Archive for ‘भ्रष्टाचार’

जून 3, 2016

कॉल ड्राप का गोरखधंधा… (के.एन. गोविंदाचार्य)

4 दिन पूर्व कॉल ड्राप के बारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखा विस्तृत पत्र आप सभी के साथ साझा कर रहा हूं   – के. एन. गोविंदाचार्य

दिनांक-30 मई 2016
प्रिय मित्र श्री नरेंद्र जी,

सादर नमस्ते!

सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आपकी सरकार ने डिजीटल इंडिया समेत कई योजनाओं की शुरुआत की है परंतु सार्थक बदलावतो योजनाओं के सही क्रियान्वयन से ही आ सकता है। सुशासन के लिए आपने सार्थक सहयोग और सकारात्मक आलोचना हेतु जो अपील की है वह निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। आज के समाचार पत्रों में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा कॉल ड्रॉप के माध्यम से धांधली की खबर पर आपका ध्यानाकर्षित करना चाहता हूं, जिसकी वजह से 100 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ता बेवजह लुट रहे हैं (संलग्नक-1)।

टेलीकॉम कंपनियों द्वारा मोबाइल नेटवर्क में निवेश की कमी से कॉल ड्रॉप एक राष्ट्रीय महामारी बन गई है। इसपर आप भी गंभीर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 16 अक्तूबर 2015 को नियम बनाया था जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मई 2016 के निर्णय से निरस्त कर दिया है। फैसले के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख सरकार द्वारा तथ्यों का सही प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया, इसका संक्षिप्त विवरण मेरे पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-2)। हमारी वज्र फाउंडेशन की टीम ने फैसले के विस्तृत अध्ययन के पश्चात कानूनी बिंदुओं कानिर्धारण किया है जिनका संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण इस पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-3)। मैं आशा करता हूं कि आप अविलंब दूरसंचार मंत्रालय तथा ट्राई को इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार सरकार द्वारा कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का नियम सही तरीके से नहीं बनाया गया था। इस बारे में संसद को नया कानून पारित करना होगा। यदि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सहमत है तो फिर नए कानून के लिए अविलंब अध्यादेश जारी करना चाहिए जिससे देश में सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग ( जिनमें से अधिकांश मध्यवर्गीय और गरीब हैं ) को राहत मिल सके।

दरअसल कॉल ड्रॉप में उपभोक्ता की मोबाइल पर बात होती ही नहीं है तो फिर उस पर टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पैसा वसूली एक खुली लूट ही है। इस पर सरकार लगाम लगाने में विफल रही है।आज के समाचार से स्पष्ट है कि जुर्माने से बचने के लिए टेलीकॉम कंपनिया अब ‘रेडियो लिंक टेक्नोलॉजी’ से उपभोक्ताओं को ठग रही हैं जिससे अब कॉल ड्रॉप के बावजूद कनेक्शन नहीं कटता। अटॉर्नी जनरल श्री मुकुल रोहतगी ने कॉल ड्रॉप मामले में बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोबाइल कंपनियां कार्टेल बनाकर जनता को लूट रही हैं। कॉल ड्रॉप मामले में आम जनता किस तरह ठगी गई है उसकी पुष्टि के लिए मैं संक्षिप्त विवरण आपको भेज रहा हूं (संलग्नक 4)।

कॉल ड्रॉप पर निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों पर सख्त पेनॉल्टी के प्रावधान हैं जिनका ट्राई द्वारा पालन नहीं हो रहा है। कॉल ड्रॉप में बगैर सेवा दिए टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पिछले कुछ सालों में ग्राहकों से हजारों करोड़ की अवैध वसूली की गई है।इसे ग्राहक निधि में जमा कराने के लिए 2007 के कानून का पालन हो यहसुनिश्चित कराने की आवश्यकता है।

मैं आशा करता हूं कि हमारे प्रतिवेदन का संज्ञान लेते हुएआप माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अविलंब पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे। कानूनों के क्रियान्वयन से जनता को प्रभावी न्याय तथा सुशासन दिलाने के लिए मैं ऐसे अन्य विषयों पर आपको सहयोग देता रहूंगा जिससे हम सभी का राष्ट्रीय स्वप्न साकार हो सके।

शुभकामनाओं सहित।
सादर

(के एन गोविंदाचार्य)
श्री नरेंद्र मोदी जी,
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

प्रति-

1- श्री रविशंकर प्रसाद, दूरसंचार मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
2- श्री आर एस शर्मा, चेयरमैन, ट्राई, नई दिल्ली

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फ़रवरी 19, 2015

हरियाणा में भूमि-अधिग्रहण मुआवजे पर “आम आदमी पार्टी” का आंदोलन शुरू

श्री मनोहर लाल खट्टर 19 फरवरी, 2015
मुख्यमंत्री, हरियाणा
चंडीगढ़

विषय: हरियाणा सरकार द्वारा भूमि-अधिग्रहण का मुवावज़ा आधे से कम करने का आदेश.

आदरणीय श्री मनोहर लाल खट्टर जी,

आपके मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद पहली बार आपसे संवाद का अवसर मिल रहा है. इसलिए मैं अपने, अपने साथियों और अपने संगठन की ओर से आपको शुभकामनाएं देता हूँ. आशा करता हूँ कि आपके नेतृत्व में हरियाणा सरकार उन उम्मीदों पर खरी उतरेगी जिनके आधार पर हरियाणा की जनता ने आपकी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है.

1. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आपकी सरकार के हाल के निर्णयों और बयानों से उन आशाओं को धक्का लगा है. हरियाणा के किसान और ग्रामवासी आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी को शक की निगाह से देखते थे. लेकिन इस बार के विधान-सभा चुनाव में उन्होंने अपने पुराने पूर्वाग्रह छोड़कर खुले दिल से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया. इस समर्थन के पीछे वे तमाम वादे थे जो आपकी पार्टी ने किसानों से किये थे. आपकी पार्टी के विधान-सभा चुनाव घोषणा-पत्र में आपने “दूसरी हरित-क्रांति” लाने का वादा किया था. आपने किसानों के साथ वादा किया था कि “किसानों के फसलों के दाम लागत-मूल्य पर 50% लाभ निर्धारित करके निर्धारित किये जाने की पद्धति अपनाई जाएगी. समय समय पर बढ़ने वाली महंगाई के अनुरूप किसानों के उत्पाद/फसलों के दाम भी बढ़ाये जायेंगे.” आपने यह वादा भी किया था कि “कृषि भूमि को कॉर्पोरेट घरानों को नहीं बेचा जायेगा और अगर अधिग्रहण किया तो किसान के शेयर का प्रावधान रखा जायेगा.”

2. लेकिन जब से आपकी सरकार आई है तब से किसान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. पिछली सरकारों के राज में पनपी किसानों की दुःख-तकलीफ का निवारण करने के बजाय भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार ने एक के बाद एक किसानों के साथ धक्का किया है. सरकारी बद-इंतज़ामी के कारण किसान यूरिया खाद के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है. किसान को वादा हुआ था 24 घंटे की बिजली का लेकिन उसकी बिजली 14 घंटे से घटाकर 11 घंटे कर दी गयी है. लागत से 50% लाभ देना तो दूर, सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को महंगाई दर के हिसाब से भी नहीं बढाया है. फसलों के दाम गिर रहे हैं लेकिन सरकारी मूल्य पर भी खरीद नहीं हो रही है. और ऊपर से भूमि-अधिग्रहण कानून में संशोधन करके किसान की ज़मीन छीनने की तैयारी चल रही है.
3. इस पत्र के माध्यम से मैं आपका ध्यान एक विशेष मुद्दे की ओर खींचना चाहता हूँ. यह मामला पूरी तरह से आपके राज्य सरकार के अधीन है. आपकी सरकार ने किसानों को भूमि-अधिग्रहण पर मिलने वाले मुवावज़े को एक ही झटके में आधे से भी कम कर दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपकी सरकार किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा कैसे कर सकती है.

3.1 जैसा की आपको ज्ञात है संसद द्वारा पारित नए भूमि-अधिग्रहण कानून (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act) 2013 के अनुसार भू-स्वामियों को मुवावज़ा नए तरीके से तय होना है. इस कानून के शेड्यूल 1 के मुताबिक ज़मीन के सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य को किसी गुणांक या फैक्टर से गुणा किया जायेगा. इस गुणन-फल से प्राप्त राशि में उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यह गुणांक कितना होगा इसका फैसला राज्य सरकार को करना होता है. केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ यह गुणांक शहरी इलाकों में 1.0 रहेगा लेकिन गाँव में राज्य सरकार 2.0 तक कोई भी गुणांक तय कर सकती है. केन्द्रीय कानून कहता है कि यह फैसला लेते वक़्त शहरी क्षेत्रों से दूरी को ध्यान में रखा जायेगा. अगर राज्य सरकार चाहे तो कलेक्टर रेट से दो गुना तक मुवावजा और उतना ही सोलाशियम यानि कुल मिलकर चार गुना मुआवजा राशि दे सकती है.

3.2 नया कानून बनने के बाद आपकी पूर्ववर्ती सरकार ने मुवावज़ा तय करते वक़्त 2.0 का फैक्टर लगाया था. दिनांक 22 अगस्त 2014 को महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील के शिवनाथपुरा गाँव के भूमि-अधिग्रहण आदेश में सरकार ने कीमत को दुगना करके मुवावज़ा तय किया था.

3.3 लेकिन आपकी सरकार ने केन्द्रीय कानून की भावना, किसानों की आकांक्षा और पिछली सरकार के निर्णय के उलट जाते हुए किसान को कम से कम मुवावज़ा देने की नीति अपनाई है. चार दिसम्बर 2014 को जारी सर्कुलर (संख्या 2331-R-5-2014/16094) के जरिये आपने पूरे ग्रामीण हरियाणा में मुवावज़े के फैक्टर को घटाकर 1.0 कर दिया है. इसका मतलब यह होगा कि भू-स्वामी को मिलने वाला मुवावज़ा आधा हो जायेगा. उदाहरणार्थ अगर कलेक्टर रेट 20 लाख रूपये एकड़ है तो 2.0 फैक्टर के हिसाब से कुल 80 लाख रुपया मुवावज़ा मिलता (20×2.0 = 40 लाख मुवावज़ा + 40 लाख सोलेशियम = 80 लाख) लेकिन इस फैक्टर को 1.0 करने के कारण कुल मुवावज़ा राशि 40 लाख रह जाएगी. ( 20×1.0 = 20 लाख मुवावज़ा + 20 लाख सोलेशियम = 40 लाख) कुल मुवावज़ा राशि आधी कर देने वाला यह नियम अब हरियाणा में हर भूमि-अधिग्रहण पर लागू होगा.

3.4 यही नहीं, आपकी सरकार द्वारा बनाये नए नियमों (दिनांक 28 अक्टूबर 2014) के अनुसार भूमि के मूल्य निर्धारण में भी किसान को भारी घाटा होगा. हरियाणा सरकार की पुरानी अधिग्रहण नीति (9 नवम्बर 2010 को अधिसूचित) के तहत सरकार ने एक न्यूनतम “फ्लोर रेट” तय कर दिया था ताकि जिन इलाकों में ज़मीन के दाम बहुत कम चल रहे हैं वहाँ भी किसान को वाजिब मुवावज़ा मिले. नए नियमों में इस प्रावधान को हटा दिया गया है. पुरानी रजिस्ट्री के हिसाब से मूल्य निर्धारण में भी किसान को कम से कम दाम देने की नीयत झलकती है. पिछले तीन सालों की रजिस्ट्री को देखते वक़्त साल को “कैलेण्डर वर्ष” की तरह परिभाषित किया गया है. इसके चलते वर्तमान वर्ष की नवीनतम रजिस्ट्री का संज्ञान भी नहीं लिया जायेगा. अगर एक एकड़ से कम की कोई रजिस्ट्री हुई है तो उसका भी संज्ञान नहीं लिया जायेगा. यानी कि हर कदम पर सरकार की नीयत यह है कि किसान के मुवावज़े में जितनी कटौती की जा सके उतनी की जाए.
3.5 केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ ज़मीन के सरकारी दाम का सरकार द्वरा तय किये फैक्टर से गुना करने पर जो राशि बनती है उसपर सौ फ़ीसदी सोलेशियम देना होगा. लेकिन बावल, जिला रेवाड़ी के 16 गाँव का अधिग्रहण आदेश (संख्या 13/R दिनांक 4 दिसम्बर 2014) जारी करते समय सरकार ने सोलेशियम को घटाकर 30% कर दिया. यह तो बिलकुल ग़ैर-कानूनी है. क्या हरियाणा सरकार भूमि-अधिग्रहण में आगे भी सोलेशियम को 30% की दर से निर्धारित करेगी?

