Archive for ‘समसामायिक’

मार्च 24, 2017

सेक्युलरवाद से संवाद – योगेन्द्र यादव

 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। उसी घड़ी एक सेक्युलर मित्र से सामना हो गया। चेहरे पर मातम, हताश और चिंता छायी हुई थी। छूटते ही बोले “देश में नंगी साम्प्रदायिकता जीत रही है। ऐसे में आप जैसे लोग भी सेक्युलरवाद की आलोचना करते हैं तो कष्ट होता है।”

मैं हैरान था: “आलोचना तो लगाव से पैदा होती है। अगर आप किसी विचार से जुड़े हैं तो आपका फर्ज़ है कि आप उसके संकट के बारे में ईमानदारी से सोचें। सेक्युलरवाद इस देश का पवित्र सिद्धांत है। जिन्हें इस सिद्धांत में आस्था है उनका धर्म है कि वो सेक्युलरवाद के नाम पर पाखंडी राजनीति का पर्दाफाश करें।”

वो संतुष्ट नहीं थे। कहने लगे “अब जलेबी न बनायें। मुझे सीधे-सीधे बताएं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से आपको डर नहीं लगता?”

मैंने सीधी बात कहने की कोशिश की: ” डर तो नहीं लगता, हाँ दुःख जरूर हुआ। जिसे इस देश में गर्व हो उसे ऐसे किसी नेता के इतनी ऊँची कुर्सी पर बैठने पर शर्म कैसे नहीं आएगी? जिसे योग में सम्यक भाव अपेक्षा हो वो आदित्य नाथ जी योगी कैसे मान सकता है? जो धर्म को कपड़ों में नहीं आत्मा में ढूँढता है वो घृणा के व्यापार को धार्मिक कैसे कह सकता है?”

अब उनके चेहरे पर कुछ आत्मीयता झलकी “तो आप साफ़ कहिये न, कि मोदी, अमित शाह और संघ परिवार देश का बंटाधार करने पर तुले हैं।”

मैं सहमत नहीं था: “सेक्युलरवादी सोचते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुष्प्रचार, संघ परिवार के घृणा फैलाने के अभियान और भाजपा की राजनीति ने आज सेक्यूलरवाद को संकट में पहुंचा दिया है। लेकिन इतिहास में हारी हुई शक्तियां अपने विरोधियों को दोष देती है। सच यह है कि इस देश में सेक्यूलरवाद स्वयं सेक्यूलरवाद के एकांगी विचार और सेक्यूलरवादियों की कमजोर और पाखंडी राजनीति के कारण संकट में है।”

उनके चेहरे पर असमंजस को देखकर मैंने कुछ विस्तार दिया: “संकट की इस घड़ी में सेक्यूलर राजनीति दिशाहीन है, घबराई हुई है। जनमानस और सड़क पर सांप्रदायिकता का प्रतिरोध करने की बजाय सत्ता के गलियारों में शॉर्टकट ढूंढ़ रही है, भाजपा की हर छोटी-बड़ी हार में अपनी जीत देख रही है। हर मोदी विरोधी को अपना हीरो बनाने को लालायित है। सांप्रदायिक राजनीति अपने नापाक इरादों के लिए संकल्पबद्ध है, इस मायने में सच्ची है। आत्मबल और संकल्प विहीन सेक्यूलर राजनीति अर्धसत्य का सहारा लेने को मजबूर है। सांप्रदायिकता नित नई रणनीति खोज रही है, अपनी जमीन पर अपनी लड़ाई लड़ रही है। सेक्यूलरवाद लकीर का फकीर है, दूसरे की जमीन पर लड़ाई हारने को अभिशप्त है। सांप्रदायिकता आक्रामक है तो सेक्यूलरवाद रक्षात्मक। सांप्रदायिकता सक्रिय है, सेक्यूलरवाद प्रतिक्रिया तक सीमित है। सांप्रदायिकता सड़क पर उतरी हुई है, सेक्यूलरवाद किताबों और सेमिनारों में कैद है। सांप्रदायिकता लोकमत तक पहुंच रही है, सेक्यूलरवाद पढ़े-लिखे अभिजात्य वर्ग के अभिमत में सिमटा हुआ है। हमारे समय की यही विडम्बना है-एक ओर बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है तो दूसरी ओर थके-हारे सेक्यूलरवाद की कवायद।”

अब वो “ऊँची बात कर दी श्रीमान ने” वाली मुद्रा में थे। तय नहीं कर पा रहे थे कि मैं दोस्त हूँ या दुश्मन। इसलिए मैंने इतिहास का सहारा लिया।

“आजादी से पहले सेक्यूलर भारत का सपना राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा था और सभी धर्मों के भीतर सामाजिक सुधार के लिए कटिबद्ध था।

आजादी के बाद से सेक्यूलरवाद इस देश की मिट्टी से कट गया। सेक्यूलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी इबारत से सेक्यूलर भारत स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गांधी की भाषा छोड़कर विदेशी मुहावरा बोलना शुरू किया। सेक्यूलरवाद का सरकारी अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ इसी उधारी सोच का नमूना है। धर्म के संस्थागत स्वरूपों और अलग-अलग पंथ के बीच तटस्थ रहने की नीति धीरे-धीरे धर्म के प्रति निरपेक्षता में बदल गई। सेक्यूलरवाद का अर्थ नास्तिक होना और एक औसत भारतीय की आस्था से विमुख होना बन गया। सेक्यूलरवाद का विचार भारत के जनमानस से कटता गया।”

अब उनसे रहा नहीं गया: “यानि कि आप भी मानते हैं कि सेक्युलरवाद वोट बैंक की राजनीति है?”

“ये कड़वा सच है। आजादी के आंदोलन में सेक्यूलरवाद एक जोखिम से भरा सिद्धांत था। आजादी के बाद सेक्यूलरवाद एक सुविधाजनक राजनीति में बदल गया। चुनावी राजनीति में बैठे-बिठाए अल्पंसख्कों के वोट हासिल करने का नारा बन गया। जैसे-जैसे कांग्रेस की कुर्सी को खतरा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे अल्पसंख्यकों के वोट पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ने लगी। अब अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों, को वोट बैंक की तरह बांधे रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी हो गई।”
“तो अब आप ये भी कहेंगे कि मुसलमानों का तुष्टिकरण भी एक कड़वा सच है?” अब उनकी दृष्टि वक्र थी।

” नहीं। तुष्टिकरण मुसलमानों का नहीं, उनके चन्द मुल्लाओं का हुआ। आजादी के बाद मुस्लिम समाज उपेक्षा, पिछड़ेपन और भेदभाव का शिकार था। देश के विभाजन के चलते अचानक नेतृत्वविहीन इस समाज को शिक्षा और रोजगार के अवसरों की जरूरत थी। लेकिन उनकी इस बुनियादी जरूरत को पूरा किए बिना उनके वोट हासिल करने की राजनीति ने सेक्यूलरवाद की चादर ओढ़ना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेक्यूलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाए रखने की राजनीति हो गई-मुसलमानों को खौफज़दा रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट अपनी झोली में बंटोरते जाओ। नतीजतन मुस्लिम राजनीति मुसलमानों के बुनियादी सवालों से हटकर सिर्फ सुरक्षा के सवाल और कुछ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों (उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, शादी-ब्याह के कानून) के इर्द-गिर्द सिमट गई।

