Archive for ‘अन्ना हजारे’

जनवरी 30, 2015

दिल्ली चुनाव : मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल – (उदय प्रकाश)

Aap cartoonयह सिर्फ़ मेरा निजी आब्जर्वेशन है कि अब दिल्ली का चुनाव पूरी तरह से मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल हो गया है। किरन बेदी, जो अब साफ़-साफ प्राक्सी कैंडिडेट हैं, उनकी हास्यास्पद हार को बचाने के लिए (जो दरअसल मोदी हाइप की ढलान का शुरुआती संकेत है) न सिर्फ़ संसार के सबसे ताक़तवर राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा के आगमन, गणतंत्र दिवस की संवैधानिक गरिमा का लोकल इस्तेमाल किया गया, बल्कि लगभग सारा केंद्रीय कैबिनेट, राज्यों के मुख्यमंत्री , बालीवुड के स्टार्स, कार्पोरेट्स के अधीनस्थ टीवी चैनल, धर्म, विकासवादी सम्मोहन और समस्त संसाधनों को झोंक दिया गया।
लगता है जैसे यह हस्तिनापुर का युद्ध है, जिसमें अकेला अभिमन्यु कुरु सैन्यविशारदों के चक्रव्यूह को भेदने और पार पाने के लिए जूझ रहा है।
हर रोज़ एक व्यूह दरकता है और हर रोज़ एक और व्यूह रच लिया जाता है।
अन्ना हज़ारे समेत उन सबको अब समझ लेना चाहिए कि यह उनकी भूमिका का सबसे निर्णायक समय है। यह समय तय कर देगा कि कौन किस पक्ष में खड़ा था।
हो सकता है यह आकलन एक मासूम अराजनीतिक आकलन हो, लेकिन यह कार्पोरेट पावर और आम नागरिक के बीच की निर्णायक लड़ाई है।
मैजिक अब उतार पर है।
साफ़ है।

साभार : टिप्पणी – उदय प्रकाश ( हिंदी के प्रसिद्द लेखक)

कार्टून – गुरप्रीत

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जनवरी 27, 2015

किरन बेदी का समर्थन क्यों संभव नहीं? (कृष्ण बिहारी)

मैं किरण बेदी के खिलाफ क्यों हूँ ?

२ अगस्त २०१२ को मैं दिल्ली में था,  साथ में हिन्दी कथाकार अमरीक सिंह दीप जी भी थे| अन्ना आन्दोलन शिखर पर था| मंच पर केजरीवाल , कुमार विश्वास , अर्चना पूरण सिंह थे, अन्ना तो थे ही, अनुपम खेर भी थे|

लेकिन उस दिन अन्ना हजारे ने अपने संबोधन में कहा था कि दिल्ली की बहरी सरकार कुछ सुन नहीं रही, अब हमें राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ेगी| उस संबोधन से पहले मैंने कभी अन्ना को राजनीतिक होते नहीं देखा-सुना था| मुझे जयप्रकाश नारायण की याद आई और लगा कि १९७७ दुहराया जाएगा| अरविन्द केजरीवाल को पहचानने लगे थे|किरन बेदी और कुमार विश्वास को लोग जानते थे| उस दिन तक राजनीतिक दल ‘आप‘ का गठन नहीं हुआ था| यह जरूर स्पष्ट हो गया था कि कोई दल अस्तित्व में आएगा|

