Archive for ‘व्यक्ति’

सितम्बर 17, 2016

एक अभिनेता की डायरी का पन्ना

तकरीबन  19 बरस की उम्र रही होगी जब मेरी शादी 17 बरस की मेहरुन्निमा के संग हुयी| आजादी के पूर्व के भारत में बड़े होते हुए मैं ब्रितानी संस्कृति से बहुत प्रभावित हो चला था| मैंने बढ़िया तरीके से अंग्रेजी बोलने में पारंगत हासिल कर ली थी, मैंने अंग्रेजी स्टाइल में नफीस सूट पहनने का शौक पाल लिया था, मैंने अंग्रेजों के आकर्षक तौर-तरीके कायदे से समझ कर जीवन में उतार लिए थे| लेकिन मेहरुन्निमा मुझसे एकदम उलट थी – वह एक बिल्कुल घरेलू किस्म की महिला थी| मेरी तमाम सलाहें और चेतावनियाँ उस पर बेअसर रहीं और उसकी मूलभूत प्रकृति में कोई सुधार न आया| वह एक आज्ञाकारी पत्नी थी, बच्चों से स्नेह करने वाली एक बहुत अच्छी माँ थी, और कुल मिलाकर कुशल गृहणी थी| लेकिन मैं तो ऐसी पत्नी नहीं चाहता था|

जितना ही मैं उसे बदलने का प्रयास करता उतनी ही दूरी हम दोनों के मध्य बढ़ती जाती| धीरे धीरे एक खुशनुमा लड़की से वह आत्मविश्वास से रहित खामोश स्त्री में परिवर्तित हो गई| इस बीच मैं अपने साथ काम करने वाली एक अभिनेत्री के प्रति आकर्षित हो गया| वह बिल्कुल वैसी थी जैसी स्त्री को मैं अपनी पत्नी के रूप में देखना चाहता था| विवाह के दस साल बाद मैंने मेहरुन्निमा को तलाक दे दिया और उसे, अपने बच्चों और अपने घर को छोड़कर मैंने अपनी अभिनेत्री साथी के संग शादी कर ली| मेहरुन्निमा और अपने बच्चों की आर्थिक सुरक्षा का इंतजाम मैंने कर दिया था|

6-7 महीनों तक सब सही चला| उसके बाद मुझे एहसास होने लगा कि मेरी दूसरी पत्नी में न तो देखभाल कर सकने की क्षमता थी न ही उसे अपने से इतर किसी से स्नेह था| उसे केवल अपनी खूबसूरती, महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों से मतलब था| कभी कभी मुझे मेहरुन्निमा के लगाव भरे स्पर्श और सदा मेरी और बच्चों की भलाई के लिए उसका प्रयासरत रहना याद आता था| 

जीवन आगे बढ़ता गया| मैं और मेरी दूसरी पत्नी एक मकान में रह रहे थे जहां न जीवंत इंसानों का कोई वजूद था और न ही घर होने का कोई लक्षण| मैंने जीवन में पीछे मुड कर देखा भी नहीं कि मेहरुन्निमा और बच्चे किस हाल में रह रहे थे?


दूसरे विवाह के तकरीबन 6-7 सालों के बाद अचानक एक दिन मैंने एक लेख पढ़ा जो किसी जो कि एक प्रसिद्धि पाती हुयी महिला शैफ के बारे में था, जिसने हाल ही में अपनी व्यंजन विधियों पर किताब लिखी थी| जैसे ही मेरी निगाह, आकर्षक, खूबसूरत, आत्मा विश्वास से लबरेज और गरिमामयी दिखाई देती लेखिका के  फोटो पर पड़ी, मैं स्तब्ध रह गया| मुझे बहुत बड़ा झटका लगा| यह तो मेहरुन्निमा थी! लेकिन यह प्रसिद्द शैफ कैसे मेहरुन्निमा हो सकती थी?

