Archive for ‘राकेश’

अप्रैल 1, 2016

तो तुम लेखक बनना चाहते हो ?

अमेरिकन पिता और जर्मन माता की संतान के रूप में सन १९२० में जन्मे Charles Bukowski २४ वर्ष की उम्र में अपनी पहली कहानी छपवा पाए और उनकी पहली कविता तब छपी जब वे ३५ साल के थे| ३९ वर्ष की आयु में उनकी कविताओं की पहली पुस्तक छपी और १९९४ में मृत्यु होने तक गद्य और पद्य दोनों विधाओं में वे ४५ पुस्तकें लिख चुके थे| १९४१ में लेखक बनने के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी लेकिन १९४६ तक लगातार लिखने के बावजूद उन्हें अपने लिखे को छपवाने में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई और इस असफलता ने १९४६ में उनसे लेखन को दरकिनार कर जीवन यापन के लिए अन्य बहुत से कार्य करवाए| इस असफलता को पचा नहीं पाने के कारण वे शराब के नशे में डूब गये और दस सालों तक तब तक शराब के चंगुल में रहे जब तक वे गंभीर रूप से अल्सर के रोगी न बन गये| उन्होंने लेखन को फिर से अपनाया और इस बार कलम उठा कर नहीं रखी|हालांकि जीवन को सहारा देने के लिए वे अन्य क्षेत्रों में काम करते रहे पर जीवन पर्यंत लेखन को उन्होंने नहीं छोड़ा| उनकी एक बेहद प्रसिद्ध और प्रभावशाली कविता है – So you want to be a writer?

प्रस्तुत है मूल अंग्रेजी की कविता का हिन्दी रूपांतरण :

यदि तुम्हारे भीतर से यह विस्फोट के रूप में बाहर निकल कर नहीं आता

तो लिखने की तीव्र इच्छा और तमाम अन्य कारण

इतने पर्याप्त नहीं कि तुम लिखो|

 

जब तक कि यह तुम्हारे दिल और दिमाग से

और मुँह और आँतों से

अपने आप बाहर निकलने के लिए तत्पर नहीं होता,

तुम्हे इसे लिखने का अधिकार नहीं है|

 

यदि तुम्हे उचित शब्दों के इंतजार में

अपने कम्प्यूटर स्क्रीन को ताकते हुए

या टायप राइटर को घूरते हुए

घंटो बैठना पड़ता है,

तो तुम्हे बिल्कुल ही लिखना नहीं चाहिए|

 

यदि तुम इसलिए लिखना चाहते हो कि

लेखन से तुम्हे संपत्ति या प्रसिद्धि मिलेगी

तो मत लिखो|

या कि तुम इस मोह में लिखना चाहते हो कि

बहुत सी स्त्रियों को तुम अपने लेखन के मोहपाश में बांध कर

अपनी शैया पर लाकर अंकशायिनी बना पाने में कामयाबी पा लोगे

तो तुम हरगिज ही न लिखो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को बैठ कर

बार बार सुधार कर पुनर्लेखन करना पड़े

तो मत लिखो|

 

यदि तुम किसी और जैसा लिखना चाह रहे हो,

तो लिखना भूल ही जाओ|

 

यदि तुम्हे उस वक्त का इंतजार करना पड़े,

जब लेखन तुम्हारे भीतर से गर्जना करता हुआ बाहर आए

तो तुम धैर्य से उस घड़ी का इंतजार करो|

और यदि यह गर्जना करता बाहर नहीं निकलता तो

तुम किसी और उचित काम में अपनी ऊर्जा का उपयोग करो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को पहले अपनी पत्नी, या गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड

या अपने माता-पिता या किसी अन्य को पढ़ कर सुनाना पड़े,

अपने लिखे पर उनका अनुमोदन लेना पड़े,

तब अभी तुम लेखन के लिए अंकुरित नहीं हुए हो,

इसे स्वीकार कर लो कि अभी तुम तैयार नहीं हो|

 