जिस खेल को पहले कांग्रेस ने शुरू किया, उसे बाद में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लेफ्ट ने भी अपना लिया। डर के मारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों का बंधक बन गया। मुसलमान पिछड़ते गए और सेक्यूलर राजनीति फलती-फूलती रही। मुस्लिम समाज उपेक्षा और भेदभाव का शिकार बना रहा, लेकिन उनके वोट के ठेकेदारों का विकास होता गया। वोट बैंक की इस घिनौनी राजनीति को सेक्यूलर राजनीति कहा जाने लगा। व्यवहार में सेक्यूलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े हुए दिखना। पहले जायज हितों की रक्षा से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे जायज-नाजायज हर तरह की तरफदारी को सेक्यूलरवाद कहा जाने लगा। धीरे-धीरे एक औसत हिंदू को लगने लगा कि सेक्यूलरवादी लोग या तो अधर्मी है या विधर्मी। उसकी नजर में सेक्यूलरवाद मुस्लिमपरस्ती या अल्पंसख्कों के तुष्टिकरण का सिद्धांत दिखने लगा। उधर मुसलमानों को लगने लगा कि सेक्यूलर राजनीति उन्हें बंधक बनाए रखने का षड्यंत्र है। इससे तो बेहतर है कि वे खुलकर अपने समुदाय की पार्टी बनाए। इस तरह देश का एक पवित्र सिद्धांत देश का सबसे बड़ा ढकोसला बन गया।”

“यानि आप कह रहे हैं कि हम योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दें कि उनके बहाने हमारी आँखे खुल गयीं ” इतना बोल मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वे आगे बढ़ गए। मुझे लगा उनके चेहरे पर उतनी हताशा नहीं थी, उनकी चाल में एक फुर्ती थी।

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जून 3, 2016

कॉल ड्राप का गोरखधंधा… (के.एन. गोविंदाचार्य)

4 दिन पूर्व कॉल ड्राप के बारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखा विस्तृत पत्र आप सभी के साथ साझा कर रहा हूं   – के. एन. गोविंदाचार्य

दिनांक-30 मई 2016
प्रिय मित्र श्री नरेंद्र जी,

सादर नमस्ते!

सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आपकी सरकार ने डिजीटल इंडिया समेत कई योजनाओं की शुरुआत की है परंतु सार्थक बदलावतो योजनाओं के सही क्रियान्वयन से ही आ सकता है। सुशासन के लिए आपने सार्थक सहयोग और सकारात्मक आलोचना हेतु जो अपील की है वह निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। आज के समाचार पत्रों में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा कॉल ड्रॉप के माध्यम से धांधली की खबर पर आपका ध्यानाकर्षित करना चाहता हूं, जिसकी वजह से 100 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ता बेवजह लुट रहे हैं (संलग्नक-1)।

टेलीकॉम कंपनियों द्वारा मोबाइल नेटवर्क में निवेश की कमी से कॉल ड्रॉप एक राष्ट्रीय महामारी बन गई है। इसपर आप भी गंभीर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 16 अक्तूबर 2015 को नियम बनाया था जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मई 2016 के निर्णय से निरस्त कर दिया है। फैसले के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख सरकार द्वारा तथ्यों का सही प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया, इसका संक्षिप्त विवरण मेरे पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-2)। हमारी वज्र फाउंडेशन की टीम ने फैसले के विस्तृत अध्ययन के पश्चात कानूनी बिंदुओं कानिर्धारण किया है जिनका संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण इस पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-3)। मैं आशा करता हूं कि आप अविलंब दूरसंचार मंत्रालय तथा ट्राई को इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार सरकार द्वारा कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का नियम सही तरीके से नहीं बनाया गया था। इस बारे में संसद को नया कानून पारित करना होगा। यदि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सहमत है तो फिर नए कानून के लिए अविलंब अध्यादेश जारी करना चाहिए जिससे देश में सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग ( जिनमें से अधिकांश मध्यवर्गीय और गरीब हैं ) को राहत मिल सके।

दरअसल कॉल ड्रॉप में उपभोक्ता की मोबाइल पर बात होती ही नहीं है तो फिर उस पर टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पैसा वसूली एक खुली लूट ही है। इस पर सरकार लगाम लगाने में विफल रही है।आज के समाचार से स्पष्ट है कि जुर्माने से बचने के लिए टेलीकॉम कंपनिया अब ‘रेडियो लिंक टेक्नोलॉजी’ से उपभोक्ताओं को ठग रही हैं जिससे अब कॉल ड्रॉप के बावजूद कनेक्शन नहीं कटता। अटॉर्नी जनरल श्री मुकुल रोहतगी ने कॉल ड्रॉप मामले में बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोबाइल कंपनियां कार्टेल बनाकर जनता को लूट रही हैं। कॉल ड्रॉप मामले में आम जनता किस तरह ठगी गई है उसकी पुष्टि के लिए मैं संक्षिप्त विवरण आपको भेज रहा हूं (संलग्नक 4)।

कॉल ड्रॉप पर निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों पर सख्त पेनॉल्टी के प्रावधान हैं जिनका ट्राई द्वारा पालन नहीं हो रहा है। कॉल ड्रॉप में बगैर सेवा दिए टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पिछले कुछ सालों में ग्राहकों से हजारों करोड़ की अवैध वसूली की गई है।इसे ग्राहक निधि में जमा कराने के लिए 2007 के कानून का पालन हो यहसुनिश्चित कराने की आवश्यकता है।

मैं आशा करता हूं कि हमारे प्रतिवेदन का संज्ञान लेते हुएआप माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अविलंब पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे। कानूनों के क्रियान्वयन से जनता को प्रभावी न्याय तथा सुशासन दिलाने के लिए मैं ऐसे अन्य विषयों पर आपको सहयोग देता रहूंगा जिससे हम सभी का राष्ट्रीय स्वप्न साकार हो सके।

शुभकामनाओं सहित।
सादर

(के एन गोविंदाचार्य)
श्री नरेंद्र मोदी जी,
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

प्रति-

1- श्री रविशंकर प्रसाद, दूरसंचार मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
2- श्री आर एस शर्मा, चेयरमैन, ट्राई, नई दिल्ली

मई 27, 2016

जल-हल

जल में हल
हल का जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल,
हल का फल
फल का रस,
रस ही सार
सार ही धार,
धार का धौरा
धौरा में जल,
जल की माया
माया में काया,
काया बिन न कुछ पाया
पाया है तो आगे चल,
चल तू , जन गण तक
तक ना, थक ना,
ना थक चलता जा
जा पायेगा जल का हल,
हल का जल
जल सबका जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल |
जल की धारा
धारा का जल,
जल है प्यारा
प्यारा है सहारा,
सहारा टूटा
टूटा जीवन,
जीवन खाली
खाली खेत,
खेत में उडती
उडती सूखी रेत,
रेत बिन पानी
पानी बिन सूना,
सूना जीवन
जीवन जिजिविषा,
जिजिविषा जिलाए
जिलाए किसान,

किसान का अन्न
अन्न की रोटी,
रोटी का जल
जल सबका जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल

(रमेश चंद शर्मा  – गाँधी शांति प्रतिष्ठान) – स्वराज अभियान के जल-हल आंदोलन के संदर्भ में रची कविता!

