Archive for ‘राजनीति’

मार्च 24, 2017

सेक्युलरवाद से संवाद – योगेन्द्र यादव

 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। उसी घड़ी एक सेक्युलर मित्र से सामना हो गया। चेहरे पर मातम, हताश और चिंता छायी हुई थी। छूटते ही बोले “देश में नंगी साम्प्रदायिकता जीत रही है। ऐसे में आप जैसे लोग भी सेक्युलरवाद की आलोचना करते हैं तो कष्ट होता है।”

मैं हैरान था: “आलोचना तो लगाव से पैदा होती है। अगर आप किसी विचार से जुड़े हैं तो आपका फर्ज़ है कि आप उसके संकट के बारे में ईमानदारी से सोचें। सेक्युलरवाद इस देश का पवित्र सिद्धांत है। जिन्हें इस सिद्धांत में आस्था है उनका धर्म है कि वो सेक्युलरवाद के नाम पर पाखंडी राजनीति का पर्दाफाश करें।”

वो संतुष्ट नहीं थे। कहने लगे “अब जलेबी न बनायें। मुझे सीधे-सीधे बताएं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से आपको डर नहीं लगता?”

मैंने सीधी बात कहने की कोशिश की: ” डर तो नहीं लगता, हाँ दुःख जरूर हुआ। जिसे इस देश में गर्व हो उसे ऐसे किसी नेता के इतनी ऊँची कुर्सी पर बैठने पर शर्म कैसे नहीं आएगी? जिसे योग में सम्यक भाव अपेक्षा हो वो आदित्य नाथ जी योगी कैसे मान सकता है? जो धर्म को कपड़ों में नहीं आत्मा में ढूँढता है वो घृणा के व्यापार को धार्मिक कैसे कह सकता है?”

अब उनके चेहरे पर कुछ आत्मीयता झलकी “तो आप साफ़ कहिये न, कि मोदी, अमित शाह और संघ परिवार देश का बंटाधार करने पर तुले हैं।”

मैं सहमत नहीं था: “सेक्युलरवादी सोचते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुष्प्रचार, संघ परिवार के घृणा फैलाने के अभियान और भाजपा की राजनीति ने आज सेक्यूलरवाद को संकट में पहुंचा दिया है। लेकिन इतिहास में हारी हुई शक्तियां अपने विरोधियों को दोष देती है। सच यह है कि इस देश में सेक्यूलरवाद स्वयं सेक्यूलरवाद के एकांगी विचार और सेक्यूलरवादियों की कमजोर और पाखंडी राजनीति के कारण संकट में है।”

उनके चेहरे पर असमंजस को देखकर मैंने कुछ विस्तार दिया: “संकट की इस घड़ी में सेक्यूलर राजनीति दिशाहीन है, घबराई हुई है। जनमानस और सड़क पर सांप्रदायिकता का प्रतिरोध करने की बजाय सत्ता के गलियारों में शॉर्टकट ढूंढ़ रही है, भाजपा की हर छोटी-बड़ी हार में अपनी जीत देख रही है। हर मोदी विरोधी को अपना हीरो बनाने को लालायित है। सांप्रदायिक राजनीति अपने नापाक इरादों के लिए संकल्पबद्ध है, इस मायने में सच्ची है। आत्मबल और संकल्प विहीन सेक्यूलर राजनीति अर्धसत्य का सहारा लेने को मजबूर है। सांप्रदायिकता नित नई रणनीति खोज रही है, अपनी जमीन पर अपनी लड़ाई लड़ रही है। सेक्यूलरवाद लकीर का फकीर है, दूसरे की जमीन पर लड़ाई हारने को अभिशप्त है। सांप्रदायिकता आक्रामक है तो सेक्यूलरवाद रक्षात्मक। सांप्रदायिकता सक्रिय है, सेक्यूलरवाद प्रतिक्रिया तक सीमित है। सांप्रदायिकता सड़क पर उतरी हुई है, सेक्यूलरवाद किताबों और सेमिनारों में कैद है। सांप्रदायिकता लोकमत तक पहुंच रही है, सेक्यूलरवाद पढ़े-लिखे अभिजात्य वर्ग के अभिमत में सिमटा हुआ है। हमारे समय की यही विडम्बना है-एक ओर बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है तो दूसरी ओर थके-हारे सेक्यूलरवाद की कवायद।”