अन्य बहुत से लेखकों की तरह मत बनो,

उन हजारों लोगों की तरह मत बनो

जो स्वयं को लेखक कहते हैं,

बोरियत से भरा और बोझिलता से भारी हो चुका लेखन मत करो,

दिखावा मत करो,

अपने ही प्रति प्रेम से मत घिर जाओ|

 

अगर ऐसे ही लक्षणों से तुम ग्रसित हो

तो स्पष्ट जान लो,

दुनिया भर में पुस्तकालय,

तुम्हारी तरह के कथित लेखकों के कारण पहले से ही निद्रावस्था में हैं,

उनकी मूर्छा में बढोत्तरी मत करो|

मत लिखो|

 

यदि तुम्हारी आत्मा से लेखन

एक राकेट की तरह बाहर नहीं आता,

और यदि तुम्हे ऐसा न लगने लगे

कि तुमने अगर अब नहीं लिखा

तो या तो तुम पागल हो जाओगे

या तुम आत्मघाती हो जाओगे

या हत्यारे ही बन जाओगे

तो तुम मत लिखो|

 

अगर लिखने का वास्तविक समय आ गया है,

और तुम एक माध्यम के रूप में चुने गये हो

तब लेखन स्वयं ही तुम्हारे भीतर से बाहर आ जायेगा

और यह बाहर आता ही रहेगा जब तक कि

या तो तुम ही न मर जाओ

या कि लेखन ही तुम्हारे भीतर न मर जाए|

 

इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है,

कभी भी नहीं रहा!

(Charles Bukowski )

अनुवाद – राकेश

अक्टूबर 29, 2015

हम एक नदी हैं

LaoTzuहमारा जीवन उस तरह का नहीं है

जैसे कि पहाड़ के एक तरफ चढ़ाई

और दूसरी तरफ ढलान|

हम नीचे गिरने और मरने के लिए

एक शिखर पर नहीं पहुंचे हैं|

हम पानी की बूंदों के जैसे हैं

जो कि समुद्र में जन्मती है

और जिसे नम्र बारिश धरती पर छिड़क जाती है|

हम पहले झरना बने

फिर धारा

और अंत में एक नदी

जो मजबूती से अपनी गहराई लिए बहती जाती है

और अपने घर पहुँचने तक

अपने संपर्क में आने वाली वस्तु को पोषित करती जाती है|

बुढाये जाने के आधुनिक मिथक को स्वीकार मत करो,

तुम गल नहीं रहे हो,

तुम व्यर्थता में खोते नहीं जा रहे हो

तुम एक ऋषि हो,

तुम बहुत गहरी और बहुत उपजाऊ क्षमता वाली नदी हो |

कुछ क्षण एक नदी के किनारे बैठो

और बड़े ध्यान से देखो

जब नदी तुम्हे तुम्हारे जीवन के बारे में बताए|

[“We Are a River,” from The Sage’s Tao Te Ching: Ancient Advice for the Second Half of Life, William Martin’s interpretation of the classic work by Lao Tzu (The Experiment, 2010)]

अनुवाद – …[राकेश]

 

 

अगस्त 22, 2015

शुक्रवार का गठबंधन

‘हरामखोर को शुक्रवार की शाम चार बजे के आसपास पकड़ना, उसका कोई खैरख्वाह अदालत न जा पाए| फिर तो अदालत दो दिन के आराम में होंगी, तीन रातें तो हवालात में बिताएगा ही साला, वहाँ भी  खातिर तवाजोह ज़रा कायदे की हो जाए|’ नोटों का बंडल अखबार में लपेट कर देने वाले ने कहा|
हें हें हें …शुक्र का टोटका तो अंग्रेजों के जमाने से अजमाया हुआ नुस्खा है| ऐसा ही होता आया है, ऐसा ही होगा| लेने वाले ने बंडल लेटे हुए ठहाका लगाते हुए कहा|

 

सोमवार की भी फ़िक्र न करो, वहाँ भी टिकने नहीं देंगें| लंबा भेजेंगे अंदर सुसरे को| एक हफ्ता तो मानकर चलो, बेल न होने देंगें| हमें भी एडवांस दे दो आज ही|

जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

फ़रवरी 2, 2015

धीरे- धीरे तुम मरने लगते हो …

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम यात्राएं नहीं करते

अगर तुम पढते नहीं

अगर तुम जीवन की आवाज को नहीं सुनते

अगर तुम अपने से सामंजस्य बिठाकर,

अपनी उचित सराहना नहीं करते |

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

जब तुम अपने आत्म-सम्मान को मार देते हो;

जब तुम दूसरों को तुम्हरी सहायता नहीं करने देते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपनी आदतों के दास बन जाते हो,

अगर तुम रोजाना एक ही पथ पर चलने लगते हो…

अगर तुम ढर्रे पर चल रहे दैनिक जीवन में परिवर्तन नहीं लाते,

अगर तुम भिन्न भिन्न रंगों के कपड़े नहीं पहनते

अगर तुम उनसे बात नहीं करते जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम उत्साह और जूनून के भावों को नजरंदाज करने लगते हो

और उन भावनाओं के विचलन से डर जाते हो

जो तुम्हारी आँखों में चमक लाती रही हैं,

और तुम्हारे ह्रदय की धडकनों को बढाती रही हैं|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपने जीवन में उस समय परिवर्तन नहीं लाते

जब तुम अपनी नौकरी से पूर्णतया असंतुष्ट हो गये हो,

या तुम अपने वर्त्तमान प्रेम से ऊब गये हो,

जब तुम अंजाने के भय की खातिर उसे

कसौटी पर रखने का जोखिम नहीं उठाते

जिसे तुम सुरक्षित मान कर जिससे चिपक गये हो,

अगर तुम अपने सपने का पीछा नहीं करते,

अगर तुम अपने को,

जीवन में कम से कम एक बार,

अच्छी लगने वाली सलाह से दूर भागने के लिए

तैयार नहीं करते…

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो|

(You start dying slowly – Martha Medeiros, Brazil)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time (A Novel) …कुछ झलकियां

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‘सर, मुझे लगता है वह आदमी अभी जिंदा होगा’| मेजर शैलेन्द्र रावत ने कहा|

‘रावत, तुम ऐसा दावे के साथ कैसे कह सकते हो’? कर्नल सिंह ने कहा|

‘सर, मैं एक गढवाली हूँ| मैंने हिमालय में बहुत सी ऐसी गुफाएं देखी हैं जहां योगी और साधू अभी भी साधना किया करते हैं| यह गुफा भी प्राकृतिक गुफा नहीं थी वरन मानव निर्मित थी| यह अवश्य ही साधुओं और तपस्वियों की किसी परम्परा दवारा विकसित गुफा है जो अभी भी साधना के लिए उपयोग में ली जाती है| संन्यासी सदियों से ऐसी गुफाओं का इस्तेमाल करते रहे हैं| हजारों हजार तपस्वियों की साधना से ऐसी गुफाएं ऊर्जा से लबरेज रहती हैं| साधना के इच्छुक साधुओं और योगियों को यहाँ भेजा जाता है ताकि वे एकांत में साधना कर सकें| यदि वह आदमी इस गुफा में कुछ दिन रुका तो ऐसा नहीं हो सकता कि जिस परम्परा की यह गुफा है, उस परम्परा के संन्यासियों को इस बात का पता न चला हो| हो न हो संन्यासी उस व्यक्ति को अपने साथ ले गये होंगे और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त्त होकर स्वयं भी संन्यासी बन गया होगा|’

‘शैलेन्द्र, कैसे तुम इतना ठोस दावा कर सकते हो?|

‘सर, मैंने गुफा में धूप बत्ती की राख देखी और लोबान की सुगंध को महसूस किया और मुझे पूरा विश्वास है कि वह आदमी तो अपने साथ धूप लेकर गया नहीं होगा| संन्यासी धूप का प्रयोग करते हैं गुफा के अंदर रोशनी के लिए और यह अंदर की वायु को भी शुद्ध करती है| सूबेदार दीक्षित ने इन् बातों पर ध्यान नहीं दिया किन्तु मैंने ऐसे छोटे छोटे संकेतों पर ध्यान केंद्रित किया| केवल एक बात मेरी समझ में नहीं आई और जो मुझे उसी समय से परेशान कर रहे एही जबसे मैंने गुफा के अंदर पैर रखा था| मेजर रावत ने खोये खोये से स्वर में कहा|

