Archive for ‘राकेश’

जुलाई 16, 2014

वे बेचते भुट्टे…

BoyGirlCorn-001बला की गर्मी… पारा डिग्री सेल्सियस में अर्द्ध शतक लगाने के एकदम करीब था…सूरज की किरणों की तीव्रता से लग रहा था कि मानो आज अपनी सारी ऊष्मा उड़ेल कर ही दम लेगा| धूप सिर को तपाये दे रहे ही, शरीर को जलाए दे रही थी|
ऐसे में कुछ दूर धूप में पैदल चलना पड़े तो लगे मानों जीते जी भट्टी में झुलस रहे हैं|

पर कई बार वे सब काम करने पड़ते हैं जो व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों में करना नहीं चाहता|

न  काम होता न तपती धूप में पैदल चलना पड़ता|

प्यास से कंठ सूख रहा था|

जहां पहुंचना अथा वह इमारत अभी भी कम से कम आधा किमी दूर थी| सड़क पार करके फुटपाथ पर चलना हुआ तो देखा कि दूर दूर तक छाया का निशां नहेने था और नंगा तपा हुआ फुटपाथ मुँह चिड़ा रहा था|

थोड़ी दूर चलने पर ही देखा तपती धूप में दो बालक भुट्टे बेचते फुटपाथ पर बैठे थे| सात-आठ साल की लड़की भुट्टे भून रही थी और उससे छोटा बालक, जो उसका भाई ही होगा, भुट्टे अपने पास चटाई पर रख बेच रहा था|

उनके थोड़ा पीछे एक छोटा सा पेड़ अवश्य था पर वहाँ एक टेम्पो वाले ने दुपहर को सोने के लिए कब्जा जमा लिया था वरना बच्चे वहाँ जो भी थोड़ी बहुत छाया थी उसी में अपना डेरा जमा सकते थे|

सामने ही एक प्रसिद्द पब्लिक स्कूल का में गेट चमचमा रहा था| इन् निर्धन बच्चों को रोजाना ही अंदर प्रवेश करते अमीर बच्चे दिखाई देते होंगे और वे यहाँ फुटपाथ पर भुट्टे बेचने को अभिशप्त थे| उनके लिए तो अभी से इस देश में दो देश बन गये थे, एक उनका देश था जो बचपन से ही कठोर मेहनत करके उत्पाद उगा रहा था, बना रहा था और बेच रहा अथा और एक दूसरा देश था जिसके बाशिंदें उनसे समां कभी कभी खरीद भी लेते थे वरना दूसरे देश के लिए बाजार भी और ही किस्म के थे, चमचमाते हुए, रोशनी और चकाचौंध से भरपूर|

प्यास से कंठ सूख रहा अथा| पानी भी साथ नहीं लिया था| मन में विचार आया कि क्यों न भुट्टा खा लिया जाए|

पर उससे तो प्यास और बढ़ेगी!

तो क्या, अब मंजिल नजदीक ही है जाकर और ज्यादा पानी पी लिया जायेगा|

पर बच्चों से भुट्टे लेना क्या बाल-मजदूरी का समर्थन नहीं?

पर अगर भुट्टा ना लिया तो क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार होगा?

अगर भुट्टा ले भी लिया तो एक भुट्टे से या कुछ भुट्टे खरीदने से क्या सुधार होगा उनकी स्थिति में?

उनके माता-पिता उन्हें मजदूरी से हटा स्कूल भेजने लगेंगे?

थोड़ी देर ऐसे ही उलझन में घिरा खड़ा रहा|

फिर बच्चों की तरफ देख दो भुट्टे देने को कहा|

कम से कम इस तपती धूप में उन्हें दो भुट्टे बेच पाने का संतोष तो मिलेगा शायद उन्हें खुशी भी हो|

इनका अच्छा भविष्य तो सरकारों के हाथ में है| वे चाहें तो ये बच्चे भी पढ़ लें और भविष्य बना लें|

भुट्टा खाते चलते हुए और बच्चों के बारे में सोचते हुए मंजिल भी आ गई|

उनके बारे में सोच सकने वाले मंत्री बनेंगे नहीं और मंत्री ऐसे बच्चों के पास समय व्यतीत करके उनके बारे में सोचेंगे नहीं|

तो ऐसे बाल-मजदूरों का क्या भविष्य है इस देश में|

क्या ये भुट्टे बेचते और ऐसे अन्य काम करते ही रह जायेंगे?

 

…[राकेश]

 

जून 5, 2014

लोकतंत्र … James Mercer ‘Langston Hughes’

लोकतंत्र नहीं आएगा Langston Hughes

आज,

इस साल,

या और कभी

…समझौतों और भय के द्वारा तो कभी नहीं आएगा! 

 

मेरा भी उतना ही अधिकार है

जैसे किसी और का है

अपने पैरों पर खड़े होने का

और जमीन का टुकड़ा लेने का!

 मैं थक जाता हूँ

लोगों को कहता पाकर –

कि सभी बातों को वक्त लेने दो,

वे खुद से हो जाएँगी

कल किसने देखा है?

मुझे मरने के बाद स्वतंत्रता नहीं चाहिए

मैं कल के सपन पर जिंदा नहीं रह सकता!

स्वतंत्रता

एक बेहद शक्तिशाली बीज है

को कि

बोया जाता है

सबसे ज्यादा जरुरत के समय! 

मैं भी यहाँ रहता हूँ

मुझे स्वतंत्रता चाहिए

जैसे कि तुम्हे चाहिए!

–  Langston Hughes –

(February 1, 1902 – May 22, 1967)


 

मई 23, 2014

गांधी Vs हिटलर

 

GandhiVsHitler-001

एक देश की करुणा संचित होती है गांधी में

एक देश का घमंड एकत्रित होता है हिटलर में

एक के उल्लेख के साथ प्रेम का आभास होता है

दूसरे के साथ घृणा की परिकाष्ठा का भय सताता है

एक आशा और प्रकाश का धोतक है

दूसरे की स्मृति अन्धेरा फैलाती है

पहला मानवता को पोषित करता है

दूसरा मानवता का विनाश करता है

पहला सदियों देश की जयजयकार करवाता है

दूसरा सदा देश को गालियाँ दिलवाता है

चुनाव सदा हाथ में है…

…[राकेश]