3.6 मुवावज़े की दर को घटाने का यह आदेश जिस जल्दबाजी और गुपचुप तरीके से हुआ वह सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करता है. नियमों में संशोधन करने का ड्राफ्ट सरकार ने २७ नवम्बर 2014 को अधिसूचित किया (संख्या 2249-R-2014/15792). जनता को इसकी सूचना 29 नवम्बर को मिली और आपात्ति दर्ज़ करने के लिए मात्र 3 दिसंबर तक का समय मिला. फिर भी प्रभावित किसानों ने 1 दिसंबर को विस्तृत आपत्तियां दर्ज करवाई. आपकी सरकार ने इन सब वाजिब आपत्तियों को दरकिनार करते हुए प्रस्तावित ड्राफ्ट को हुबहू 4 दिसंबर को अधिसूचित कर दिया. प्रदेश के किसानों के भविष्य पर इतना दूरगामी असर डालने वाले इस फैसले में इतनी जल्दबाजी क्यूँ की गयी? आपके अफसर कह रहे हैं की यह फैसला किसी कमेटी की सफ़ारिश पर लिया गया. क्या सरकार उस कमेटीकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करेगी?

3.7 इन सब तथ्यों का अवलोकन करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि आपकी सरकार किसी भी तरह से किसानों का मुवावज़ा कम से कम करने पर आमादा है. ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी सरकार किसान के हित में नहीं बल्कि उसकी ज़मीन पर नज़र गड़ाये बिल्डरों और उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है. इस मुद्दे पर मीडिया से बात करते हुए आपके प्रतीनिधियों ने कहा है कि यदि किसान को ज्यादा मुवावज़ा दे दिया तो इस ज़मीन पर लगने वाले प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाएगी. यह तो कुतर्क है. एक तो किसी भी उद्योग में ज़मीन की लागत उसका एक छोटा हिस्सा होती है. दूसरा, अगर सरकार को इन प्रोजेक्ट्स की लागत कम करनी है तो सरकार अपनी जेब से इन्हें सब्सिडी क्यूँ नहीं दे देती. यह रियायत किसान से छीन कर क्यूँ दी जा रही है. असली सवाल यह है कि आपकी सरकार की पहली चिंता किसान की आजीविका है या कि बिल्डर और उद्योगपतियों का मुनाफा?

4. इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप
(क) नए भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश के अंतर्गत बनाये गए इन नियमों के तहत अधिग्रहण को ततकाल प्रभाव से रोक दें.
(ख) इन नियमों की समीक्षा कर इनमें तमाम किसान-विरोधी प्रावधानों को हटाया जाए.
(ग) मुवावज़े के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के गुणन फैक्टर को 1.0 की बजाय 2.0 किया जाय.
(घ) यह स्पष्ट किया जाय कि सरकार 30% की बजाय 100% सोलेशियम देगी.

आम आदमी पार्टी इस मुद्दे और किसानों के साथ हो रहे चौतरफा धक्के के खिलाफ 21 तारीख से प्रदेश भर में जय-किसान अभियान शुरू कर रही है. संविधान की भावना के अनुरूप और लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए आम आदमी पार्टी ऐसे सभी किसान-विरोधी नीतियों और निर्णयों के विरुद्ध संघर्ष करेगी. जब तक इन किसान-विरोधी प्रावधानों को बदला नहीं जाता तब तक आम आदमी पार्टी हरियाणा प्रदेश में कहीं भी भूमि-अधिग्रहण नहीं होने देगी.

आशा है कि प्रदेश के किसानों की हितरक्षा के अपने दायित्व को देखते हुए आप इन मांगो को स्वीकार कर लेंगे और किसानो और सरकार के बीच किसी भी टकराहट की नौबत नहीं आने देंगे.

सादर,
आपका
योगेन्द्र यादव
हरियाणा राज्य प्रभारी और मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी

फ़रवरी 3, 2015

आम आदमी पार्टी के पत्र सुप्रीम कोर्ट, सोनिया गांधी और अमित शाह के नाम

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फ़रवरी 2, 2015

दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ की लहर है : योगेन्द्र यादव

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

फ़रवरी 1, 2015

आम आदमी पार्टी : मेनिफेस्टो (दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015)

दिल्ली विधानसभा चुनाव घोषणापत्र-2015

70 सूत्री कार्ययोजना

आम आदमी पार्टी के लिए, राजनीति एक परस्पर संवादात्मक और निरंतर संवाद की प्रक्रिया है। दिल्ली विधान सभा नवंबर 2014 के पहले सप्ताह में भंग कर दी गई थी, इसके तुरंत बाद, आम आदमी पार्टी ने अपने बहुचर्चित व सफल कार्यक्रम दिल्ली संवाद Delhi Dialogue  की शुरूआत की। और इस अनूठी पहल के जरिए पार्टी ने समाज के विभिन्न वर्गों के विशेषज्ञों व आम नागरिकों के बीच साझेदारी के जरिए नए व गंभीपर सुझावों के आधार पर पार्टी के घोषणापत्र की रूपरेखा तैयार की है।

एक ईमानदार, जवाबदेह और उत्तरदायी राजनीतिक दल शासन में लोगों की भागीदारी को अहम मानती है। दिल्ली डायलॉग में जाने-माने शिक्षाविदों, व्यवसायियों, नौकरशाहों,निर्वाचित अधिकारियों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और आम आदमी के विचार को भी शामिल किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इऩ सबने मिलकर दिल्ली के भविष्य के लिए-हमारे भविष्य के एक ठोस व प्रभावी खाका तैयार किया है।

विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के साथ आम लोगों की सैकड़ों बैठकों और गोल मेज के आयोजनों, ऑनलाइन टिप्पणियों, ईमेल सुझाव, WhatsApp संदेश, ट्वीट्स और फेसबुक टिप्पणियों के जरिए हजारों प्राप्त सुझावों के बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के युवाओं, महिलाओं, व्यापारियों. व्यावसायियों, उद्यमियों, ग्रामीण व शहरीकृत गांवों, सफाई कर्मचारियो, अल्पसंख्यकों, अनधिकृत व पुनर्वास कॉलोनियों, जेजे कल्सटर्स, रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन, कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटियों और ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों के लिए 70 सूत्री कार्ययोजना तैयार की है।

दिल्ली के नागरिकों की दृष्टिकोण और आकांक्षाओं को सूचित करने के लिए बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, स्वच्छता, रोजगार, परिवहन, सामाजिक न्याय, महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के मुद्दों पर दिल्ली डायलॉग के तहत चर्चा हुई। दिल्ली डायलॉग के दौरान कई ऐसे मुद्दे भी उठे जो दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं आते । आम आदमी पार्टी ऐसे मुद्दों का भी नेतृत्व करेगी और अपनी पूरी नैतिक और राजनीतिक अधिकार के साथ इन मुद्दों का समाधान देश के समक्ष लाने की कोशिश करेगी।

दिल्ली डायलॉग का उद्देश्य दिल्ली के विकास के लिए ऐसा खाका तैयापर करना था जो दिल्ली के सभी क्षेत्रों के लोगों के इंद्रधनुषी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करेगा। आम आदमी पार्टी की नजर में दिल्ली की परिकल्पना:-

 

  • सबके लिए रोजगार

  • सबके लिए उच्च स्तरीय शिक्षा

  • सर्वोत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं

  • महिलाओं की सुरक्षा

  • आबादी के हिसाब से सड़कें, वाहन और परिवहन सुविधाएं

  • बिजली सस्ती और सबके लिए

  • मुफ्त पीने का पानी

  • नागरिकों के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं

  • यमुना की सफाई, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण

  • सभी धर्म और समुदाय के बीच परस्पर प्रेम

  • प्रदूषण मुक्त दिल्ली

  • शासन व विकास में आम जनता की भागीदारी

  • समृद्ध, आधुनिक और प्रगतिशील दिल्ली

 

 

आम आदमी पार्टी दिल्ली में ऐसी सरकार लेकर आएगी जो पारदर्शिता सहाभागिता और परस्पर संवाद की पक्षधर होगी और दिल्ली में अपने 70 सूत्री कार्य योजना को पूरा करने की दिशा में काम करेगी-

  1. दिल्ली जनलोकपाल बिल: आम आदमी पार्टी सत्ता में आने के बाद दिल्ली जन लोकपाल विधेयक को पारित करेगी। दिल्ली सरकार के सभी सरकारी अधिकारी (मुख्यमंत्री,मंत्री और विधायक) भी इसके जांच के दायरे में आएंगे। दिल्ली के सरकारी अधिकारियों के लिए अपनी परिसंपत्तियों के बारे में सालाना घोषणा करना जरूरी होगा। किसी भी अघोषित परिसंपत्तियों को जब्त कर लिया जाएगा। भ्रष्टाचार के मामलों की समयबद्ध जांच सुनिश्चित होगी। दिल्ली लोकपाल को भ्रष्टाचार के आरोपी लोगों के खिलाफ जांच और अभियोजन शुरू करने की शक्ति होगी। दिल्ली के सभी सरकारी दफ्तरों में’नागरिक चार्टर भी शुरू की जाएगी। ह्विसल्ब्लोअर्स को सुरक्षा दी जाएगी और भ्रष्टाचार विरोधी प्रणाली में योगदान देने के लिए उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

  2. स्वराज विधेयक: आम आदमी पार्टी स्वराज लाएगी -यानि स्व-शासन और सबसे अच्छा प्रशासन। आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में शासन संरचना में बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध है जिसमें स्थानीय समुदायों को सूक्ष्म स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता होगी। इससे नौकरशाहों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की बजाए फैसले लेने की राजनीतिक क्षमता आमलोगों के हाथों में होगी। इसके लिए आम आदमी पार्टी स्वराज विधेयक कानून लाएगी। स्थानीय समुदाय को प्रभावित करने वाले निर्णय नागरिकों द्वारा लिए जाएंगे और उन्हें सचिवालय द्वारा लागू किया जाएगा। मोहल्ला सभा को और रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन को स्थानीय क्षेत्र विकास (सी-लाड) फंड दिया जाएगा।

3.दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा- संवैधानिक ढांचे के भीतर रहते हुए आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अपनी नैतिक और राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करेगी। डीडीए, एमसीडी और दिल्ली पुलिस दिल्ली की निर्वाचित सरकार के प्रति जवाबदेह हो यह भी सुनिश्चित करेगी।

4.बिजली बिल आधे किए जाएंगे- आम आदमी पार्टी की सरकार बिजली के बिल को आधे से कम करने के अपने वादे को निभाएगी। साथ ही बिलिंग में गड़बड़ियों और मीटर दोषों को सही करने के अलावा  बढ़ती बिजली बिलों से परेशान जनता को राहत प्रदान करने के उपाय करेगी।

5.डिस्कॉम का स्वतंत्र ऑडिट- आम आदमी पार्टी बिजली वितरण कंपनियों को ऑडिट कराएगी। ऑडिट परिणाम विधानसभा में पेश करने के बाद, बिजली टैरिफ का पुनर्गठन किया जाएगा।

6.दिल्ली का अपना पॉवर स्टेशन- आम आदमी पार्टी दिल्ली में अपना पावर स्टेशन लगाने की पक्षधर है और मानती है कि इससे दिल्ली में 6200MW तक बिजली की खपत को पूरा करने में सहायता मिलेगी और इससे बिजली समस्या का समाधान होगा। राजघाट और बवाना संयंत्र का कुशलता से संचालन भी किया जाएगा।

7.बिजली वितरण कंपनियों में प्रतिस्पर्धा की शुरूआत- आम आदमी पार्टी उपभोक्ताओं को बिजली प्रदाताओं के बीच चयन करने का अधिकार प्रदान करने संबंधी दिसम्बर 2013 के दिल्ली घोषणा पत्र  में किए अपने वादे को फिर से दोहराती है। दिल्ली में बेहतर सेवाएं प्रदान करने और टैरिफ में कमी के लिए प्रतिस्पर्धी वितरण प्रणाली को लागू करेगी।

8.दिल्ली को सोलर सिटी बनाने की योजना- आम आदमी पार्टी ऊर्जा के अक्षय और वैकल्पिक स्रोतों के लिए एक चरणबद्ध पारी की शुरूआत करेगी। घरों, हाउसिंग सोसायटी,उद्यम और उद्योगो को सौर उर्जा के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वर्ष 2025 तक दिल्ली में ऊर्जा जरूरतों का 20 प्रतिशत सौर ऊर्जा के माध्यम से प्राप्त करने का लक्ष्य है।