अप्रैल 30, 2016

दिल्ली की चुनावी राजनीति में एक नया प्रयोग

‘स्वराज अभियान’ वजीरपुर – वार्ड ६७, में एमसीडी के उपचुनाव में एक नया राजनीतिक प्रयोग करने जा रहा है| इसकी सफलता भारतीय राजनीति में सुधार की ओर एक सार्थक कदम होगी|

फ़रवरी 21, 2016

जाट आरक्षण का कड़वा सच : योगेन्द्र यादव

Yogendra Yadavपिछले दो दिनों से हरियाणा से आ रही ख़बरों से मन बहुत ख़राब है। सरकार अक्षम है, आंदोलनकारी अनुशासनहीन है और विपक्ष गैर-जिम्मेदार है। सब मिलकर सीधा-सादा सच जनता से छुपा रहे हैं। अगर राज्य को अराजकता और हिंसा से बचाना है तो शुरुआत सच बोल कर करनी होगी।

सच ये है कि सभी पार्टियां जाटों को आरक्षण का झूठा वादा करती रही हैं। इस वादे को पूरा करना किसी के बस का नहीं है। सन 2013 में हरियाणा सरकार ने और सन 2014 में केंद्र सरकार ने बिना कायदे के जाटों को आरक्षण दिया था। सबको तभी पता था की ये आदेश कोर्ट में टिकेगा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र का आदेश रद्द कर दिया, हरियाणा सरकार से आदेश पर हाई कोर्ट ने स्टे दे रखा है। जब तक कोर्ट अपना फैसला नहीं बदलते तब तक सरकार आंदोलनकारियों को कुछ वे वादा करले, उसका कोई महत्व नहीं है। अगर सरकार आंदोलनकारियों को खुश करने के लिए अध्यादेश लाती भी है, तो वो भी कोर्ट में रुक जाएगा।

सच ये है कि मामला सिर्फ एक कोर्ट आर्डर का नहीं है। आज की कानूनी-संवैधानिक व्यवस्था में जाट और पटेल जैसी जातियों को आरक्षण देना संभव नहीं है। किसी भी जाति को ओबीसी में शामिल करने के लिए यह काफी नहीं हैं कि इसके बारे में पहले क्या धारणा थी, या की मंडल कमीशन ने क्या लिखा। अब इसका वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर प्रमाण देना पड़ता है कि वह जाति आज शिक्षा और सरकारी नौकरी में सामान्य से बहुत पिछड़ गयी है। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने यह सर्वे करवाया था, उसके मुताबिक जाट समाज की स्थिति उतनी पिछड़ी हुई नहीं है। इस प्रमाण के आधार पर आज के हालात में जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण जैसा कोई लाभ देना संभव नहीं है।

सच ये भी है कि साधारण जाट परिवार की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है और वह आज की व्यवस्था में अन्याय का शिकार है। अधिकांश जाट गाँव में रहते हैं और खेतिहर हैं। खेती अब घाटे का धंधा बन गयी है। खेती की लागत और किसान के खर्चे बढ़ रहे हैं लेकिन फसलों के दाम बढ़ नहीं रहे। ऊपर से मौसम और बाजार की मार। अगर बच्चे को पढ़ा-लिखा दिया तो वो न खेती के लायक बचा न ही नौकरी के काबिल बना। ऊपर से हर नौकरी में सिफारिश और रिश्वत। यानी असली समस्या खेती के संकट और शिक्षित बेरोजगारी की है। इस असली समस्या का समाधान करने को कोई तैयार नहीं है। किसी के पास न तो समझ है, न हिम्मत। आरक्षण इस समस्या का समाधान नहीं है। इससे चंद पढ़े-लिखे और कांटेक्ट वाले परिवारों का भला हो सकता है, लेकिन ज्यादातर जाट परिवारों को इससे कोई फायदा नहीं है। बस इस सवाल पर साधारण लोगों की भावनाएं भड़काना आसान है।

सच ये है की जाट आरक्षण के नाम पर यही खेल हो रहा है। कोई अपनी लीडरी चमका रहा है, कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी हिला रहा है, कोई अपनी पार्टी के वापिस आने का आधार बना रहा है। घबराई हुई सरकार अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार रही है। सबको पता है की इससे कुछ हासिल नहीं होगा। पांच घरों के चिराग बुझ चुके हैं, और पता नहीं कितनों की बारी है। अब चुप रहने का वक्त नहीं है। कुछ लोगों को तो खुल कर सच बोलना चाहिए ताकि शांति लौट सके, सच्चे सवालों पर ध्यान दिया जा सके।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 14, 2015

उ.प्र में सूखा और किसानों की दुर्दशा: मुख्यमंत्री के नाम सुझाव-पत्र (योगेन्द्र यादव)

13 अक्टूबर 2015
श्री अखिलेश यादव,
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय : उत्तर प्रदेश में सूखे के संकट से निपटने के लिए कुछ सुझाव

प्रिय अखिलेश जी,

स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन के तहत हम कुछ साथी विगत 2 अक्टूबर से देश के सूखाग्रस्त इलाकों की ‘संवेदना यात्रा’ पर हैं. इस सिलसिले में पिछले चार दिनों में हमने बाँदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट, कौशाम्बी, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, कानपुर नगर, कानपुर देहात, औरैया, इटावा और आगरा जनपदों के गाँवों में यात्रा की, और किसानों से बातचीत की. इसके अलावा जिन इलाकों में हम नहीं जा पाए, वहाँ कार्यरत संगठनों एवं व्यक्तियों से भी हमने सलाह मशविरा किया.
राज्य में सूखे की स्थिति के बारे में आपको नियमित रूप से सूचनाएं तो मिलती ही हैं, आपके पास इस जानकारी का कहीं बेहतर तंत्र है. फिर भी कई बार बड़े सरकारी सूचना तंत्र के बावजूद कुछ सूचनाएँ शीर्ष तक नहीं पहुँच पातीं. इसलिए मैं इस यात्रा के निष्कर्ष और उनके आधार पर कुछ सुझाव आपके सामने रख रहा हूँ. आशा है कि इसे आप अन्यथा नहीं लेंगे और इन रचनात्मक सुझावों पर गौर करेंगे.

देश के सबसे अधिक सूखे से प्रभावित जिलों के दौरे के बाद हमारी टीम दो निष्कर्षों पर पहुंची है. पहला यह कि इस राष्ट्रीय आपदा का केंद्र बिन्दु उत्तर प्रदेश है. इस बार उत्तर प्रदेश में औसत से 45 प्रतिशत कम वर्षा हुई है. वर्षा की कमी से देश में सर्वाधिक प्रभावित 30 जिलों में से 17 उत्तर प्रदेश से हैं. प्रदेश के कई इलाकों में लगातार दूसरे या तीसरे वर्ष सूखा पड़ रहा है. एक बहुत बड़े इलाके में खरीफ की फसल लगभग बर्बाद हो चुकी है. ज्यादातर इलाकों में किसान रबी की फसल बोने की स्थिति में भी नहीं है. पीने के पानी का संकट है. लोग पशुओं को बेच रहे हैं या यूँ ही छोड़ दे रहे हैं.