अब वो “ऊँची बात कर दी श्रीमान ने” वाली मुद्रा में थे। तय नहीं कर पा रहे थे कि मैं दोस्त हूँ या दुश्मन। इसलिए मैंने इतिहास का सहारा लिया।

“आजादी से पहले सेक्यूलर भारत का सपना राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा था और सभी धर्मों के भीतर सामाजिक सुधार के लिए कटिबद्ध था।

आजादी के बाद से सेक्यूलरवाद इस देश की मिट्टी से कट गया। सेक्यूलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी इबारत से सेक्यूलर भारत स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गांधी की भाषा छोड़कर विदेशी मुहावरा बोलना शुरू किया। सेक्यूलरवाद का सरकारी अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ इसी उधारी सोच का नमूना है। धर्म के संस्थागत स्वरूपों और अलग-अलग पंथ के बीच तटस्थ रहने की नीति धीरे-धीरे धर्म के प्रति निरपेक्षता में बदल गई। सेक्यूलरवाद का अर्थ नास्तिक होना और एक औसत भारतीय की आस्था से विमुख होना बन गया। सेक्यूलरवाद का विचार भारत के जनमानस से कटता गया।”

अब उनसे रहा नहीं गया: “यानि कि आप भी मानते हैं कि सेक्युलरवाद वोट बैंक की राजनीति है?”

“ये कड़वा सच है। आजादी के आंदोलन में सेक्यूलरवाद एक जोखिम से भरा सिद्धांत था। आजादी के बाद सेक्यूलरवाद एक सुविधाजनक राजनीति में बदल गया। चुनावी राजनीति में बैठे-बिठाए अल्पंसख्कों के वोट हासिल करने का नारा बन गया। जैसे-जैसे कांग्रेस की कुर्सी को खतरा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे अल्पसंख्यकों के वोट पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ने लगी। अब अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों, को वोट बैंक की तरह बांधे रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी हो गई।”
“तो अब आप ये भी कहेंगे कि मुसलमानों का तुष्टिकरण भी एक कड़वा सच है?” अब उनकी दृष्टि वक्र थी।

” नहीं। तुष्टिकरण मुसलमानों का नहीं, उनके चन्द मुल्लाओं का हुआ। आजादी के बाद मुस्लिम समाज उपेक्षा, पिछड़ेपन और भेदभाव का शिकार था। देश के विभाजन के चलते अचानक नेतृत्वविहीन इस समाज को शिक्षा और रोजगार के अवसरों की जरूरत थी। लेकिन उनकी इस बुनियादी जरूरत को पूरा किए बिना उनके वोट हासिल करने की राजनीति ने सेक्यूलरवाद की चादर ओढ़ना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेक्यूलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाए रखने की राजनीति हो गई-मुसलमानों को खौफज़दा रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट अपनी झोली में बंटोरते जाओ। नतीजतन मुस्लिम राजनीति मुसलमानों के बुनियादी सवालों से हटकर सिर्फ सुरक्षा के सवाल और कुछ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों (उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, शादी-ब्याह के कानून) के इर्द-गिर्द सिमट गई।

जिस खेल को पहले कांग्रेस ने शुरू किया, उसे बाद में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लेफ्ट ने भी अपना लिया। डर के मारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों का बंधक बन गया। मुसलमान पिछड़ते गए और सेक्यूलर राजनीति फलती-फूलती रही। मुस्लिम समाज उपेक्षा और भेदभाव का शिकार बना रहा, लेकिन उनके वोट के ठेकेदारों का विकास होता गया। वोट बैंक की इस घिनौनी राजनीति को सेक्यूलर राजनीति कहा जाने लगा। व्यवहार में सेक्यूलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े हुए दिखना। पहले जायज हितों की रक्षा से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे जायज-नाजायज हर तरह की तरफदारी को सेक्यूलरवाद कहा जाने लगा। धीरे-धीरे एक औसत हिंदू को लगने लगा कि सेक्यूलरवादी लोग या तो अधर्मी है या विधर्मी। उसकी नजर में सेक्यूलरवाद मुस्लिमपरस्ती या अल्पंसख्कों के तुष्टिकरण का सिद्धांत दिखने लगा। उधर मुसलमानों को लगने लगा कि सेक्यूलर राजनीति उन्हें बंधक बनाए रखने का षड्यंत्र है। इससे तो बेहतर है कि वे खुलकर अपने समुदाय की पार्टी बनाए। इस तरह देश का एक पवित्र सिद्धांत देश का सबसे बड़ा ढकोसला बन गया।”