9.पानी का अधिकार- आम आदमी पार्टी एक अधिकार के रूप में पानी उपलब्ध कराएगी। पार्टी किफायती मूल्य पर दिल्ली के सभी नागरिकों को स्वच्छ पेयजल की सुविधा देगी। पानी को अधिकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी दिल्ली जल बोर्ड के अधिनियम में भी संशोधन करेगी। एक समयबद्ध योजना के तहत दिल्ली को दिल्ली जल बोर्ड के पाइप कनेक्शन व सीवेज नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।  पानी सप्लाई व वितरण प्रणाली को सुचारू बनाया जाएगा।

10.मुफ्त पानी- आम आदमी पार्टी दिल्ली जल बोर्ड के मीटर के जरिए प्रति माह हर घर के लिए 20 किलोलीटर (20,000 लीटर) तक मुफ्त जीवन रेखा पानी सुनिश्चित करेगी। इस योजना से हाउसिंग सोसायटी भी लाभान्वित होंगे।

11.निष्पक्ष और पारदर्शी पानी मूल्य निर्धारण- आम आदमी पार्टी सस्ती व स्थायी कीमत पर दिल्ली के सभी नागरिकों को पीने के पानी की सुविधा मुहैया कराएगी। पानी की दरों में अनिवार्यत: सालाना 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी के प्रावधान को समाप्त करेगी और किसी भी तरह की बढ़ोतरी विचार-विमर्श के बाद ही की जाएगी।

  1. मुनक नहर से पानी-दिल्ली हरियाणा से अतिरिक्त कच्चे पानी की हकदार है । उच्च न्यायालय के इस आदेश  का कार्यान्वयन हो इसके लिए आम आदमी पार्टी पूरी कोशिश करेगी।
  2. जल संसाधन बढाने पर जोर-आम आदमी पार्टी की सरकार वर्षा जल संचयन, कुओं के पुनर्भरण, वाटरशेड विकास और मिट्टी-जल संरक्षण से जुड़ी योजनाओं के जरिए जल संसाधनों की कमी को पाटने की पहल करेगी। आम आदमी पार्टी मोहल्ला सभा की साझेदारी से झीलों, तालाबों और बावड़ियों जैसे जल निकायों को पुनर्जीवित करेगी।
  3. पानी माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई-आम आदमी पार्टी राजनीतिक नेताओं के संरक्षण में पनप रहे दिल्ली के शक्तिशाली पानी माफिया पर रोक लगानेके लिए प्रतिबद्ध है। आम आदमी पार्टी एक पारदर्शी टैंकर पानी वितरण प्रणाली विकसित करेगी। विभिन्न इलाकों में सक्रिय टैंकरों की अनुसूची ऑनलाइन और मोबाइल फोन पर उपलब्ध कराई जाएगी। निजी टैंकरों को आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा बनाये दिशा निर्देशों के तहत काम करने की अनुमति दी जाएगी। इससे काफी हद तक पानी के अधिक मूल्य निर्धारण और निजी टैंकर ऑपरेटरों की मनमानी से उपभोक्ताओं की रक्षा हो सकेगी।
  4. यमुना पुनर्जीवित-यमुना नदी एक लंबे समय से दिल्ली की सामूहिक स्मृति का हिस्सा रही है लेकिन जीवन रेखा नदी मर रही है। आम आदमी पार्टी इसको फिर से पुनर्जीवित करने के लिए संभावित कदम उठाएगी। इसी कड़ी में एक व्यापक सीवरेज नेटवर्क और नई कार्यात्मक मलजल उपचार संयंत्रों के निर्माण किया जाएगा। साथ ही यमुना नदी में अनुपचारित पानी और औद्योगिक अपशिष्ट के प्रवेश पर सख्ती से रोक लगाने के लिए सख्त कदम उठाएगी।
  5. वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहन-आम आदमी पार्टी की सरकार वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देगी। वर्षा जल संचयन को अपनाने वाले परिवारों को पानी अनुकूल परिवारों-water- friendly families कहा जाएगा। ऐसे परिवारों को सरकार प्रोत्साहन भी देगी।
  6. 200,000 सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण-आम आदमी पार्टी 2 लाख शौचालय बनवाएगी। मलिन बस्तियों और जेजे क्लस्टरों में लगभग 1.5 लाख शौचालय और सार्वजनिक स्थलों में 50,000 शौचालय बनवाए जाएंगे।  एक लाख शौचालयों महिलाओं के लिए बनाए जाएंगे। ये शौचालय मुख्य रूप से सार्वजनिक स्थलों और स्लम क्षेत्रों बनाए जाएंगे। आम आदमी पार्टी पानी की बचत के लिए ईको-शौचालयों का निर्माण करेगी।
  7. बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन-आम आदमी पार्टी बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन के लिए दुनिया भर के अपशिष्ट प्रबंधन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी। घरेलू स्तर परbiodegradable और गैर biodegradable कचरे के रीसाइक्लिंग को भी प्रोत्साहित करेगी। सार्वजनिक स्थानों पर कचरा या किसी भी तरह के मलबे के निपटान करने पर भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। आम आदमी पार्टी शहर में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू करेगी।

19.500 नए सरकारी स्कूल- दिल्ली के हर बच्चे के लिए बेहतर क्वालिटी की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए आम आदमी पार्टी 500 नए स्कूलों का निर्माण करेगी। इसमें माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर के स्कूल होंगे।

  1. उच्च शिक्षा गारंटी योजना-12 वीं के बाद की पढ़ाई की इच्छा रखने वाले छात्रों को सरकार बैंक से ऋण लेने की सुविधा देगी। इसके लिए गारंटी भी सरकार देगी। ऋण ट्यूशन फीस और रहने का खर्च दोनों को कवर करेगी। छात्र ऋण का भुगतान नौकरी लगने के बाद कर सकते हैं।

21.20 नए डिग्री कॉलेज- आम आदमी पार्टी गांवों के साथ साझेदारी कर शहर के बाहरी इलाके में 20 नए डिग्री कॉलेज खोलेगी। इसके अलावा दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय,अम्बेडकर विश्वविद्यालय सहित दिल्ली सरकार के कॉलेजों में मौजूदा सीटों की क्षमता दोगुनी की जाएगी।

22.निजी स्कूलों की फीस पर निगरानी- निजी स्कूलों की फीस को नियमित करने के लिए आम आदमी पार्टी फीस स्ट्रक्चर और उनके अकाउंट को ऑनलाइन करेगी। कैपिटेशन शुल्क भी समाप्त कर दिया जाएगा।

23 स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता- आम आदमी पार्टी नर्सरी और केजी में दाखिले की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाएगी। प्रवेश प्रक्रिया को कारगर बनाने के लिए, नर्सरी दाखिले के लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन प्रणाली विकसित की जाएगी। इससे दाखिला संबंधी भ्रष्टाचार पर भी रोक लगेगी।

  1. सरकारी स्कूलों को अच्छे निजी स्कूलों के समकक्ष लाने की योजना-आम आदमी पार्टी दिल्ली के सभी नागरिकों को शिक्षा की उच्च गुणवत्ता प्रदान करने के लिए सरकारी स्कूलों के स्तर में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। हर स्कूल में विशेष रूप से लड़कियों के लिए शौचालय बनाया जाएगा। स्कूलों में लाइट, पंखे, ब्लैकबोर्ड और अन्य आवश्यक बुनियादी सुविधाओं के लिए स्कूल के प्रिंसिपल को पर्याप्त बजट दिए जाने की योजना है। कंप्यूटर और उच्च गति के इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा हर स्कूल में होगी। सरकारी स्कूलों में सत्रह हजार नए शिक्षकों की भर्ती की जाएगी।
  2. शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में वृद्धि-शिक्षा और स्वास्थ्य आम आदमी पार्टी की शीर्ष प्राथमिकता होगी। स्वास्थ्य सेवा पर कुल बजटीय आवंटन में इसपर होने वाले खर्च के अनुसार वृद्धि की जाएगी।

26.स्वास्थ्यवर्धक बुनियादी ढ़ांचो में वृद्धि- आम आदमी पार्टी 900 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और अस्पतालों में 30,000 अतिरिक्त बेड की सुविधा देगी। इसमें 4000 बेड प्रसूति वार्ड के लिए होगा।  आम आदमी पार्टी दिल्ली में हर 1000 लोगों के लिए पांच बेड के अंतरराष्ट्रीय मानदंड को भी सुनिश्चित करेंगी।

  1. सभी के लिए सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं-दवा और दवा उपकरणों की खरीद को सौ फीसदी भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए इसे केंद्रीकृत किया जाएगा। सामान्य, सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं जनता के लिए आसानी से उपलब्ध कराई जाएंगी।
  2. सड़कों पर पर्याप्त रोशनी-दिल्ली में सत्तर प्रतिशत सड़कों की बत्ती नहीं जलती। रात में सड़कों पर पसरा अंधेरा विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ अपराधों को बढ़ावा देता है। आम आदमी पार्टी दिल्ली की हर सड़क हर गली में सौ फीसदी रोशनी की व्यवस्था करेगी।
  3. लास्ट माइल कनेक्टिविटी-महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या को कम करने में प्रभावी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में लास्ट माइल कनेक्टिविटी की सुविधा देगी। साझा ऑटो रिक्शा, मेट्रो फीडर सेवाओं और ई-रिक्शा को लास्ट माइल कनेक्टिविटी के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इन साझा सेवाओं को निश्चित स्थान से मेट्रो और बस के समय के साथ समन्वयित किया जाएगा।
  4. सार्वजनिक स्थलों और बसों में सीसीटीवी कैमरे-अपराधों पर रोक लगाने के लिए आम आदमी पार्टी डीटीसी बसों,बस स्टैंडों पर और भीड़-भाड़ वाले जगहों में सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना बना रही है। आम आदमी पार्टी सुनिश्चित करना चाहती हैं कि घर से बाहर हर जगह महिलाएंअपने आपको सुरक्षित महसूस करे।
  5. त्वरित न्याय-आम आदमी पार्टी की सरकार महिला उत्पीड़न और अन्य अपराधों के मामलों के तुरत निपटान के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन पर जोर देगी। आम आदमी पार्टी ने त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए जनवरी 2014 में नई फास्ट ट्रैक कोर्ट के निर्माण का ऐलान किया था। आम आदमी पार्टी की सरकार के आने के बाद 47 नई फास्ट ट्रैक कोर्ट में काम शुरू हो जाएगा। यदि जरूरत पड़ी तो महिलाओं के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए कोर्ट में दो पारियों में भी सुनवाई पर विचार कर सकती है। ताकि छह महीने के भीतर सभी मामलों की सुनवाई पूरी हो सके।

32- दिल्ली में वकीलों और न्यायपालिका का सशक्तीकरण- नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाएगी। आम आदमी पार्टी की सरकार निचली अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे सरकारी अधिवक्ताओं और वकीलों के लिए किफायती आवास मुहैया कराएगी। कानूनी अधिकारियों को चिकित्सा योजनाओं की अधिकतम कवरेज सुविधा सुनिश्चित करने के लिए सरकार मौजूदा कानून को अधिक कारगर बनाएगी।

  1. महिला सुरक्षा बल-आम आदमी पार्टी की सरकार 15,000 होमगार्ड जवानों की मदद से महिला सुरक्षा दल या महिलाओं सुरक्षा बल का गठन करेगी। ये होम गार्ड जवान वर्तमान में वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के आवासों पर नौकरों, ड्राइवरों और रसोइयों के रूप में काम करने को मजबूर हैं। आम आदमी पार्टी महिला की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक परिवहनों में 5000 मार्शलों की भी नियुक्ति करेगी।
  2. सुरक्षा बटन-आम आदमी पार्टी की सरकार हर मोबाइल फोन पर एक सुरक्षा या एसओएस बटन की सुविधा देगी। इस सुरक्षा बटन के जरिए महिलाएं आपात स्थिति में निकटतम पुलिस स्टेशन, पीसीआर वैन, रिश्तेदारों और स्वयंसेवक समुदाय से संपर्क कर सकती हैं।
  3. मोबाइल फोन पर शासन-सभी सरकारी सेवाओं की जानकारी और फार्म ऑनलाइन उपलब्ध होंगे। ये जानकारी फोन पर भी उफलब्ध होगी। सभी सरकारी परियोजनाओं,उनसे से संबंधित जानकारियां, खातों और सरकारी कर्मियों से संबंधित आंकड़े ऑनलाइन पोस्ट किए जाएंगे। इससे शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की शुरूआत होगी।
  4. गांवों के विकास पर विशेष ध्यान-दिल्ली के गांवों के विकास के बारे में निर्णय ग्राम सभा, द्वारा लिया जाएगा। ग्राम सभा ग्राम विकास निधि का उपयोग गांव में विकास कार्यों की प्राथमिकताओं के अनुसार कर सकेगी। सरकार कृषि और पशुपालन में लगे लोगों को प्रोत्साहन और ढांचागत समर्थन देगी। गांवों के युवाओं को खेल में प्रोत्साहित करने के लिए गांवों में खेल सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। ग्रामीण दिल्ली के लिए बस और मेट्रो सेवाओं के माध्यम से कनेक्टिविटी में वृद्धि की जाएगी।