सब लोग शांत होकर मेजर रावत की बात सुन रहे थे, उन सभी को अपनी ओर देखते हुए पाकर, मेजर ने कहा,”सर, गुफा के गीले पथरीले फर्श पर मैंने दो जोड़ी पांवों के निशान देखे| हालांकि गुफा के बाहर पैरों के बहुत सारे निशान थे, पर अंदर केवल दो ही जोड़ी थे| और एक जोड़ी पाँव के निशान असामान्य थे और आकार में काफी बड़े थे| इतने बड़े पैरों के निशान सामान्य मनुष्य के नहीं हो सकते”|

‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो?”

‘पता नहीं सर, मैं खुद इस गुत्थी को नहीं सुलझा पा रहा हूँ’|

‘क्या वे किसी जानवर के पंजों के निशान थे?’

‘नहीं सर, जानवर के पंजे के निशान तो बिल्कुल भी नहीं थे| थे इंसानी पाँव के निशान ही, परन्तु बहुत ही बड़े पैरों के निशान थे, और निशान की स्पष्ट छाप बता रही थी कि वे किसी बहुत भारी मनुष्य के पैरों के निशान थे’|

‘ह्म्म्म’|

कुछ देर की खामोशी के बाद जवान मधुकर श्रेष्ठ ने आगे बढ़कर हिचक के साथ कहा,”साहब अनुमति हो तो मैं भी कुछ कहूँ?”

‘जरुर’|

‘साहब, उत्तराखंड और नेपाल में ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी अमर हैं और वे अभी तक हिमालय में विचरण करते हैं| सर, ऐसा कहा जाता है कि जो भी उन्हें देख लेता है वह या तो पागल हो जाता है या मर जाता है| कृपया इसे एक बुढाते व्यक्ति का अंध-विश्वास मान कर नकारिये मत| मुझे विश्वास है कि वे असामान्य पांवों के निशान अवश्य ही हनुमान जी के थे| आज के दौर के मनुष्यों के पांवों के निशान वैसे हो ही नहीं सकते|”

‘क्या ऊलजलूल बात कर रहे हो?’

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‘आह पवित्र वेदों के ज्ञान को मौखिक रूप से अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए श्रुति की परम्परा को सुरक्षित करने के लिए एक और शिष्य! लेकिन परिश्रमी मनुष्यों के कठोर परिश्रम को पार्श्व में ढकेल कर देवताओं और उनसे सम्बंधित सर्वथा कर्महीन राजाओं की झूठी महानता का वर्णन क्यों? कथाओं में राजाओं का संबंध ईश्वर से स्थापित करके उन्हें आम जनता की निगाहों में अजेय और अमर बनाकर राजवंशों को अमरता प्रदान करने का षड्यंत्र कब तक चलेगा?’ विश्वामित्र ने क्षुब्ध होकर सोचा|

विश्वामित्र ने धीमे स्वर में पूछा,”चारुदत्त, तुमने यह कहानी कहाँ सुनी?”

“भगवन, ब्रह्म-ऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल में”|

विश्वामित्र अपनी निराशा छिपा नहीं पाए और सयंत लेकिन दबे हुए क्रोधित स्वर में बोले,” चारुदत्त, मुझे नहीं पता, वहाँ क्या पढ़ाया जाता है| राज्यों के कोष से चलने वाली शिक्षण संस्थाएं इतिहास का पुनर्लेखन एवं पुनर्पाठ करती हैं क्योंकि यह उनके आश्रयदाता के हितों के अनुकूल होता है| भगीरथ की असली कहानी क्या है, कोई नहीं जनता लेकिन जिसमें मैं विश्वास रखता हूँ , मैं तुम लोगों को वह सुनाता हूँ”|