हमारा दूसरा निष्कर्ष यह है कि प्रदेश में आपदा की इस घड़ी में प्रशासन तंत्र सूखे के शिकार किसान और मजदूरों को मदद पहुंचाने में असमर्थ रहा है. हालाँकि आपकी सरकार ने किसानों से मालगुजारी न वसूलने का फैसला जरूर लिया है, लेकिन यह कदम तो प्रतीकात्मक ही है. ऎसी प्राकृतिक आपदा के समय लोगों की सरकार से बहुत अपेक्षा होती है. लेकिन किसान को इस साल का मुआवजा तो दूर पिछली फसलों का मुआवजा भी नहीं मिल पाया है. खेती में मनरेगा का इस्तेमाल भी नहीं के बराबर है. इस संकट की घड़ी में जिन लोगों को सस्ते अनाज की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उनमें से अधिकांश उस राशन कार्ड के पात्र नहीं हैं.

कुल मिलाकर प्रदेश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बहुत बडे संकट से गुजर रहा है. जानवरों के लिए तो यह सूखा अकाल में बदलता ही जा रहा है, अगर सरकार की ओर से जल्द ही कुछ प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह भी आशंका है कि बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में सबसे गरीब वर्ग के लिए अकाल की स्थिति बन सकती है.

अपनी टीम के साथियों की ओर से मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि इस संकट की घड़ी में निम्नलिखित बेहद जरूरी कदम तुरंत उठाएँ.

1 प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा
सूखे की उपरोक्त स्थिति को देखते हुए आपकी सरकार को पूरे प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा करनी चाहिए, ताकि सूखा राहत के काम शुरू हो सकें. कर्नाटक और मध्य प्रदेश ने यह घोषणा कर दी है, जबकि वहाँ सूखे की स्थिति इतनी भयावह नहीं है. उम्मीद है कि आपकी सरकार राज्य आपदा राहत कोष और जरूरत पड़े तो राष्ट्रीय आपदा राहत कोष का इस्तेमाल करेगी और धन की कमी को सूखे की घोषणा के रास्ते में रोड़ा नहीं बनने देगी.

2 फसल नुकसान के मुआवज़े की घोषणा और बकाया राशि का भुगतान
आपकी सरकार ने पिछले साल ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से हुए नुकसान के लिए मुआवज़े की घोषणा की थी, लेकिन यह मुआवज़ा कुछ ही गाँवों तक पहुँच पाया है. ज्यादातर बड़ी ग्राम पंचायतें अब भी इस मुआवजे का इंतजार कर रही हैं. जहाँ मुआवजा मिला भी है, वहाँ यह कुछ ही लोगों तक पहुँचा पाया है. इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी सामने आई हैं. इसलिए सरकार तत्काल किसानों बकाया मुआवज़ा दिलवाने की व्यवस्था करे.

पिछली फसल के मुआवज़े के साथ-साथ इस फसल को हुए व्यापक नुकसान की भरपाई के लिए एक वस्तुपरक और न्यायसंगत नीति की घोषणा होनी चाहिए. इस सन्दर्भ में आपकी सरकार मध्य प्रदेश के राजस्व कोड के प्रावधानों पर विचार कर सकती है. ऐसी न्यायसंगत व्यवस्था में मुआवज़ा निर्धारित करते समय दो बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए- (क) किसान ने बीज, खाद, कीटनाशक आदि में कितना निवेश किया था, जो बेकार चला गया ; तथा (ख) इस फसल के नुकसान की वजह से उस अवधि में न्यूनतम गुज़ारे लायक आमदनी का कितना नुकसान हुआ. इन दोनों तथ्यों को देखते हुए हमारा सुझाव है कि जहाँ फसल का पूरा नुकसान हुआ है, वहाँ सिंचित खेतों के लिए 20,000 रूपए प्रति एकड़ और असिंचित खेती के लिए 15,000 रूपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाना चाहिए. इस मुआवजे की घोषणा के तत्काल बाद मुआवजज़े की राशि प्रभावित किसानों के बैंक में खाते जमा की जानी चाहिए. फसलों के नुकसान का जायजा पारदर्शी तरीके से हो, इसके लिए किसकी फसल को कितना नुकसान हुआ, यह सूची ग्रामसभा के सामने पेश की जानी चाहिए.

3 क़र्ज़ के बोझ में दबे किसानों को तात्कालिक राहत
रबी के दौरान अतिवृष्टि और अब खरीफ के दौरान सूखे के कारण किसानों ने इन फसलों के लिए जो क़र्ज़ लिया था, वह डूब चुका है. अपेक्षित आय न होने की वजह से किसान पुराने बकाया कर्जे की अदायगी में भी असमर्थ है. क़र्ज़ के बोझ में दबा किसान आत्महत्या को विवश न हो इस लिए यह ज़रूरी है किसानों के तमाम खेती संबंधी और व्यक्तिगत ऋणों का पुनर्निर्धारण हो.

इस सम्बन्ध में हमारा सुझाव है कि: क) जिन इलाकों में फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी है, वहाँ पिछली दोनों फसलों के ऋण को माफ़ कर दिया जाए ; ख) किसानों के बकाया क़र्ज़ का ब्याज माफ़ कर दिया जाए ; ग) इन बकाया कर्जों की किश्तों की अदायगी मुल्तवी कर दी जाए ; घ) किसानों को सरल, सुगम और समयानुसार बैंक क़र्ज़ उपलब्ध करवाया जाए ताकि वह साहूकारों के चंगुल में फंसकर प्रतिमाह 5 से 10 प्रतिशत ब्याज देने को मजबूर न हो.

4 रोजगार गारंटी योजना को सही ढंग से लागू किया जाए
जब फसल बर्बाद हो जाए और किसान मजदूरों को रोजगार देने में असमर्थ हों, ऐसे में मजदूर और सीमांत किसान अपनी आजीविका के लिए सरकार की ओर देखता है, और रोजगार के लिए सरकार का मोहताज हो जाता है. रोजगार गारंटी योजना ऎसी ही स्थितियों से निपटने के लिए बनी थी. लेकिन आज सूखे की स्थिति में सरकार इस योजना का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रही है. अधिकांश जरूरतमंद लोगों के पास जॉब कार्ड तो है, लेकिन कई महीनों से उन्हें कोई काम नहीं मिला है. जिन लोगों को काम भी मिला, उन्हें कई महीनों से भुगतान नहीं मिल पाया है. भुगतान न मिलने की वजह से अब गरीबों को लगता है कि इस योजना के तहत काम करने से कुछ हासिल नहीं होगा. हाल ही में भारत सरकार ने महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना में अधिकतम रोजगार की सीमा सौ दिन से बढ़ाकर डेढ़ सौ दिन कर दी है. इस योजना की मदद से सूखा प्रभावित गरीब परिवारों को वैकल्पिक रोजगार देने का यह महत्वपूर्ण अवसर है.