37.किसान समर्थक भूमि सुधार- आम आदमी पार्टी दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम की धारा 33 और 81, हटाएगी। कोई भी भूमि ग्राम सभा की सहमति के बिना अधिग्रहित नहीं की जाएगी। गांवों में भूमि के उपयोग के संबंध में अनावश्यक प्रतिबंध को हटाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डालेगी।

  1. वाई-फाई दिल्ली-आम आदमी पार्टी पूरी दिल्ली में वाई-फाई की सुविधा देगी। इससे शिक्षा, उद्यम, व्यवसाय, और रोजगार को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही महिलाओं की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
  2. दिल्ली में व्यापार और खुदरा हब –आम आदमी पार्टी व्यापारियों के अनुकूल नीतियों तैयार करेगी और व्यवसायों की स्थापना और चलाने के लिए संबंधित नियमों और कानूनों को कारगर बनाएगी। आम आदमी पार्टी व्यापारियों के लिए अनुपालन और लाइसेंस को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो क्लियरेंस की प्रणाली विकसित करेगी। आम आदमी पार्टी दिल्ली में कोई भी नया व्यापार या व्यवसाय शुरू करने के लिए एक सप्ताह का समय सुनिश्चित करेगी। व्यापार संबंधी नीतियों को तैयार करने में व्यापारियों की भागीदारी को भी प्रोत्साहित करेगी।
  3. खुदरा में कोई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं-हमारी सरकार दिल्ली में खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक के अपने फैसले पर कायम रहेगी।
  4. सबसे कम वैट व्यवस्था-देश मेंदिल्ली में सबसे कम वैट की व्यवस्था होगी। आम आदमी पार्टी वैट और अन्य टैक्स संरचनाओं को सरल बनाएगी। हर इलाके और बाजार से एकत्र वैट के एक हिस्से को व्यवसाय और व्यापार को बढ़ाने में लगाया जाएगा। इस राशि को बाजार के रखरखाव और उन्नयन के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
  5. छापे और इंस्पेक्टर राज का अंत-आम आदमी पार्टी की सरकार छापे की संस्कृति और इंस्पेक्टर राज प्रथा को खत्म करेगी। केवल विशेष परिस्थितियों में वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति से छापा डाला जा सकेगा।
  6. वैट नियमों का सरलीकरण-आम आदमी पार्टी वैट नियमों, प्रक्रियाओं और इसके प्रारूपों को सरल बनाएगी। 30 पेज लंबे वैट फार्म को व्यापारियों की सहुलियत के लिए एक पेज में तब्दील करेगी। संबंधित विभाग के साथ सभी संचार प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जाएगा। लाइसेंस का आवेदन और इसकी प्राप्ती घर बैठे कर सकते हैं।
  7. दिल्ली कौशल मिशन का गठन- दिल्ली में अचल कौशल की खाई को पाटने के लिए आम आदमी पार्टी की सरकार स्कूलों और कॉलेजों में व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा देगी। युवाओं को सक्षम करने के लिए दिल्ली कौशल मिशन पैदा करेगी।
  8. 8 लाख रोजगार के अवसर-आम आदमी पार्टी अगले पांच साल में आठ लाख नए रोजगार के अवसर पैदा करेगी। आम आदमी पार्टी उद्यमियों को सहायता मुहैया कराने के लिए अभिनव और निजी स्टार्टअप की सुविधा भी देगी। निजी उद्दोगों के माध्यम से अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाएगी।
  9. दिल्ली एक स्टार्ट-अप हब-सरकार विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में व्यापार और प्रौद्योगिकी इन्क्यूबेटरों की स्थापना करकेstartups हब के लिए प्रोत्साहित करेगी। एक पायलट परियोजना के रूप में, तीन लाख वर्ग फुट में व्यापार के लिए सस्ती जगह भी विकसित की जाएगी।
  10. ठेके के सभी पद नियमित किए जाएंगे-आम आदमी पार्टी दिल्ली सरकार और दिल्ली सरकार के स्वायत्त निकायों में 55,000 रिक्तियों को तत्काल आधार पर भरेगी। साथ ही 4000 डॉक्टरों और 15,000 नर्सों और सहयोगी स्टाफ को स्थायी किया जाएगा।
  11. सामाजिक सुरक्षा पर जोर-आम आदमी पार्टी एक लचीला और निष्पक्ष श्रम नीति लागू करेगी। हमारी नीति असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी। इस नीति से मजदूरी, सेवाओं और घरेलू श्रमिकों के काम के घंटे को निर्धारित करने और खपरैल बीनने के काम की स्थिति में सुधार होगा। स्थानीय मोहल्ला सभा निर्धारित स्थानों के लिए फेरी वाले और हॉकरों को लाइसेंस देगी।
  12. प्रदूषण कम करने पर जोर-दिल्ली शहर की आत्मा दिल्ली रिज को अतिक्रमण और वनों की कटाई से संरक्षित किया जाएगा। स्थानीय मोहल्ला सभा के सहयोग से पर्यावरण के अनुकूल वनीकरण को दिल्ली के सभी भागों में बढ़ावा दिया जाएगा। आम आदमी पार्टी शहर को साफ करने के लिए यंत्रीकृत वैक्यूम सफाई वाहनों को अधिग्रहित करेगी। सड़कों से कारों की संख्या को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहनों की हालत सुधारेगी। इसके अतिरिक्त सीएनजी और बिजली की तरह कम उत्सर्जन ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके अलावा प्रदूषण कम करने के लिए सरकार कार-पूलिंग को प्रोत्साहित करेंगी। और ईंधन में मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त  कार्रवाई करेगी।
  13. एकीकृत परिवहन प्राधिकरण-आम आदमी पार्टी मेट्रो,बसों, ऑटो रिक्शा, रिक्शा और ई-रिक्शा सहित सभी परिवहन व्यवस्था के लिए समग्र परिवहन नीतियों का गठन करेगी। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक ‘एकीकृत परिवहन प्राधिकरण’ स्थापित करेगी।

51.बस सेवाओं में बड़े पैमाने पर विस्तार- आम आदमी पार्टी दिल्ली में भारी पैमाने पर बस सेवाओं का विस्तार करेगी। आगामी पांच साल में शहर को कम से कम 5,000 नई बसों से जोड़ने की योजना है।  इससे शहर में परिवहन लागत कम हो जाएगी और प्रदूषण भी कम होगा।

  1. ईरिक्शा के लिए तत्काल निष्पक्ष नीति-पिछले कई महीने सेदिल्ली के ई-रिक्शा चालक असंमजस की स्थिति में है। भाजपा सरकार की गलत नीतियों के कारण कई महीने से बेकार बैठे है। आम आदमी पार्टी सुरक्षा पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ई-रिक्शा चालकों के स्वामित्व और सुचारू संचालन के लिए एक स्पष्ट नीति और मानक लेकर आएगी।
  2. मेट्रो रेल का विस्तार-आम आदमी पार्टी मेट्रो रेल का विस्तार और दिल्ली में रिंग रेल सेवा को विकसित करने के लिए भारतीय रेलवे के साथ समझौता करेगी। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, दिल्ली मेट्रो का बड़े पैमाने पर विस्तार करने की योजना है। वरिष्ठ नागरिकों, छात्रों और विकलांग लोगों को बसों पर और मेट्रो में रियायत देने का भी प्रावधान है।
  3. ऑटो चालकों के लिए निष्पक्ष व्यवस्था-ऑटो रिक्शा स्टैंड की संख्या में वृद्धि की जाएगी। ऑटो-रिक्शा की खरीद के लिए त्वरित बैंक ऋण की सुविधा होगी। आचरण में सुधार के लिए ऑटो चालकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। ऑटो यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए जाएंगे। और, किसी भी तरह के दुर्व्यवहार के मामले में ऑटो चालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। आम आदमी पार्टी पुलिस से ऑटो रिक्शा चालकों के उत्पीड़न रोकने संबंधी कानून भी बनाएगी।
  4. पुनर्वास कालोनियों का फ्रीहोल्ड-आम आदमी पार्टी पुनर्वास कालोनियों को फ्रीहोल्ड अधिकार देने के लिए सरल समाधान का प्रस्ताव लाएगी। मूल आवंटी को सिर्फ 10,000 रुपये में उसके प्लाट का स्वामित्व मिलेगा।

जो मूल आवंटी नहीं हैं उन्हें 50000 रूपए में प्लाट के स्वामित्व का अधिकार मिलेगा। बोझिल बहु पृष्ठ प्रपत्र का सरलीकरण करके एक ही पृष्ठ के फार्म में तब्दील किया जाएगा।

  1. अनधिकृत कालोनियों का नियमितिकरण व परिवर्तन-हम पुनर्वास कालोनियों में संपत्ति और बिक्री के कामों में पंजीकरण का अधिकार देंगे। इसके अलावा,हम एक व्यवस्थित और चरणबद्ध तरीके से बिजली, पानी,सीवर लाइन और, स्कूलों व अस्पतालों की सुविधा भी मुहैया कराएंगे। बुनियादी जरूरतों को पूरा करके ही  अनधिकृत कालोनियों को सशक्त बनाने के लिए एक ही रास्ता है। आम आदमी पार्टी की सरकार के गठन के एक वर्ष के भीतर, इन अनधिकृत कालोनियों को नियमित कर दिया जाएगा और निवासियों के स्वामित्व अधिकार दिया जाएगा।
  2. सभी के लिए किफायती आवास: आम आदमी पार्टी की सरकार कम आय वर्ग के लिए किफायती आवास  बनाएगी। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की वर्तमान में खाली पड़ी 200 एकड़ की जमीन को किफायती आवास के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
  3. मलिन बस्तियों में सीटू विकास-झुग्गी वासियों को मौजूदा मलिन बस्ती में ही भूखंड या फ्लैट्स उपलब्ध कराया जाएगा। यह संभव नहीं हुआ, तो उनका निकटतम संभावित स्थान में पुनर्वास कराया जाएगा। मोहल्ला सभा पुनर्वास प्रक्रिया की योजना है और इसके सफल कार्यान्वयन की निगरानी की जाएगी। पुनर्वास कार्य तक मलिन बस्तियों को किसी भी हाल में ध्वस्त नहीं किया जाएगा। पीने के पानी, साफ-सफाई और दूसरी बुनियादी सुविधाएं सभी मलिन बस्तियों में उपलब्ध कराई जाएंगी। मलिन बस्तियों में गलियों की मरम्मत की जाएगी और सड़कें पक्की बनाई जाएंगी।

59-वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल- सरकार तुरंत एक सार्वभौमिक और गैर-अंशदायी वृद्धावस्था पेंशन प्रणाली शुरू करेगी। एक न्यूनतम सम्मानजनक राशि मुद्रास्फीति में सूचीबद्ध के लिए दी जाएगी। संवितरण और पेंशन के संबंध में मनमाने ढंग से फैसलों में देरी का सफाया हो जाएगा। भुगतान अदायगी व पेंशन से संबंधित फैसलों में मनमाने ढ़ंग से होने वाली देरी को दूर किया जाएगा।

  1. नियंत्रित मूल्य वृद्धि-खुदरा और थोक व्यापार में,जमाखोरी और मुनाफाखोरी को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। आम आदमी पार्टी की सरकार सब्जियों, फलों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए काला बाजारी, जमाखोरी को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा देगी। राशन की दुकानों और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी और बढ़ती लागत से आम आदमी को राहत देगी।

  2. नशा मुक्त दिल्ली-आम आदमी पार्टी दिल्ली को पूरी तरह से नशा मुक्त राज्य बनाना चाहता है। नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने के लिए निगरानी प्रणाली और दोषियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान बनाएगी। नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाएगी और ऐसे लोगों के पुनर्वास में मानसिक और मनोरोग समर्थन दिया जाएगा। साथ ही स्कूलों में किशोरों के लिए प्रभावी परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराएगी।

