Archive for ‘लघुकथा’

अगस्त 22, 2015

शुक्रवार का गठबंधन

‘हरामखोर को शुक्रवार की शाम चार बजे के आसपास पकड़ना, उसका कोई खैरख्वाह अदालत न जा पाए| फिर तो अदालत दो दिन के आराम में होंगी, तीन रातें तो हवालात में बिताएगा ही साला, वहाँ भी  खातिर तवाजोह ज़रा कायदे की हो जाए|’ नोटों का बंडल अखबार में लपेट कर देने वाले ने कहा|
हें हें हें …शुक्र का टोटका तो अंग्रेजों के जमाने से अजमाया हुआ नुस्खा है| ऐसा ही होता आया है, ऐसा ही होगा| लेने वाले ने बंडल लेटे हुए ठहाका लगाते हुए कहा|

 

सोमवार की भी फ़िक्र न करो, वहाँ भी टिकने नहीं देंगें| लंबा भेजेंगे अंदर सुसरे को| एक हफ्ता तो मानकर चलो, बेल न होने देंगें| हमें भी एडवांस दे दो आज ही|

जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

दिसम्बर 16, 2014

बच्चे को क्या मालूम … मंटो

kid on gunpoint-001लिबलिबी दबी-पिस्तौल से झुंझलाकर गोली बाहर निकली।खिड़की में से बाहर झाकने वाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।लिबलिबी थोड़ी देर के बाद फिर दबी-दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुंह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में मिलकर बहने लगा।लिबलिबी तीसरी बार दबी-निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज्ब हो गई।चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख भी न सकी और वहीं ढेर हो गई।

पाचवीं और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ न जख्मी। गोलिया चलाने वाला भिन्ना गया। दफ्अतन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया। गोलिया चलाने वाले ने पिस्तौल का मुंह उसकी तरफ मोड़ा। उसके साथी ने कहा: ”यह क्या करते हो?”

गोलिया चलाने वाले ने पूछा: ”क्यों?” ”गोलिया तो खत्म हो चुकी है!”

 

”तुम खामोश रहो.. इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”

 

[मंटो की लघुकथा – बेखबरी का फायदा]

मई 31, 2013

कम्युनिज्म : ‘सआदत हसन मंटो’ की दृष्टि में

वह अपने घर का तमाम जरूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया|
एक ने ट्रक के सामान पर नज़र डालते हुए कहा,” देखो यार, कितने मजे से अकेला इतना सामान उडाये चला जा रहा है|”
सामान के मालिक ने कहा.”जनाब माल मेरा है|”
दो तीन आदमी हँसे,” हम सब जानते हैं|”
एक आदमी चिल्लाया,” लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियां करता है|”

जून 2, 2011

टॉलस्टोय तो नहीं पर बचपन सुझा गया

राइटर्स ब्लॉक ऐसा वायरस है जो रचनाकार के दिमाग को बर्फ की तरह से जड़ बना देता है। उसके दिमाग में विचार आते तो हैं पर वे न जमीन पा पाते हैं विचरने के लिये और न आकाश ही उन्हे मिल पाता है उड़ान भरने के लिये। रचनाकार का दिमाग ऐसा हो जाता है कि उसे विचार सूझते भी हैं तो वह उन्हे विकसित नहीं कर पाता। उसके हाथ नहीं चलते लिख पाने को। उसका दिमाग विचारों को क्रियान्वित न करने की जड़ता को पालने पोसने लगता है। उसे किसी तरह भी अपने ही विचारों पर विश्वास नहीं आ पाता। उसे वे बिल्कुल तुच्छ लगने लगते हैं। वह ऐसी स्थितियों में आ जाता है जहाँ उसे दरकार होने लगती है बाहर से मिल सकने वाले विश्वास की जिससे कि उसका आत्म-विश्वास वापिस आ जाये। पर दूसरों का विश्वास पाने के लिये वह कुछ लिख पाने का साहस नहीं जुटा पाता।