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“रानी सुमित्रा के दो जुड़वा बेटे हैं, लक्ष्मण और शत्रुघ्न| लक्ष्मण अपनी माँ की तरह है, लाग-लपट से दूर, सीधे सच्चे बोंल बोलने वाला| शत्रुघ्न को राजमहल की ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली पसंद है पर लक्ष्मण को महल से बाहर का जीवन भाता है| वह तीव्र बुद्धि वाला मेहंताकश इंसान है| अपनी माँ की तरह उसे भी राजा दशरथ की महिलाओं के प्रति कमजोरी, राजा की चापलूसों से घिरे रहने की आदत, और सबसे छोटी रानी कैकेयी के सामने घुटने टेक कर रहने की प्रवृति सख्त नापसंद है| लक्ष्मण के पास सूचना एकत्रित करने का तंत्र विकसित करने की विलक्षण प्रतिभा है| राजसी सेवकों में लक्ष्मण बेहद लोकप्रिय है और वे उसके प्रति बेहद निष्ठावान हैं| एक बार मैंने लक्ष्मण से पूछा कि वे कैसे सेवकों से एकदम सही सूचना निकलवा पाने में सफल रहते हैं, सेवक उनको क्यों इतना पसंद करते हैं ?”|

विनम्र लक्ष्मण ने हँस कर उत्तर दिया,” शायद वे महसूस करते हैं कि मैं उनमें से एक हूँ”|

“मैंने सुना है राम कैकेयी को पसंद नहीं करते”| विशालक्ष ने अँधेरे में तीर छोड़ा|

धरमरुचि ने उसकी ओर ऐसे देखा मानों अनुमान लगा रहा हो कि यह प्रश्न अज्ञानता का फल है या मूर्खता का|

‘नहीं, ऐसा नहीं है| लक्ष्मण से उलट, राम के कैकेयी के साथ अच्छे संबंध हैं| कैकेयी के शुरुआती मानसिक द्वंद को छोड़कर, वे आसानी से राम के ह्रदय में प्रवेश कर गयीं| कैकेयी बेहद सुंदर थीं और उनकी उम्र भी बहुत नहीं थी, राम से हो सकता है छह सात साल ही बड़ी हों, मुझे निश्चित नहीं पता”|

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‘मुनिवर, इसमें क्या हानि है अगर किसी ने पुराना और व्यर्थ पड़ा धनुष तोड़ दिया’? लक्ष्मण ने लापरवाह अंदाज़ में कहा|

क्रोध से उबल कर परशुराम ने अपने विशाल फरसे से वार किया किन्तु लक्ष्मण ने उतनी ही शीघ्रता से फरसे के वार से अपना बचाव कर लिया|

यह सब देख, विश्वामित्र ने आगे बढ़कर परशुराम को चेताया|

‘भार्गव, यह युद्ध स्थल नहीं है| यह राज दरबार है| कृपया इसकी मर्यादा का सम्मान करें| एक बालक के ऊपर फरसे से वार करना आपको शोभा नहीं देता’|

‘पितामह, यदि परम्परा का सम्मान नहीं होगा तो मेरा फरसा हर व्यक्ति को समुचित उत्तर देगा चाहे वह राजा जनक हो या दशरथ का यह युवा पुत्र| आप कृपया मेरे मामले में न पड़ें’|

विश्वामित्र ने परशुराम को शांत करके समझाने का प्रयत्न किया|

राम, आपने यहाँ आने का कष्ट किया| मैं आपके गुस्से को समझ पाने में असमर्थ हूँ| आप एक पुराने धनुष की तुलना परम्परा तोड़ने से कर रहे हैं| क्यों? कृपया इस आयोजन की मूल भावना को समझने का प्रयत्न करें| मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपने फरसे का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए करें’|

‘कौशिक, जिस किसी ने शिव के महान पिनाकी का अपमान किया है, मैं उसे नहीं छोडूंगा| प्रतीकों की अपनी गरिमा होती है| अगर आप मेरे दुश्मनों के साथ खड़े होंगें तो मैं भूल जाउंगा कि आप मेरे पितामह हैं’|

‘भार्गव आपके दुश्मन कौन हैं? राजर्षि जनक या राम, जिसने कि राक्षसों का संहार किया है कमजोर लोगों की सहायता करने के लिए? ऐसा क्यों है कि रावण जैसे आतंकवादी आपके दुश्मन नहीं हैं?’|

‘कौशिक मेरा ध्यान बंटाने की चेष्टा मत कीजिये| मैं रावण को अपना दुश्मन क्यों मानूं?’