  3. विकलांगों का सशक्तिकरण-आम आदमी पार्टी विकलांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है, और उम्मीद करती है कि दिल्ली भारत के बाकी के हिस्से के लिए मिसाल साबित होगी। आम आदमी पार्टी विकलांग व्यक्तियों के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करेगी। आम आदमी पार्टी सरकारी स्कूलों में विशेष शिक्षकों की भर्ती करेगी। आम आदमी पार्टी विकलांग बच्चों के स्कूलों और कॉलेजों में प्रवेश के लिए आसान प्रावधान बनाएगी और विकलांग बच्चों के लिए काम कर रही संस्थानों को वित्तीय सहायता भी देगी।

  4. 1984 के दंगों पीड़ितों के लिए न्याय-1984का दंगा दिल्ली के इतिहास का सबसे काला पन्ना है। इस हादसे के जिम्मेदार लोग आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। न्याय से वंचित सिख समुदाय की भावना को आम आदमी पार्टी अच्छी तरह समझती है। इस मुद्दे पर केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार का रवैया अभी भी संदेहास्पद है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने जनवरी 2014 1984 सिख विरोधी दंगे की जांच के लिए एसआईटी के गठन का आदेश दिया था। आम आदमी पार्टी की सरकार इस दिशा में फिर से प्रयास करेगी। और, इस दंगे की जांच प्रक्रिया को दोबारा कराने का वादा करती है।

  5. पूर्व सैनिकों का सम्मान-पूर्व सैनिकों और महिलाओं की सबसे बड़ी आबादी दिल्ली में रहती है। आम आदमी पार्टी “एक रैंक, एक पेंशन ‘की मांग कर रहे भूतपूर्व सैनिकों की लड़ाई में उनके साथ है। दिल्ली रोजगार बोर्ड और अन्य निकायों को पूर्व सैनिकों की जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता साथ पूरा करने का निर्देश दिया जाएगा। आरक्षित नौकरी की रिक्तियों को केवल पूर्व सैनिकों से भरा जाएगा।

  6. अल्पसंख्यकों को समानता और विकास-दिल्ली में हाल ही में कुछ स्थानों पर हुए सांप्रदायिक तनाव ने पूरी तरह से शहर के सामाजिक ताने-बाने को हिला कर रख दिया है। दिल्ली भर में पूजा स्थलों पर भड़काऊ भाषणों की भी आम आदमी पार्टी निंदा करती है। आम आदमी पार्टी ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए मोहल्ला सभा शांति समितियों की स्थापना करेगी। समिति का मकसद स्वराज की भावना को बनाए रखने और पास-पड़ोस में शांति व सद्भाव सुनिश्चित करने की कोशिश होगी। आम आदमी पार्टी दिल्ली वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता लाने व निजी पार्टियों और सरकार द्वारा वक्फ संपत्ति पर अतिक्रमण हटाने की दिशा में भी ठोस पहल करेगी।

  7. सफाई कर्मचारी को गरिमा-आम आदमी पार्टी की सरकार ठेका प्रथा को खत्म करेगी। ठेके पर काम कर रहे मौजूदा कर्मचारियों को नियमित किया जाएगा। सीवेज नालों में प्रवेश करने वाले श्रमिकों को मास्क,सूट और मशीनों जैसे सुरक्षात्मक गियर उपलब्ध कराए जाएंगे। आग सेनानियों के लिए बीमा का प्रावधान होगा। सफाई कर्मचारियों के कैरियर में उन्नति के लिए उनके शिक्षा व प्रशिक्षण में सहायता दी जाएगी । ड्यूटी के दौरान “सफाई कर्मचारी” की मौत पर उनके शोक संतप्त परिवार को 50 लाख रूपए दिए जाएंगे।

  8. हाशिए की जिंदगी गुजार रहे लोगों को सुरक्षा-आम आदमी पार्टी की सरकार अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े जाति वर्गों के लिए दिल्ली सरकार की नौकरियों में आरक्षण की नीतियों के पालन को सुनिश्चित करेगी। अनुसूचित जातियों के उद्यमियों के लिए छोटे व्यवसायों की शुरूआत के लिए शून्य या कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा। जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाएगा। आम आदमी पार्टी दिल्ली में बसे डिनोटिफाइड और खानाबदोश समुदायों के भेदभाव और उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए कदम उठाएगी। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और उचित पहचान पत्र दिया जाएगा।

  9. खेल संस्कृति को बढ़ावा-आम आदमी पार्टी विशेष रूप से दिल्ली के ग्रामीण और शहरी गांवों में, एथलीटों के लिए खेल सुविधाएं, बुनियादी ढांचे और प्रभावी मानव संसाधन प्रबंधन पैदा करेगी। युवाओं के लिए दिल्ली में नए स्टेडियम और खेल परिसर खोले जाएंगे। 3000 से अधिक सरकारी स्कूलों में खेल के मैदान बनाए जाएंगे जहां स्कूल के बाद खेलने की सुविधा होगी।

  10. पंजाबी,संस्कृत और उर्दू को बढ़ावा- उर्दू और पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा देगी । उर्दू और पंजाबी पढ़ाने के लिए शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जाएगी। दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उर्दू और पंजाबी में रिसर्च को प्रोत्साहित किया जाएगा। संस्कृत के अध्ययन और रिसर्च को भी प्रोत्साहित किए जाने की योजना।

  11. हमारी विरासत और साहित्य का संरक्षण-दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी नेटवर्क का विस्तार किया जाएगा। सभी के लिए सुलभ एक जीवंत सार्वजनिक स्थान मुहैया कराने की योजना। पढ़ने और जिज्ञासा की संस्कृति को प्रोत्साहित करेगी आम आदमी पार्टी की सरकार। एक सार्वजनिक पुस्तकालय या समुदायिक पढ़ने की जगह दिल्ली के हर निर्वाचन क्षेत्र में बनाने की योजना।

 

 

जनवरी 25, 2015

अरविंद केजरीवाल : “पैसे सबसे लेना पर वोट झाड़ू पर ही देना” पर चुनाव आयोग को जवाब

AKpoliceदिनांक: 24/01/2015
सेवा में,
माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त
भारतीय चुनाव आयोग, दिल्ली
निर्वाचन सदन,
अशोका रोड, नई दिल्ली
मुझे चुनाव आयोग से नोटिस मिला है। मुझ पर आरोप है कि मैं लोगों को रिश्वत लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं। ये आरोप सरासर गलत है। हमारी पार्टी रिश्वतखोरी के सख़्त खिलाफ है। देश की राजनीति को साफ़ करने के लिए और भ्रष्टाचार दूर करने के लिए ही हमारी पार्टी का जन्म हुआ है। ऐसे में मैं किसी को रिश्वत देने अथवा लेने को प्रोत्साहित करूंगा, ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता।आज इस सच को नहीं झुठलाया जा सकता कि हमारे देश के कई नेता और पार्टियां पैसे और अन्य सामान बांट कर वोट खरीदते हैं। सरकार, चुनाव आयोग और कई गैर सरकारी संगठनों के सतत प्रयासों के बावजूद यह अभिशाप हमारे देश की राजनीति का अभिन्न अंग बन चुका है।इसे कैसे रोका जाए? राजनीति की इस कुरीति को रोकने के लिए ही हमने ये तरीका अपनाया है। मैंने अपने भाषणों में जो कुछ कहा उसका असली तात्त्पर्य है- ‘‘जो पैसा दे, उससे पैसा ले लो। लेकिन पैसा देने वालो वोट बिल्कुल नहीं दो। वोट अपने मन से दो। वोट उसे दो जो पैसा नहीं दे रहा।’’

अगर मेरे भाषण को ध्यान से सुने तो मेरे कहने का मर्म यही है। अगर मैं कहता कि जो पैसा दे उसी को वोट दो, तब आप मुझ पर इल्ज़ाम लगा सकते थे कि मैं लोगों को रिश्वत देकर वोट डालने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं। मैं तो इसके बिल्कुल उल्टा कह रहा हूं। मैं तो कह रहा हूं जो पैसा दे उसे वोट बिल्कुल मत दो। इस तरह से तो मैं रिश्वतखोरी रोकने का काम कर रहा हूं। मैं तो आप ही की मदद कर रहा हूं।

हमने पिछले दिल्ली विधानसभा के चुनाव के पहले भी अपने हर भाषण में ये बात कही थी। तब किसी ने कुछ नहीं कहा। मैंने लोकसभा चुनाव के दौरान भी अपने हर भाषण में यही बात कही थी, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने मेरे खिलाफ शिकायत की है। ऐसा क्यों? अब इन्हें क्या तकलीफ़ हो रही है?

ऐसा इसलिए क्योंकि एक साल के अंदर दिल्ली का वोटर धीरे-धीरे समझदार हो गया है। वो भारी संख्या में इस बात को लागू करने लगा है कि जो पैसा देगा उससे पैसा तो ले लेंगे पर वोट उसे कतई नहीं देंगे। इसलिए ये पार्टियां घबरा गईं कि इनका पैसा बेकार हो जाएगा। अब इन पार्टियों को पता चल गया है कि पैसे देकर वोट नहीं खरीद पाएंगे। अब इन पार्टियों को पता चल गया है कि चुनाव के कि चुनाव के दौरान रिश्वतखोरी नहीं चलेगी। इसलिए इन दोनों पार्टियों ने घबराकर और बौखलाकर मेरे खिलाफ शिकायत की है।

मैंने तो ये अपील करके हमारी राजनीति की एक गंदी परंपरा को बंद करने की दिशा में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। जिसे मीडिया तोड़-मरोड़कर भ्रष्ट पार्टियों के इशारे पर जनता के सामने गलत रूप से पेश कर रही है. अपने हर भाषण में मैं जनता से पूछता हूँ – ‘‘क्या बीजेपी-कांग्रेस वाले चुनाव के टाइम पैसे देने आते हैं?’’ जनता ज़ोर से चिल्लाकर एक आवाज़ में कहती है- ‘‘हां आते हैं।’’ इसका मतलब वोट खरीदने की परंपरा बहुत बड़े पैमाने पर चल रही है।

पिछले एक साल से मेरी अपील ने इस गंदी परंपरा को तोड़ने में बहुत अहम्‌ भूमिका निभाई है। इसीलिए ये दोनों पार्टियां बुरी तरह से घबरा गई हैं। और इसलिए इन्होंने आपके समक्ष मेरी शिकायत की है।

आपको याद होगा कि जब मैं मुख्यमंत्री बना तो मैंने दिल्ली के लोगों को रिश्वतखोरी पर कुछ इसी तरह का आह्‌वान किया था। मेरा आह्‌वान कई लोगों को अटपटा लगा। कुछ लोगों का मानना था कि मैं रिश्वतखोरी को प्रोत्साहन दे रहा हू। लेकिन आपने देखा कि मेरी इस अपील ने भ्रष्ट कर्मचारियों के मन में ऐसा खौप़ पैदा कर दिया कि उन 49 दिनों में दिल्ली में रिश्वतखोरी लगभग बंद हो गई थी।

उस वक्त भी मैंने रिश्वतखोरी बंद करने के लिए जनता से मदद मांगी थी और आज भी रिश्वतखोरी बंद करने के लिए जनता से ही मदद मांग रहा हूं।

आज जब मैं दिल्ली के वोटरों से ये अपील कर रहा हूं कि पैसा सब से ले लो, लेकिन वोट उस पार्टी को दो जो आपको पैसा नहीं दे रही। कुछ लोगों को मेरी अपील अटपटी लग सकती है। लेकिन राजनीति को साफ़ करने में इस अपील ने एक अहम भूमिका निभाई है। और दोनों पार्टियों की बौखलाहट में इसका असर दिखाई देता है।

कानूनी रूप से भी मैंने और मेरे वकीलों ने कानून में दी गई ‘‘रिश्वतखोरी’’ की परिभाषा को अच्छे से पढ़ा है। कानूनन भी मेरी अपील किसी भी तरह से रिश्वतखोरी की अपील नहीं मानी जा सकती। आपके नोटिस कानूनी रूप से जवाब इस पत्र के साथ में संलग्न है।

मैं चुनाव आयोग की बहुत इज्ज़त करता हूं। मैं हमारे संविधान और कानून की भी बहुत इज्ज़त करता हूं। मैं किसी भी हालत में कोई कानून नहीं तोड़ूंगा। मेरी उपर दी गईं दलीलों के बावजूद यदि आपको लगता है कि मेरी अपील गलत है तो जब तक MCC लागू है, तब तक मैं ये अपील करना बंद कर दूंगा। लेकिन मेरी आपसे एक विनती है यदि आप मेरी दलीलों से असहमत हैं तो मुझे एक बार व्यक्तिगत रूप से पेश होकर आपके समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर जरूर दें।

भवदीय,
अरविन्द केजरीवाल!