बहरहाल उसके बारे में पता लगाने से मुझे मालूम हुआ कि उसने न केवल दुबारा विवाह कर लिया था बल्कि अपना नाम भी बदल लिया था|

मैं उस वक्त विदेश में फिल्म की शूटिंग में व्यस्त था| मेहरुन्निमा अमेरिका में रहने लगी थी| मैंने अमेरिका जाने के लिए फ्लाईट पकड़ी और मेहरुन्निमा के निवास स्थान आदि का विवरण जुटाकर उससे मिलने उसके घर पहुँच गया| मेहरुन्निमा ने मुझसे मिलने से इंकार कर दिया| मेरे बच्चों, मेरी बेटी 14 साल की हो चुकी थी, और बेटा 12 का, ने मेहरुन्निमा से कहा कि वे एक अंतिम बार मुझसे मिलना और बात करना चाहते हैं|मेहरुन्निमा का वर्त्तमान पति उनकी बगल में बैठा था, वही अब मेरे बच्चों का कानूनी रूप से पिता था|

आज तक भी मैं वह सब नहीं भुला पाता जो मेरे बच्चों ने मुझसे कहा!


उन्होंने कहा – कि उनके नये पिता को सच्चे प्रेम का अर्थ पता है| उसने मेहरुन्निमा को उसके प्राकृतिक रूप में स्वीकार किया और कभी भी उसे अपने जैसा या उसके मूल स्वभाव से अलग स्वभाव का इंसान बनाने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि उसने स्वंय से ज्यादा मेहरुन्निमा से प्रेम किया|  उसने मेहरुन्निमा को सहजता से और उसके अपने तरीके से उसकी अपनी गति से निखरने, खिलने और संवरने का भरपूर मौक़ा दिया और कभी भी उस पर अपनी इच्छा नहीं लादी| उसने मेहरुन्निमा को बिल्कुल उसी रूप में स्वीकार किया और उसे सम्मान दिया जैसी की वह थी| अपने दूसरे पति के निश्छल प्रेम, स्वीकार और बढ़ावा देने से मेहरुन्निमा एक गरीमामयी, स्नेहमयी और भरपूर आत्मविश्वास से भरी हुयी स्त्री के रूप में खिल गई थी|


जबकि मेरे साथ रहने के दौर में मेरे दवारा उस पर अपनी इच्छाएं लादने से, उसके प्राकृतिक स्वभाव और विकास पर हमेशा उंगली उठाने से और मेरी स्वहित देखने की प्रवृत्ति के कारण वह बुझ गई थी और इस सबके बावजूद भी मैंने ही उसे छोड़ दिया था|
शायद मैंने उसे कभी प्रेम किया ही नहीं, मैं तो स्वयं से ही प्रेम करता रहा|

अपने ही प्रेम में घिरे लोग दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर पाते!


(अभिनय से जीवन जीता एक अभिनेता) 

अगस्त 30, 2016

‘प. नेहरु’ का पत्र ‘डा. राम मनोहर लोहिया’ के नाम

NehruLohiaसमाजवादी चिन्तक और राजनेता डा. राम मनोहर लोहिया, ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाए भारत में, इसके प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु के घनघोर राजनीतिक आलोचक रहे| परन्तु ब्रिटिश राज से आजादी से पूर्व दोनों बड़े नेताओं के मध्य कैसे संबंध थे यह डा. लोहिया को लिखे प. नेहरु के व्यक्तिगत पत्र से पता लगता है|

Nehru2Lohia

फ़रवरी 24, 2016

महात्मा गांधी एवं परमहंस योगानंद

 

दिसम्बर 8, 2015

विद्रोही : जेएनयू की चेतना के जनकवि का अंततः चले जाना

जेएनयू के नाम के साथ एकाकार हो चुके जनकवि रमा शंकर यादव ‘विद्रोही’ की मृत्यु, चेतना की उस परम्परा की मौत है, जो संभवतः अब कभी जेएनयू  या किसी अन्य भारतीय विश्वविद्यालय में कभी देखने को न मिले|

दशकों जेएनयू के कैम्पस में जंगल और चट्टानों पर बसेरा करने वाले विद्रोही को जग संभवतः पागल या अर्द्ध पागल तो कहेगा पर जेएनयू में उनसे पहले और उनके बाद प्रवेश पाने वाला हर जीवित व्यक्ति, दुनिया में कहीं भी बैठा हो, उनकी मृत्यु की खबर पढ़ आँखों में नमी भी महसूस करेगा| जिन प्रशासकों ने उन्हें जेएनयू कैम्पस से बाहर निकाला होगा, उन्हें भी आज कुछ छूटता महसूस हुआ होगा| छात्रों के हर आंदोलन में उनके साथ खड़े विद्रोही की कवितायेँ जेएनयू के चप्पे चप्पे पर बरसों, दशकों तक गूंजती रहेंगी और कैम्पस से बाहर की बाकी दुनिया में भी कहीं न कहीं किसी न किसी के माध्यम से जीवित रहेंगीं, पुनर्जीवित हो होकर! निराला जीवन तो था ही इस जनकवि का|