हमारा सुझाव है कि – क) मनरेगा के तहत राज्य के हर सूखाग्रस्त जिले में हर गाँव में काम उपलब्ध करवाया जाए, चाहे उसकी औपचारिक माँग हुई हो या नहीं ; ख) मनरेगा के काम को भूमि और पानी संरक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाए, ताकि भविष्य में सूखे का सामना करने की क्षमता विकसित हो सके ; ग) काम के पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान किया जाए, इसमें किसी भी तरह की देर होने पर दोषी व्यक्ति को सजा दी जाए ; घ) सूखे के समय लोगों को रोजगार न देने, उनके भुगतान में भ्रष्टाचार करने या मशीनों से काम करवाने की शिकायत पर सख्त कार्रवाई हो.

5 राशन व्यवस्था के जरिये खाद्यान्न संकट का मुकाबला
सूखे के चलते गाँवों में गरीबों के खान-पान पर असर पड़ रहा है. सूखे से खाद्यान्न की कमी और अकाल जैसे हालात न उत्पन्न हों, इसके लिए ज़रूरी है कि राशन व्यवस्था के जरिये जरूरतमंद लोगों तक सस्ता खाद्यान्न पहुंचाया जाए. लेकिन राज्य की सार्वजनिक आपूर्ति व्यवस्था आज यह करने में पूरी तरह से असमर्थ है. लाल कार्ड, पीले और सफ़ेद कार्ड वितरित करने की व्यवस्था में कोई न्यायसंगत आधार दिखाई नहीं देता. हर गाँव में बड़ी संख्या में गरीब परिवारों को पीला कार्ड दिया गया है, जिसके कारण वे सस्ते खाद्यान्न से वंचित हैं. चूँकि सरकार के लिए तुरंत इन कार्डो का पुनर्वर्गीकरण संभव नहीं है, इसलिए सूखाग्रस्त इलाको में सभी परिवारों को सूखे की अवधि के दौरान 60 किलो खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाय. इस दौरान उनसे इस खाद्यान्न का वही दाम लिया जाए, जो कि लाल कार्ड धारकों से लिया जाता है. जिन परिवारों के पास कोई भी कार्ड नहीं है, उन्हें भी सूखे के दौरान यही सुविधा एक अस्थायी प्रमाण पत्र के माध्यम से दी जाए.

6 आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को मुआवजा
हाल ही में तेलंगाना सरकार ने एक शासनादेश के जरिये आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को दिए जाने वाली मुआवजे की एक सुसंगत व्यवस्था बनाई. हमारा सुझाव है कि उत्तर प्रदेश सरकार भी ऐसा ही एक आदेश जारी कर आज की व्यवस्था में सुधार कर सकती है. इस नयी व्यवस्था के तहत: (क) आत्महत्या के शिकार परिवारों की पहचान में तकनीकी औपचारिकताओं को खत्म किया जाना चाहिए ; (ख) जमीन जोतने वाले भूमिहीन परिवारों को भी इस मुआवजे का लाभ मिलना चाहिए ; (ग) मुआवजे में परिवार के बकाया कर्ज को माफ़ करने, तात्कालिक राहत राशि, विधवा के लिए रोजगार और बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए.

7 जानवरों के लिए ‘चारा छावनी’ की व्यवस्था
इस समय पूरे प्रदेश में मवेशियों के लिए भारी आपदा की स्थिति है. पिछली गेहूँ की फसल अतिवृष्टि से खराब होने के कारण चारा भी बर्बाद हो गया था. अब खरीफ की फसल सूख जाने की वजह से ज़हरीली हो रही है. सूखा जहरीला चारा खाकर जानवरों के मरने की खबर आ रही है. जो परिवार बाहर से महँगा चारा (वर्तमान बाजार भाव 600 से 800 रूपए प्रति क्विंटल) खरीदकर अपने जानवरों को नहीं खिला सकता, वह इस विपदा की स्थिति में मजबूर होकर जानवरों को औने-पौने दाम पर बेच रहा है, या फिर उन्हें गाँव के बाहर छोड़ रहा है. एक गाँव के लोग दूसरे गाँव में जानवरों को चरने के लिए छोड़ रहे हैं. चारों ओर अफरा-तफरी मची है. इससे जानवरों के प्राणों को खतरा तो है ही, छूटे हुए जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करने की संभावना भी है. इस आपात स्थिति से बचने के लिए सरकार को बिना देर किए महाराष्ट्र की तर्ज़ पर ‘चारा छावनी’ बनानी चाहिए. इन चारा छावनियों में सैकड़ों मवेशियों को एक साथ रखकर सरकार की ओर से चारा और पानी उपलब्ध किया जाना चाहिए. सरकार उचित समझे तो इस काम मे स्वंयसेवी संगठनों, गौशालाओं और अन्य पशुपालक संगठनों को शामिल कर सकती है.

8 सूखाग्रस्त इलाकों में नलकूपों की मरम्मत के बाद
सूखाग्रस्त इलाकों में तालाब और पानी के अन्य स्रोत सूख गए हैं। इसलिए इंसान और मवेशी, दोनों पानी के लिए नलकूपों पर निर्भर हैं. लेकिन प्रायः हर गाँव में कई नलकूप छोटी-मोटी मरम्मत के अभाव में काम नहीं कर रहे हैं. इससे गाँववासियों , खास तौर पर औरतों को, बेहद कष्ट उठाना पड़ रहा है. अतः सरकार एक मिशन की तरह पूरे प्रदेश में नलकूपों की मरम्मत का काम अगले 2 हफ्ते में संपन्न कराए.

9 सिंचाई के लिए बिजली आपूर्ति
सूखे की मार से परेशान किसान अपने बोरबेल या ट्यूबवेल के ज़रिये अपनी फसल को बचने की चेष्टा कर रहा है लेकिन बिजली की आपूर्ति अपर्याप्त होने या समयबद्ध तरीके से न होने के कारण वह फसल को बचाने में असमर्थ रहता है. बिजली का विकल्प है डीज़ल, लेकिन वह इतना मंहगा पड़ता है कि किसान उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता इसलिए अब रबी की फसल के लिए बिजली नियमित रूप से उपलब्ध करवाई जाए. जहाँ ज़रुरत हो वहां बिजली के बिलों को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाये.

मुझे आशा है कि आप इन सुझावों की मूल भावना का सम्मान करेंगे। इस पत्र का उदेश्य आलोचना या दोषारोपण नहीं है। इस राष्ट्रीय संकट की घडी में सभी को मिलकर काम करना है. हमारी टीम ने प्रदेश में भ्रमण कर कर किसानो के दुःख-तकलीफ़ को सुना – समझा है. इसलिए हमारा फर्ज़ बनता है कि हम उनकी आवाज़ को आप तक पहुँचाएँ. देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की जनता इस आपदा के वक्त आप की सरकार की तरफ देख रही है. मुझे विश्वास है कि आप उनकी इन आशाओं पर खरे उतरेंगे।