मई 30, 2014

योगेन्द्र यादव : 21वीं सदी में नहीं चल सकती 20वीं सदी की राजनीति

Yogendra Yadav‘प्रभात खबर’ के रंजन राजन ने राजनीतिक विश्‍लेषक व ‘आप’ नेता योगेंद्र यादव से लंबी बातचीत की|

रंजन – 2014 के जनादेश को आप कैसे देखते हैं? क्या इसे आप ‘मोदी लहर’ का परिणाम मानते हैं?

योगेन्द्र – ‘चुनावी लहर’ का मतलब है चुनाव क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं को लांघ कर देश के बड़े इलाके में एक जैसा रुझान दिखना. नतीजे में जब भी ऐसी स्थिति दिखे, तो उसे हम ‘चुनावी लहर’ का नाम दे सकते हैं. जैसे 1971 में हुआ, 1977 में हुआ, 1984 में हुआ. इस लिहाज से 2014 के जनादेश को ‘चुनावी लहर’ कहना बिल्कुल सही होगा. यह सही है कि इस लहर में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, लेकिन इसे ‘मोदी लहर’ मान लेना या ‘मोदी लहर’ की संज्ञा देना, इस चुनावी लहर के चरित्र को समझने में चूक होगी|
दरअसल, 2014 की ‘चुनावी लहर’ के तीन प्रमुख कारक हैं. पहला, जो शायद सबसे बड़ा कारक था, यूपीए-2 के राज ने देश में एक तरह का नैतिक और राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था. इसलिए जनता के मन में असंतोष नहीं, बल्कि गुस्सा घर कर गया था. लोग कह रहे थे कि यूपीए को छोड़ कर जो मर्जी सत्ता में आ जाये. दूसरा, इस गुस्से में लोग एक पुख्ता और जाना-पहचाना विकल्प भी ढूंढ रहे थे. इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी एक जानी-पहचानी पार्टी थी, पायदार दिखाई दे रही थी और लोगों को भरोसा था कि यह पार्टी देशभर में जीत हासिल कर सकती है, 272 के आंकड़े को छू सकती है, केंद्र में सरकार बना सकती है|

नरेंद्र मोदी इस चुनावी लहर के तीसरे कारक थे. उनका योगदान यह था कि उन्हें देश में एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में मोदी की छवि ने चुनावी रुझान को एक लहर में तब्दील कर दिया. मोदी की छवि में लोगों को वह शून्य भरने की संभावना दिखाई देने लगी. मनमोहन सिंह के लचर एवं कमजोर व्यक्तित्व के सामने लोग अगर एक मजबूत एवं निर्णायक व्यक्तित्व देखना चाह रहे थे, तो नरेंद्र मोदी की छवि ने उस कमी को पूरा किया. मोदी की छवि में लोगों को भविष्य के लिए आशा दिखाई दी. जिन-जिन बातों को लेकर लोगों के मन में एक कसक थी, वह पूरी होती दिखायी दी. ऐसा अकसर होता है कि इस तरह की किसी छवि में जो कोई व्यक्ति जो कुछ भी ढूंढ़ना चाहता है, ढूंढ़ लेता है|

रंजन – नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किये हैं, उसके आधार पर बहुत से लोगों को लग रहा है कि देश में ‘अच्छे दिन’ बस आने ही वाले हैं. आप कितने आशान्वित हैं?

योगेन्द्र – सपने देखना अच्छी बात है. जब कोई समूह या देश सपने देखता है, तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है. उसकी ऊर्जा बढ़ती है. उसका मन बड़ा होता है. इसलिए अगर आज देश के एक बड़े वर्ग में आशा है, तो मैं न तो उस आशा से झगड़ना चाहूंगा और न ही उस आशा को पंचर करना चाहूंगा. अगर आज इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी में आस्था है, तो जनता में आस्था रखने के नाते मुङो उन लोगों का सम्मान करना सीखना चाहिए. हालांकि मुङो यह डर भी है कि लोगों की आशाएं कहीं खोखली न साबित हो. मुङो डर है कि कहीं नरेंद्र मोदी के कई दावे महज लफ्फाजी न साबित हों. हालांकि मैं चाहूंगा कि मैं इसमें गलत साबित होऊं|

मैं समझता हूं कि देश में अगर अच्छे दिन आ सकते हैं और हमारी पार्टी उसकी वाहक नहीं बनती है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है. जो भी पार्टी वाहक बने, देश का भला हो यह बड़ी बात है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी एवं अप्रत्याशित पराजय के प्रमुख कारक क्या-क्या रहे?

योगेन्द्र – इस बार के जनादेश को सिर्फ कांग्रेस की हार कहना अपर्याप्त होगा. उसकी यह हार अप्रत्याशित और बहुत गहरी ही नहीं थी, बल्कि साथ-ही-साथ यह दीर्घ काल में कांग्रेस के पतन का संकेत देती है. यूपीए की सरकार को दो मौके मिले. चूकि उसकी पहली बार की जीत भी अप्रत्याशित थी, इसलिए उस सरकार के विरुद्ध असंतोष उभरते-उभरते भी समय लगा. चूंकि यूपीए-1 की जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए उसका आशा-निराशा का चक्र सामान्य सरकार की तरह नहीं चला. उस सरकार से आशा बंधनी देर से शुरू हुई और यूपीए की पहली सरकार खत्म होने तक भी आशा का माहौल बना ही रहा. लेकिन यूपीए-2 की शुरुआत होते ही निराशा आरंभ हो गयी. यह निराशा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते चरम सीमा पर पहुंची और 2014 का चुनाव आते-आते नैराश्य में बदल गया|

जनता कांग्रेस से निराश ही नहीं थी, जनता को कांग्रेस से असंतोष ही नहीं था, बल्कि उसमें गुस्सा घर कर गया था. लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस से छुटकारा पाना चाह रहे थे. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की ईमानदारी की चमक उतर चुकी थी. लोग इन्हें एक भ्रष्ट सरकार के मुखौटे के रूप में देखने लगे थे. राजनीतिक रूप से इस सरकार में किसी दिशा बोध का सर्वथा अभाव था. वह चाहे कश्मीर का मसला हो या तेलंगाना का, कांग्रेस सरकार एक के बाद एक आत्मघाती कदम उठाती चली गयी. सरकारी कामकाज के मामले में भी सबकुछ ठहर गया था. एक तरफ आम आदमी परेशान था, तो दूसरी तरफ उद्योगपति और पूंजीपति भी निराश हो गये थे. ऐसे में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी नीचे गिर जायेगा, इसकी कल्पना मैंने भी नहीं की थी|

कांग्रेस की यह अभूतपूर्व हार एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, कि पार्टी इससे पांच साल में उबर जायेगी. यह कांग्रेस के पतन का एक नया दौर हो सकता है. 1989-91 के दौरान कांग्रेस इस देश में राजनीति की धुरी की जगह कई राष्ट्रीय पार्टियों में से एक पार्टी बन गयी थी. उसके बाद से जिस-जिस राज्य में कांग्रेस एक बार बैठ गयी, वहां वापस खड़ी नहीं हो पायी. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इसके बड़े उदाहरण हैं. मुङो लगता है कि इस चुनाव के बाद देश की जो मध्य पट्टी है, कांग्रेस उसमें बहुत बड़े संकट में आ सकती है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कांग्रेस बीते 15 साल से विपक्ष में रही है, लेकिन किसी भी तरह का विपक्ष देने में असमर्थ रही है. इस बार कांग्रेस का इस सारी पट्टी से सफाया होने के बाद संभव है कि कांग्रेस इस इलाके में बैठ जाये और फिर कभी उबर नहीं पाये. यही दिल्ली और हरियाणा में भी संभव है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष में तो है, लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर विपक्ष की भूमिका निभा पायेगी, इसमें मुङो संदेह है. और अगर ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के अप्रासंगिक होने की संभावना पैदा हो गयी है|

रंजन – कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि ‘आप’ के चुनाव मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी मतों का बिखराव बढ़ा, जिससे भाजपा को बहुमत पाने में सुविधा हुई. दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आप ने कांग्रेस के मुसलिम वोट बैंक में सेंध लगायी, जिससे उसकी सबसे बड़ी हार हुई. आप इन विचारों को कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – यह बहुत ही सतही समझ है. कौन किसके वोट काट रहा है, यह समझने के लिए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उस वोटर ने पिछले चुनावों में किसे वोट दिया था. हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वह वोटर अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती तो किसे वोट देता. यह कांग्रेस की खुशफहमी है कि जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, वे ‘आप’ के नहीं रहने पर कांग्रेस को वोट देते. हकीकत यह है कि उनमें से काफी लोगों ने पिछली बार कांग्रेस को भले ही वोट दिया हो, लेकिन उनमें से एक बड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में कोई विकल्प नहीं होने पर झक मार कर भाजपा को ही वोट देता. इसीलिए आम आदमी पार्टी से भाजपा जितनी बौखलायी हुई थी, उतनी तो कांग्रेस भी नहीं बौखलायी थी|

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर गौर करें. अगर उसमें आम आदमी पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, तो जाहिर है भाजपा को बहुत बड़ी सफलता मिलती. अब तो दिल्ली का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है और कम-से-कम दिल्ली के बारे में तो हमें यही कहना चाहिए कि वहां कांग्रेस ही आम आदमी पार्टी के वोट काट रही है. अगर कांग्रेस ने एक-दो संसदीय क्षेत्रों में वोट न काटा होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में ‘आप’ को एक-दो सीटें मिल जाती. लेकिन राजनीति का गुणा-भाग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता. मैं समझता हूं कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव में नहीं होती, तो देश के लिए, देश के भविष्य की दिशा ढूंढनेवाले काफी लोगों का मन नैराश्य में डूब जाता. नरेंद्र मोदी में देश का भविष्य न देखनेवाले लोगों को इस चुनाव में देश के भविष्य के लिहाज से कुछ नजर ही नहीं आता. आम आदमी पार्टी ने इस देश के आदर्शवादियों, और खास कर देश के युवाओं, के मन में देश के भविष्य के प्रति एक उम्मीद जगायी है. यह किसी भी चुनावी गणित से बड़ी बात है|

रंजन – इस बार के जनादेश में वामपंथी दलों की जमीन और खिसकी है. अब वाम दलों की राजनीति की दशा-दिशा और भविष्य की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – पिछले दो-तीन दशकों से लेफ्ट की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है. लेफ्ट राष्ट्रीय ताकत की जगह पर एक क्षेत्रीय ताकत में तो पहले ही बदल चुका था, अब उन क्षेत्रों से भी धीरे-धीरे फेल होता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खत्म भले ही न हो रहा हो, लेकिन ममता बनर्जी से हार के बाद पहले जैसा दबदबा कायम नहीं कर सकता. केरल में तो एलडीएफ एक वामपंथी शक्ति बचा ही नहीं. उधर, मानिक सरकार पुरानी राजनीतिक पूंजी और अपने व्यक्तिगत प्रताप से चुनाव जीत रहे हैं|

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जनाभिमुखी और गरीब व्यक्ति के सपनों की राजनीति की जगह नहीं बची है. मैं मानता हूं कि ऐसी राजनीति भारत के लोकतंत्र के केंद्र में है और रहेगी. लेकिन मैं मानता हूं कि लेफ्ट की ‘ऑर्थोडॉक्स राजनीति’ आज जन आकांक्षाओं का वाहक नहीं बन पा रही है. जनता की आकांक्षाओं को एक नयी राजनीति की तलाश है. पिछले दो-तीन दशकों के जनांदोलन इसी तलाश का परिणाम हैं. और मैं चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी भी इसी तलाश का वाहक बने|

रंजन – आप विकल्प की बात करते हैं, तो आपकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस और भाजपा से किस तरह अलग हैं? क्या इस चुनाव में वामपंथी दलों की ओर से खाली हुई राजनीतिक जमीन को भरने की दिशा में आपकी पार्टी बढ़ेगी?