Vidrohi

(रमा शंकर यादव ‘ विद्रोही )

सितम्बर 10, 2015

प्रसिद्द लेखक एवं विचारक निर्मल वर्मा पर बनी डॉक्यूमेंटरी

सुप्रसिद्ध विचारक एवं हिंदी के लेखक दिवंगत निर्मल वर्मा पर बनी डॉक्यूमेंटरी  को नीचे दिए वीडियोज के माध्यम से देखने का आनंद उठायें| वरिष्ठ कवि मंगरेश डबराल ने निर्मल वर्मा से बात की है और इसे निर्देशित किया है प्रवीण अरोड़ा ने

 

 

जुलाई 31, 2015

डा. अब्दुल कलाम : अंतिम छह घंटे

Kalaamमैं किसलिए याद किया जाऊँगा… महान कलाम सर के जीवन के अंतिम दिन उनके साथ बिताएं घंटों की स्मृतियों के कारण…
उनसे अंतिम बार बात करे हुए 8 घंटे हो चुके हैं और नींद मुझसे कोसों दूर है, यादों की बाढ़ सी आती जाती है, जब तब आंसुओं के सैलाब के साथ| उनके साथ मेरा अंतिम दिन – 27th July, को दोपहर 12 बजे शुरू हुआ, जब मैं उनके साथ गुवाहटी जाने के लिए हवाई जहाज में बैठा| ड़ा. कलाम की सीट थी, 1A पर और मैं बैठा था IC पर| उन्होंने गहरे रंग का ‘कलाम सूट’ पहना था और मैंने उनके सूट की प्रशंसा की,’बहुत अच्छा रंग है सर!’  तब मुझे कहाँ पता था कि इस रंग के सूट को उनके जीवित शरीर पर मैं अंतिम बार देख रहा था|

बरसात के मध्य 2.5 घंटे लंबे फ्लाईट| मुझे ऊपर आकाश में उड़ते हवाई जहाज के झटके खाने से नफरत है जबकि वे ऐसी अवस्था में अविचलित बैठे रहते| जब भी वे मुझे झटके के कारण भयभीत देखते वे खिड़की ढक देते और मुझसे कहते,’ अब भय की कोई बात दिखाई नहीं देती!’
हवाई  यात्रा के बाद 2.5 घंटे कार से यात्रा करके हम दोनों IIM शिलांग पहुंचे| पिछले पांच घंटों के सफर के दौरान हमने ढेर सारी बातें कीं, बहस की, जैसे कि हम पिछले छह सालों में हवाई यात्राओं या सड़क यातारों के दौरान करते रहे हैं|

पिछली हर बातचीत की तरह इस बार की बातचीत भी विशेष थी| विशेषतया तीन ऐसे मुददे हैं जो उनसे इस अंतिम मुलाक़ात की स्मृतियों के सबसे यादगार मुददे रहेंगें|
पहले तो डा. कलाम पंजाब में हाल में हुए आतंकवादी हमले से बेहद चिंतित थे| निर्दोषों की हत्याओं ने उन्हें अंदर तक व्यथित कर दिया था| IIM शिलांग में उनके लेक्चर का विषय ही था – पृथ्वी को रहने के लिए और बेहतर बनाया जाए| उन्होंने पंजाब में आतंकवादी घटना को अपने लेक्चर के विषय से जोड़ा और कहा,’ ऐसा प्रतीत होता है कि मानव रचित ताकतें धरती पर जीवन के लिए उतनी ही विनाशकारी हैं जैसे कि प्रदुषण|’

हम दोनों ने इस विषय पर बात की कि अगर हिंसा, प्रदुषण और मानव की बेतुकी और हानिकारक गतिविधियां आदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो मनुष्य को धरती को छोड़ना पड़ेगा|