मार्च 30, 2014

वह जो है सबसे महान माँ…

सब माताएं महान होती हैं womanchildlabour

अपने बच्चों के लिए

वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं

अपने बच्चों के लिए

वे अपने जीवन को

अपनी अभिलाषाओं को

काट-छांट कर सीमित बना देती हैं

अपने बच्चों के लिए

बहुत सी माताएं

छोड़ देती हैं

लाखों-करोड़ों की नौकरियां और व्यवसाय

अपने बच्चों के लिए

अपने तमाम शौक और जूनून की हद तक पाले गये शौक

भी छोड़ देती हैं कुछ अरसे के लिए

अपने बच्चों के लिए

जो कुछ भी आड़े आता है बच्चों के

सही ढंग से लालन पोषण में

वे उसे छोड़ देती हैं

पर सुरक्षित माहौल में

रहने वाली स्त्रियाँ

बेहतरीन माएँ होते हुए भी

उतनी महान नहीं होती

जितनी होती है एक कामगार गरीब माँ

वह स्त्री जो बांधकर

अपनी पीठ पर दूधमुयें बच्चे को

काम पर जाती है

पत्थर तोडती है

ईंटें धोती हैं

भांति भांति के परिश्रम करती है

ताकि अपने और बच्चे के लिए

जीविका कमा सके,

और यह कठोर परिश्रम उसे

रोज करना पड़ता है

अगर रहने का कुछ ठिकाना है तो

वहाँ से वह रोज सुबह निकलती है

 बच्चे को पीठ पर कपड़े से बाँध कर

ठेकेदार की चुभती निगाहों से गुजर कर

उस रोज की जीविका के लिए काम पाती है

बच्चे को कार्यस्थल के पास ही कहीं लिटा देती है

और काम पर जुट जाती है

और इस स्थल पर न उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध है

labour motherन उसके बच्चे की

पर इन् सब मुसीबतों से लड़ती हुयी

वह जीविकोपार्जन के लिए हाड तोड़ मेहनत करती रहती है

कुछ देर रोते बच्चे के पास जाती है तो

सुपरवाइजर से झिडकी सुनती है

चुनाव का वक्त होता है तो

देखती है पास से गुजरते वाहनों पर लदे नेताओं को

और सुनती है उनके नारों को

– वे उस जैसे गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करेंगे|

शायद उसे आशा भी बंधती हो

पर वह सब तो भविष्य की बातें होती है

वर्तमान में तो उसे रोज

जीने के लिए लड़ना है

इसलिए रोज सुबह वह अपने बच्चे को पीठ पर लाद

काम पर निकलती है

उसे जीना है

अपने बच्चे के लिए

और अपने बच्चे को जिंदा रखना है

खुद को जिंदा रखने के लिए|

उसे बीमार पड़ने तक की न तो सहूलियत है और न ही इजाज़त

चारों तरफ निराशा से भरे माहौल में भी

वह रोजाना कड़ी मेहनत करके जिए चली जाती है

घर-परिवार में रहने वाली तमाम माओं से

जिनके पास सहयोग होते हैं

तमाम तरह के

कहीं ज्यादा बड़े कद होते हैं ऐसी माओं के

यही हैं धरती पर सबसे महान माएँ!

…[राकेश]

 

 

 

 

दिसम्बर 31, 2013

16 दिसम्बर की सर्द रात…

oldman-001बर्फ गिरती है हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में, और दांत किटकिटाने लगते हैं दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के इलाके में रहने वाले जीवों के| इस बरस भी दिसम्बर की दस तारीख क्या निकली सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया था| मजबूरी न हो तो कौन सर्दी की रातों में घर की नर्म-गर्म शरण छोड़कर बाहर सडकों पर ख़ाक छानेगा?

‘समय से मीटिंग खत्म हो जाती तो घर पहुँच जाता’|  बस से उतर कर बस स्टॉप पर चढ़ते हुए अमित भुनभुनाया|

भूख अलग परेशान कर रही थी| उसने समय देखा|

साढ़े नौ बजने ही वाले थे| दुकानदार दुकानें बंद कर अपने अपने घर जाने लगे थे| कुछ ही मिनटों में बस स्टॉप सुनसान लगने लगा| अमित को एहसास हुआ कि वह अकेला ही बस स्टॉप पर मौजूद था| यही तो वक्त रहा होगा पिछले बरस की 16 दिसंबर की रात जब ऐसे ही एक बस स्टॉप से दामिनी और उसके मित्र को कुछ वहशी दरिंदों ने भुलावा देकर अपनी बस में बैठा लिया था और हैवानियत की सभी हदें पार करके एक खिल उठने की भरपूर संभावना लिए हुए जीवन को कुचल दिया था| उस रात भी वह सड़क पर ही था और उस हादसे की खबर उसे सुबह उठने पर टीवी पर आ रहे समाचारों के जरिये ही हुयी थी|

बस स्टॉप पर हल्की सी आहट से उसकी विचार श्रंखला टूटी| उसने देखा कोट पहने और मंकी कैप और मफलर में ढके हुए एक बुजुर्गवार बस स्टॉप पर आ पहुंचे थे| उन्होंने कोट की जेब से एक मोमबत्ती और माचिस की एक डिबिया निकाली और माचिस की एक तिल्ली निकाल कर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करने लगे, पर हवा चलने के कारण मोमबत्ती जल पाती उससे पहले ही माचिस की तिल्ली बुझ गई| उन्होंने दूसरी तिल्ली जलाई, इस बार मोमबत्ती जल गई और वे उसे बस स्टॉप के एक कोने पर लगाने लगे पर हवा ने इस बार भी काम दिखा दिया और मोमबत्ती बुझ गई|

अमित ने देखा कि कोई पिज्ज़ा खाकर उसका डिब्बा बस स्टॉप में लगी एकमात्र बैंच पर छोड़ गया था| उसने डिब्बा उठाकर बुजुर्गवार से कहा,” सर, इसकी ओट में जलाइए मोमबत्ती शायद काम बन जाए|”

कैप और मफलर से लगभग पूरी तरह ढके बुजुर्गवार के चेहरे से झांकती उनकी आँखों में मुस्कान की झलक सी दिखाई दी|

‘ले आओ बेटा इसे इधर ले आओ, यहाँ कोने में लगा देता हूँ’

अमित गत्ते का डिब्बा लेकर बस स्टॉप के एक कोने पर खड़े बुजुर्गवार के पास चला गया| उसने डिब्बे को खोल दिया और अब वह काफी बड़े हिस्से को गत्ते की दीवारों से रोक सकता था| उसे एहसास हो गया था कि बुजुर्गवार दामिनी की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं|