भवदीय,

योगेन्द्र यादव
राष्ट्रीय संयोजक
जय किसान आन्दोलन

सितम्बर 14, 2015

हिंदी दिवस के ढकोसले को बंद कीजिये : योगेन्द्र यादव

हर साल 14 सितम्बर के दिन ऊब और अवसाद में डूब कर हिंदी की बरसी मनायी जाती है। सरकारी दफ्तर के बाबू हिन्दी की हिमायत में इसका कसीदा और स्यापा दोनों एक साथ पढ़ते हैं। हिंदी की पूजा-अर्चना और अतिशयोक्ति पूर्ण महिमामंडन के मुखौटे के पीछे हिंदी के चेहरे पर पराजयबोध साफ़ झलकता है। मानो, इस दिन दुनिया की (चीनी,स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद ) चौथी सबसे बड़ी भाषा अपना जीवित-श्राद्ध आयोजित कर रही है |

हर साल हिंदी दिवस के इस कर्मकांड को देख मेरा खून खौलता है | पूछना चाहता हूँ कि इस देश में अंग्रेजी दिवस क्यों नहीं मनाया जाता है (बाकी 364 दिन अंग्रेजी दिवस ही तो हैं! ) सरकारी दफ्तरों के बाहर हिंदी पखवाड़े के बेनूर बैनर को देख चिढ़ होती है | उतर भारत में तमिल का पखवाड़ा मने, दिल्ली में हिंदी की सैकड़ो विलुप्त होती “बोलियों” का पखवाडा मने, तो समझ में आता है लेकिन अगर पचास करोड़ लोगो की भाषा को अपने ही देश में अपनी आकांक्षा को एक पखवाड़े भर में सिकोड़-समेट लेना पड़े तो लानत है ! हर बार यह सब देख के रधुवीर सहाय की कविता “हमारी हिंदी” याद आती है | सुहागिन होने की खुशफहमी तले दुहाजू की नई बीबी जैसी हमारी यह हिंदी सीलन और चीकट से घिरी है, दोयम दर्जे का जीवन जीने को अभिशप्त है |

हिंदी दिवस पसरते जाते हैं, हिंदी सिकुड़ती जाती है। आज इस देश में हिंदी भाषा अंग्रेजी की दासी , अन्य भारतीय भाषाओँ की सास और अपनी ही दर्जनों बोली या उप-भाषाओ की सौतेली माँ बन गई है | संघ लोक सेवा आयोग के सीसैट पर्चे की परीक्षा के विरुद्ध आन्दोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी के बरक्स हिंदी की हैसियत का एहसास कराया है। चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी चिट्ठी, राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी है | रैपिड इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के सर्वव्यापी विज्ञापन और कुकरमुत्ते की तरह उगते इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का डंका बजाते हैं | बॉस को खुश करने को लालायित जूनियर , मेहमान के सामने बच्चे को पेश करते माँ–बाप या प्रेमिका को पटाने की कोशिश में लगा लड़का…जहाँ–जहाँ अभिलाषा है वहां–वहां अंग्रेजी है| सत्ता का व्याकरण हिंदी में नही अंग्रेजी में प्रकट होता है | ऐसे में राज-भाषा का तमगा एक ढकोसला है !
दरअसल यह ढकोसला हिंदी के लिए अभिशाप बनता जा रहा है | हिंदी के पल्ले और कुछ तो है नहीं, बस राज भाषा होने का एक खोखला अहंकार है | इसके चलते हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच एक खाई बनी रहती है | हमारा संविधान कही”राष्ट्र-भाषा”का जिक्र नहीं करता लेकिन अपने गरूर में हिंदी वाले मान कर चलते हैं कि उनकी भाषा इस देश की राष्ट्र-भाषा है | वे हिन्दी को मकान मालिक समझते है, बाकी भाषाओं को किरायेदार | हर गैर हिंदीभाषी को स्कूल में हिंदी सीखनी पड़ती है लेकिन हिंदीभाषी दक्षिण या पूर्व भारत की एक भी भाषा नहीं सीखते। इसके चलते अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वालों को हिंदी से चिढ़ होती है |और तो और, आज हिंदी और उर्दू के बीच भी फांक बना दी गयी है। इस झगड़े का फायदा उठा कर अंग्रजी का राज बदस्तूर चलता रहता है |
हिंदी-दिवस का ढकोसला हमारी आँखों से खुद हिंदी की बनावट को ओझल करता है | यह इस गलतफहमी को पैदा करता है कि आकाशवाणी–दूरदर्शन की खड़ी बोली पचास करोड़ देशवासियों की मातृभाषा है | हम सब अब भोजपुरी,मगही,अवधी,मेवाती,बागड़ी,मारवाड़ी,भीली,हाड़ोती,मालवी,छत्तीगढ़ी,संथाली जैसी भाषाओ को महज बोली कहने लगे हैं | नतीजतन इन भाषाओँ में उपलब्ध सांस्कृतिक धरोहर और रचनात्मकता का भण्डार आज विलुप्त होने के कगार पर है | अंग्रेजी के बोझ तले दबी हिंदी खुद इन भाषाओँ को दबाने का औजार बन गई है |