‘क्यों नहीं? आपके लिए शिव भक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है, मासूमों और निर्दोषों के हत्यारों को सजा देने से| क्षमा कीजिये परन्तु आप छिलके की रक्षा कर रहे हैं और फल को सड़ने दे रहे हैं!’

*   * * ** * * * * * * * * * * * * * * * * * *

रात्री में लक्ष्मण ने राम से पूछा,”हनुमान औरों से अलग कैसे हैं, विशेषकर अंगद से? क्या किसी साधारण मानव दवारा ऐसा चमत्कारिक कर्म करना संभव है”?

‘जब एक साधारण मनुष्य चमत्कार करता है तभी वह महान बनता है| लक्ष्मण, हमारा दृष्टिकोण हमें अलग बनाता है| दृष्टिकोण ही हमें प्रेरित करता है, जोखिम उठाने के लिए तैयार करता है, और हमारे निश्चय को दृढ बनाकर, हमें प्रतिबद्ध बनाता है ताकि हम अपने धर्म को जी सकें, अपना कर्म को पूर्णता प्रदान कर सकें|’

अंगद और अन्यों ने क्यों समुद्र पार करने से इंकार कर दिया?’ लक्ष्मण ने पूछा|

‘केवल हनुमान ने असफल होने के भय को किनारे करके आगे बढ़ने का जोखिम उठाया| हरेक के लिए यह कहना आसान था कि वे समुद्र किनारे तक गये पर सीता का कोई सूत्र उन्हें नहीं मिला| कोई भी उनसे प्रश्न नहीं करता| परन्तु लक्ष्मण, लक्ष्य था सीता को ढूँढना| वह थी प्रतिबद्धता| जोखिम उठाने वाला दृष्टिकोण हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है| इससे असीमित ऊर्जा और संभावनाओं का प्रस्फुटन होता है| इसके लिए, फले हमको अपने अंदर से असफल होने की लज्जा बाहर निकालना पड़ता है|

‘क्या सीता को ढूँढने के अभियान के वक्त अंगद का व्यवहार अजीब नहीं था?’

‘कैसे?’ राम ने पूछा|

‘अपने दल के सदस्यों को प्रेरित करने के स्थान पर उसने उन्हें निराश करने की कोशिश की| इसके अलावा उसने सुग्रीव को अपशब्द कहे और युवराज जैसे पद से न कहने वाले वचन कहे|’

‘लक्ष्मण, अंगद के भय असुरक्षा की भावना से उपजे हैं| ऐसा युवा जो कि अपनी संभावनाओं के प्रति शंकालू हो और जो जोखिम लेने में रूचि न रखता हो, वह असफलता से घबराएगा ही| हमें उसे मजबूती प्रदान करनी होगी और उसे आत्मविश्वास से भरना होगा| मैं युद्ध से पहले यह काम करूँगा|’

लक्ष्मण को अपनी ओर देखता पाकर राम ने कहा,”लक्ष्मण, असफलता का भय हमें अपनी पूरी शक्ति से काम करने से रोकता है| एक बात बताओ, क्यों कोई भी वानर इस अभियान पर जाने के लिए तैयार नहीं था? वे सब असफलता से डरे हुए थे, उन्हें शर्म आ रही थी कि अगर वे असफल हो गये तो वे सुग्रीव का या मेरा सामना कैसे करेंगे|’

* * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेघनाद ने अपने रथ पर हाथ-पैर बांध कर खड़ी की गई स्त्री को दिखाते हुए गरज कर कहा,” राम यही वह स्त्री है न जिसके लिए तुम युद्ध कर रहे हो| आज मैं तुम्हारे सामने इसका अंत कर देता हूँ”|