बुजुर्गवार ने मोमबत्ती जलाई और एक कोने में थोड़ा मोम टपका कर फर्श पर टिका दी और आँखें बंद करके हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगे| मिनट भर ऐसे ही प्रार्थना जैसा कुछ करके वे पीछे हटे तो अमित ने गत्ते के डिब्बे को मोमबत्ती के सामने इस तरह टिका दिया जिससे हवा का प्रवाह रोका जा सके|

बुजुर्गवार ने बैंच पर बैठ हल्की आवाज में कहा,” बहुत बुरा हुआ था उसके साथ”|

“जी”, अमित के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल सका|

बुजुर्गवार कुछ देर सड़क पर दूर कुछ देर देखते रहे| अमित को अब तक बस आने का इन्तजार था पर अब बुजुर्गवार के आने से अकेलेपन का एहसास खत्म हो चला था|

‘बहुत साल हो गये…ऐसी ही एक रात थी…पर सर्दी अभी आने को थी| नवंबर के शुरुआती दिन होंगे|’

बुजुर्ग ने धीमे स्वर में मानों अपने आप से कहा हो| अमित ने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो उन्हें कहीं खोया हुआ पाया| उसकी समझ में नहीं आया कि वे उससे कह रहे थे या खुद से ही बुदबुदा कर बात कर रहे थे|

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा,” तीसरी मंजिल पर स्थित घर में अकेला था, बीमार भी था,  रात का खाना खाकर बालकनी में टहल रहा था| रात के कोई साढ़े नौ बजे होंगे| कमरे और बालकनी की बत्तियाँ बंद करके घूम रहा था| नीचे कुछ दूर स्ट्रीट लाईट जल रही थी| एक कार आकर रुकी और उसमें से दो नौजवान उतरे| उन्होंने देखा उनकी पार्किंग की जगह कोई कार खड़ी हुयी थी| पार्किंग को लेकर झगडा होना लगभग रोजमर्रा की बात थी वहाँ| उन्होंने कुछ देर अपनी कार का हार्न बजाया जिससे कि जो भी वहाँ कार खड़ी करके गया हुआ है वह झाँक कर देख सके| पर कहीं कोई हलचल न देख कर उन्होंने वहाँ खड़ी कार को धक्का लगाकर हटाना चाहा पर उसमें हेण्ड ब्रेक लगा हुआ था| क्रोधित होकर उन्होंने आपस में कुछ बात की और एक नौजवान अपने घर में अंदर चला गया| वापिस आया तो उसके हाथ में गुप्ती, या बर्फ तोड़ने वाले सुए जैसा कुछ चमक रहा था| उन्होंने इधर उधर देखा, ऊपर आसपास के सब घरों की ओर देखा| अन्धेरा होने के कारण वे मुझे नहीं देख सकते थे पर मैं उनकी सभी हरकतें देख सकता था|’

अमित को उनके वृतांत में रस आने लगा था| वह उत्सुकता से उनकी बातें सुनने लगा| आखिर पार्किंग की समस्या तो शहर में ज्यों की त्यों बनी हुयी थी, बल्कि हालात पहले से बदतर ही हो रहे थे| स्कूटर खड़े करने वाले फ्लैटों में एक एक घर में रहने वाले लोग दो से चार कारें  रखने लगे थे|

‘एक युवक ने अपनी पार्किंग की जगह खड़ी कार की ड्राइविंग सीट की तरफ वाले दरवाजे में खिड़की के कांच के पास अपना हथियार घुसा दिया और कुछ पल बाद ही उसने कार का दरवाजा खोल दिया| उसने हेण्ड ब्रेक खोला और दोनों युवकों ने कार को आगे धकेल कर बाड़ के पास लगे पाइप से सटाकर खड़ा कर दिया और हेण्ड ब्रेक पहले की तरह लगा कर दरवाजा बंद कर दिया| एक युवक ने कार के दोनों साइड मिरर हाथ मारकर तोड़ दिए|  दूसरे युवक ने उस कार के पीछे अपनी कार पार्क कर दी| अब आगे वाली कार न पीछे निकल सकती थी और न ही आगे जा सकती थी| युवकों ने कार को अपनी कार और बाड़ के बीच ट्रैप कर दिया था|

दोनों युवक अपने घर के अंदर चले गये|

सब तरफ शान्ति थी| सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था| मैं भी घर में चला गया| टीवी देखने लगा| पर मन नीचे सड़क पर ही लगा हुआ था| किसकी कार होगी, कैसे निकालेगा? क्या इन् लोगों में झगडा होगा…जैसे प्रश्न दिमाग में उठ रहे थे| बीच बीच में बालकनी में जाकर नीचे झाँक लेता था| कार अभी भी सेंडविच बनी खड़ी थी| तकरीबन चालीस-पैंतालीस मिनट बाद बाहर गया तो देखा कि एक युवती उस कार के पास खड़ी इधर उधर देख रही थी| उसने देख ही लिया था कि उसकी कार के साइड मिरर तोड़ दिए गये थे और कार को खिसका कर आगे कर दिया गया था| ऐसा लगता था कि वह किसी से मिलने वहाँ आयी थी और खाली जगह देख कर कार यहाँ खड़ी कर गई थी| सड़क पर अब भी कोई नहीं था| लगभग निश्चित था कि जिस घर में वह मिलने आई थी वह उस ब्लॉक में न होकर पास वाले किसी ब्लॉक में था| तभी उसे छोड़ने कोई नहीं आया था, वह अकेली ही वहाँ आई होगी, अपने मेजबानों से उनके घर के बाहर ही विदा लेकर|

युवती ने अपनी कार के पीछे खड़ी कार का मुयायना करना शुरू किया| उसे पीछे वाले शीशे पर मकां नंबर वाला स्टीकर दिख गया होगा| उसने अपने पर्स से छोटी से टार्च निकाल कर उसे पढ़ा और इधर – उधर  मकानों के नंबर पढकर वह युवकों के घर की तरफ चल पड़ी|

मेरी बालकनी के एकदम नीचे ग्राउंड फ्लोर पर युवकों के घर का दरवाजा होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था| पर दरवाजा खुलने और कुछ पल के बाद ऐसी अस्पष्ट आवाजें आईं जिससे लगा कि युवती और उन युवकों के बीच बहस जैसा कुछ घटित होता प्रतीत हो रहा था| कुछ पल ऐसी ही अस्पष्ट आवाजें आती रहीं और फिर दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया| युवती वापिस अपनी कार के पास नहीं आई| मैं काफी देर वहाँ खड़ा रहा पर युवती को आते नहीं देखा|