किसी घड़ी किसी स्व:स्फूर्त प्रेरणा से ही राइटर्स ब्लॉक पार्श्व में आ जा पाता है और रचनाकार का दिमाग फिर से ऊर्जा, उत्साह और रचनात्मकता से भर जाता है। क्या चीज, कौन से घटना रचनाकार को प्रेरणा दे जाये इसका कोई भी निश्चित तौर पर अनुमान नहीं लगा सकता।

प्रदीप ने लगी लगाई नौकरी छोड़कर लिखने का प्रयास किया था। फ्री-लांसिग करके नियमित रुप से आमदनी हो जाती थी और बाकी बचे वक्त्त में वह अपनी रचनात्मक कल्पनाशीलता को कागज पर उड़ेलता रहता। लेखन प्रतिभा उसके पास थी। वह जल्दी ही स्थापित भी हो गया। सब ठीक चल रहा था कि लगभग तीन महीने पहले जैसे उसका दिमाग असहयोग आंदोलन करने लग गया। वह छटपटाया, बहुत हाथ-पैर मारे, ढ़ेरों जतन किये पर दिमाग की गंगोत्री से रचनात्मक गंगा नहीं बही।

अपने मनपसंद लेखकों की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकें कई बार पढ़ डालीं, दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों की श्रेष्ठतम पुस्तकों के साथ दिन, शाम और रातें बितायीं पर कुछ भी सोयी हुयी लेखन क्षमता को जगा नहीं पाया। दिन में बाजारों में जाकर आवारागर्दी भी की पर कुछ भी प्रेरित न कर पाया।

कई बार शरीर शिथिल पड़ जाता और उसके सारे अस्तित्व में एक गहन उदासी छा जाती। ऐसा लगने लगता जैसे गहरे अवसाद का मरीज बनता जा रहा है। बहुत प्रयास करता तो कुंठा घर कर लेती।

उसका चिड़चिड़ापन उसकी पत्नी और पांच साल के आसपास के वय की बेटी पर भी गाहे-बेगाहे पड़ने लगता, हालाँकि वह भरकस कोशिश करता कि उसकी मानसिक परेशानियों का शिकार उसका परिवार न बने पर कई बार बाजी उसके हाथ से निकल जाती।

उसके फ्री-लांसिंग के कार्य पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा था। वह तो उसकी पत्नी भी नौकरी करती थी सो आर्थिक परेशानियाँ घनघोर रुप धारण न कर पाती थीं परंतु लेखक केवल धन के लिये ही तो लिखता नहीं। जैसे और लोगों को जीवन जीने के लिये धन चाहिये ऐसे ही लेखक को भी चाहिये परंतु लेखन कोई नौकरी तो है नहीं कि जब चाहे छोड़ दी। लेखन अगर ऐसे सस्ते में छूट जाता तो लोग लेखक बनने का कष्ट ही क्यों करते? न लिखें तो शांति से जियें कैसे लेखक? लेखन तो अवश्यम्भावी किस्म की प्रवृत्ति बन जाता है लेखकों के लिये।

उस दिन भी सवेरे से ही प्रदीप लिखने का प्रयास कर रहा था। पत्नी नौकरी पर चली गयी बेटी स्कूल चली गयी, दोपहर को वापिस भी आ गयी, खाना खाकर सो भी गयी, पर किसी भी तरह के एकांत में भी प्रदीप से मन को पसंद आने वाली एक भी पंक्ति न लिखी गयी।

बेटी उठ भी गयी पर प्रदीप की कुंठा और उदासी बरकरार थी। अपने ख्यालों में गुम वह बैठा था कि बेटी वहाँ आ गयी। उसने पिता का हाथ छूकर कहा,” पापा खेलने चलो मेरे साथ”।

प्रदीप की तंद्रा टूटी। परेशानी भरी आँखों से बेटी को देखा। कुछ बोल नहीं पाया।

बेटी का इतने पास खड़ा होना भी उसके दिमाग से भारीपन नहीं हटा पाया। उलझन इतनी थी दिमाग में कि उसकी इच्छा हो रही थी कि बेटी वहाँ से चली जाये तो वह फिर से अपने ख्यालों में खो जाये।

