Archive for ‘मुल्ला नसरुद्दीन’

फ़रवरी 2, 2011

मुल्ला नसरुद्दीन : लंका में सभी बावन गज के

बात उन दिनों की है जब मुल्ला नसरुद्दीन को एक प्रदेश के शिक्षा विभाग ने कुछ समय के लिये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर ससम्मान आमंत्रित करके नियुक्त्त किया था और नसरुद्दीन ने देश के विकास में शिक्षा के मह्त्व को देखते हुये यह जिम्मेदारी अपनाने की स्वीकृति दे दी थी। उन्होने शिक्षा विभाग को कहा कि विभाग को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहिये। वे प्रदेश भर के प्राथमिक स्कूलों के दौरे करने लगे। आज यहाँ तो कल वहाँ। साल के किसी दिन अवकाश न था उन्हे।

सारे दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर

उनका तो अटल विश्वास था ’कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत पर। किसी तरह की बाधा उन्हे न रोक पाती।

उसके बाद उन्होने दसवीं और बारहवीं तक के विद्यालयों के दौरे किये। उन्होने अपने इन तूफानी दौरों के दौरान सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, निजी, गरीब और धनी स्कूलों एवम विद्यालयों के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र के कला और विज्ञान को गहराई से खंगाला।

इन यात्राओं से उपजे ज्ञान को देश के चहुँमुखी विकास और इसकी एकता और अखंडता की मजबूती के लिये उपयोग में लाने के लिये उन्होने राज्य सरकार को बेशकीमती सुझावों से भरी रिपोर्ट सौंपी। अगर मुल्ला नसरुद्दीन की रिपोर्ट पहले राज्य और बाद में समूचे देश में लागू हो जाती तो देश की दशा और दिशा ही और होती। पर राजनीतिज्ञों से ऐसी आशा रखनी कि वे विशुद्ध देश हित में कोई काम करेंगे ऐसा है कि जैसे कोई बरसते सावन में बिना छाते के बाहर निकल पड़े और सोचने लगे कि भीगेगा नहीं या कोई शराब का तबियती शौकीन दूरदराज से आती बेग़म अख्तर की आवाज में सुनकर कि

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

हाथ में बड़े बड़े जग आदि लेकर बरसात में खड़े हो जायें और बाद में निराश होकर बरसात को और उस आदमी को गालियाँ दें जो बेग़म की गज़ल सुन रहा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की बुनियादी सिफारिशें थीं कि देश के बच्चे देश की जिम्मेदारी हैं और ये बच्चे ही आने वाले भविष्य की दुनिया को संवार सकते हैं और हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने की एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिये। अगर प्राथमिक स्कूल के स्तर पर ही बच्चों में धन, जाति और सम्प्रदाय के भेद होने लगेंगे तो यह बात भूल जानी चाहिये कि बड़े होकर वे इन भेदभावों से ऊपर उठ पायेंगे। ऐसा कभी नहीं हो पायेगा और देश के संसाधन, ऊर्जा और विचारशक्त्ति जैसे सभी बहुमूल्य गुण इन झगड़ों से निबटने में ही नष्ट होती रहेंगे और देश और इसके वासी पिछड़े ही रहेंगे।

शिक्षा सरकार का सबसे परम कर्त्तव्य होना चाहिये और सरकार को सबसे अच्छे स्कूल और विद्यालय खुद खोलने चाहिये और देश के सभी बच्चों को उनमें ही पढ़ाया जाये।

प्रदेश सरकार ने मुल्ला नसरुद्दीन की सिफारिशों पर कान न रखे।

सरकारें यदि देशहित में शिक्षा पद्यति लागू कर दें तो शिक्षा के क्षेत्र में घुसपैठ करके लाखों करोड़ रुपये कमा रहे माफियाओं का क्या होगा। समाज खुद नहीं चाहता कि बच्चों से भेदभाव खत्म हो अतः लोग खुद पसंद करते हैं कि आर्थिक, जाति और सम्प्रदाय के आधार पर बने स्कूल और विद्यालयों में ही उनके बच्चे पढ़ें ताकि उनके झूठे अहं बने रहें।