लेकिन जैसे ही ‘आप‘ का औपचारिक रूप सामने आना शुरू हुआ वैसे ही किरन बेदी का सत्ता प्रेमी हुक्मरान भी सामने आने के लिए छटपटाने लगा| चूंकि , अन्ना  हजारे, अरविन्द को ईमानदार के विशेषण से नवाज़ चुके थे इसलिए ‘आप‘ में अरविन्द केजरीवाल ही नम्बर-१ के स्थान पर स्वीकृत हो चुके थे|  किरन बेदी के लिए यह बरगद से बोनसाई होना था| उन्होंने साहिल से भी दूरी बना ली, बाढ़ में उतरने का तो प्रश्न ही नहीं था| जनरल विक्रम सिंह ने तो किरन बेदी से पहले ही भांप लिया कि अरविन्द के सामने उनका व्यक्तित्व भी बौना है और यह कहाँ सुनिश्चित है कि सत्ता के आगे आर्थिक रूप से कमजोर पार्टी ‘आप‘ अपना प्रभाव दिखा सकेगी तो उन्होंने अन्ना से दूरी बनाई और जैसे ही मौका मिला भाजपा में शामिल हो गए|  उन्हें भी अपने जनरल रह चुकने का गुमान कभी सामान्य आदमी बनने नहीं देता| उनका गुमान पार्टी हाई कमान ने कुछ ऐसा कुचला है कि अब वे खुद को खुर्दबीन से खोज रहे हैं| आम आदमी पार्टी बनी| उससे पहले बाबा रामदेव की कुटाई हो चुकी थी| उनका भी अता-पता भाजपा के शक्ति केंद्र बन जाने के बाद ही लगा| उनके योग का महत्त्व आज तो स्थापित हो गया और उनकी चलती दूकान बंद होने से बच गई,  लेकिन यदि कहीं ऐसा नहीं हुआ होता तो एक बार शलवार-कुरता पहनकर जान किसी तरह बच गई थी, दूसरा मौका नहीं मिलना था| उन्होंने भी अरविन्द के मंच से किनारा किया|

आम आदमी पार्टी बनने और चुनाव में हिस्सा लेने के बाद ‘बिन्नी‘ की भूमिका को देश ने देखा है, और इसलिए ‘बिन्नी’ पर कोई बात महत्त्वपूर्ण नहीं है. शाजिया को इस बात की गलतफहमी है कि वे दिल्ली की दूसरी इमाम हैं और पूरी दिल्ली उनके फतवे को सुनकर अमल करेगी| दो-दो चुनाव हारने के बाद भी अपनी कमजोरियों को वे विशेषताएं ही समझती हैं, उन्हें ऐसा समझने से कौन रोक सकता है!

आम आदमी पार्टी की सरकार किन परिस्थितियों में बनी, ४९ दिन तक कैसे चली ? यह सब देश ने देखा है कि दिल्ली विधान सभा में कांग्रेस और भाजपा एक होकर सदन में क्या कर रहे थे ? या कि शोएब ने सदन में क्या किया था ? अब चुनाव एक बार फिर सामने हैं| 

किरन बेदी को सत्ता पर काबिज़ होने का एक मौका भाग्य से फिर मिल गया है, जो वह चाहती थीं| लेकिन, उन्हें जानना चाहिये कि जनता सत्ता और संघर्ष का अर्थ जानती है| वे केवल सत्ता का अर्थ जानती हैं, उनका दिल्ली की जनता के प्रति प्रेम कितना है इसे उनसे बेहतर जनता जानती है| चुनाव में , खासतौर पर भारत में सभी हथकंडे आजमाए जाते हैं, हो सकता है कि वे जीत भी जाएँ लेकिन यह यकीनी तौर पर मान लें कि वे  अरविन्द केजरीवाल के आगे हार चुकी है| और , अरविन्द के खिलाफ चुनाव न लड़कर उनके पहले कदम पर ही हार की मुहर लग गई है…

 

कृष्ण बिहारी (हिंदी के प्रसिद्द लेखक एवं पत्रिका ‘निकट‘ के सम्पादक)

नवम्बर 2, 2014

अरविंद केजरीवाल : रहस्य स्टील के गिलास का

AKHungerstrikeअरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, और गोपाल राय, सैंकड़ों अन्य स्वयंसेवकों के साथ 25 जुलाई July 2012 को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ SIT घोषित करने की मांग के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गये| अरविंद केजरीवाल के मधुमेह के रोगी होने के कारण बहुत से लोग उनके अनशन करने के निर्णय से चिंतित थे| अनशन न करने के लोगों हजारों लोगों के अनुरोध एवं मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों की चेतावनी को दरकिनार कर अरविंद अपने फैसले पर अडिग रहे और अनशन पर बैठ गये|