एक घंटे बाद भी युवती की कार वहीं फंसी खड़ी थी| रात के लगभग बारह तक भी कार वहीं खड़ी थी| मैं टीवी देखते देखते किसी समय सो गया| सुबह पांच बजे नींद खुली तो सबसे पहले बालकनी में जाकर नीचे झांका तो देखा कार वहाँ नहीं थी| युवकों की कार भी वहाँ नहीं थी| मतलब वे भी या तो रात में ही या सुबह सुबह ही कहीं चले गये थे|  पर अगर युवकों ने बारह बजे के आसपास भी अगर युवती को कार निकालने दी होगी तब भी एक घंटे से ज्यादा समय वह उनके घर में उपस्थित रही होगी| मुझे ऐसा ख्याल आया कि युवती के साथ कुछ न कुछ गलत तो कल रात हुआ था|

दिन में नीचे सड़क पर गया तो ऐसे ही युवकों के घर की तरफ झाँक लिया पर वहाँ ताला लगा था| शाम को और फिर रात को भी उनकी कार नीचे नहीं दिखाई दी| इसका मतलब था वे घर नहीं लौटे थे| उससे अगले रोज भी उनकी कार नहीं दिखाई दी|

तीन-चार दिन बाद मैं शहर से बाहर चला गया पर उस रात की घटना मेरे जेहन में समाई रही| दस-बारह दिन बाद लौटा तो पता चला कि चार-पांच दिन पहले एक रोड एक्सीडेंट में ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक मर गये|

मुझे हमेशा लगता रहा कि उस रात कुछ न कुछ गडबड तो युवकों ने उस युवती के साथ की थी और शायद उस एक्सीडेंट के पीछे भी उस रात की घटना का कोई हाथ हो| घर आकर मैंने उस रात के बाद के दिनों के सारे अखबार खंगाल डाले…क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं न कहीं शायद किसी युवती की आत्महत्या या ह्त्या की कोई खबर जरुर छपी होगी| खबर मुझे पढ़ने को मिली उस रात के बाद वाले पांचवे दिन के अखबार में जिसमें जिक्र था एक सभ्रांत परिवार की युवती की आत्महत्या का| खबर के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों से वह बेहद परेशान थी|

इतने सालों में मैंने कभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया| पर पिछले साल निर्भया कांड के बाद उस रात की स्मृतियाँ मेरे दिमाग में बार बार उथल पुथल मचाने लगीं| आज जाने क्यों तुमसे सब कह दिया|’

अमित उनकी कहानी में खोया हुआ था कि बस आकर रुकी और उसका ध्यान बस की ओर गया| वह बस में चढ़ने के लिए बैंच से उठा तो देखा कि बुजुर्ग बस स्टैंड से उतर कर सड़क पर चलने लगे थे| वह बस में चढ़ गया और पीछे देखा तो अँधेरे में एक साया जाता हुआ दिखाई दिया|

“हैलो, भाईसाहब उतरना नहीं है क्या| बस इससे आगे नहीं जायेगी|”

अमित हडबडा कर उठा तो पाया कि वह बस में बैठा हुआ था और कंडक्टर उसे झिंझोड कर उठा रहा था| वह पसीने से तरबतर था|

ओ माई गॉड!

तो क्या वह सो गया था? सपना देख रहा था? यह सब कुछ सपने में घटा? बस से उतर कर उसने इधर उधर देखा मानो अभी भी महसूस करने की कोशिश कर रहा हो कि बुजुर्गवार सपने में नहीं वास्तव में उससे मिले थे|

  …[राकेश]

दिसम्बर 13, 2013

सफाई बाबा…

safai baba 2-001चौंकना स्वाभाविक बात है जब सुबह उठकर हमेशा गंदी रहने वाली सड़क साफ़ दिखाई दे| ऐसा नहीं कि पहले बहुत साफ़ सुथरे रहते थे भारत के शहर और गाँव-कस्बों के गली-कूचे और मोहल्ले, पर पौलीथीन बैग्स के आगमन के बाद और लगभग हर सामान छोटे छोटे प्लास्टिक पाउच में मिलना आरम्भ होने के बाद तो हिन्दुस्तान की हर जगह की हर सड़क सिर्फ कूड़े से लबलबाती नज़र आती है|

ऊपर से भारतीयों का कुत्ते पालने का शौक| रहने को फ़्लैट भी मुश्किल से मयस्सर हो पा रहे हैं पर बंगलों में रहने वाले अंग्रेजों के शौक हम भारतीयों ने पोषित कर लिए हैं| और फिर दिक्कत क्या है – कुत्तों से गंदा करवाने के लिए सड़कें तो हैं ही| कुत्ते को सड़क पर लेकर निकल आइये और इधर उधर देख जब कोई न देख रहा हो तब कुत्ते को कहीं हल्का होने दीजिए| पुरुष तो पहले ही कहीं भी हल्के होने के लिए खड़े हो ही जाते हैं, उनके लिए ( और शायद सरकारों के लिए भी, जो इस ओर ध्यान नहीं देती और जन-सुविधाएँ नहीं बनवातीं) तो पूरा देश शायद मूत्रालय ही है|

कुत्तों के लिक्विड यूरिया के वेस्ट ट्रीटमेंट का जिम्मा सड़क पर खड़े वाहनों का होता है और कुत्तों के सौलिड वेस्ट मैनेजमेंट का भार सड़क, सड़क किनारे की कच्ची-पक्की जमीन (फुटपाथ) और नीचे देख न चल पाने वाले लोगों के जूतों और चप्पलों पर रहता है|

भांति भांति के कूड़े घरों से निकल सड़कों की शोभा बढाते रहते हैं| किसी राज्य में किसी की सरकार हो, नगर निगम किसी दल का हो या निर्दलियों से भरा हो, सफाई अब इनके कर्तव्यों से बाहर की वस्तु है| इनके पुनीत कर्तव्य क्या हैं इसे उनके मतदाता भी नहीं जानते जो इन्हें चुनते हैं| ऐसे ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनकी सात पुश्तों में किसी ने कभी झाडू को हाथ नहीं लगाया पर उनके निठल्ले रिश्तेदारों के नाम सफाई कर्मचारियों को निर्धारित वेतन हर माह आ जाता है| सफाई तो किन्ही और लोगों का काम है|

नवम्बर के अंत और दिसम्बर के शुरू में ठण्ड न इतनी अधिक होती है कि रात या सुबह घर में अंदर ही दुबक कर बैठे रहें और न ही इतनी कम होती है कि सड़क पर ही चहलकदमी करते रहें|

हर आदमी की अपनी सनक होती है और उसका दिमाग किसी किसी मामले में औरों से ज्यादा चलता है| एक सुबह ऐसा पाया कि घर के सामने वाली सड़क अपेक्षाकृत साफ़ लग रही है तो हल्का आश्चर्य हुआ| कालोनी वाले तो चौकीदार तक के लिए चन्दा देने को तैयार नहीं सफाई कर्मचारी रखने के लिए कौन जेब ढीली करेगा?