ऐसी घोषणा करके मेघनाद ने अपनी तलवार स्त्री के सीने में घोंप दी और दूसरे वार में स्त्री का सिर धड़ से अलग कर दिया| इस वीभात्स्कारी कृत्य ने सभी को स्तब्ध कर दिया| हनुमान ने कूदकर स्त्री के मृत शरीर को हथियाना चाहा पर मेघनाद हनुमान की उम्मीद से ज्यादा तेज गति से अपने रथ को युद्धभूमि से दूर ले गया|

दुखी हनुमान और कुछ अन्य सैनिक रोते हुए राम के पास पहुंचे| कुछ पल के लिए राम भ्रमित हो गये और फिर धीरे से धरा पर बैठ गये|

‘क्या तुम्हे विश्वास है वह सीता ही थी?’ राम ने मंद स्वर में पूछा|

स्तब्ध हनुमान के कंठ से स्वर न निकला पर उसने सिर हिलाकर अनुमोदन किया|

राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ|

विभीषण भाग कर आया और कहा,” राम, यह सब माया का खेल है, इसके जाल में मत फंसना| युद्ध के बीच में हारते हुए दुश्मन पर क्यों भरोसा किया जाए? राम, रावण और उसका पुत्र दोनों मायाजाल के स्वामी हैं| हनुमान भी घटना का अनुमोदन करें तो भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि सीता को ऐसे मारा जा सकता है| राम, भावनाओं को अलग रख कर सोचो, रावण सीता को क्यों मारेगा?”

लक्ष्मण को विभीषण की बात पर भरोसा नहीं हुआ,” विभीषण, वह क्यों ऐसा नहीं करेगा? रावण पहले ही अपनी आधी से ज्यादा सेना, अपने भाई और बहुत सारे करीबी रिश्तेदारों की आहुति इस युद्ध में दे चुका है| यह बदला है| यदि वह हार भी गया तो वह हमें सीता को वापिस क्यों करेगा?”

लक्ष्मण, मैं रावण को आपसे ज्यादा जानता हूँ| रावण एक अहंकारी राजा है और उसके अहं को जो पोषित करे उसे वही काम और रास्ते भाते हैं| सीता को मारने का विकल्प उसके लिए कभी मायने नहीं रख सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसके दिमाग में उसके अपने बारे में सर्वश्रेष्ठ योद्धा, सर्वश्रेष्ठ राजा, और धरती पर जन्में सर्वश्रेष्ठ पुरुष की छवि खंडित हो जायेगी| राम, ऐसा आदमी मेघनाद को सीता को युद्धस्थली पर लेकर आने की अनुमति क्यों देगा? और मेघनाद रावण से जुड़े किसी भी मामले में अपनी तरफ से कोई भी निर्णय नहीं लेगा|

* * * * * * * * * * * * *

(मूल अंग्रेजी से अनुवादित)

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

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मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

दिसम्बर 18, 2014

कट्टरता

कट्टरता कभी दुखी नहीं होती,
कभी खुद पर आन भी पड़े परेशानी की छाया,
तो यह हिंसक हो उठती है
दूसरों के खिलाफ|
दूसरों के दुख,
पर यह अट्टहास लगाया करती है!
इसके डी.एन.ए की संरचना में
विद्रूपता, हिंसा और विध्वंस
गुत्थम-गुत्था रहते हैं|
कट्टरता कभी दुखी नहीं होती!
दीगर बात यह कि
यह करमजली, दिलजली कभी सुखी भी नहीं होती|
जलना और दुनिया को जलाना
यही दो काम इसे आते हैं|
कट्टरता कभी दुखी नहीं होती!