‘तीस साल शायद…, अगर ऐसे ही सब कुछ चलता रहा|आप लोगों को इस सन्दर्भ में कुछ करना चाहिए … यह आप लोगों के भविष्य के संसार का मामला है|’

हमारी बातचीत का दूसरा मुद्दा राष्ट्रीय महत्त्व का था| ड़ा. कलाम, चिंतित थे कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था, संसद की कार्यवाही बार बार ठप्प हो जाती है| उन्होंने कहा,’ मैंने अपने कार्यकाल में दो भिन्न सरकारों को देखा| उसके बाद मैं कई और सरकारों को देख चुका हूँ| हरेक सरकार के काल में संसद की गतिविधियां बाधित होती रही हैं| यह उचित नहीं है| मुझे वास्तव में कोई ऐसा रास्ता खोजना चाहिए जिससे संसद की कार्यवाही बिना बाधा के सुचारू रूप से विकास के मॉडल पर चलाई जा सके|’

उसी समय उन्होंने मुझसे एक प्रश्न तैयार करने के लिए कहा जिसे वे अपने लेक्चर के अंत में IIM शिलांग के विधार्थियों से पूछना चाहते थे एक सरप्राइज असाइनमेंट के तौर पर| वे चाहते थे कि युवा विधार्थी ऐसे मौलिक रास्ते सुझाएँ जिससे संसद की कार्यवाही को ज्यादा गतिमय और उत्पादक बनाया जा सके| लेकिन कुछ क्षण बाद उन्होंने कहा,’ लेकिन मैं कैसे उनसे समस्या का हल पूछ सकता हूँ जबकि मेरे पास ही इस विकराल समस्या का कोई हल नहीं है?’ अगले एक घंटे तक हमने इस मुददे पर कई संभावित विकल्पों पर विचार किया, हमने सोचा अकी हम इन विकल्पों को अपनी आने वाली पुस्तक  – Advantage India, का हिस्सा बनायेंगें

तीसरा मुद्दा उनके सरल और मानवीय स्वभाव की खूबसूरती से मेरे सामने उपजा| हम लोग 6-7 कारों के काफिले में थे| ड़ा. कलाम और मैं दूसरी कार में थे और हमसे आगे एक खुली जिप्सी में सैनिक सवार थे| जिप्सी में दोनों और दो दो जवान बैठे थे और एक लंबा – पतला जवान खड़ा होकर अपनी बन्दुक संभाले इधर उधर निगरानी में व्यस्त था| सड़क यात्रा के एक घंटे के सफर के बाद डा. कलाम ने कहा,’ सैनिक ऐसे क्यों खड़ा है? वह थक जायेगा| यह तो सजा है उसके लिए| क्या आप वायरलेस से सन्देश भेज सकते हैं कि वह बैठ जाए|’

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि सैनिक को बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के लिए ऐसे ही खड़ा होकर चलने के निर्देश दिए गये होंगे| पर वे नहीं माने| हमने रेडियो सन्देश भेजने का प्रयास किया लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया| यात्रा के अगले  1.5 में तीन बार डा. कलाम ने मुझे सैनिक को किसी तरह से सन्देश भेज कर उसे बैठ जाने के लिए कहा| उन्होंने कहा कि हाथ से सन्देश भेज कर देखो शायद उनमें से कोई देख ले| जब उन्हें लगा कि कुछ नहीं हो पायेगा तो उन्होंने मुझसे कहा,’ मैं सैनिक से मिलना चाहता हूँ उसे धन्यवाद देने के लिए|’ जब हम IIM  शिलांग के परिसर में पहुंचे तो मैं सिक्योरिटी के लोगों के पास गया उस सैनिक के बारे में पूछताछ करने| मैं उस सैनिक को अंदर डा. कलाम के पास ले गया| डा कलाम ने उस सैनिक का अभिवादन किया और उससे हाथ मिला कर कहा,’ भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया| क्या आप थके हैं? आप कुछ खायेंगें? मुझे बड़ा खेद है कि मेरे कारण आपको इतनी देर तक खड़े रहना पड़ा|’