बेटी ने फिर पिता का हाथ झिंझोड़कर कहा,: पापा, खेलने चलो”।

बेटा आप खेलो जाकर।

नहीं पापा आप चलो, आपके साथ खेलना है।

मुझे काम है बेटा।

आप बाद में कर लेना। पहले खेल लो मेरे साथ।

इतने वार्तालाप से उसके ख्यालों में हल्का सा झरोखा बना पर वह अभी भी बाहर नहीं आ पाया था।

बेटी ने जिद करते हुये कहा,” चलो न पापा…खेलेंगे..आप रात को काम कर लेना”।

नहीं बेटा अभी मेरे पास समय नहीं है आप खेलो।

बेटी का चेहरा मुर्झा सा गया और वह रुआंसे स्वर में बोली,” आपके पास नहीं है पर मेरे पास तो समय है न पापा”।

जैसे बिजली कौंध जाती है ऐसे ही उस क्षण में कुछ हो गया प्रदीप को, उसके दिमाग में बेटी की आवाज गूँजने लगी,” आपके पास नहीं है पर मेरे पास तो समय है न”।

उदास बेटी आँखों के सामने खड़ी थी और प्रदीप की इच्छा हो रही थी कि वह जोर जोर से रो ले।

किसी तरह से अपने को रोककर उसने बेटी को सीने से लगा लिया और उसके बालों में ऊँगलियाँ फिराते हुये उसने कहा,” चलो आप तैयारी करो बाहर चल कर मैं अभी आता हूँ। आज खूब खेलेंगे”।

बेटी फिर से खिल उठी और ऊर्जा से भरकर कमरे से बाहर भाग गयी।

प्रदीप की आँखों से आँसू झर-झर टपक रहे थे। दिमाग का ठोस भारीपन द्रवीय बन बह चला था। वह हल्का महसूस कर रहा था।

उसके हाथ की कलम चलने लगी। दिमाग सनासन दौड़ने लगा।

कुछ पंक्तियाँ लिखकर उसने हाथ रोक दिये। अब उसे संजोकर रखने की जरुरत नहीं थी। अब वह कभी भी लिख पायेगा इसका अहसास और विश्वास उसे हो चुका था। आज उसकी बेटी ने उसे जीवन का बहुत बड़ा सबक दे दिया था, शायद इससे बड़ा सबक उसे पहले कभी नहीं मिला था।

अपने प्रिय लेखक लियो टॉल्स्टोय की अपनी मनपसंद कहानी को पढ़ा तो उसने कई बार था पर उसका वास्तविक मर्म आज उसकी बेटी की कही एक बात ने उसके सामने ऐसे स्पष्ट कर दिया था जैसे सूरज के सामने से घने काले बादल छँट गये हों और सूरज फिर से अपनी किरणों से प्रकाश धरती पर फैलाने लगा हो।

वह कुर्सी से उठकर बाहर अपनी बेटी के साथ खेलने चल दिया, जीवन जीने चल दिया।

…[राकेश]

अप्रैल 21, 2011

ईमानदारी-भ्रष्टाचार के बीच झूलता मानस

रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी लाइन टिकट खिडकी पर लगी थी।

पत्नी बोली,” हे राम! टिकट कैसे मिलेगा, गाड़ी की रवानगी में बीस मिनट ही बचे हैं”।

रमेश मुस्करा कर बोला,” अभी मिलता है”।

और वह कुली के पास जा पंहुचा,” भाई! टिकट का इंतज़ाम हो जायगा क्या?”

“हाँ साब,  सौ रुपये अधिक लगेंगे”।

“कोई बात नहीं यार! तू टिकट तो दिला”।

यह बेईमानी की जीत थी!
….