बहरहाल मुल्ला नसरुद्दीन ने जिस काम में अपना समय और अपनी ऊर्जा झौंकी वह प्रयास उस समय तो सफल न हो पाया, हो सकता है कि कभी ऐसा भी देश में हो जाये। आशा का साथ छोड़ना मनुष्य के लिये संभव नहीं।

नसरुद्दीन जीवन के किसी भी क्षेत्र से हास्य की बात खोज ही लेते थे। अपने इन दौरों से जुड़ी बहुत सारी मजेदार बातें वे बताया करते थे और उनमें से बहुत सारी बातें चुटकलों के रुप में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। भले ही लोग जानते न हों कि इन चुटकलों की शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन ने ही की थी।

अपने इन दौरों से जुड़ा एक मजेदार वाक्या वे सुनाते थे।

एक बार वे किसी पर्वतीय इलाके में बड़े ही दुर्गम स्थल पर स्थित एक स्कूल का दौरा करने पहुँच गये। उस दूरदराज के स्कूल में कभी कोई अधिकारी नहीं गया था पर मुल्ला तो कवियों एवम रवि से भी ज्यादा कुशल थे और जहाँ रवि और कवि भी न पहुँच पायें वे वहाँ भी पहुँच जाते थे।

नसरुद्दीन तो उस जगह के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गये। प्रकृति ने हर तरफ अपने सौंदर्य का ऐसा जलवा बिखेर रखा था कि आँखें हटती ही न थी। हवा में ऐसी ताजगी थी कि साँस लेने में भी आनंद की अनुभूति होती थी। आंनदविभोर नसरुद्दीन स्कूल में प्रवेश करते ही प्रधानाध्यापक के कक्ष में गये और उन्हे अपना परिचय देते हुये कहा कि वे अकेले ही कक्षाओं का मुआयना करेंगे और अध्यापकों को बताकर परेशान और सचेत न किया जाये।

छोटा सा स्कूल था। नसरुद्दीन कक्षाओं के बाहर से ही अध्यापकों एवम विधार्थियों को आपस में संवाद करते हुये देखते और सुनते रहे। तभी उनकी दृष्टि बाहर मैदान में पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर पड़ी। वे वहाँ पहुँचे और बच्चों से पूछा कि वे वहाँ क्यों बैठे हैं तो एक बच्चे ने बताया कि यहाँ उनकी अंग्रेजी की क्लास लग रही है।

नसरुद्दीन ने पूछा,” और आपके टीचर कहाँ हैं?”

जी, वे अभी आ जायेंगे। कल गिर गये थे हाथ में फ्रैक्टर हो गया था, उसी के लिये पास के अस्पताल से होकर स्कूल आने को बोल गये थे।

नसरुद्दीन बच्चों से बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होने ध्यान दिया कि बच्चे अंग्रेजी शब्दों को उनके मूल उच्चारण के साथ न बोलकर उन्हे उनके लिखने के आधार पर उच्चारित कर रहे हैं। मसलन ’अम्ब्रेला’ को कुछ ’यूम्बरेला’ बोल रहे थे और कुछ ’उम्ब्रेला’, ’स्टडी’ को ’स्टयूडी’ या ’स्टूडी’, ’गोट’ को ’जोट’ बोल रहे थे। अंग्रेजी की वर्णमाला में जो वर्ण जैसा उच्चारित किया जाता है वे शब्दों में भी उसे लगभग वैसा ही बोल रहे थे।

नसरुद्दीन ने सोचा कि टीचर से ही बात करेंगे। सो वे बच्चों से कहने लगे कि यहाँ चारों तरफ कितनी प्राकृतिक सुंदरता फैली हुयी है। उन्होने एक बच्चे से पूछा कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

’जी नेटूर’

’नेटूर’?

’जी हाँ नेटूर’

’इसकी स्पेलिंग बता सकते हो’?

जी हाँ… एन ए टी य़ू आर इ ।

तब तक टीचर भी हाथ में प्लास्टर चढ़वाये हुये वहाँ आ गये। प्रधानाध्यापक ने उन्हे मुल्ला नसरुद्दीन के दौरे के बारे में बता ही दिया था। आते ही वे नमस्कार करके मुस्कुराते हुये खड़े हो गये।

नसरुद्दीन ने उनका हाल पूछा, हाथ के बारे में पूछा और फिर उसी बच्चे से कहा कि अब फिर से बताये कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं और उस अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग क्या है?