मैं मधुमेह रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक हूँ और मुझे पता था कि वे एक जिद्दी रोगी हैं और उनका एलोपैथिक पद्धति पर कम और नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) पर ज्यादा विश्वास है| एक चिकित्सक के नाते मेरे लिए वे पहले ही catabolic अवस्था के मरीज थे, और उनका शुगर लेवल कुछ समय से अनियंत्रित था, और यह तय था कि अगर वे उपवास पर जाते हैं तो ketosis का ख़तरा उन पर छायेगा ही छायेगा|

उनके अनशन से पहले मुझे बहुत सी मेडिकल सामग्री पढनी पड़ी यह सीखने के लिए कि अगर मधुमेह का रोगी उपवास करता है तो उसकी शारीरिक स्थितियों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है| कुछ ऐसी रिपोर्ट्स थीं जहां मधुमेह के रोगी लम्बी भूख हड़ताल के बावजूद जीवित बच गये| मैं अरविंद के लगातार संपर्क में था और जंतर मंतर पर उनके अनशन के दौरान उनके साथ रहने के लिए सहमत था| Dr Atul Gupta (Anesthesiologist) और Dr Vipin Mittal (dentist) अरविंद और अन्य उपवासियों की देखभाल कर रही मेडिकल टीम के मुखिया थे| दोनों फोन के दवारा निरंतर मेरे संपर्क में थे, क्योंकि उपवास के तीन दिनों तक मुझे जयपुर में ही रुकना पड़ा जहां मेरे कुछ साथी अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर जमे हुए थे|

28 जुलाई 2012 को सुबह-सवेरे ही मैं जंतर-मंतर पहुँच गया| मैंने अरविंद की जांच की और उनकी मेडिकल स्थिति की ताजा रपटें पढीं| जैसा कि अपेक्षित था वे ketosis की अवस्था में पहले ही आ चुके थे| सुनीता केजरीवाल (अरविंद की धर्मपत्नी), ड़ा. मित्तल, और रणसिंह आर्य (प्राकृतिक चिकित्सक) मेरे साथ थे और मधुमेह रोग का विशेषज्ञ होने के नाते मैं उन्हें अरविंद की मेडिकल स्थिति और संभावित खतरों के बारे में समझा रहा था| एलोपेथिक चिकित्सा की परिभाषा से वे पहले ही उस स्थिति में पहुँच चुके थे जहां उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाना जरूरी था, हालांकि वे बाहर से ठीक दिखाई दे रहे थे और आत्मविश्वास से भरे हुए थे पर उनकी मेडिकल जांच रपट में ketone का स्तर बहुत ज्यादा था| अरविंद को अस्पताल में भर्ती करे जाने के लिए तैयार करना बहुत कठिन था, वे जब तक कि बेहोश न हो जाएँ तब तक वहाँ से हटने को तैयार नहीं थे| हमारे पास उस समय तक उन पर निगाह रखने के सिवा कोई चारा नहीं था जब तक कि वे गंभीर रूप से बीमार न हो जाएँ| ड़ा. मित्तल को सांत्वना मिली यह जानकर कि मैं उपवास के खत्म होने तक चौबीसों घंटे वहाँ रहूंगा और अरविंद की मेडिकल स्थितियों पर नजर रखूंगा| चिकित्सक की दृष्टि से देखूं तो यह एक चमत्कार ही था कि अरविंद अगले एक हफ्ते तक अनशन पर डटे रहे|

अरविंद के राजनीतिक विरोधियों ने उनकी मेडिकल स्थितियों और मधुमेह के बावजूद अनशन जारी रखने के बारे में कई कहानियां उडानी शुरू कर दीं| सोशल मीडिया पर उनके स्टील के गिलास को चर्चाओं का केन्द्र बनाया गया| क्योंकि अरविंद कैमरे पर स्टील के गिलास में पानी पीते दिखाए गये थे तो उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि स्टील के गिलास में जीवन रक्षक द्रव अरविंद को दिया जा रहा था अगर ऐसा न होता तो वे पारदर्शी शीशे के गिलास में पानी पीते| मुझे अब तक आरोप आश्चर्य में डालता है अगर अरविंद स्टील के गिलास में छिपा कर लिक्विड डायट ग्रहण करते तो उन्हें यह सरेआम कैमरों के सामने करने की क्या जरुरत थी?