अगर आज भी हिंदी में कुछ जान बची है तो इस राजभाषा के कारण नहीं | सरकारी भाषा-तंत्र के बाहर बम्बईया फिल्मों , क्रिकेट कमेंट्री और टीवी तथा अखबार ने हिंदी को आज भी जीवित रखा है | न जाने कितने गैर हिंदीभाषियों ने बम्बईया फिल्मो के माध्यम से हिंदी सीखी | पिछले बीस सालों में टीवी के अभूतपूर्व प्रसार ने हिंदी का अभूतपूर्व विस्तार किया | समकालीन हिंदी साहित्य किसी भी अन्य भाषा के श्रेष्टतम साहित्य से हल्का नहीं है | पिछले कुछ सालो से अंग्रेजीदां हिन्दुस्तानी भी हिंदी के कुछ जुमले बोलते वक्त झेंप महसूस नहीं करते| लेकिन इस सब का राजभाषा संवर्धन के सरकारी तंत्र से कोई लेना-देना नहीं है |
इसलिए, मै गुस्से या खीज में नहीं, ठंढे दिमाग से यह प्रस्ताव रखना चाहता हूँ कि हिंदी दिवस के सरकारी ढकोसले को बंद कर देना चाहिए |योजना आयोग की तरह राजभाषा प्रसार समितियों को भी भंग कर देना चाहिए। सरकार इस ढकोसले को बंद करना नहीं चाहेगी | अंग्रेजी वाले भी नहीं चाहेंगे | ऐसे में हिंदी के सच्चे प्रेमियों को हिदी दिवस का बहिष्कार करना चाहिए | इसके बदले 14 सितम्बर को भारतीय भाषा संकल्प दिवस के रूप में मनाना चाहिए | इस अवसर पर सभी भारतीय भाषाओँ को एक जुट हो कर अंग्रेजी भाषा के विरूद्ध नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष करने का संकल्प लेना चाहिए | लेकिन भाषा का संघर्ष केवल विरोध और बहिष्कार से नहीं हो सकता, इसमें नवनिर्माण सबसे जरूरी है|
इसका मतलब होगा कि हिंदी की पूजा-अर्चना छोड़ उसका इस्तेमाल करना शुरू करें | जैसे मिस्त्रियों ने हर कल पुर्जे के लिए अपनी हिंदी गढ़ ली है (पिलास, चिमटी, ठंढा/गर्म तार) उसी तरह हमें अर्थ-व्यवस्था, क़ानून, खगोलशास्त्र और डाक्टरी के लिए भी एक नई भाषा गढ़नी होगी | देश और दुनिया की तमाम भाषाओँ से शब्द उधार लेने होंगे, शब्द-मैत्री की नई रवायत बनानी होगी | गुलज़ार की तरह हर पौराणिक कहानी को बाल साहित्य में बदलना होगा | सुकुमार राय के ‘आबोल ताबोल’ की तर्ज पर बच्चो को हँसने – गुदगुदाने वाली कवितायेँ लिखनी होंगी | हैरी पॉटर का मुकाबला कर सकने वाला रहस्य और रोमांच से भरा किशोर साहित्य तैयार करना होगा | कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हर विषय की मानक पाठ्यपुस्तकें तैयार करनी होगी | अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान के असीम भण्डार का अनुवाद करना होगा | चीनी और जापानी की तरह हिंदी को भी इन्टरनेट की सहज – सुलभ भाषा बनाना होगा |इसके बिना अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध बेमानी है।
यह सब करने के लिए अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ सास जैसा व्यवहार छोड़ कर सखा-भाव बनाना होगा | अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ लडाई तभी लड़ी जा सकती है जब तमाम भारतीय भाषाएँ एक जुट हो जाएँ | हिंदी संख्या के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी भाषा भले ही हो लेकिन न तो सबसे वरिष्ठ है और न ही सबसे समृद्ध | हिंदी को तमिल के प्राचीन ग्रन्थों, आधुनिक कन्नड़ साहित्य, मलयाली समाचार पत्रों, मराठी विचार-परंपरा, बांग्ला अकादमिक लेखन और उर्दू–फ़ारसी की कानूनी भाषा से सीखना होगा | अपनी ही बोलियों को मान–सम्मान दे कर मानक हिंदी के दरवाजे इन सब भाषाओं के लिए खोलने होंगे |अगर हिंदी की गरिमा हिन्द की गरिमा से जुडी है तो हिंदी को हिन्दवी की परंपरा से दुबारा जुड़ना होगा, हिन्द के भाषायी संसार का वाहक बनाना होगा।
हिंदी प्रमियों को गैर-हिंदी इलाकों में हिंदी के प्रचार–प्रसार-विस्तार की कोशिशों से बाज आना होगा | अगर वे हिंदीभाषी प्रदेशों में ही हिंदी को मान–सम्मान दिला पायें तो बहुत बड़ी बात होगी | हिंदी की वकालत का काम महात्मा गाँधी , डॉक्टर आंबेडकर, काका कालेलकर, और चक्रवर्ती राज गोपालाचारी जैसे गैर हिंदीभाषियों ने किया था | यह उन्ही को शोभा देता है |
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सितम्बर 9, 2015

सरकारी स्कूल और इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला : योनेग्द्र यादव

Yogendra Yadavइलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के दो दिन बाद मेरे पास इमेल से एक अनजाने व्यक्ति की चिठ्ठी आयी. लिखनेवाली महिला कभी उत्तर प्रदेश सरकार में काम कर चुकी थीं, आजकल विदेश में हैं.

चिठ्ठी बड़ी ईमानदारी और शालीनता से लिखी गयी थी. चिठ्ठी में उन्होंने पूछा कि हमने और स्वराज अभियान से जुड़े साथियों ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के उस फैसले का स्वागत क्यों किया, जिसमें सभी सांसदों, विधायकों, सरकारी अफसरों सहित सभी सरकारी कर्मचारियों को हिदायत दी है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं? उनका तर्क सीधा था- मैंने ईमानदारी से नौकरी की, कोई भष्टाचार नहीं किया, तो नेताओं और भ्रष्ट अफसरों की करतूतों की सजा मेरे बच्चों को क्यों मिले? अगर मैं ईमानदार रहते हुए अपने बच्चों को बेहतर अवसर दिला सकती हूं, तो मुझे क्यों रोक जाये? क्या यही आपका न्याय है? आप इसको स्वराज कहते हैं?

उनके सवाल तीखे थे, लेकिन अनर्गल नहीं. सवालों ने मेरा अपना अपराध बोध जगाया. मेरी पत्नी और मैंने अपने पहले बच्चे को पड़ोस के सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाने की ठानी थी. शुभचिंतकों ने समझाया कि बच्ची को बस्तियों और झुग्गियों के ‘ऐसे-वैसे’ बच्चों के साथ बैठना पड़ेगा. लेकिन हम तो वही चाहते थे. बताया गया कि स्कूल में सुविधाएं कम होंगी, बच्ची की अंगरेजी कमजोर रहेगी. हमने सोचा कि वो कमी हम घर पर पूरी करवा देंगे.

जब मन बना कर राजकीय सर्वोदय विद्यालय पहुंचे (दिल्ली में सर्वोदय विद्यालय आम सरकारी स्कूलों में बेहतर माने जाते हैं), तो प्रिंसिपल साहब हैरान हुए. फिर खुशी-खुशी हमें अपनी सबसे अच्छी कक्षा दिखाने ले गये. उस ‘आदर्श’ कक्षा में गुरुजी बच्चों को समाज विज्ञान के सवालों के जवाब लिखवा रहे थे.

पूछने पर पता लगा कि कक्षा में अध्याय पढ़ाये नहीं जाते, सिर्फ सवाल-जवाब लिखवाये जाते हैं. एक ही कमरे में आधे बच्चे हिंदी में प्रश्नोत्तर लिख रहे थे, आधे अंगरेजी में. प्रिंसिपल साहब को धन्यवाद कर हम जल्द रवाना हुए. उसके बाद बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने की हिम्मत नहीं हुई. चिठ्ठी लिखनेवाली महिला यह भी पूछ सकती थीं कि अगर खुद नहीं कर पाये, तो दूसरों को सजा क्यों देते हो?

इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के बारे में चल रही बहस में यही दिक्कत है. हर कोई इसे सजा की तरह देख रहा है. जनता खुश है कि उनसे बदतमीजी करनेवाले नेताओं और अफसरों की किसी ने तो नकेल खींची. सरकारी कर्मचारी परेशान हैं कि उन्हें किसी और के किये की सजा मिल रही है. हर कोई मान कर चलता है कि बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना एक सजा है.

देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों के पास साधारण प्राइवेट स्कूलों से बेहतर बिल्डिंग है, ज्यादा जमीन है, ज्यादा डिग्रीवाले और बेहतर वेतन पानेवाले अध्यापक हैं. फिर भी कोई भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता. इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला इस विसंगति को ठीक करने का तरीका है, सरकारी कर्मचारियों से बदला लेने का प्रयास नहीं है.

यह विसंगति पूरे देश में दिखायी देती है. सरकारें शिक्षा पर बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं, नये स्कूल खुलते हैं, बिल्डिंग बनती है. लगभग सभी बच्चे आज स्कूल जा भी रहे हैं.

लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा नहीं है. प्रथम संस्था के असर सर्वेक्षण के 2014 के आंकड़े उत्तर प्रदेश में शिक्षा की बदहाली की तस्वीर पेश करते हैं. उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले अधिकतर बच्चे न भाषा जानते हैं, न गणित. पांचवीं कक्षा के सिर्फ 27 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरी कक्षा की हिंदी की किताब ठीक से पढ़ सकते हैं. पांचवीं के सिर्फ 12 प्रतिशत बच्चे भाग हल कर सकते हैं. तीसरी के महज 7 प्रतिशत बच्चे हासिल से घटाना जानते हैं. सात साल पहले की तुलना में हर आंकड़े में गिरावट आयी है. अन्य राज्यों की स्थिति बहुत अलग नहीं है.