जब अगली सुबह पहले से भी ज्यादा साफ़ सड़क नज़र आयी तो आश्चर्य की मात्रा भी बढ़ गई|

अडोस पड़ोस में एक दो से पूछा तो उन्होएँ साफ़ सड़क देख संतोष जाहिर किया और मामले में रूचि न ली| एक सज्जन ने सोचा और विचार प्रकट किया कि हो सकता है हर व्यक्ति ने अपने घर के बाहर सफाई की हो या करवाई हो| उनसे पूछा कि क्या उन्होंने ऐसा किया अपने घर के सामने तो उन्हें अपने सिद्धांत की सच्चाई पर सौ प्रतिशत संदेह हो आया| वे भी जानते थे कि इस कालोनी के लोग वे हस्ती हैं जो  मौक़ा मिले तो एक हफ्ते में ग्रीस का गाजीपुर डेरी बना डालें|

लगातार तीन सुबह जगह जगह कूड़े से सजी गली अगर साफ़ दिखाई दे तो आँखों से जिसे सही दिखता हो और दिमाग की खिड़की जिसकी खुली हो उसे तो बात की गंभीरता दिखाई देगी ही|

इन सफाई हादसों की चौथी रात, कोई पौने बारह बजे का समय होगा, कम्प्यूटर पर पढते पढते और काम करते करते आँखें भी थक गई थीं और हाथ की मासपेशियाँ भी एक खुली अंगड़ाई का खिंचाव मांगती थीं| हर ओर लगभग सन्नाटा सा पसरा था|

उठकर पानी पीया और मध्यम  आवाज में एफ.एम रेडियो चालू किया तो प्रस्तोता अपनी लगातार बकबक से कूड़ा बिखेर रहा था पर अच्छी बात यही कि ऐसे कूड़े में फेंक देने के हकदार कार्यक्रम में भी बीच बीच में अच्छे गीत  सुनने को मिल जाते हैं|

प्रस्तोता की तथ्यहीन बकवास बंद हुयी तो गीत शुरू हुआ…  श्री 420 फिल्म का शैलेन्द्र लिखित, मुकेश द्वारा गाया  गीत शुरू हुआ|…

मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंग्लिस्तानी

सर पे लाल टोपी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

….

गीत के सौंदर्य में मन खोया ही था कि इसकी एक पंक्ति  ‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पे अपना सीना ताने’ सुनकर दिमाग की चेतना के दरवाजे खुलो गये और सड़क की सफाई की बात याद आ गयी|

इच्छा हुयी कि जाकर सड़क को देखा जाए| कमरे से बाहर निकल पाया कि अच्छा अन्धेरा था| मेन गेट खोल कर सड़क पर पहुंचना हुआ तो  देखा कि घर के सामने ही नहीं अगल बगल तीन चार स्ट्रीट बल्ब नहीं जल रहे थे| गली के इस छोर से उस छोर तक कोई हलचल न दिखाई दी| मेन गेट बंद करके गली के घर के पास वाले मुहाने तक पहुँच अगली गली के सामने बने छोटे से पार्क तक जाने की इच्छा हुयी| पार्क भी सुनसान पड़ा प्रतीत होता था| पार्क न बहुत बड़ा था और न ही छोटा| चारों कोनों में एक एक स्ट्रीट लाईट जाली हुयी थी जो पार्क में थोड़ा थोडा प्रकाश बिखेर रही थीं| पार्क में बनी एक बैंच पर बैठना हुआ तो उसकी ठंडक ने सूचित किया कि मौसम में ठण्ड बढ़ती ही जायेगी दिन प्रति दिन|

बैठे बैठे आँखें बंद हो गयीं| कुछ समय बाद एकदम से चेतना लौटी तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही पलों के लिए सही पर एक गहन निद्रा छा गई थी मन-मस्तिष्क पर| आँखें खोलीं तो पार्क के सामने वाले हिस्से पर पैदल चलने के लिए बने पक्के रास्ते पर एक साया हिलता डुलता दिखाई दिया| पहले तो वहीं बैठे बैठे देखने, जानने और पहचानने की कोशिश की कि इस वक्त कौन हो सकता है पार्क में| दूरी और सर्द रात के अँधेरे के कारण कुछ साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दिया तो उत्सुकतावश उस ओर बढ़ चला|

साये से थोड़ा दूरी तक पहुँच रुक कर उसे देखा तो पाया कि वह झाडू से रास्ते को बुहार रहा था और रास्ते में पड़े कूड़े को उठा एक थैले में डाल  रहा था| इस ओर उसकी पीठ थी सो उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था पर उसके शरीर से ऐसा अनुमान लगाना मुश्किल न था कि साया किसी बुजुर्ग का था|

और पास पहुंचना हुआ तो आहट पाकर साया पलटा| वे वाकई एक बुजुर्गवार थे जो श्वेत वस्त्र धारण किये हुए पार्क की सफाई कर रहे थे| उनका चेहरा शान्ति के नूर से कांतिमान था|

अपने आप ही मुँह से निकला,”बाबा!… इतनी रात को आप यहाँ सफाई कर रहे हैं?”

बुजुर्ग ने मुस्कराकर देखा और काम में मशगूल रहे|

क्या आपने ही इस कालोनी की सड़कें पिछले दिनों साफ़ की थीं?

हाँ, बेटा!

आप अगर बुरां न माने, तो क्या आपसे पूछ सकता हूँ कि आप क्यों इस सफाई के काम में लगे हुए हैं और वह भी रात को?