बहरहाल इन् फिजूल बातों से अलग यह बात मार्के की है कि बिगड़े हुए मधुमेह के रोगी होने के बावजूद वे कैसे 10 दिनों से ज्यादा समय तक अनशन करके जीवित रह पाए?

उनके उपवास की तैयारियां तकरीबन एक माह पूर्व शुरू हो चुकी थीं| हम जैसे एलोपैथिक चिकित्सक ऐसे मामलों से सबन्धित साहित्य पढ़ रहे थे और प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम उनके शरीर को एक लंबे उपवास के योग्य बनाने में जुटी हुयी थी| तथ्यात्मक रूप से अगर अरविंद इतने लंबे उपवास के बावजूद बच पाए तो इस एक कारण से कि उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सकों दवारा उनके लिए तैयार किये गये प्रोटोकोल का पूरी तरह से पालन किया| अरविंद का विश्वास एलोपैथी पर नहीं था और हम वहाँ केवल किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए उपस्थित थे| हमने उनके स्वास्थ्य का नियमित रिकार्ड बनाया और मीडिया को इसके बारे में नियमित रूप से अपडेट करते रहे| प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम अनुभवी थी और मधुमेह के रोगियों के उपावास को पहले संभाल चुकी थी| बल्कि उन्होंने यह तक दावा किया कि वे लमने उपास के माध्यम से ही मधुमेह के कुछ रोगियों को ठीक कर चुके थे| उनकी तैयारी अच्छी और उनका आत्मविश्वास दृढ़ दिखाई देता था|

प्राकृतिक चिकित्सकों ने उपवास से एक माह पहले अरविंद की डायट को इस तरीके से संचालित किया जिससे उनका शरीर भरपूर मात्रा में प्रोटीन ग्रहण कर सके और उनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न्यूनतम हो| इस डायट से संभावना थी कि उनके शरीर की पाचन व्यवस्था anabolic अवस्था की ओर अग्रसारित होगी| जब उन्होंने उपवास शुरू किया अताब तक उनके शरीर में प्रोटीन की अच्छी खासी मात्रा संचयित हो चुकी थी और अब तक उनका शरीर भोजन में कार्बोहाइड्रेट के निम्न स्तर का आदि हो चुका था|

अरविंद एरोबिक्स, योग और प्राणायाम के संयुक्त प्रोटोकोल (तीनों एक एक घंटे की अवधि के लिए) का भली भान्ति पालन कर रहे थे| व्यायाम और प्राणायाम के इस संयुक्त कार्यक्रम ने उनके शरीर की Insulin संवेदनशीलता को बढ़ाया होगा और beta cell function में बढोत्तरी की होगी| इसी अनुशासन के कारणउपवास के शुरुआती दिनों में glycemic नियंत्रण स्थायी रहा जबकि उनकी मधुमेह की दवाइयां बंद की जा चुकी थीं| वास्तव में उनकी सारी anti-diabetic medicines उपवास से कुछ दिन पहले ही बंद कर डी गई थीं और ऐसा करना इसलिए उपवास के दौरान hypoglycemia की स्थिति न उत्पन्न हो जाए|

उपवास के दौरान शरीर में एक उचित हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए उन्हें समुचित मात्रा में पानी पीने के लिए दिया गया| शरीर में हाइड्रेशन का स्तर अच्छा बनाए रखने के साथ पानी का काम उपवास के कारण शरीर में उत्पन्न ketone को बाहर निकाल भी था| उपवास के दौरान, जब कि रोगी को खाना नहेने दिया जाता तो उसके शरीर में जमा वसा (फैट) ऊर्जा देने के काम आती है| पर इस क्रिया के दौरान Ketone bodies भी उत्पन्न हो जाती हैं जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक हैं|

समुचित हाइड्रेशन स्तर बनाए रखने के साथ साथ शरीर से ketone bodies और अन्य toxins को बाहर निकालने के लिए अरविंद को प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण तरीके कुंजल और एनिमा भी दैनिक स्तर पर अपनाने पड़े|