पत्नी की बहुत मिन्नत के बाद रमेश सिनेमाघर गया था। टिकट खरीदारों की लंबी लाइन आगे सरक ही नहीं रही थी। बीच-बीच में एक दबंग टिकट खिडकी पर पहुँच कर इकट्ठे बहुत सारे टिकट लेता और वापिस भीड़ में टिकट ब्लैक करने आ जाता।

कतार तोड़ कर लोग स्वयं ही उसके साथ हो रहे थे।

रमेश सोच रहा था कैसे लोग हैं, जरा भी सब्र नहीं कर रहे। यूँ ही तो बेईमानी को बढ़ावा मिलाता है।
अचानक भडाक की आवाज़ के साथ टिकट खिडकी बंद हो गयी और दबंग की आवाज़ का सुर और भी तेज हो गया।

पत्नी बोली,” कुछ ही रुपये और लगेंगे, ले लो न टिकट”

कुछ तो टिकट नहीं मिलने की खीज थी और कुछ पत्नी द्वारा बेईमानी कराने की सलाह पर गुस्सा।

रमेश पत्नी का हाथ पकड कर घसीटता सा सिनेमाहॉल के बाहर निकल आया।

कारण कोई भी रहा हो पर यह ईमानदारी की तरफ उठा एक कदम था!

(रफत आलम)

फ़रवरी 21, 2011

अपना जूता अपने सर

कुछ साल पहले ही देश में युवाओं को अट्ठारह साल की उम्र में वोट देने का अधिकार दे दिया गया था। केबल टी.वी ने भी देश में धूम मचा दी थी।

चारों लड़के- अ, ब, स, और द, वोट देने का अधिकार पा गये थे। टी.वी, सिनेमा, किताबें और अखबार आदि में परोसी जाने वाली सामग्री उनके अंदर बन रहे हार्मोन्स  की गतिविधियों को और ज्यादा उछाल दे रही थी।  उनकी शारीरिक और मानसिक इच्छाओं ने ऐसा गठबंधन कर लिया था कि सारे समय वे इन्ही सब बातों में खोये रहते थे।

केवल लड़को को शिक्षा देने वाले कॉलेज में कक्षा में बैठें हो या घर पर, राह पर चल रहे हों या बिस्तर पर लेटकर सोने की तैयारी कर रहे हों, उनके दिलोदिमाग पर स्त्रीजाति ही छायी रहती। उनकी बातें भी घूमफिर कर स्त्री-पुरुष के मध्य होने वाले शारीरिक सम्बंधों पर पहुँच जाती।

उनकी अतृप्त इच्छायें उन्हे ऐसी सामग्री भी पढ़वाने और दिखवाने लगीं जिन्हे समाज में छिपाकर इस्तेमाल किया जाता है और कानून पकड़ ले तो पुलिस वाले घूसखोर हुये तो ठीक मामला कुछ या बहुत कुछ देकर रफादफा किया जा सकता था पर अगर पुलिस वाले को ईमानदारी के कीड़े ने काटा हुआ हो तो मामला काफी जिल्लत भरी स्थितियाँ सामने ला सकता था।

एक जैसी सोच वाले और एक जैसे मर्ज वाले लोग बड़ी जल्दी मिल जाते हैं और कॉलेज में भी इन लड़कों को उकसाने वाले ऐसे साथी मिल जाते जो उनकी इच्छाओं को कुछ झूठी और कुछ सच्ची कहानियाँ मिर्च मसाला सुनाकर और भड़का रहे थे। किसी के पास होली के अवसर की कहानियाँ थीं। कोई ऐसा भाग्यवान था जहाँ किसी स्त्री ने उसे डाक्टरेट तक की शिक्षा ही दे दी थी।

इन किस्सों को सुनकर इन लड़कों को लगता कि एक वे ही संसार में भाग्यहीन हैं जिन्हे अपनी इच्छायें पूरी करने का मौका नहीं मिलता वरना दुनिया तो ऐश में जी रही है।

एक शाम ट्यूशन पढ़कर लौटने के बाद अपनी किस्मत को कोसते हुये चारों लड़के नदी किनारे लगी बेंच पर बैठे हुये अपने पसंदीदा विषय पर चर्चा कर रहे थे। पास ही उनकी साइकिलें खड़ी थीं। कॉलेज से छुट्टी होने के बाद वे वहीं बाजार में कुछ खाकर ट्यूशन के लिये चले जाया करते थे। ट्यूशन से लौटते तो इधर उधर घूमकर शाम को अंधेरा होने के बाद ही घर लौटा करते थे।