काली पोशाक में सजा हुआ युवा सैनिक उनके ऐसे मृदुल व्यवहार से आश्चर्यचकित था| उसके मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे| मुश्किल से उसने कहा,’ सर आपके लिए तो छह घंटे भी खड़े रहेंगें|’

इसके बाद डा. कलाम लेक्चर हॉल में चले गये| वे लेक्चर के लिए विलम्ब से नहीं पहुंचना चाहते थे| वे हमेशा कहते थे,’ विधार्थियों को कभी इंतजार नहीं कराना चाहिए|’
मैंने जल्दी से उनका माइक सेट किया, उनके लेक्चर के बारे में संक्षिप्त सा विवरण दिया और कम्प्यूटर के सामने मुस्तैदी से बैठ गया| मैंने जैसे ही उनका माइक कनेक्ट किया उन्होंने मुस्करा कर मुझसे कहा,’ फनी गाय, आर यू डूइंग वेळ?’ ‘फनी गाय’ जब भी डा. कलाम ऐसा कहते थे तब इसके कई अर्थ हो सकते थे और उनके स्वर के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि उनका क्या तात्पर्य था मुझे ऐसे संबोधित करने के लिए| इसका अर्थ कुछ भी सकता था, मसलन- तुमने अच्छा काम किया, या कि तुमने सब गडबड कर दिया, और तुम्हे उन्हें ढंग से सुनना चाहिए, या कि तुम बेहद भोले हो, या वे खुद मजाक के मूड में हों तो ऐसा कहते थे| पिछले छह सालों में मैं उनके ‘फनी गाय’ के सम्बोधन का सही अर्थ जानने में प्रवीण हो गया था| इस बार वे मुझसे मजाक करने के मूड में थे|

उन्होंने कहा,’ फनी गाय! आर यू डूइंग वेळ?’ मैं उनकी तरफ मुस्करा दिया| यही वे अंतिम शब्द थे जो उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहे| उनके पीछे बैठ कर  मैं उनका भाषण सुन रहा था| दो मिनट के आसपास ही भाषण में एक वाक्य बोलकर उन्होंने एक लम्बी चुप्पी साध ली, मैंने उनकी ओर देखा और वे मंच पर गिर गये|

हमने उन्हें उठाया| डाक्टर्स जब तक आटे हम्नसे सब कुछ किया जो हम कर सकते थे| मैं जीवन भर उनकी दो-तिहाई बंद आँखों के भाव नहीं भूल पाउँगा| मैंने एक हाथ में उनका सिर थामा और उन्हें रिवाइव करने के सब प्रयत्न किये जो मैं कर सकता था| उनकी मुट्ठियाँ कास गयीं और मेरे हाथों से लिपट गयीं| उनके चेहरे पर शान्ति थी उनकी बुद्धिमान आँखें स्थिर होकर भी बुद्धिमत्ता बरसा रही थीं| उन्होंने एक शब्द नहीं कहा| किसी दर्द का कोई चिह्न तक उनके चेहरे पर नहीं उभरा|

पांच मिनटों के अंदर हम पस के अस्पताल में थे| अगले कुछ मिनटों में डाक्टर्स ने सूचित कर दिया कि भारत के ‘मिसाइल मैन’ के प्राण पखेरू उड़ चुके थे| मैंने उनके चरण स्पर्श किये…अंतिम बार| अलविदा मेरे बुजुर्ग मित्र! विशाल दार्शनिक गुरु! अब केवल विचारों में ही भेंट हो पायेगी और मिलना अगले जन्म में होगा|
लौटते समय यादों का पिटारा खुल गया| बहुत बार वे मुझसे पूछते थे,’ तुम युवा हो, निर्णय करो कि तुम किस रूप में याद किये जाना पसंद करोगे?’ मैं किसी शानदार उत्तर के बारे में सोचा अकर्ता और एक बार ठाकर मैं जैसे को तैसा का सिद्धांत अपनाते हुए उन्ही से पूछ डाला,’पहले आप बताइये, आप अपने को किस रूप में याद किये जाना पसंद करेंगे? राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, India 2020, Target 3 billion…. या कुछ और?’  मुझे लगा उन्हें कई विकल्प देकर मैंने प्रश्न को उनके लिए अत्यंत सरल बना दिया था| पर उनके उत्तर ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया| उन्होंने कहा,’शिक्षक के रूप में’|