योगेन्द्र – किसी भी नयी राजनीति की यह नियति होती है कि उसे शुरुआत में पुराने चश्मे से ही देखा जाता है. हमारे साथ भी यही हो रहा है. हम स्थापित राजनीतिक खांचों के बाहर अपनी राजनीति स्थापित कर रहे हैं, लेकिन हमारे हर कदम को अब भी उन्हीं पुराने राजनीतिक खांचों में फिट करने की कोशिश की जाती है. मैंने बार-बार कहा है कि हमारी राजनीति न तो लेफ्ट की है, न ही राइट की|

आर्थिक नीतियों को लेकर इस देश में जो जड़ता आयी है, आर्थिक नीतियों के बारे में सोच जिस तरह से दो खांचों में बंध गयी है, हम उससे बाहर निकलना चाहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सामाजिक न्याय या आर्थिक समता के विरुद्ध हैं. इस देश का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व की बुनियाद पर ही खड़ा है. लेकिन हम अंतिम व्यक्ति की भलाई को किसी पुराने वैचारिक खांचे से बांध कर नहीं देखते. हमारा साध्य है अंतिम व्यक्ति के हाथ में संसाधन पहुंचना, लेकिन हमारे साधन और औजार किसी बने-बनाये मॉडल से नहीं आते. अंतिम इनसान की खुशहाली अगर सरकार के दखल देने से बेहतर होती है, तो हम दखल के पक्ष में हैं और अगर सरकार के हाथ खींचने से बेहतर होती है, तो हम हाथ खींचने के पक्ष में हैं|

कुछ सेक्टर हैं- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-जहां हम सरकार की पहले से ज्यादा दखल चाहते हैं, लेकिन व्यापार और उद्योग में हम चाहेंगे कि सरकार कुछ न्यूनतम नियमन के अलावा बहुत ज्यादा दखलंदाजी न करे. यह बात चूंकि नयी है, इसलिए लोगों को अटपटी लगती है और वे कहते हैं कि हमारे विचार स्पष्ट नहीं हैं. लेफ्ट के साथी सोचते हैं कि हम अभी उनकी तरह हो नहीं पाये हैं. सच यह है कि हम उस तरह के वैचारिक ढांचे से बंधना ही नहीं चाहते. बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गिरफ्त से मुक्त हुए बिना इक्कीसवीं सदी के विचारों को, इक्कीसवीं सदी की राजनीति को स्थापित नहीं किया जा सकता|

रंजन – इस जनादेश के बाद विरोध की राजनीति को आप गैर-कांग्रेसवाद से गैर-भाजपावाद में शिफ्ट होते देख रहे हैं? क्या विरोध की राजनीति को दिशा देने के लिए आम आदमी पार्टी अन्य दलों के बीच तालमेल का प्रयास करेगी, या चुनाव से पहले की एकला चलो की नीति पर ही चलती रहेगी?

योगेन्द्र – नरेंद्र मोदी की राजनीति के विरोध के दो अलग-अलग स्वरूप होंगे और इसकी दो अलग-अलग जमीन होगी. इसमें कोई शक नहीं है कि संसद के भीतर गैर-भाजपाई ताकतें किसी न किसी किस्म का गैर-भाजपावाद चलाने की कोशिश करेंगी. यह कोई नयी चीज नहीं है. पिछले तीस साल में कांग्रेस, वामपंथी दलों और कुछ अन्य संगठनों ने मिल कर इस तरह की कोशिशें कई बार की है|

लेकिन इसके अनुभव ने हमें सिखाया है कि भाजपा के विरोध के लिए मतलबी गंठजोड़ बनाने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि इससे भाजपा और ज्यादा मजबूत होती है. इस प्रयोग ने यह भी सिखाया है कि भाजपा विरोध के नाम पर सेक्युलर खेमा बनाने की कोशिश भी एक ढकोसला बन कर रह जाती है. कांग्रेस, राजद, सपा सरीखे पार्टियों का सेक्युलरिज्म मुसलमानों को बंधक बनाये रखने का षड्यंत्र है. जनता इसे खारिज कर चुकी है. मुङो नहीं लगता कि इस तरह के किसी प्रयास से भाजपा का विकल्प बनाने में कोई मदद मिलेगी. संसद के भीतर एकाध बार कुछ छोटी सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे भाजपा की राजनीति का मुकाबला करने की ऊर्जा खड़ी नहीं हो सकती|

आम आदमी पार्टी कांग्रेस विरोध या भाजपा विरोध के नाम पर अवसरवादी गंठबंधनों के खिलाफ रही है. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब संसद में भाजपा के खिलाफ कभी-कभार बोल देना या उसके कुछ कानूनों का विरोध करना भर नहीं होगा. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब होगा उस तरह की राजनीति का विरोध करना, जिसकी प्रतीक आज भाजपा है. हमारे लिए भाजपा के विरोध का मतलब होगा हर किस्म के भ्रष्टाचार का विरोध करना, हर किस्म की सांप्रदायिकता का विरोध करना, देश में लोकतंत्र के हनन का विरोध करना और एक नंगे किस्म के पूंजीवाद का विरोध करना. आज भाजपा इन खतरों का प्रतीक है, लेकिन सिर्फ भाजपा इस अपराध की दोषी नहीं है|

इसमें देश का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान शामिल रहता है. इसलिए विपक्ष की राजनीति हमारे लिए ऐसी राजनीति नहीं हो सकती कि हम सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बोलें, और कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर चुप हो जायें. सिर्फ भाजपा की सांप्रदायिकता के बारे में बोलें और सपा या एमआइएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) की सांप्रदायिकता पर मौन साध लें. विपक्ष की राजनीति हमारे लिए केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगी. मैं समझता हूं कि अगले पांच साल तक मोदीमय भाजपा के विरोध का असली मंच संसद नहीं होगा, बल्कि इस लड़ाई को सड़क और मैदान पर लड़ना होगा. मुङो नहीं लगता कि यह कांग्रेस के बस की बात है|

इसलिए आम आदमी पार्टी को यह बीड़ा उठाना पड़ेगा. संसद में भले ही हम एक छोटी विपक्षी पार्टी के रूप में गिने जायेंगे, लेकिन अगले पांच साल में आम आदमी पार्टी जमीन पर इस देश की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में उभरेगी. जहां तक दूसरी पार्टियों के बीच तालमेल का सवाल है, मेरे अब तक के जवाब में ही इसका उत्तर अंतर्निहित है, यानी कि भाजपा विरोध के नाम पर भानुमति का कुनबा जोड़ने की राजनीति में हमारा विश्वास नहीं है|

रंजन – भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि इस वक्त भाजपा विरोध की बात करना 2014 के जनादेश का अपमान होगा?

योगेन्द्र – मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में यह कहना ही लोकतंत्र का अपमान है, कि किसी भी दल का विरोध करना जनादेश का अपमान होगा. मैं समझता हूं कि अगर कोई पार्टी इतना बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में पहुंची है, तो उसे स्वयं इस बात की चिंता होनी चाहिए कि उसके किसी गलत कदम का अच्छा विरोध हो पायेगा या नहीं. विपक्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है. उससे डरना लोकतंत्र से डरना होगा|

रंजन – यह भी कहा जा रहा है कि इस बार के जनादेश में यूथ फैक्टर काफी अहम रहा है. देश के करोड़ों युवा मतदाताओं की आकांक्षाएं अलग तरह की हैं और उनमें बड़ी उम्मीद है नरेंद्र मोदी को लेकर, इसलिए उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नाम पर, मोदी सरकार बनाने के लिए मतदान किया है. इस संबंध में आपकी क्या राय है?

योगेन्द्र – मैंने इस बार के चुनाव के आंकड़े ठीक से देखे नहीं हैं, क्योंकि मैं किसी भी सव्रेक्षण की टीम में शामिल नहीं था. इसलिए मैं प्रमाण के साथ तो नहीं कह पाऊंगा, लेकिन मुङो इस तरह के दावों में अतिशयोक्ति नजर आती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में युवाओं और युवा मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि बाकी मतदाता-समूहों की तुलना में युवाओं में भाजपा के लिए आकर्षण अपेक्षाकृत ज्यादा है, लेकिन इतना भर से युवा वोट या युवा शक्ति का भाजपामय हो जाना जैसे निष्कर्षो पर हम नहीं पहुंच सकते. हमें अभी देखना है कि युवाओं का यह रुझान झणिक है या दीर्घकालिक. इसके बाद ही किसी बड़े निष्कर्ष पर हम पहुंच सकते हैं|

रंजन – पहले माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का जाति आधारित मजबूत जनाधार है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि खासकर हिंदी पट्टी में यूथ फैक्टर इतना कारगर रहा कि क्षेत्रीय दलों के किले ध्वस्त हो गये. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का जनाधार क्यों खिसक गया और इसके बाद क्षेत्रीय दलों की राजनीति के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?

योगेन्द्र – इस चुनावी लहर में भाजपा या भाजपा समर्थक दलों को छोड़ कर बाकी ज्यादातर दलों को भारी नुकसान हुआ है. खास कर उत्तर भारत के क्षेत्रीय दल इसी का शिकार हुए हैं. हालांकि यह बात दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह लागू नहीं होती है. अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाइएसआर की पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, बीजेडी और ममता बनर्जी की पार्टी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर नुकसान हुआ तो मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को. इसलिए यहां उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों की हार पर अलग से गौर करना बेहतर होगा|

मैं समझता हूं कि इन दोनों राज्यों में मंडलीकरण के बाद की जातीय राजनीति अपने एक चरम बिंदु पर पहुंच कर अप्रासंगिक होने लगी थी. जातिगत राजनीति की यही नियति है कि एक जाति आधारित वोट बैंक मजबूत होते-होते एक ऐसे बिंदु तक पहुंच जाती है, जहां राजनीतिक जड़ता आ जाती है और जहां लोगों को समझ आने लगता है कि इस जड़ता से बाहर निकलने की जरूरत है. खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सभी मुमकिन राजनीतिक समीकरण इस्तेमाल कर लिये थे- अगड़ों का, पिछड़ों का, दलित, यादव, मुसलिम आदि सभी इस्तेमाल हो चुके थे. और यह यात्रा एक ठहराव के बिंदु पर पहुंच गयी थी|

इस बार भाजपा की बड़ी विजय उसके परंपरागत सामाजिक समीकरण की विजय नहीं है. वह सभी जाति-समुदायों के एक बड़े हिस्से को जोड़ कर बेहतर सरकार बनाने की राजनीति की विजय है. इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की विजय में कहीं जातिवादी राजनीति से मुक्त होकर एक बेहतर सरकार और बेहतर राजकाज की इच्छा शामिल थी. मुङो नहीं लगता कि भाजपा या नरेंद्र मोदी वास्तव में इस इच्छा को पूरा कर पायेंगे, लेकिन इस इच्छा का होना दोनों राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में एक सार्थक राजनीतिक संभावना की ओर इशारा कर रहा है|

रंजन – यदि जातीय राजनीति अप्रासंगिक हो जायेगी, तो कई क्षेत्रीय दलों का ‘वोट बैंक’ ही खत्म हो जायेगा. ऐसे में इस जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीति को किस तरह से आगे बढ़ाना होगा?

योगेन्द्र – इस विषय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी सभी दलों को विचार करने की जरूरत है. खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति एक खास दौर से गुजर चुकी है. सामाजिक न्याय के नारे के तहत हुई राजनीति के इस दौर में लोगों के जीवन के, रोजमर्रा के, मुद्दों में बेहतरी के सवाल गौण हो गये थे. मोदी की जीत इस ओर इशारा करती है कि इन सवालों को दबाया नहीं जा सकता. यानी क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, सभी दलों को खुद को आम लोगों की जिंदगी में खुशहाली के सपने से जोड़ना होगा. मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी इस काम को पूरा कर पायेंगे. हालांकि वे इस सपने के वाहक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता|

रंजन – क्षेत्रीय दलों की ओर से सामाजिक न्याय का नारा भी तो इसी तर्क के साथ दिया जाता है कि संसाधनों के बंटवारे में जो लोग अपना हिस्सा पाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें उनका हक दिलायेंगे. तो इस जनादेश से क्षेत्रीय दलों को क्या सबक लेने की जरूरत है|

योगेन्द्र – सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस प्रकार के नारे तो दिये, लेकिन व्यवहार में वह राजनीति केवल प्रतीकात्मक हिस्सेदारी की राजनीति बन गयी. इसमें चेहरों में तो हिस्सेदारी हुई, यानी कितने एमएलए किस समुदाय के बनेंगे, कितने मिनिस्टर किसके बनेंगे; लेकिन विकास के फल में हिस्सेदारी का माहौल नहीं बन पाया|

मैं समझता हूं कि बिहार में शुरू में यह सबक नीतीश कुमार सरकार ने सीखा, कि लोगों को सिर्फ सामाजिक न्याय का नारा नहीं चाहिए, उसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार आदि में हिस्सेदारी भी चाहिए, हालांकि बाद में वे भी इस पर पूरी तरह कायम नहीं रह पाये. मुङो लगता है कि इस बार के जनादेश से खास कर उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा और बिहार में राजद को यह सबक सीखना होगा कि जब तक वे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों पर कुछ करेंगे नहीं, तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक सामाजिक न्याय की बात करने से उनकी राजनीति बहुत दिन तक टिकनेवाली नहीं है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी कम क्यों रहा?