सड़क के एक ओर नदी और दूसरी ओर पत्थर की बाड़ सड़क के साथ साथ लगी हुयी थी। बाड़ करीब बीस फुट ऊँची होगी और नदी किनारे वाली इस सड़क के साथ-साथ ही ऊपर भी एक सड़क थी। ऊपर की सड़क से नीचे आने के लिये जगह- जगह सीढ़ियाँ भी थीं और थोड़ा आगे जाकर दोनों सड़कें एक मोड़ पर मिल भी जाती भी थीं और वहाँ से ऊँची सड़क पर वाहन चला कर भी जाया जा सकता था।

सूरज छिप चुका था।

लड़के साइकिलें चलाते हुये सड़क के रास्ते ऊपर पहुँच गये।

वहाँ वे अपनी अपनी साइकिल पर बैठे बैठे जमीन पर पैर टिकाकर बातें करने लगे।

बातें करते करते एक लड़के की निगाह नीचे वाली सड़क पर गयी और उसने बाकी साथियों को इशारा किया।

अंधेरा छाने लगा था पर इक्का दुक्का स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं और उस रोशनी में उन्हे दिखायी दिया कि दूर से एक स्त्री और पुरुष उसी तरफ चलते हुये आ रहे थे जहाँ वे पहले खड़े थे।

दमित इच्छाओं ने लड़कों के सोचने समझने की शक्त्ति को पहले ही अपनी गिरफ्त में ले रखा था। उनके दिमाग में शैतानी से बड़ी खुरापात सर उठाने लगी।

उन्होने योजना बना ली कि आज वे भी नारी शरीर का ऊपरी तौर पर थोड़ा बहुत अनुभव ले सकते हैं।

‘अ’ ने कहा,” मैं और ‘ब’ इधर से साइकिल से आगे जाते हैं और कुछ देर बाद हम दोनों साइकिल ऊपर ही खड़ी करके जोड़े के पीछे पहुँचकर सीढ़ियों से नीचे उतर जायेंगे और तुम दोनों अभी नीचे जाओ और नदी किनारे खड़े रहकर उनका इंतजार करो। ऐसी जगह खड़े रहना जहाँ रोशनी न हो और जब वे पास आ जायें तो तुम दोनों एकदम से आदमी को पकड़ लेना और उसकी आँखों पर रुमाल आदि बाँध देना और हम दोनों महिला को पकड़ लेंगे। अंधेरा होगा वे दोनों कुछ देख नहीं पायेंगे। अपन लोग कुछ मस्ती करके ऊपर भाग लेंगे।”

योजना के मुताबिक अ और ब साइकिल से ऊपरी सड़क पर ही उस दिशा में चल दिये जिधर से जोड़ा आ रहा था और स और द वहीं से सीढ़ियों से नीचे उतर गये और बिजली के खम्बे से कुछ दूर अंधेरे में नदी की ओर मुँह करके खड़े हो गये।

उनकी सांसें तेज चल रही थी और धड़कनें तो दौड़ लगा रही थीं। योजना बनाना और बात है और उस पर अमल करना एकदम अलग बात है।

जोड़ा पास आता जा रहा था| ‘स’ और ‘द’ की घुकधुकी बँधी हुयी थी। स्त्री अपने साथी से कुछ बोल रही थी। लड़कों को लगा कि जोड़ा उनसे दस हाथ की दूरी पर ही होगा, वे मुँह घुमा कर जोड़े की तरफ देखने लगे।

जोड़ों के पीछे ऊपर से पत्थरों की बाड़ के बीच बनी सीढ़ियों से उतरते दो साये भी उन्हे दिखायी दिये।

‘स’ और ‘द’ भ्रमित थे कि क्या करें। ‘द’ ने ‘स’ को कोहनी मारी, तैयार रहने के लिये।

जोड़ा पास आ चुका था। अभी भी स्त्री ही बोल रही थी।

‘स’ और ‘द’ हिले ही थे कि उनकी हलचल से चौंककर जोड़े ने उनकी ओर देखा।

पुरुष के हाथ की टॉर्च चमक उठी और लड़कों के चेहरों पर पड़ी।

अरे तुम दोनों, यहाँ क्या कर रहे हो? घर नहीं गये अभी तक।

आवाज सुनकर ‘स’ और द’ अवाक रह गये। जोड़ा उनके एकदम पास खड़ा था।

भैया आप… भा…भी जी … क…ब आये आ…प… लोग?