…[राकेश]

जुलाई 16, 2014

वे बेचते भुट्टे…

BoyGirlCorn-001बला की गर्मी… पारा डिग्री सेल्सियस में अर्द्ध शतक लगाने के एकदम करीब था…सूरज की किरणों की तीव्रता से लग रहा था कि मानो आज अपनी सारी ऊष्मा उड़ेल कर ही दम लेगा| धूप सिर को तपाये दे रहे ही, शरीर को जलाए दे रही थी|
ऐसे में कुछ दूर धूप में पैदल चलना पड़े तो लगे मानों जीते जी भट्टी में झुलस रहे हैं|

पर कई बार वे सब काम करने पड़ते हैं जो व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों में करना नहीं चाहता|

न  काम होता न तपती धूप में पैदल चलना पड़ता|

प्यास से कंठ सूख रहा था|

जहां पहुंचना अथा वह इमारत अभी भी कम से कम आधा किमी दूर थी| सड़क पार करके फुटपाथ पर चलना हुआ तो देखा कि दूर दूर तक छाया का निशां नहेने था और नंगा तपा हुआ फुटपाथ मुँह चिड़ा रहा था|

थोड़ी दूर चलने पर ही देखा तपती धूप में दो बालक भुट्टे बेचते फुटपाथ पर बैठे थे| सात-आठ साल की लड़की भुट्टे भून रही थी और उससे छोटा बालक, जो उसका भाई ही होगा, भुट्टे अपने पास चटाई पर रख बेच रहा था|

उनके थोड़ा पीछे एक छोटा सा पेड़ अवश्य था पर वहाँ एक टेम्पो वाले ने दुपहर को सोने के लिए कब्जा जमा लिया था वरना बच्चे वहाँ जो भी थोड़ी बहुत छाया थी उसी में अपना डेरा जमा सकते थे|

सामने ही एक प्रसिद्द पब्लिक स्कूल का में गेट चमचमा रहा था| इन् निर्धन बच्चों को रोजाना ही अंदर प्रवेश करते अमीर बच्चे दिखाई देते होंगे और वे यहाँ फुटपाथ पर भुट्टे बेचने को अभिशप्त थे| उनके लिए तो अभी से इस देश में दो देश बन गये थे, एक उनका देश था जो बचपन से ही कठोर मेहनत करके उत्पाद उगा रहा था, बना रहा था और बेच रहा अथा और एक दूसरा देश था जिसके बाशिंदें उनसे समां कभी कभी खरीद भी लेते थे वरना दूसरे देश के लिए बाजार भी और ही किस्म के थे, चमचमाते हुए, रोशनी और चकाचौंध से भरपूर|

प्यास से कंठ सूख रहा अथा| पानी भी साथ नहीं लिया था| मन में विचार आया कि क्यों न भुट्टा खा लिया जाए|

पर उससे तो प्यास और बढ़ेगी!

तो क्या, अब मंजिल नजदीक ही है जाकर और ज्यादा पानी पी लिया जायेगा|

पर बच्चों से भुट्टे लेना क्या बाल-मजदूरी का समर्थन नहीं?

पर अगर भुट्टा ना लिया तो क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार होगा?

अगर भुट्टा ले भी लिया तो एक भुट्टे से या कुछ भुट्टे खरीदने से क्या सुधार होगा उनकी स्थिति में?

उनके माता-पिता उन्हें मजदूरी से हटा स्कूल भेजने लगेंगे?

थोड़ी देर ऐसे ही उलझन में घिरा खड़ा रहा|

फिर बच्चों की तरफ देख दो भुट्टे देने को कहा|

कम से कम इस तपती धूप में उन्हें दो भुट्टे बेच पाने का संतोष तो मिलेगा शायद उन्हें खुशी भी हो|

इनका अच्छा भविष्य तो सरकारों के हाथ में है| वे चाहें तो ये बच्चे भी पढ़ लें और भविष्य बना लें|

भुट्टा खाते चलते हुए और बच्चों के बारे में सोचते हुए मंजिल भी आ गई|

उनके बारे में सोच सकने वाले मंत्री बनेंगे नहीं और मंत्री ऐसे बच्चों के पास समय व्यतीत करके उनके बारे में सोचेंगे नहीं|

तो ऐसे बाल-मजदूरों का क्या भविष्य है इस देश में|

क्या ये भुट्टे बेचते और ऐसे अन्य काम करते ही रह जायेंगे?

 

…[राकेश]

 

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