पड़ी”।

पदोन्नति के एक महीने के अंदर ही खान साब ने अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली तो सब पडोसियों और इस बार तो उनकी पत्नी तक का चौंकना वाजिब था।

उनकी पत्नी ने बताया कि आज तो खान साब नौकरी भी छोड़ आये। सवेरे देर तक बिस्तर में पड़े रहे थे।

कहने लगीं,” मैंने पूछा, जी आज ऑफिस नहीं जाओगे, तो फरमाने लगे, बेगम! हमने इस्तीफा दे दिया है”।

“जैसे नौकरी भी अखबार हो, पढ़ा तो पढ़ा नहीं तो उलट के पटक दिया। ऊपर से ज़रा भी अफ़सोस नहीं। जनाब आराम से अखबार पढ़ रहे थे। मैंने भी ऐसी क्लास ली कि खाना भी नहीं खाया देर तक। जी तो चाहा भूखा ही मरने दूं। पर क्या करूँ बहिन! मन मार कर रोटी खिलानी पड़ी। खूंटे बंधे जानवर को भी भूखा नहीं रखा जाता। फिर ये तो जैसे हैं वैसे ही हैं। क्या किया जाए”?

“किस्मत ही फूटी है जो इन जैसे करमनिखट्टू के पल्ले बंधी। घर में दो बेरोजगार बेटे छाती पर मूंग दल रहे हैं। अरे! नौकरी में रहते बेटी के हाथ ही पीले कर देते। शासन सचिव के रुतबे में ढंग का लड़का तो मिल जाता। ज़रा भी नहीं सोचा बुद्धू जी ने”। वे सर पकड़ कर बैठ गयीं।

खान साब चूँकि आपने आप तक ही सीमित रहते थे, इसलिए इस्तीफे देने के कारण का तसल्लीबख्श जवाब मिलना असंभव सा लगता था। फिर भी एक शाम बतौर संवेदना उनके घर जाकर बातों के दौरान झिझकते हुये पूछ ही लिया,” भाई साहब! ऐसा क्या हुआ कि आपने अचानक इस्तीफा दे दिया”?

जनाब, सवाल उछालने भर की देर थी कि जैसे बरसों से कैद किसी तड़क गयी चट्टान से लावा फूट पडा हो।

“यार! सब साले बेईमान हैं, कब तक सहन करता? देखो प्रमोशन दे के क्या अहसान किया, कुँए से खाई में पटक दिया। खान विभाग तो भाई डाकुओं का अड्डा निकला”।

तीसरे दिन ही सचिव साब ने तलब किया और कहने लगे,” खान! ये फलां फलां फाइलें है इनमें मंत्री महोदय का इनट्रेस्ट् है, ज़रा देख लेना”।

आगे की बेहयाई तो देखो, खुद मेरा असिस्टेंट फाइल के साथ रिश्वत लेकर हाज़िर। पहले तो दुनिया भर की बातें करता रहा फिर बेशर्म हंसी के साथ कहने लगा,” हें ..हें ..हें साब ये लिफाफा आपके प्रमोशन पर, बतौर गिफ्ट फलां साहब ने भिजवाया है. सर! एक लाख रूपये हैं”।

फिर साले ने उसी गंदी बनावटी हंसी के साथ सलाह भी दे डाली,” हें…हें …हें वैसे भी तो अपने को फ़ाइल निकालनी है ना साब, सो कुछ हाथ पल्ले आ रहा है तो बुरा क्या है?”

खान साब बिफ़र रहे थे,” यार! क्या ऐसा भी वक्त देखना लिखा था। जी तो चाहा हरामखोर की गर्दन मरोड़ दूं पर फटकार लगाने के सिवा क्या कर सकता था”।

चलो यार! यहाँ तक भी सब्र था लेकिन रोज सचिव के उलहानों और मंत्री के पी.ए. का फोन पर बार-बार तकाजा, खोपड़ी ही आऊट हो रही थी। बताओ, कैसे सिफारिश कर देता करोडों की खानें लाखों में अलॉट करने की। भाई! साली, हद तो तब हो गई जब लंच में खुद पार्टी हाज़िर मेरे उसी नालायक असिस्टेंट के साथ। साला! पच्चीस लाख ब्रीफकेस में लाकर सीधी रिश्वत देना चाह रहा था। पहले तो राज़ी-राज़ी समझा कर रवाना करना चाहता था। मोटी चमड़ी वाले नहीं माने तो आखिर एंटीकरप्शन विभाग बुलाने की धमकी देकर कमरे से निकाला।

बेईमानों का हौसला तो देखो उलटे मुझी को तड़ी दे गए कि मैं क्या एंटीकरप्शन विभाग बुलवाऊँगा वे लोग ही कुछ दिन में मुझे सीखचों के पीछे भिजवा देंगें।

भाई! मैं सकते में आ गया था सब लोगों की मिलीभगत देखकर। एक काल्पनिक परन्तु आज के कुँए में भाँग पड़ी वाले बेईमान दौर में, कभी भी सच हो सकने वाला मंज़र, जिसमें मैं जेल में बैठा हूँ, आँखों के सामने लहरा गया था। क्या बताऊँ उस वक्त की कैफियत।

रोज़ मर्रा के हिसाब से मुझे परेशान करने लगे। मैं सोचता रहता कि क्या करूँ? आखिर अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर उन फाइलों पर जो वाजिब टिप्पणियाँ होनी चाहिए थीं दर्ज कर दीं। फिर कागज़ उठाया और इस्तीफा लिख, दस्तखत कर सैक्रेटरी महोदय को पेश कर आया। ज़िंदगी ने दुःख तो कई और भी दिए हैं पर सबसे बड़ा अफ़सोस यही है कि किसी ने नहीं टोका मुझे। दफ्तर में कोई नहीं बोला कि पकी-पकाई नौकरी क्यों छोड़ रहा हूँ?

बोलते-बोलते खान साब की आवेश पूर्ण आवाज़ स्वतः ही धीमी होती चली गयी थी। अचानक लंबी साँस लेकर वे चुप हो गए। गीली हो गयी थीं उनकी आँखे।

अक्सर शहर के रास्तों पर चौपहिया वाहनों और मोटर साइकिलों के रेल-पेल में खान साब दिखायी दे जाते हैं अपनी साइकिल पर सवार। ऐसा लगता है उन्हे देख कि आज भी उनकी आँखें गीली हैं।

(रफत आलम)

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जिंदगी से बड़ी सजा  ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं
अपने हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
जिंदगी मौत  तेरी  मंजिल है
दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं
सच घटे या बढे तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तेहा ही  नहीं
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आइना  झूठ  बोलता ही  नहीं  (कृष्ण बिहारी नूर)

मई 1, 2011

भ्रष्टाचार का प्राइमरी स्कूल

जन्म लेते ही बेईमान बना रहा है बाप
बच्चे को लाके हराम खिला रहा है बाप
जहर का पला सर्प के सिवा क्या बनेगा
आम की आस में बबूल उगा रहा है बाप

क़र्ज़ बाप के नाम का चुकायेगा ही सही
पैसा दे के आया है घूस खायगा ही सही
नौकरी की पहली ईंट बेईमानी ने रखी है
ये भ्रष्टाचार का महल बनायगा ही सही

(रफत आलम)

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