तकरीबन दो सप्ताह पहले जब हम उनके मिसाइल प्रोजेक्ट के समय के मित्रों के बारे में चर्चा आकार रहे थे, उन्होंने कहा,’ बच्चों को उनके माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए| यह दुखद है कि बहुत मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है|’ उन्होंने एक अंतराल लेकर कहा,’ दो बातें हैं| बड़ों को भी करनी चाहियें| मृत्युशैया के लिए वसीयत या संपत्ति का बंटवारा नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे परिवार में झगडे होते हैं| दूसरा, कितना बड़ा वरदान है काम करते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाना, बिना कैसी लम्बी बीमारी से घिरे हुए तब ही चले जाना जब सीधा चल सकता हो व्यक्ति| अलविदा संक्षिप्त होनी चाहिए| वास्तव में बहुत छोटी|’

आज जब मैन पीछे मुड़कर देखता हूँ – उन्होंने अपनी यात्रा – अध्यापन करते हुए सम्पन्न की, वे हमेशा अपने को एक शिक्षक के तौर पर जाने जाना पसंद करते थे| और वे अपने जीवन के अंतिम क्षण तक, सीधे खड़े थे, काम कर रहे थे और लेक्चर दे रहे थे| वे हमें छोड़ गये एक महान शिक्षक की भांति, सबसे ऊँचे कद के साथ खड़े हुए| उन्होंने धरा छोड़ डी, अपने व्यक्तिगत खाते में बिना कोई संपत्ति जमा किये हुए| उनके खाते में जमा है करोड़ों लोगों का प्यार और उनके प्रति  सद्भावनाएं| वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों में बेहद सफल रहे|

मुझे उनके साथ किये गये लंच और डिनर्स की बहुत याद आयेगी| मुझे बहुत खलेगा कि अब वे मुझे अपने दयालू और मृदुल व्यवहार और जिग्यासोँ से आश्चर्यचकित नहीं करेंगे, मुझे कमी महसूस होगी जीवन की उन शिक्षाओं की जो कि वे शब्दों और अपने कर्मों से मुझे समझाते थे| मुझे उनके साथ फ्लाईट पकड़ने के जद्दोजहद, उनके साथ की गई यात्राएं, उनके साथ की गयी लम्बी चर्चाएं बहुत याद आयेंगीं|

आपने मुझे सपने देखना सिखाया| आपने सिखाया कि असंभव से प्रतीत होते स्वप्नों के अलावा सब कुछ योग्यताओं के साथ समझौते हैं|

डा. कलाम चले गए हैं, उनके लक्ष्य जीवित हैं| कलाम अमर हैं|

आपका अनुगृहित विधार्थी,

समर पाल सिंह

 

जुलाई 6, 2015

विफलता : (लोकनायक जयप्रकाश नारायण)

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

जयप्रकाश नारायण

(अगस्त 1975, चण्डीगढ़ जेल में)

 

नवम्बर 24, 2014

महात्मा गांधी और वसुधैव कुटुम्बकम : इटेलियन स्टाइल

धार्मिक प्रतीकों से अलग हटें तो पूरी दुनिया में जिस भारतीय का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है और जिस एक भारतीय को पूरी दुनिया सम्मान देती है, और अपनी नै पीढ़ी को जिसके बारे मने लगातार जाग्रत बनाए रखती है उस शख्सियत का नाम गांधी है|

इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य को, कि भारत में ऐसे वर्ग भी हैं जो गांधी से घृणा तक करते रहे हैं,  नजरअंदाज करें तो हर उस भारतीय के लिए जिसे गांधी में थोड़ी सी भी दिलचस्पी है, इटेलियन विज्ञापन एक सुखद एहसास लेकर आता है|

नवम्बर 21, 2014

विलक्षण बाल-गायिका और ‘कुमार विश्वास’

१९ नवंबर को किसी ने कविता के मंच के प्रसिद्द हस्ताक्षर और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास को नीचे दिये वीडियो का लिंक भेजा |

 