अरविंद की शारीरिक गतिविधियों को न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित करके कैलोरीज के खर्च होने पर नियंत्रण पाया गया| उन्हें न ताली जा सकने वाली बिल्कुल आवश्यक गतिविधियों से ज्यादा चलने फिरने नहीं दिया गया| कैलोरीज क्रचने के स्तर को नियंत्रित करके ketone bodies के उत्पन्न होने को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि अब वसा की कम मात्रा शरीर में पचाई जा रही है|

उनकी शारीरिक जांच नियमित रूप से की जा रही थी और उनके शरीर की बायोकमिस्ट्री भी नियमित जांची जा रही थी| उन्हें नियमित रूप से जांच के लिए खून के सैम्पल देने में एतराज था| उपवास के अंतिम पांच दिन एलोपैथी में विश्वास करने वाले सभी लोग बेहद चिंतित हो चले थे| उनका ketones का स्तर 4+ और 5+ के बीच झूल रहा था, electrolytes असामान्य अवस्था में थे और अंतिम 3 दिनों में bilirubin भी बढ़ना शुरू हो गया था| लेकिन रपट में इन् सब आकंडों में लगातार वृद्धि होने से शरीर के लगातार कमजोर होते रहने के बावजूद अरविंद पूरी तरह से जीवंत थे और अपने निश्चय पर अडिग|

उपवास के छठवें दिन ketone bodies का स्तर स्थायीत्व को प्राप्त कर गया और उससे ज्यादा नहीं बढ़ा| उस समय तक उनके शरीर ने शायद सारे संचित फैट का क्षय कर लिया था, और नके शरीर की कैलोरीज की आपूर्ति के लिए प्रोटीन्स टूट गये थे और यह यूरिक एसिड लेवल के बढे होने से भी सिद्ध हो रहा था|

सरकारी डाक्टरों की एक टीम अरविंद की जांच करने आई और उन्होंने दबाव डाला कि अरविंद को अविलम्ब अस्पताल में भर्ती करवाना चाहिए| हमारे डाक्टरों की टीम तब तक अरविंद के अपने विश्वास में अपना विश्वास समाहित कर चुकी थी और सब अरविंद के समर्थन में खड़े रहे| जीवन और मृत्यु का मामला आते ही कोई भी चिकित्सक तनिक भी ख़तरा नहीं उठाना चाहता| सरकारी डाक्टरों ने वही सलाह डी थी जो मैंने उपवास के चौथे दिन अरविंद को दे थी| भोपाल से आए हुए cardiologist, Dr Ayyar, ने भी यही सलाह दी|

चौबीसों घंटे जंतर मंतर पर उपस्थित देशभक्ति के गीत गाते, उन पर झूमते, और तिरंगा लहराते दीवाने लोगों और स्वयंसेवकों के मध्य हम लोग भी केवल मेडिकल जांच रपटों पर ही विश्वास करने वाले चिकित्सक न रहकर उन जैसे आम भारतीय ही बन चुके थे, जिनका प्रारब्ध पर पूर्ण विश्वास था|

मैं 2 अगस्त के शाम को जीवन भर नहेने भूल सकता जब अन्ना हजारे ने घोषित किया कि अरविंद एवं साथी अगले दिन उपवास तोड़ देंगें| मेरे हाथ में अरविंद की नवीनतम मेडिकल रपट थी और उनका serum pottasium 3.2,(सामान्य स्तर 3.5-5 meq/l) था| Hypokalemia एक बेहद खतरनाक स्थिति है और उनके स्तर खतरनाक स्थिति की ओर जा रहे थे| Further drop in Potassium के स्तर में और घटोत्तरी का मतलब था एकदम से ह्रदय समस्या के खतरे का उत्पन्न होना|

मैं उस जगह गया जहां अरविंद को रखा गया था| वे उस वक्त अकेले थे| मैंने उन्हें potassium के कम स्तर के बारे में सूचित किया और इससे होने वाले खतरों के प्रति सचेत किया| मैंने उनके सामने तर्क दिया – “अन्ना पहले ही देश के सामने घोषित कर चुके हैं कि उपवास कल टूट जायेगा और हम लोग देश को एक राजनीतिक विकल्प देने जा रहे हैं तो आज की रात के खतरे को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा| जब कल उपवास टूटना ही है तो आज की रात आपके जीवन को खतरे में डालने का क्या मतलब है| अगर आप थोड़े से नारियल पानी का सेवन कर लें तो potassium का स्तर सामान्य हो सकता है, और आपके जीवन से एक बड़ा ख़तरा टल सकता है और नारियल पानी के सेवन से आपका उपवास भी नहीं टूटेगा| इसे आपद-धर्म समझा जाए”|