“यानि आप कह रहे हैं कि हम योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दें कि उनके बहाने हमारी आँखे खुल गयीं ” इतना बोल मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वे आगे बढ़ गए। मुझे लगा उनके चेहरे पर उतनी हताशा नहीं थी, उनकी चाल में एक फुर्ती थी।

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मार्च 23, 2017

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव : आज का भारतीय उन्हें श्रद्धांजलि देने लायक है भी?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत पर उनकी शान में आज की तारीख में कसीदे काढने वाली भारतीय जनता में से बहुसंख्यक क्या जीते जागते इन क्रांतिकारियों को आज की परिस्थितियों में स्वीकार भी कर पाते?

भगत सिंह और उनके साथी तो आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर जी रहे वंचित तबके के हितों के लिए संघर्ष कर रहे होते, आदिवासियों के हितों, देश के जंगल, पानी और आकाश और पर्यावरण की रक्षा के लिए अलख जगा रहे होते और निश्चित तौर पर वे जन-शोषक कोर्पोरेट हितों के विरुद्ध खड़े होते, और निश्चित ही किसी भी राजनैतिक दल की सरकार भारत में होती वह उन्हें पसंद नहीं करती|

उन पर तो संभवतः आजाद भारत में भी मुक़दमे ही चलते|

झूठे कसीदों से फिर क्या लाभ, सिवाय फील गुड एहसासात रखने के कि कितने महान लोगों की स्मृति में हम स्टेट्स लिख रहे हैं ?

भगत सिंह एवं उनके साथियों के पक्ष में खड़ा होना आज भी क्रांतिकारी ही है और आधुनिक भारत का बाशिंदा इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकता कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के वशीभूत होने के कारण किसी भी किस्म के सजग आंदोलन के पक्ष में वह खड़ा हो नहीं सकता|

आज भगत सिंह और उनके साथी होते तो उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें गरिया रहे होते, उनके साथ गाली-गलौज भी हो सकती थी|

ऐसे में भगत सिंह और उनके साथियों को श्रद्धांजलि देने के प्रयास दोहरेपन के सिवाय कुछ भी नहीं हैं| उनके कार्यों की ताब आज की तारीख में न सहने की मानसिकता के कारण उन्हें झूठी श्रद्धांजलि देने के प्रयास २५ साल से कम उम्र में ही देश की खातिर फांसी पर चढ़ जाने वाले इस महावीर और उनके साथियों के बलिदान के प्रति अवमानना ही कहे जायेंगें|

पुनश्चा:

१) डा. राम मनोहर लोहिया का जन्म २३ मार्च को हुआ पर वे इन शहीदों की सहादत की स्मृति में अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे|

२) पंजाब के अनूठे कवि पाश, भगत सिंह और उनके शहीद साथियों के बहुत बड़े प्रशंसक थे, और संयोगवश पंजाब में आतंकवादियों दवारा उनकी ह्त्या भी इसी दिन २३ मार्च १९८८ को हुयी|

 

#BhagatSingh #Sukhdev #Rajguru

 

फ़रवरी 13, 2017

कैसे मुसलमां हो भाई…

नवम्बर 11, 2016

कालाधन – विचारार्थ कुछ पहलू …(के.एन. गोविन्दाचार्य)

500 और 1000 के नोट समाप्त करने से केवल 3% काला धन आ सकता है बाहर !!

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- ‘खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया ” सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलु उत्पाद(GDP) के लगभग 20% अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी। वहीँ 2000 के समय वह 40% तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20% तक पहुंची है। 2015 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना। इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है।

रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86% था। अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3% होता है!