‘स’ ने हकला कर कहा।

पीछे सीढ़ियों से उतरते साये जहाँ थे वहीं चिपक कर रह गये।

आज दोपहर बाद। ‘अ’ कहाँ है? अभी तक घर नहीं पहुँचा, तुम्हारे साथ भी दिखायी नहीं दे रहा।

भैय्य्य्य्या वो …वो … यहीं था अभी चला गया है ऊपर वाली रोड से गया है।

जोड़े के पुरुष और महिला ‘अ’ के बड़े भाई और भाभी थे!

उनकी शादी के वक्त्त ही ’अ’ के दोस्तों ने उसकी भाभी को देखा था और अब शादी के लगभग साल भर बाद वे लोग वहाँ आये थे।

…[राकेश]

चित्र : साभार – life.com

फ़रवरी 9, 2011

तबादला

चार दिन गायब रहने के बाद हरेंद्र हॉस्टल वापस आया तो बहुत खुश था। अपने कमरे में जाकर सामान रखने के बाद बाहर आया तो उसके हाथों में मिठाई के डिब्बे थे। मैस में काम करने वाले लड़कों को उसने खाना खाते अपने सभी साथियों को मिठाई देने के लिये कहा और अपने ग्रुप के साथ  बैठ गया।

उसने बताया कि वह अपने घर चला गया था। सूचना आयी थी।

साथियों ने मजाक किया कि शादी वगैरह तो निश्चित नहीं कर दी घर वालों ने।

अरे नहीं।

हरेंद्र आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। कुछ हाथ तंग करके ही उसका माहभर का खर्च निकल पाता था। उसके पिता को आशा थी कि साल-डेढ़ साल में इंजीनियरिंग पूरी करके उसे नौकरी मिल जायेगी तो घर की आर्थिक हालत बेहतर हो जायेगी। साथियों के लिये यह थोड़ा हैरत का विषय था कि वह पूरे हॉस्टल को मिठाई खिलाये। उन्होने अपनी शंका का समाधान चाहा।

तो फिर यह सारे हॉस्टल को मिठाई क्यों बाँटी जा रही है?

अरे यार तुम लोगों से क्या छिपाना। दरअसल पापा का तबादला हो गया है। दस साल से सालों ने ऐसी जगह डाला हुआ था… जहाँ सैलेरी के अलावा कुछ भी कमाई नहीं थी। अब जाकर ऐसी पोस्टिंग मिली है जहाँ पैसा ही पैसा है। पिछले दस साल बहुत परेशानी में बीते हैं हमारे घर के। अब हालात ठीक होंगे। पापा बहुत खुश थे। तबादले के लिये बहुत भागदौड़ की है इन दस सालों में। अब जाकर काम हो पाया है। ऊपर थोड़ा पैसा खिलाना पड़ा पर यह सब तो कुछ ही माह में पूरा हो जायेगा। यह सेक्शन डिपार्टमेंट के सबसे कमाऊ सेक्शंस में आता है। ऐसा मलाईदार तबादला मिला है… मजा आ गया यारों। वारे न्यारे हो जायेंगे अब। सब कसर पूरी हो जायेगी।

हरेंद्र का चेहरा खुशी से लबरेज़ था।

 

…[राकेश]

जनवरी 17, 2011

गुरु

किसी कारण दोनों लड़कों का मूड ऑफ था। दोनों ही अपने अपने विचारों में खोये हुये पैदल चलते रहे। बाहर से खामोश थे पर दोनों के ही अंदर तरह तरह के विचार उमड़ रहे थे।

जब उनकी तन्द्रा भंग हुयी तो वे कालेज से दूर चिड़ियाघर तक आ चुके थे। उन्होने सड़क किनारे खड़े फलों के ठेलेवाले से केले खरीदे और चिड़ियाघर की ओर सड़क किनारे बनी रेलिंग पर बैठकर केले खाते हुये इधर-उधर आते जाते लोगों को देखने लगे।