वे रुक गये, और अपनी गहरी आँखों से देखते रहे| शायद उन्हें उत्सुकता सच्ची लगी हो, वे बोले आओ बेंच पर बैठते हैं|

बेंच पर बैठ कर वे बोले,”सीधे मुद्दे की बात करें तो इर्द-गिर्द सफाई हो तो अच्छा लगता है कि नहीं”|

जी, बिलकुल मन प्रसन्न हो जाता है सफाई देख कर और अगर सुबह सबह सफाई ही रहे आँखों के सामने तो दिन भर एक खुशनुमा एहसास छाया रहता है मन पर|

सफाई तो हरेक आदमी ओ अच्छी लगती होगी पर क्या कारण है कि हमारा देश एक कूड़ेदान में परिवर्तित होता जा रहा है|

जी, आपने सही कहा| चारों तरफ गन्दगी का ही साम्राज्य ही दिखाई देता है| शायद हम लोग खुद सफाई रखते नहीं है और इस काम के लिए जिम्मेदार विभागों के पास या तो कर्मचारी नहीं है, या अगर वे हैं तो वे काम करना नहीं चाहते या विभागों के पास पैसा नहीं है| या शायद नये दौर के कूड़े से निबटने के लिए हमारे पास न तो तकनीकी योग्यता है न ही दूरदृष्टि| अतः हमने अपने को कूड़े के साथ रहने के लिए अभिशप्त मान लिया है| घर के बाहर नालियां अत जाती हैं, बड़े नाले सडांध मारते रहते हैं,  पर हम घर बैठे सिर्फ इस बारे में नाक मुँह सिकोड़ कर शिकायत करते रहते हैं| करते कुछ नहीं| फिर एक बात और भी है कि हरेक आदमी के पास वक्त की कमी है और लगभग हरेक व्यक्ति सोचता है कि वही क्यों गंदगी में हाथ डाले|

मेरे अंदर शायद इस समस्या को लेकर बहुत कुछ दबा हुआ था इसलिए बुजुर्ग के पूछने पर वह लावे की तरह बह निकला|

अच्छा बेटा, एक बात बताओ| क्या किसी को अपने आप को साफ़ करना गंदा लगता है?

नहीं, हर आदमी अपने शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है और इस ओर प्रयास करता ही है|

माता-पिता को क्या गंदा लगता है अपने बच्चे को साफ़ करना? या दूसरे शब्दों में कहें तो क्या गंदा हुआ बच्चा क्या माता-पिता को खराब लगता है? क्या उन्हें अच्छा महसूस नहीं होता अपने बच्चे को साफ़ करके? क्या माता-पिता का वात्सल्य भाव महत्वपूर्ण नहीं होता|

जी हाँ, आपने एकदम सही कहा|

बस बेटा, एक तो मुझे ऐसा लगा कि हमारा देश बेहद गंदा होता जा रहा है और इस काम की शुरुआत लोगों को खुद ही करनी पड़ेगी| मैं किससे कहता, किसे साथ लेता, मैंने अपने आप जो मुझसे हो सकता था उसे करने निकल पड़ा| दूसरे अब इस काम को करते करते मुझे इतना अरसा हो गया है कि मेरे अंदर ऐसी भावनाएं जन्म ले चुकी हैं जहां मुझे ऐसा ही लगता है कि मैं अपने बच्चों को ही साफ़ कर रहा हूँ| मेरे अंदर वात्सल्य भाव घर कर चुका है| मैं दिन-रात कभी भी समय पाकर किसी न किसी जगह सफाई में लग जाता हूँ| अब यही मेरे बचे जीवन का लक्ष्य है|

पर आप अकेले क्या क्या कर सकते हैं?

जितना कर सकता हूँ उतना तो करूँगा ही मरते दम तक| फिर मुझे लगता है कि जैसे गंदगी में रहने की आदत हो गयी है ऐसे ही जहां भी मैं कुछ दिन सफाई करता हूँ वहाँ रहने वाले लोगों को सफाई में रहने की आदत हो जायेगी और शायद किसी के अंदर सफाई करने की ज्योति जाग्रत हो जाए| शायद इस जगह तुम ही इस विरासत को आगे ले जाओ|

वे चुप हो गये|

मेरे मन ने प्रण किया कि उनका सफाई का यह अभियान अब रुकना नहीं चाहिए| क्या समिति बनाकर पूरी कालोनी की सफाई का जिम्मा लिया जाए?

वहीं खड़े खड़े प्रण ये भी किये कि जल,थल और वायु तीनों में से किसी को भी अपनी ओर से गंदा और दूषित नहीं करूँगा और ‘सफाई बाबा’ के इस मिशन को और आगे बढाने और ज्यादा लोगों में फैलाने का कार्य करूँगा|

मुझे मौन विचारों में मग्न देख, वे बोले|

अच्छा बेटा अब मैं अपना काम खत्म कर लूँ| उम्र हो चली है, बाद में कल को जीने के लिए ऊर्जा पाने के लिए आराम भी करना है|

वे उठे और सफाई के काम में लग गये|

समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? क्या उनका हाथ बटाऊँ? पर सब कुछ इतना अप्रत्याशित ढंग से घटित हुआ था कि किंकर्तव्यविमूढ़ ही खड़ा रहा|

कुछ पल बाद होश आया तो देखा वे पार्क से जा चुके थे|

घर आकर सो गया|

सुबह सोकर उठा तो लगा कि रात शायद कोई सपना देखा था| भागकर पार्क गया तो पार्क का फुटपाथ वाकई साफ़-सुथरा था|

महसूस हुआ सपना तो नहीं था|

रात को फिर से पार्क, और आसपास की सड़कों पर उन्हें खोजा पर वे दिखाई नहीं दिए| अगली रात फिर से जाकर देखा पर उनसे मुलाक़ात न हो पायी|

शायद किसी और जगह अलख जगा रहे होंगे| मेरी तरह उन्हें कई और लोग मिलते रहे होंगे और मिलते रहेंगे और वे सबको अपने इरादों से स्वच्छ करते ही रहेंगे|

…[राकेश]

नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

नवम्बर 13, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1) से आगे…

देखिये कामना जी आप इसे मेरे द्वारा आपका मजाक उड़ाने की चेष्टा के रुप में न लें अतः यहाँ सीधे-सीधे रुप में जोड़ना चाहता हूँ यौन- शिक्षा के मुद्दे को, जो कि सम-सामायिक मसला है और आपकी कहानियों की नायिकाओं के शारीरिक सम्बंधों को लेकर दृष्टिकोण से सीधे-सीधे सम्बंध रखता है।