बालिका की विलक्षण गायन प्रतिभा से कोई संगीत प्रेमी प्रभावित न हो ऐसा संभव ही नहीं है| हर संगीत प्रेमी को लगेगा कि यह बालिका सही प्रशिक्षण पाकर संगीत की ऊँचाइयों को प्राप्त करेगी पर ऐसा होना सबके साथ संभव नहीं होता| कुमार विश्वास भी बालिका के गायन से प्रभावित हुए पर जब पता चला कि इस बालिका का परिवार संभवतः आर्थिक रूप से समर्थ नहीं है तो बहुतों की तरह उन्हें भी भय लगा कि इस अनूठी बाल-गायिका का संगीत कहीं गरीबी के कारण दम न तोड़ दे| तब उन्होंने नीचे दिया सन्देश लिखा|

“कुछ ऐसे फूल हैं जिन्हे मिला नहीं माहौल ,
महक रहे हैं मगर जंगलों में रहते हैं…..!”
किसी ने ये विडिओ भेजा है ! उनके अनुसार विडिओ में दिख रही बच्ची घरेलु सहायक का काम करती है ! दस बार सुन चुका हूँ और आखँ की कोर हर बार भीग रही है ! आप में से कोई अगर इस बेटी का अता-पता निकाल सके तो बड़ी कृपा होगी ! माँ सरस्वती साक्षात इस शिशु-कंठ पर विराजमान है ! जीती रहो स्वर-कोकिला ! बस ये मिल जाये तो इसे सर्वोत्तम शिक्षा और साधना का ज़िम्मा मेरा ! ढूँढो दोस्तों अगली सम्भावना को !

 

सन्देश ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सअप के माध्यमों से लाखों लोगों तक पहुंचा| और बालिका की खोज सम्पन्न हुयी| कुमार विश्वास अपने वादे के मुताबिक़ बालिका के अच्छे भविष्य के लिए प्रयासरत हैं|

 

आद्य शकराचार्य की आविर्भाव भूमि केरल के एक तटीय गावँ में नन्ही जयलक्ष्मी मिल गयी है ! शाम तक उसके माता-पिता से बात भी हो जाएगी ! सब कुछ ठीक रहा तो कुछ ही दिन में, माँ शारदा की यह नन्ही-बेटी विधिवत संगीत-शिक्षा ग्रहण कर रही होगी ! कोशिश करूँगा कि किसी चैनल में उस पर एक शो भी बनवाऊँ ! आभार कोमल,राजश्री और मनोज का इस खोज को अंजाम तक पहुँचाने के लिए
“हर फूल को हक़ है कि चमन में हो क़ामयाब ,
माली को भी ये फ़र्ज़ मगर याद तो रहे.…।”

 

 

 

नवम्बर 6, 2014

जिंदगी और मौत की जंग के फोटो ने फोटोग्राफर से आत्महत्या करवाई…

FamineSudanसाउथ अफ्रीकन फोटो जर्नलिस्ट Kevin Carter 1993 के मार्च माह में अकाल को कवर करने के सूडान गये थे, जहां यू.एन के फूडिंग कैम्प के बाहर एक दिल चीरने वाला  दृश्य देखकर उन्होंने दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया|

सूडान में अकाल के कारण भूखमरी से कृशकाय हो चुकी एक बालिका जमीन पर घिसट घिसट कर यू.एन के फूडिंग कैम्प की ओर जा रही है और एक गिद्ध उसके पीछे आकर बैठ गया है इस इंतजार एन कि जल्द ही ज़िंदगी बालिका का साथ छोड़ देगी और उसके लिए भोजन का इंतजाम कर देगी|

इस फोटो को 1994 में अप्रैल माह में पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया और यह फोटो दुनिया भर के अखबारों और पत्रिकाओं में छपा और चर्चा का केन्द्र बना|

भूख से कंकाल बन चुकी अभागिन बालिका का क्या हुआ?  क्या वह बच पाई?

27 July 1994 को Kevin Carter  ने आत्महत्या कर ली|

उनकी कहानी 2010 की Canadian-South African फिल्म – The Bang Bang Club में दर्शाई गई है|

Kevin Carter के सुसाइड नोट में लिखा था –

“I’m really, really sorry. The pain of life overrides the joy to the point that joy does not exist… depressed … without phone … money for rent … money for child support … money for debts … money!!! … I am haunted by the vivid memories of killings and corpses and anger and pain … of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, of killer executioners …”

 

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