अरविंद ने कहा,

“ड़ा. पारिख, मैं ईश्वर को धोखा नहीं दे सकता, हम दोनों के सिवा यहाँ कोई और नहीं है पर ईश्वर तो हमारे साथ सदैव ही है| अन्ना ने कहा है कि उपवास कल टूटेगा तो यह कल ही टूटेगा उससे पहले नहीं| चाहे जो कुछ भी मेरे साथ हो जाए, और चाहे मेरा निश्चय सार्थक न लगता हो, पर मैं मुँह से कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा जब तक कि कल अन्ना घोषणा न कर दें”|

क्या उन्हें जिलाए हुए था तमाम प्रतिकूल शारीरिक परिस्थितियों में? क्या रहस्य था स्टील के गिलास का? ये रहस्य हैं – कर्म में दृढ़ विश्वास, लक्ष्य में पूर्ण आस्था और अगर आवश्यकता हो तो अंतिम त्याग करने की पूर्ण तैयारी|
जंतर मंतर पर व्यतीत किये गये सात दिनों में मैं मुश्किल से ही सो पाया और उस रात तो मैं एक झपकी तक न ले पाया| Potassium के घटते स्तर का ग्राफ मेरी आँखों के सामने तैरता रहा| लेकिन, यह आदमी- अरविंद केजरीवाल, जिसे यह विश्वास नहीं था कि वह अगली सुबह जीवित उठ पायेगा या नहीं, शान्ति से अपने बिस्तर पर सो रहा था|
अगले दिन, अरविंद के उपवास तोड़ने के बाद, जयपुर जाने के लिए जंतर मंतर से निकलने से पहले मैं भीड़ से घिरे अरविंद के पास गया| मैंने उनके कक्ष के दरवाजे से उनकी ओर हाथ हिलाया और अरविंद ने मुझे अंदर बुलाया और बाहें खोल कर मुझे गले लगा लिया| मेरे सब्र का बाँध टूट गया और उनकी बाहों में बंध कर मैं एक बच्चे की भांति फूट-फूट कर रो पड़ा| मैं इस भावुकतापूर्ण क्रंदन के पीछे कोई कारण नहीं खोज पाता| यही वे क्षण थे जब मैं एक बहुत बड़े तनाव और दबाव से मुक्त हुआ| मेरे कन्धों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी एक ऐसे आदमी की मेडिकल देखरेख की जिसे लाखों भारतीय युवा प्रेम करते हैं और जिसकी ओर समूचा देश आशा भरी दृष्टि से देख रहा था| हर क्षण उनका जीवन ईश्वर की दया के वश लगता था जबकि बाकी लोगों का विश्वास था कि उनकी देखरेख एक कुशल चिकित्सक के हाथों हो रही है| शायद इसी दबाव से मुक्ति आंसुओं के रास्ते बह निकली|

 

[ड़ा. राकेश पारिख]

मूल लेख

अगस्त 29, 2011

कौन रहेगा ईमानदार?


विजय दिवस था कल
एक बूढी लाठी के आगे
नतमस्तक हुए शाह–वजीर
अचरज से देख रहे थे
कबाड़े से निकल आई
गाँधी टोपियों का कमाल
सिर पर रखते ही
हरीशचन्द्र बन रहे थे लोग
जिन्हें लेख का शीर्षक भी पता नही
टीकाकार बन गए थे कौवे
कोयलें चुप थीं।

उस बड़े मैदान में
सुनहरे कल के सपने
प्यासों के आगे
बिसलेरी बोतलों के समान
उछाले जा रहे थे,
परंतु जो सपना उठा लाया
वह रात भर सो न सका
उसे याद आ गया था
माटी बने पुल की नींव से
कमीशन खोद कर निकालना है,
उसने भी माइक पर
ईमान की कसम दोहराई थी
रोज गीता–कुरआन पर
हाथ रख कर,
झूठी गवाहियाँ देने वाला दिल
व्याकुल रहता कब तक?