प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहाँ है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु ( अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं। इसके आलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चूका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फरक नहीं पड़ेगा।

अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है, इन्हें काला धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सीखाने वाले मिल जाते हैं। इसीप्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे। 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3% है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य । अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3% ही बाहर आ पायेगा और 1% से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं।
केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आँख में धूल झोंकना है। उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग ।

 (के. एन. गोविंदाचार्य)
अगस्त 30, 2016

‘प. नेहरु’ का पत्र ‘डा. राम मनोहर लोहिया’ के नाम

NehruLohiaसमाजवादी चिन्तक और राजनेता डा. राम मनोहर लोहिया, ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाए भारत में, इसके प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु के घनघोर राजनीतिक आलोचक रहे| परन्तु ब्रिटिश राज से आजादी से पूर्व दोनों बड़े नेताओं के मध्य कैसे संबंध थे यह डा. लोहिया को लिखे प. नेहरु के व्यक्तिगत पत्र से पता लगता है|

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अप्रैल 30, 2016

दिल्ली की चुनावी राजनीति में एक नया प्रयोग

‘स्वराज अभियान’ वजीरपुर – वार्ड ६७, में एमसीडी के उपचुनाव में एक नया राजनीतिक प्रयोग करने जा रहा है| इसकी सफलता भारतीय राजनीति में सुधार की ओर एक सार्थक कदम होगी|

मार्च 16, 2016

जावेद अख्तर : राज्यसभा में विदाई भाषण !

मशहूर पटकथा एवं संवाद लेखक और गीतकार जावेद अख्तर शब्दों के ही नहीं वरन विचारों और हाजिरजवाबी के भी धनी हैं, उनकी बातें रोचक और सही समय पर मुँह से निकलती हैं और इसलिए सुनने वालों को आकर्षित करती हैं| बोलने में मिले अवसर का लाभ बहुत लोग नहीं उठा पाते. जावेद अख्तर अक्सर ही ऐसे अवसरों को हाथ से नहीं जाने देते जब वे वह कह सकते हैं जो वे कहना चाहते हैं और जो सही भी है|

छह साल राज्यसभा के सदस्य रहने के बाद  उच्च सदन से अपनी विदाई के अवसर पर उन्होंने वे बातें बोलीं जो वर्तमान के भारत के लिए बेहद महतवपूर्ण हैं और उन्होंने लगभग वे सभी चेतावनियाँ अपने भाषण में कहीं जिनसे भारत को सचेत रहने की जरुरत है| जावेद अख्तर ने राज्यसभा में अपने अंतिम भाषण में न केवल एक सांसद बल्कि एक नागरिक के कर्तव्यों का निर्वाह किया| ऐसे सचेत और प्रासंगिक भाषण के लिए जावेद अख्तर साधुवाद के पात्र हैं|

मार्च 6, 2016

विद्यार्थी और राजनीति : भगत सिंह

bhagat2इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मन्त्री है, स्कूलों-कालेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ानेवाला पालिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था। वहाँ भी सर अब्दुल कादर और प्रोफसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पोलटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ(Politically backward) कहा जाता है। इसका क्या कारण है?क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली है? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है?इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं। आज पंजाब कौंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते है तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- “काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।”

बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं,क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘’‘Appeal to the young, ‘Prince Kropotkin’ (‘नौजवानों के नाम अपील’, प्रिंस क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा- प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा जरूरी था। प्रोफेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हँस भी पड़ा। और उसने फिर कहा- ये रूसी सज्जन थे। बस! ‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा! प्रोफेसर ने कहा कि “तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।”

देखिए आप प्रोफेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते है?

दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करनेवाले वफादार नहीं, बल्कि गद्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।

सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत हैं, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फँसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फँसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। सिर्फ गणित और ज्योग्राफी का ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो।

क्या इंग्लैण्ड के सभी विद्यार्थियों का कालेज छोड़कर जर्मनी के खिलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ना पोलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहाँ थे जो उनसे कहते- जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो। आज नेशनल कालेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जायेंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आजाद करवाने वाले वहाँ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पायेंगे? नवजवानों 1919 में विद्यार्थियों पर किये गए अत्याचार भूल नहीं सकते। वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रान्ति की जरूरत है। वे पढ़ें। जरूर पढ़े! साथ ही पालिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें। वरना बचने का कोई उपाय नजर नहीं आता।

[भगत सिंह]