अनिल जी, यौन शिक्षा एक अलग मामला है। उन्होने आँखें तरेर कर गुस्से से कहा।

पर फिर भी किशोर लड़कियाँ तो शिक्षा लेंगी ही आपकी कहानियों से कि खूब शारीरिक सम्बंध बनाओ, कुछ नहीं होता, सब वैसे ही डराते हैं। और यौन शिक्षा अलग मुद्दा नहीं है। आपने खुद ही अपने एक लेख में एक सर्वे को कोट करते हुये लिखा है कि कैसे गरबा खेलने के महीने के बाद कुछ प्रांतों में गर्भपात करवाने के मामलों में बढोत्तरी हो जाती रही है और इस बरस उन प्रांतों में गरबा के महीने में गर्भ निरोधक सामग्रियों की बिक्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है। तो एक तरफ तो इतनी जागरुकता आ रही है और आप जाने क्या कहना चाहती हैं अपनी कहानियों के माध्यम से।

लेखिका ने कुछ हथियार डालते हुये कहा,” आपके कुछ तर्कों से मैं सहमत हूँ पर मौटे तौर पर अभी भी कहूँगी कि कहानी के चरित्र समाज से ही लिये जाते हैं और अगर ये चरित्र समाज को गलत रुप में प्रभावित करते तो अज्ञेय, जैनेंद्र, यशपाल, मण्टो, और मृदुला गर्ग आदि इतने प्रसिद्ध लेखक न बनते। इन लेखकों ने भी स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधों को खुलकर अपनी कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया है। और भी बहुत सारे लेखक एवम लेखिकायें हैं जिन्होने ऐसा किया है।

कामना जी, जैनेंद्र जी का साफ साफ आग्रह अपनी नायिकाओं को घर से बाहर के क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष स्थापित करने का था। वे ऐसी महिलायें स्थापित करना चाहते थे जो अपने फैसले खुद ले सकें और पुरुषों की ही भाँति समाज निर्माण में भागीदारी कर सकें। अज्ञेय, नदी के द्वीप में अगर रेखा को विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंधों में सलंग्न होते हुये दिखाते हैं तो वे उसे पहले गर्भवती होने और बाद में गर्भपात की यातनामयी वेदना से गुजरते हुये भी दिखाते हैं। वे बहुत जागरुक और जिम्मेदार लेखक के रुप में सामने आते हैं। और आप ऐसा एक भी उदाहरण दे दें जहाँ आपने पाया हो कि कोई पुरुष मण्टो की खोल दो या ठण्डा गोश्त जैसी कहानियाँ पढ़कर कामुकता के भाव से जाग्रत हो गया हो।

लेखिका इस विश्लेषण पर कुछ और गुस्से से भर गयीं| उन्हें आभास हो गया कि उनके लेखन की तुलना इन्ही लेखकों के लेखन से आने ही वाली है| वे चुप रहीं|

कामना जी,  दर्पण झूठ नहीं बोला करता| आप कहती हैं कि कहानियां और चरित्र समाज से ही लिए जाते हैं और कहानियां समाज को दर्पण दिखाती हैं| कहानियां समाज को दर्पण तब दिखाती हैं जब वे एक जिम्मेदार भूमिका निभाएं| क्षमा कीजियेगा आपकी ज्यादातर कहानियां आजकल के सनसनी फैलाने के तौर तरीकों का अनुसरण करती ज्यादा दिखाई देती हैं| आप अपनी किसी भी एक कहानी का उदाहरण दे दें जहां आपकी कहानी की नायिका या नारी चरित्र ने विवाह पूर्व और विवाह से बाहर जाकर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए हों और आपने उस चरित्र को ऐसी संभावना के आसपास से भी गुजारा हो जहां इस तरह के संबंधों से उत्पन्न दुष्परिणामों से उनका पाला पड़ता हो| आपने तो ऐसे संबंधों के इर्दगिर्द आनंद का ऐसा मिथ्या वातावरण रचा है जैसा कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोर पाठकों के लिए झूठे रोमांटिक किस्से कहानी और उपन्यास रचते रहे हैं|

लेखिका का चेहरा क्रोध से अजीब से भूरेपन से रंग गया था| वे कुछ कहना चाहती थीं पर शायद उन्हें शब्द नहेने मिल पा रहे थे या वे अपने गुस्से के कारण नहीं बोल पा रही थीं| उनके हाव भाव ऐसे हो चले थे मानो आँखों से ही भस्म कर देंगी|

उनकी एक शिष्या उनके बचाव में मैदान में कूदी और तीखे तेवर के साथ बोली|

कहानी समाज के घटनाक्रमों से उठायी जाती हैं और लेख इनके व्यक्तिगत विचार को प्रकट करते हैं| अतः आपके द्वारा इनकी आलोचना गलत है|

महोदया पहले तो आप एक सुधार कर लें मैं इनकी आलोचना कर रहा हूँ| में कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ जैसा कि मैंने शुरू में भी निवेदन किया था कि कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर महिला रचनाकारों को खोजने चाहियें| आज सुबह ही कार्क्रम में मंच से तो कामना जी भी औरों के लिखे हुए पर पचास किस्म के प्रश्न उठा रही थीं|

शिष्या के तेवर कुछ कमजोर पड़े और वह पहले से धीमे स्वर में बोली|

लेखक का दायित्व समाज सुधार का तो होता नहीं|

महोदया, हो सकता है आपकी बात सही हो पर मुझे लगता है कि यह बात तभी तक सच है जब तक कि लेखक कल्पित संसार में विचरण कर रहा है और इसी संसार में कविता,कहानी और उपन्यासों के रचनाशील कर्म में सलंग्न है पर अगर वही लेखक लेखों के द्वारा नैतिक-अनैतिक के सवाल पर समाज में चीख पुकार मचा रहा है और अपने को नैतिकता का ठेकेदार के रूप में प्रचारित कर रहा है तो समाज को भी देखना होगा कि ऐसा रचनाकार असल में रच क्या रहा है और समाज एं अपने लेखन से क्या फैला रहा है| अभी तो हो क्या रहा है कि नशा बेचने वाले खुद ही ढोल पीट रहे हैं कि  लोग नशे के आदि हो रहे हैं| अरे इतना ख्याल है समाज का तो नशा बेचना और बनाना बंद करो पहले|

शिष्या ने अपनी गुरु के तमतमाते चेहरे को देखा और नये शब्दों से आक्रमण करना चाहा, पर तर्क के अभाव में कम शब्दों के साथ शिकायती बन गयी|

यह तो लेखक की व्यक्तिगत आलोचना हो गयी|

…जारी

…[राकेश]

नवम्बर 10, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1)

विरोध की हल्की सी झलक पाते ही लेखिका कम सम्पादक कम विभागाध्यक्ष महोदया – प्रोफ़ेसर कामना बिफर उठीं। चेहरा आवेश में लाल हो गया। मेज पर रखे मोबाइल को उठाकर उसमें कुछ देखा और फिर उसे वापस मेज पर रखते हुये बोलीं,” देखिये अनिल जी, कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी समाज को दर्पण दिखाती है और लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों को प्रकट करते हैं।”

कुछ हद तक आपका कहना ठीक है कामना जी परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आप सोचकर बतायें कि क्या कहानी के पात्र स्वतंत्र होते हैं? कौन उन्हे विचार देता है? क्या वे अपनी मनचाही दिशा में भ्रमण करने के लिये स्वतंत्र होते हैं? या लेखक उन पर उनकी प्रत्येक किस्म की गति, चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है?