वह उठा और
माटी के पुल के रास्ते चल पडा
उस समय तक सभी सियार
जश्न का खुमार उतरने के बाद
शेर की खाल ओढ़ रहे थे,
रोज़मर्रा समान
निजी लाकरों और स्विस बैंकों के
दफ्तर भी खुल चुके थे।

(रफत आलम)

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

अप्रैल 8, 2011

इस बार जंग ये जीत ली जाये

भ्रष्टाचार की फैक्टरी में
लोकहितकारी योजनाओं का लहू
निचोड़ा जाकर
सोने में बदला जा रहा है

अनगिनत बैंक लोकरों संग्रणग्रहों में
दफन हो चुके हैं सपने जो
विकास की हकीकत बनने थे
प्रजातंत्र के चारों स्तंभ
चोर उच्चके लफंगों के कब्जे में हैं
विवेक दुबका पडा है
बोले तो जान की खैर नहीं

तुमने देखा नहीं क्या
सच के उपासकों का अंजाम
कल ही एक जिंदा जलाया गया है
बाकी की तलाश में हैं गोलियाँ
आज के सफ़ेदपोश आतकंकारी
करोड़ों उम्मीदों के ये कातिल
बदतर हैं विदेशी दुश्मनों से
जिनके बम सौ पचास जानें लेते हैं

जो भी इन्ही की गफलत से
फौजी ताबूत और गोलीरोधी जाकेट तक
निगल खाए बेईमानों ने
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
बेलगाम हैं ऊँगलीमालों के काले घोड़े

अब तथागत कहाँ?
कौन गाँधी?
फिर भी अचीर इस अंधकार में
रौशनी की दीर्घ किरण
अन्ना हजारे
बुझने से पहले
सुनहरा सूरज तुम्हे सौंपने को है आतुर

ए! छले गए, लूटे गए, बहलाए गए
शोषितो-शापितो-मुफलिसो
खास तौर से नौजवानो
बहुत कर चुके हो आत्महत्याये
अब वक्त शहादत का आया है
सच का कफ़न बाँध कर चल पडो
अन्ना हजारे के साथ
क्या पता
बेईमानों के विरुद्ध जंग
इस बार हम जीत ही जाएँ?

(रफत आलम)

Pic. courtesy : Hindustantimes

अप्रैल 7, 2011

नया गाँधी और भूरे अंग्रेज

जो बेचते  थे मुल्क कभी वो विदेशी थे
तुमने यारो जयचंद को भी मात किया
गरीब के फंड में जब डाका डलना था
नेता ने सबसे आगे अपना हाथ किया
……..
बूढ़ा साधु बेईमानों को सबक सिखाने निकला है
नौजवान बच्चो तुम्हारे ज़मीर का इम्तेहान होना है

लाखों बंद लाकरों में देश काला धन अटा पड़ा है
चाबियाँ जाच एजेंसी का प्रमुख खुद छुपा लेता है

पगार तेरी चालीस हज़ार बच्चा विदेश में पढता  है
बता तो सही अफसर ये ऊँचा महल केसे बना है

माना के भ्रष्टाचार का विष रग रग में उतर गया है
ईमानदारी की दवा से रोग का उपचार हो सकता है

टूटती  साँसें पहले भी कह कर गुज़र गयी है राम
इन्कलाब उठाने फिर एक मसीहा उठ खड़ा हुआ है

मुट्ठियाँ तानो छले हुए लोगो न्याय की राह चुन लो
चलो के भ्रष्टाचार का विष वृक्ष जड़ से मिटाना है

वो भूखा बैठा है और राजा दावतें उड़ाते फिर रहे हैं
चले आओ शोषितों अपनी भूख का बदला लेना है

किसी भी तरह से जुडो यारो सच के साथ आ जुडो
गाँधी का इन्कलाब उठाने अन्ना खम ठोके खड़ा है

(रफत आलम)

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