किरती, 1928

फ़रवरी 21, 2016

जाट आरक्षण का कड़वा सच : योगेन्द्र यादव

Yogendra Yadavपिछले दो दिनों से हरियाणा से आ रही ख़बरों से मन बहुत ख़राब है। सरकार अक्षम है, आंदोलनकारी अनुशासनहीन है और विपक्ष गैर-जिम्मेदार है। सब मिलकर सीधा-सादा सच जनता से छुपा रहे हैं। अगर राज्य को अराजकता और हिंसा से बचाना है तो शुरुआत सच बोल कर करनी होगी।

सच ये है कि सभी पार्टियां जाटों को आरक्षण का झूठा वादा करती रही हैं। इस वादे को पूरा करना किसी के बस का नहीं है। सन 2013 में हरियाणा सरकार ने और सन 2014 में केंद्र सरकार ने बिना कायदे के जाटों को आरक्षण दिया था। सबको तभी पता था की ये आदेश कोर्ट में टिकेगा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र का आदेश रद्द कर दिया, हरियाणा सरकार से आदेश पर हाई कोर्ट ने स्टे दे रखा है। जब तक कोर्ट अपना फैसला नहीं बदलते तब तक सरकार आंदोलनकारियों को कुछ वे वादा करले, उसका कोई महत्व नहीं है। अगर सरकार आंदोलनकारियों को खुश करने के लिए अध्यादेश लाती भी है, तो वो भी कोर्ट में रुक जाएगा।

सच ये है कि मामला सिर्फ एक कोर्ट आर्डर का नहीं है। आज की कानूनी-संवैधानिक व्यवस्था में जाट और पटेल जैसी जातियों को आरक्षण देना संभव नहीं है। किसी भी जाति को ओबीसी में शामिल करने के लिए यह काफी नहीं हैं कि इसके बारे में पहले क्या धारणा थी, या की मंडल कमीशन ने क्या लिखा। अब इसका वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर प्रमाण देना पड़ता है कि वह जाति आज शिक्षा और सरकारी नौकरी में सामान्य से बहुत पिछड़ गयी है। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने यह सर्वे करवाया था, उसके मुताबिक जाट समाज की स्थिति उतनी पिछड़ी हुई नहीं है। इस प्रमाण के आधार पर आज के हालात में जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण जैसा कोई लाभ देना संभव नहीं है।

सच ये भी है कि साधारण जाट परिवार की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है और वह आज की व्यवस्था में अन्याय का शिकार है। अधिकांश जाट गाँव में रहते हैं और खेतिहर हैं। खेती अब घाटे का धंधा बन गयी है। खेती की लागत और किसान के खर्चे बढ़ रहे हैं लेकिन फसलों के दाम बढ़ नहीं रहे। ऊपर से मौसम और बाजार की मार। अगर बच्चे को पढ़ा-लिखा दिया तो वो न खेती के लायक बचा न ही नौकरी के काबिल बना। ऊपर से हर नौकरी में सिफारिश और रिश्वत। यानी असली समस्या खेती के संकट और शिक्षित बेरोजगारी की है। इस असली समस्या का समाधान करने को कोई तैयार नहीं है। किसी के पास न तो समझ है, न हिम्मत। आरक्षण इस समस्या का समाधान नहीं है। इससे चंद पढ़े-लिखे और कांटेक्ट वाले परिवारों का भला हो सकता है, लेकिन ज्यादातर जाट परिवारों को इससे कोई फायदा नहीं है। बस इस सवाल पर साधारण लोगों की भावनाएं भड़काना आसान है।

सच ये है की जाट आरक्षण के नाम पर यही खेल हो रहा है। कोई अपनी लीडरी चमका रहा है, कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी हिला रहा है, कोई अपनी पार्टी के वापिस आने का आधार बना रहा है। घबराई हुई सरकार अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार रही है। सबको पता है की इससे कुछ हासिल नहीं होगा। पांच घरों के चिराग बुझ चुके हैं, और पता नहीं कितनों की बारी है। अब चुप रहने का वक्त नहीं है। कुछ लोगों को तो खुल कर सच बोलना चाहिए ताकि शांति लौट सके, सच्चे सवालों पर ध्यान दिया जा सके।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

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