योगेन्द्र – आम आदमी पार्टी के लिए यह जनादेश न तो निराशाजनक रहा है और न ही बहुत अप्रत्याशित. संभव है कि हमारे कुछ समर्थकों, शुभचिंतकों के मन में बड़ी उम्मीदें बंध गयी थीं. लेकिन दरअसल अपने पहले लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी से इससे ज्यादा अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए. पिछले तीस-चालीस साल में केवल दो नयी राष्ट्रीय पार्टियां इस देश में स्थापित हुईं- भाजपा और बसपा. उन दोनों पार्टियों के पहले लोकसभा चुनाव पर आप गौर कीजिए. 1984 में भाजपा ने अपना पहला राष्ट्रीय चुनाव लड़ा था, उसे सिर्फ दो सीटें आयी थीं. लेकिन चूंकि उसमें एक पुरानी पार्टी का अंश शामिल था, इसलिए उसे सात फीसदी वोट हासिल हो गये थे. 1989 में बसपा ने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव लड़ा, उसे दो सीटें आयीं और दो प्रतिशत वोट हासिल हुए. इस तरह पहले चुनाव के लिहाज से हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं है|

हां, हमें दिल्ली में निराशा जरूर हुई. दिल्ली में हमारा वोट प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन हमें कोई सीट नहीं मिली और भाजपा का फासला हमसे बढ़ा. हमें वाराणसी में भी निराशा हुई. मैंने सोचा था कि दिल्ली के बाद हमें हरियाणा में एक नयी शुरुआत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को जो हासिल हुआ है, वह कम नहीं है. चार सीटें अपने-आप में कम जरूर लगती हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर एक नये राज्य-पंजाब-में हमें कामयाबी मिली है|

रंजन – इस चुनाव में ‘आप’ को उम्मीद से काफी कम सीटें मिलने पर कुछ विश्लेषक दो बड़े कारण गिना रहे हैं. पहला, दिल्ली में 49 दिनों में ही सरकार चलाने से इनकार कर देना और दूसरा, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव तथा ज्यादातर फैसले अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया जैसे कुछेक नेताओं द्वारा मनमाने तरीके से लिया जाना. आप क्या कहेंगे?

योगेन्द्र – जहां तक दिल्ली सरकार के इस्तीफा देने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इस्तीफा देने से दिल्ली में भी और दिल्ली के बाहर भी बड़े तबके को धक्का लगा. उन्हें लगा कि कोई सरकार, जो उनके लिए बहुत सारे काम कर सकती थी, अचानक चली गयी. और पूरे चुनाव में यह बात हमें हर जगह और बार-बार सुनने को मिली. हम पर भगोड़े का आरोप कहीं चिपक गया. हम तर्क देते रह गये, लेकिन जनता हमारी बात को नहीं मानी. राजनीति का काम है जनता से सबक लेना. और मैं समझता हूं कि यह एक सबक हमारे लिए है कि हमें दिल्ली सरकार को छोड़ने का फैसला भी हमें जनता के साथ किसी राय-मशविरे के बाद लेना चाहिए था, जैसा कि हमने सरकार बनाने के वक्त किया था. और अगर जनता कहती कि छोड़ना नहीं चाहिए, तो हमें जनता की बात माननी चाहिए थी. उसमें हमारी राजनीतिक समझ की एक चूक हुई, यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं है|

रही बात पार्टी की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की, तो मैं समझता हूं कि आम आदमी पार्टी देश की अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक है और पूरी तरह से लोकतांत्रिक बनना अपने आप में एक प्रक्रिया है, जिसमें तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं. और मुङो यकीन है कि स्वराज के जिस विचार को लेकर यह पार्टी बनी है, उसे यह अपनी कार्यप्रणाली में भी समाहित कर पायेगी|

रंजन – इस जनादेश के बाद आपलोगों ने इस पर मंथन किया होगा. आम आदमी पार्टी ने इस जनादेश से क्या-क्या प्रमुख सबक लिये हैं और उनके आधार पर पार्टी आगे अपनी रणनीति में किस तरह की तब्दीली करने जा रही है?

योगेन्द्र – अभी हमारी बैठकों का सिलसिला पूरा नहीं हुआ है और हमारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी अभी बाकी है. इसलिए मैं अपनी समझ के बारे में ज्यादा कह पाऊंगा, पार्टी की सामूहिक समझ के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा|

मुङो लगता है कि हमारे लिए बड़ा सबक यह है कि लोग हमारी ईमानदारी पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन हमारी समझदारी के बारे में अभी आश्वस्त नहीं हैं. हमें लोगों के बीच यह साबित करना है कि हम सरकार बनाने और चलाने के बारे में गंभीर हैं. हममें सरकार चलाने की काबिलियत है और हम रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने के लिए धैर्य के साथ काम कर सकते हैं|

दूसरा सबक यह है कि पोलिंग बूथ के स्तर पर संगठन बना कर पोलिंग बूथ मैनेजमेंट किये बिना बड़ी पार्टियों के मुकाबले में चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है|

तीसरा सबक कह लीजिये या चुनौती, बड़े मीडिया और बड़ी पूंजी का जो सम्मिलित हमला है, उसके सामने टिकना आसान काम नहीं है. इस बार के चुनाव में जिस तरह से इस देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के प्रचार-प्रसार में लग गया, उसके सामने खड़ा होने की रणनीति अभी हमारे पास नहीं है. इसकी रणनीति हमें बनानी पड़ेगी|

इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आगे का रास्ता है संगठन का निर्माण करना. हमें नीचे से ऊपर तक, यानी पोलिंग बूथों से लेकर संसदीय क्षेत्रों तक, राज्यों से राष्ट्र स्तर तक अपना संगठन बनाना होगा और आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से जनता को समझाना होगा कि हम गंभीर और सफल सरकार बनाने में सक्षम हैं. यह काम असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए बहुत धीरज की जरूरत है|

रंजन – एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक से एक संसद सदस्य बनने की दिशा में आपके द्वारा उठाये गये कदम का एक उम्मीदवार के रूप में व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा और इससे आपको क्या-क्या नयी चीजें सीखने को मिलीं?

योगेन्द्र – मेरे लिए पूर्णकालिक राजनीति में आना उतना बड़ा बदलाव नहीं था, जितना बाहर से दिखाई दे रहा था. पिछले तीन दशकों से मैं देश के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूं, देश भर की खाक छानता रहा हूं, तमाम जनांदोलनों का हमसफर रहा हूं. इसलिए मेरे लिए राजनीति में या जमीन पर काम करना उतनी नयी चीज नहीं थी. लेकिन फिर भी बदलाव तो था और बहुत बड़ा बदलाव था. खास तौर पर जमीन पर चुनाव लड़ना और जीतने के इरादे से चुनाव लड़ना एकदम नया अनुभव था. इसने मुङो बहुत कुछ सिखाया. पहला तो यह सीखा कि मैं राजनीति के बारे में कितना कम जानता हूं. दुनिया मुङो विशेषज्ञ होने का तगमा जरूर देती रही है, लेकिन सच बात यह है कि राजनीति का वह किताबी ज्ञान धरातल पर चुनाव लड़ने के वक्त बहुत काम नहीं आया|

दूसरा यह कि जिस इलाके को मैं अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि मानता रहा हूं, उस इलाके को भी मैं कितना कम जानता हूं. मेरे लोकसभा क्षेत्र के कितने गांव, इलाके, क्षेत्र ऐसे थे, जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं था, जिनके दुख-तकलीफ को मैं समझता भी नहीं था. इसलिए चुनाव में असफल होने पर पहला विचार मेरे मन में यही आया कि शायद अभी मैं इसके काबिल ही नहीं था. मुङो तो अभी अपने इलाके के बारे में बहुत कुछ जानना है, समझना है|

तीसरा, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. कुछ इस किस्म के अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप लगे, जो तीखे तो थे ही, बहुत छिछले भी थे और मेरी चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं है कि इन बातों का कोई असर नहीं पड़े. जाहिर है, दिल को चोट भी पहुंची और मैं अभी समझ नहीं पाया हूं कि उस किस्म की घटिया हरकतों से कैसे निपटा जाये, जिससे मानसिक द्वेष न हो|

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि आम लोगों का इतना प्यार मिला, जितना पहले न तो कभी मुङो मिला था और न ही जिसके मैं काबिल हूं. केवल अपने गांव के इर्द-गिर्द नहीं, केवल स्वजातीय लोगों में नहीं, बल्कि तमाम इलाकों में वोट मिला या न मिला हो, लेकिन मुङो लोगों का भरपूर स्नेह मिला. क्षेत्र के भीतर से और बाहर से इतने सारे कार्यकर्ताओं ने खुद आकर धन दिया, ऊर्जा दी और इस चुनाव अभियान को अपना अभियान बना दिया|

मई 26, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नितिन गडकरी : भ्रष्टाचार एवं मान हानि केस

AK court case
अरविन्द और उन की पार्टी का यह मानना है कि उन्होंने नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया था वह सही था और ऐसा करना जनहित में था। ऐसा करना वे लोग अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि कोई इस कारण से उन पर किसी अदालत में मुकदमा करता है तो वे प्रतिभूति-बंधपत्र नहीं देंगे। उन का कहना यह भी है कि उन्हें कई बार बिना प्रतिभूति-बंधपत्र के केवल निजी मुचलके पर छोड़ा जा चुका है। अदालत के आदेश के अनुसार प्रतिभूति-बंधपत्र प्रस्तुत करना या न करना उस व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर है जिसे ऐसा आदेश दिया गया है। अरविंद एक राजनैतिक व्यक्ति हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलनरत हैं। उन्होंने प्रतिभूति-बंधपत्र प्रस्तुत कर रिहा होने के स्थान पर उसे प्रस्तुत न कर जेल में रहना पसंद किया। यह उनका निजी मामला है। प्रेस को इसे हौवा बनाने से बचना चाहिए।
AK Jail

अरविंद की पार्टी ने बेईमान लोगों की एक सूची जारी की थी, जिसमें देश के अनेक राजनेताओं के नाम थे। स्पष्ट था कि अरविन्द की पार्टी खुद तो सब के विरुद्ध मुकदमा चलाने से रही। उनका मानना है कि यह राज्य का दायित्व है कि वह भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध मुकदमा चलाए। सूचीबद्ध नेताओं में एक नितिन गडकरी ने अरविन्द के विरुद्ध माँ हानि किए जाने के अपराध का परिवाद अदालत में प्रस्तुत किया। यदि अरविन्द खुद गडकरी के विरुद्ध मुकदमा पेश करते तो उन्हें खुद ही साक्ष्य से साबित करना होता कि गड़करी ने भ्रष्टाचार किया है या फिर बेईमानी की है।

Kaushik
लेकिन अब गडकरी को अपने मुकदमे में साबित करना पड़ेगा कि अरविन्द ने जो किया उस से उन का अपमान हुआ है। इस के लिए गडकरी को खुद गवाही देनी होगी और गवाही के दौरान अरविन्द और उस के वकीलों को उन से सवाल करने का अवसर मिलेगा। उनके सामने प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों और खुद के बयानों का स्पष्टीकरण देना पड़ेगा। जो निश्चित ही गडकरी को कठगरे में खड़ा करने वाला और मजेदार होने वाला है। यह सब आगे आने वाली राजनीति पर भी अपना असर छोड़े बिना नहीं रहेगा। (नौशाद)

MKSINGHAL
बेल के खेल की एक कथा विस्तार से पढ़ें

मई 26, 2014

अरविंद केजरीवाल : भ्रष्टाचार से लड़ाई बहुत पुरानी है!

अरविंद केजरीवाल की भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कोई एक दो बरस की बात नहीं है| वे डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से इसके खिलाफ सक्रिय रूप से लड़ रहे हैं और जहां भी रहे इसके खिलाफ ईमानदारी का झंडा बुलंद करते ही रहे|

AKparivartan

मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

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