जाहिर है, अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की ओर जा रहे हैं. 2006 में ग्रामीण उत्तर प्रदेश के 30 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे, लेकिन 2014 तक यह संख्या 52 प्रतिशत हो गयी थी. गांव में भी जिसे सामर्थ्य है, वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजता है. गांव के सरपंच का बच्चा गांव के सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता. सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजते हैं.

अफसरों और नेताओं के बच्चे तो ऊंचे दर्जे वाले महंगे प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ते हैं. कुल मिला कर सरकारी स्कूली शिक्षा के तमाम कर्ता-धर्ता लोगों का उन स्कूलों से कोई निजी वास्ता नहीं हैं. स्कूल अच्छे हों या खराब, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहते हैं, जिसके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर परायी.

ऐसे में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला एक ऐतिहासिक फैसला है. यह फैसला िसर्फ एक फैसला भर नहीं, बल्कि यह हमारी सरकारी स्कूली व्यवस्था को बचाने का एक नायाब मौका भी है. जरा कल्पना कीजिये, अगर डीएम साहब की बिटिया खुद सरकारी स्कूल में पढ़ेगी, तो क्या उसमें साफ शौचालय नहीं होगा, महीनों तक विज्ञान के अध्यापक का पद खाली पड़ा रहेगा?

यह फैसला न तो सजा है और न ही कोई सरकारी योजना. यह देश को एक इशारा है, सरकार को एक चेतावनी है. यह फैसला हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में सरकारी स्कूलों की सही शिनाख्त करता है. इस कमजोरी की जड़ में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को चिन्हित करना भी एकदम सही है.

यह फैसला देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे गुनहगारों की ओर उंगली उठाने का साहस करता है. इस फैसले पर बहस करना हमें देश में गैर-बराबरी के नंगे सच से रूबरू होने को मजबूर करता है. इस फैसले पर जितना जल्दी अमल होगा, हमारे देश की कमजोर शिक्षा व्यवस्था के लए उतना ही अच्छा होगा|

(योगेन्द्र यादव)

जुलाई 15, 2015

जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं| बेहतर होता, सरकार बताती कि किस तारीख तक जाति की गिनती को कागज पर अंतिम रूप दे दिया जायेगा, जातिवार आंकड़े सार्वजनिक कर दिये जायेंगे| पर जाति संबंधी आंकड़े जारी न करने को लेकर सरकार की दलील सुनने पर सरकार की नीयत पर शक होता है|

जब जेटली कहते हैं कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी की जानकारी जुटाना है, तो साफ है कि सरकार गोली देने की कोशिश कर रही है| हकीकत यह है कि कांग्रेस या बीजेपी, किसी भी सरकार की मंशा नहीं थी कि जातिवार जनगणना हो| दोनों सरकारों ने इसे रोकने, टालने और मोड़ने की कोशिशें कीं| खैर कहिए कि संसद में बहस हो गयी और सरकार को जातिवार जनगणना की बात सिद्धांत रूप में स्वीकारनी पड़ी| फिर इसे उलझाने के षड्यंत्र रचे गये| जाति की गणना संग सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी नत्थी कर दिया| अब कहा जा रहा है कि असली बात तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की ही थी, जाति की गणना नहीं|

जब रामविलास पासवान जाति गणना को गोपनीय रखने के तर्क देने लगते हैं, तो सरकार की नीयत पर शक और पुष्ट होने लगता है| व्यक्तिगत आंकड़े गोपनीय होते हैं, आप नहीं पूछ सकते कि फलां व्यक्ति ने अपनी जाति क्या बतायी है! पर जाति विषयक कुल तालिकाओं का जोड़-जमा सार्वजनिक करना जरूरी है| यह सब जानते-बूझते जब पासवान जी कहते हैं कि जातियों की गणना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो जान पड़ता है कि सरकार ने इस आंकड़े को दबाने की ठान ली है|

जातिवार जनगणना के आंकड़े से सरकार डरती है, बड़े राजनीतिक दल डरते हैं, और डरते हैं सामाजिक न्याय के वे पक्षधर जो जाति की तहों के भीतर झांकने से कतराते हैं| सबके डर की अपनी-अपनी वजहें हैं|

जाति के आंकड़ों से कांग्रेस-बीजेपी और पूरा राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान डरता है. उन्हें डर है कि जाति का जिन्न बोतल से बाहर आ जायेगा| पिछड़ी जातियों की संख्या सार्वजनिक हो जायेगी और लोगों को आधिकारिक रूप से पता चल जायेगा कि जिस जाति समुदाय की संख्या इस देश में सबसे ज्यादा है, वह शिक्षा और नौकरियों के अवसर के मामले में कितना पीछे है|

उन्हें डर यह है कि जाति और नौकरी के संबंध पर से परदा उठ जायेगा| राजनीति, अफसरशाही और अर्थव्यवस्था पर अगड़ी जाति के वर्चस्व का राज खुल जायेगा| वैसे इसमें कुछ छुपा नहीं है, पर जाति के आंकड़ों के सामने आते ही इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो जायेगी| मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद से मोटा-मोटी जानते तो सब ही हैं कि इस देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल लोगों की संख्या 45 से 50 फीसदी और सवर्ण जाति के लोगों की संख्या 16-20 फीसदी के आस-पास है, पर जाति की आधिकारिक गणना के सार्वजनिक होने से शिक्षा और नौकरियों में संख्या के हिसाब से भागीदारी का सवाल भी पुरजोर तरीके से उठेगा| बराबरी के इसी सवाल को बड़ी पार्टियां और सरकार कभी खुल कर सामने नहीं आने देना चाहते|

जाति के आंकड़ों से मंडल और सामाजिक न्याय के पक्षधरों में भी बेचैनी हो सकती है| उन्हें डर है, सर्वेक्षण कहीं यह न दिखा दे कि जाति सामाजिक अन्याय का एक महत्वपूर्ण कारक तो है, पर एकमात्र कारक नहीं|

ओबीसी में आनेवाली जातियों के बीच शिक्षा और नौकरियों में अवसर के लिहाज से चंद जातियों के वर्चस्व की बात जाति जनगणना के आंकड़ों से आधिकारिक रूप से उजागर हो सकती है| यह भी सामने आ सकता है कि एक ही जाति के बीच वर्ग और लिंग-भेद भी अवसरों की असमानता का बहुत बड़ा कारक है| इन बातों के उजागर होने पर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुराने र्ढे पर चलाना मुश्किल होगा|

जातिवार आंकड़े को सार्वजनिक करना जातिवाद नहीं है, यह जाति के भूत को वश में करने का तरीका है| आरक्षण पर रुक गयी बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का यह एक जरूरी अवसर भी है, बशर्ते हम जाति के भूत से आंखें खोल कर सामना करने को तैयार हों|

(योगेन्द्र यादव – प्रभात खबर में)

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