कुछ समय बाद उनका मूड कुछ ठीक हुआ तो एक लड़के ने कहा,” चलो यार हॉस्टल चला जाये”।

उन्होने सामने से गुजरते हुये एक अधेड़ उम्र के रिक्शे वाले को आवाज देकर रोका,” क्यों भैया, गुरुदेव पैलेस के पास चलोगे क्या”।

“चलेंगे, बाबू भैया, दस रुपये लगेंगे”।

“चलो”।

दोनों लड़के रिक्शा में बैठ गये। रिक्शा चली तो चलती हवा सुहानी प्रतीत हुयी।

अक्टूबर के माह में बादलों भरा दिन अच्छा लग रहा था। लड़कों का मूड दुरुस्त हो चला था।

रिक्शा चिड़ियाघर के सामने वाली सड़क से गुरुदेव पैलेस जाने वाली सड़क पर मुड़ने लगी तो पहले से उस मुख्य सड़क पर चल रही एक रिक्शा उनके सामने से गुजरी। रिक्शा चालक एक जवान युवक था और रिक्शे में दो लड़कियाँ बैठी हुयी थीं और आपस में हंसी ठिठोली करने में व्यस्त थीं।

पहले कभी भी लड़कियों को देखकर छींटाकशी न करने वाले लड़कों को न जाने आज क्या चंचलता सूझी कि एक लड़के ने सीटी बजा दी। सीटी तेज नहीं बजायी गयी थी पर इतनी हल्की भी नहीं थी कि आगे चल रही रिक्शे में बैठी लड़कियां न सुन पायें।

सीटी की आवाज सुनकर लड़कियों ने पीछे मुड़कर देखा और वापस हंसते हुये अपनी बातों में मशगूल हो गयीं।

लड़कों पर आज असामान्य व्यवहार हावी था।

एक लड़के ने रिक्शे वाले से कहा,” भैया, ज़रा तेज चलाओ, उस आगे वाले रिक्शे के बराबर में ले चलो”।

रिक्शे वाले ने कहा,” बाबू भैया, एक बात कहूँ”।

“हाँ, कहो”।

“आप लोग भले घरों के हो। अच्छे पढ़े लिखे हो। कल को बड़े आदमी बनोगे। ये सब छोटी हरकतें आपको शोभा नहीं देतीं।”

लड़कों को चुप पाकर रिक्शे वाले ने आगे कहा,” आप लोगों के पिता, चाचा वगैरहा मेरी ही उम्र के होंगे। उसी बुजुर्गियत के नाते कह रहा हूँ। और अपने जीवन के अनुभव से कहता हूँ बेटा कि समय बहुत बड़ा न्याय करने वाला होता है। यह सूद समेत वापस करता है। आज आप किसी की बेटी को छेड़ोगे, कल कोई आपकी बेटी को छेड़ेगा। समय ऐसा करेगा ही करेगा।”

रिक्शे वाले की नसीहत सुनकर लड़कों की सोच, जो इधर-उधर हिल गयी थी वापस अपनी नैसर्गिक स्थिति में आ गयी। वे भीतर ही भीतर शर्मिंदा महसूस करने लगे।

रिक्शे वाले ने कहा,” आप भले लगे इसलिये कह देने की इच्छा हो गयी।”

“आपने ठीक कहा, शुक्रिया”। लड़कों ने कहा।

उनका हॉस्टल भी आ गया था। वे रिक्शे से उतर गये। उन्होने रिक्शे वाले को पचास का नोट दिया। उसके पास खुले नहीं थे, लड़कों ने कहा कि फिर किसी और दिन हिसाब हो जायेगा।

हॉस्टल की ओर बढ़ते हुये एक लड़के ने अपने साथी से कहा,” यार, ज़िंदगी पता नहीं कैसे कैसे सिखा देती है और कहीं से भी गुरु ले आती है शिक्षा देने के लिये”।

…[राकेश]

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