लेखिका कुर्सी पर बैठे बैठे बिलबिलाने लगीं, उनका क्रोध और बढ़ गया। ऊँचे स्वर में कहने लगीं।

लेखक समाज में से ही तो चरित्रों को लेता है, वह उन्हे संवाद और मनोस्थिति देता है पर वह उन्हे ऐसी दिशा में ही नियंत्रित करता है जिससे समाज को कुछ बातें कह सके।

कामना जी, अगर कहानी समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने का ही नाम है फिर तो यह काम एक साधारण पत्रकार बहुत सस्ते में कर देता है और अपने लिखे पर उसे ऐसा बहुत ज्यादा गर्व भी नहीं होता जैसा कि अपनी एक भी कहानी कहीं छपने वाला लेखक दर्शाने लगता है। पत्रकार के व्यवहार में तो यह चाह भी नहीं दिखायी देती कि उसे चिंता है कितने लोग उसके लिखे को पढ़ेंगे और इस पर उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं।

अनिल जी, मैं आप से फिर से कह रही हूँ कि कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी में जहाँ लेखक का कोई सामाजिक दायित्व नहीं होता वहीं लेख में वह अपने नितांत व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर सकता है।

तो फिर कामना जी, डबल स्टैंडर्ड वाली बात कहाँ तक झूठ है? एक तरफ तो आपकी कहानियों के चरित्र खासकर महिला चरित्र विवाहपूर्व और विवाहेत्तर सभी प्रकार के शारीरिक संबंधों में सलंग्न रहते हैं और दूसरी ओर आपके लेख हद दर्जे की चिंता में घुले जाते हैं कि लड़कियों को इन सब तरह के शारीरिक सम्बंधों से दूर रहना चाहिये। आपकी लगभग हर कहानी की नायिका विवाह से पूर्व और विवाह के बाद वैवाहिक जीवन से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने में सलंग्न दिखायी देती है पर वास्तविक जीवन की तरह वह कभी भी गर्भवती नहीं होती। ऐसा क्यों? अब यह मानने का तो कोई कारण है नहीं कि आपकी कहानियों में एकदम से स्थापित इन शारीरिक सम्बंधों की मुठभेड़ों से निबटने के लिये आपके नायक या नायिका अपने साथ गर्भ निरोधक साधन साथ लेकर घूमते होंगे? आपकी कहानियाँ ऐसा तो कोई संकेत नहीं देतीं। क्या किशोर पाठक आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसी प्रेरणा नहीं लेगें कि ठीक बात है कि विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंध हानिकारक नहीं हैं लड़कियों के लिये।

अनिल जी, मेरी नायिकायें पच्चीस की वय को पार कर चुकी वयस्क नारियाँ हैं जो अपना भला बुरा बखूबी समझती हैं।

कामना जी सच पूछें और मुझे सच बोलने की अनुमति दें तो मेरी इच्छा हो रही है कि मैं इस बात का जवाब कुछ यूँ दूँ कि एकदम से हुये इन सैक्स एनकाऊंटर्स में नारी पात्रों की परिपक्वता गर्भ निरोधक का कार्य तो करेगी नहीं। शुक्राणु और अंडाणु को क्या मतलब नर-नारी की मानसिक परिपक्वता से? वे तो मिलन का मौका छोड़ने से रहे और देखा तो ऐसा गया है कि अगर युगल अविवाहित हैं तो इनके मिलन कुछ जल्दी ही हो जाते हैं।

अनिल ने लेखिका की ओर देखा तो वे गुस्से से उसकी ओर ही देख रही थीं और उनके इर्द गिर्द बैठी और खड़ी उनकी शिष्यायें भी गुस्से से भरी साँसें और क्रुद्ध दृष्टिपात उसकी ओर फेंक रही थीं।

उन्हे हल्के मूड में लाने के लिये अनिल ने मुस्कुराते हुये कहा।

आपने देखा ही होगा प्रकाश झा की राजनीति में कि भारत में स्त्री-पुरुष की फर्टीलिटी पॉवर कितनी ज्यादा है! इस फिल्म की तीन स्त्रियाँ एक ही बार के संसर्ग में गर्भवती हो गयीं और विवाह पूर्व बनाये ऐसे संबध ने कितना बड़ा हत्याकांड करवा दिया। प्राचीन काल से ही महाभारत आदि भी इस बात की गवाही देते रहे हैं।

अनिल के इस उदाहरण से न चाहते हुये भी लेखिका और उनकी शिष्य मंडली के मुख मंडलों पर तिर्यक रेखायें खिंच गयीं पर वे ढ़ील देना नहीं चाहती थीं सो गम्भीर मुद्रा ही बनाये रहीं।

…जारी

…[राकेश]

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

अगस्त 25, 2013

मैं वर्तमान हूँ !

मैं जीवन के बीते समय पर पछतावा कर रहा था

और आने वाले समय के प्रति भयभीत हो रहा था,

अचानक, मैंने सुना,

मेरा ईश्वर बोल रहा था ,

“मेरा नाम “वर्तमान” है”|

वह रुका, मैंने इन्तजार किया,

उसने फिर बोलना शुरू किया,

“जब तुम भूतकाल में जीते हो,

बीते समय में की गई गलतियों और पछतावों के साथ,

तब मुश्किल हो जाती है मेरे लिए,

मैं ऐसे माहौल में नहीं रह सकता|

मेरा नाम ” भूत” नहीं है|”

“जब तुम भविष्य में जीते हो,

आने वाली समस्याओं और भय की कल्पनाओं के साथ,

तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है,

मैं वहाँ भी नहीं रहता,

मेरा नाम “भविष्य” नहीं है|”

जब तुम इसी क्षण में,

-जो तुम्हारे सामने है,

जीते हो,

तब कतई कोई मुश्किल मेरे लिए नहीं होती,

मैं यहीं रहता हूँ,

मेरा नाम “वर्तमान” है|”

[I Am by Helen Mallicoat]

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