बच्चे ने फिर से दोहरा दिया।

नसरुद्दीन ने टीचर की ओर देखा। टीचर बच्चे की तरफ गर्व से मुस्कुराकर देख रहे थे। शाबास बेटा।

नसरुद्दीन ने दोहराया, एन ए टी य़ू आर इ, इन सबसे मिलकर क्या बना।

सब बच्चों ने समवेत स्वर में नारा लगाया और उनके साथ साथ उनके टीचर ने भी स्वर मिलाया, ” एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर”।

नसरुद्दीन के मस्तक पर पसीने की नमी आ गयी। पर वे अपने भावों पर नियंत्रण कर गये।

अच्छा बच्चों पढ़ाई करो।

टीचर से विदाई लेकर नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक के कक्ष में आ गये। वे कुछ क्रोधित भी थे। उन्होने प्रधानाध्यापक से कहा,” महोदय आपके स्कूल के अंग्रेजी के अध्यापक, कैसी अंग्रेजी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”

अच्छी अंग्रेजी पढ़ाते हैं श्रीमान।

कैसी अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वे बच्चों को शब्दों का सही उच्चारण भी नहीं सिखाते। एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर, पढ़ाते हैं। इच्छा तो हो रही है कि उनकी शिकायत लिखूँ।

प्रधानाध्यापक निवेदन करने लगे,” नहीं श्रीमान ऐसा न करें, घर में अकेला कमाने वाला है। बेचारे का फुटूर बिगड़ जायेगा”।

’फुटूर’ सुनकर तो नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक का चेहरा देखते रह गये।

वहाँ सुधार का प्रबंध तो उन्होने किया ही। बाद में जब वे यह किस्सा सुनाते थे तो कहते थे कि इसलिये कहा जाता है कि लंका में सभी बावन गज के।

…[राकेश]

जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

जुलाई 3, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन : दुनिया रंग रंगीली बाबा

बात मुल्ला नसरुद्दीन की हो रही थी कि कैसे कई मर्तबा नादानी में वे कैसी कैसी स्थितियों में फँस जाते थे।

सामान्य जन की परिभाषा से देखें तो हर पहुँचे हुये व्यक्ति की तरह नसरुद्दीन भी विरोधाभासों से भरे व्यक्ति थे। उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वे ऐसा ही करेंगे जैसा कि दुनिया वाले उनसे उम्मीद लगाये बैठे हैं।

लोग अगर ये समझ लें कि अब तो नसरुद्दीन की उम्र हो चली है और अब तो वरिष्ठ नागरिकों वाले लक्षण उनमें दिखायी देंगे तो वे सबको चौंकाते हुये मैदान में बच्चों के साथ फुटबॉल खेलते हुये दिखायी दे जाते थे। पुल से नदी में छलांग लगाते दिखायी दे जाते थे। तैरने का शौक तो उनका उम्र भर न गया। उनका बस चलता तो वे जल समाधि लेकर ही मृत्युलोक से विदा लेते।

नसरुद्दीन यूँ तो जीवन में नये से नये परिवर्तन के प्रति एकदम बिंदास ढ़ंग से खुले दिल वाले मेजबान बने रहते थे बस एक संगीत ही ऐसा क्षेत्र था जहाँ उन्हे नये परिवर्तन रास नहीं आये। नसरुद्दीन ठहरे उन बिरले लोगों में से जिन्होने बड़े बड़े संगीतकारों के सम्मुख बैठकर उन्हे सुना था।

बिजली वाले रेकार्ड प्लेयर के होते हुये और कैसेट प्लेयर्स के धड़ल्ले से हर तरफ चलन में आने के बाद भी वे घर पर हाथ से चाबी देकर चलने वाले ग्रामोफोन पर नब्बे के दशक तक संगीत सुनते रहे। हजारों नायाब तवे (रेकार्ड्स) उनके पास थे। उनके संग्रह की विशेषता की बात पता चलेगी उनके एक मित्र की मार्फत। उनका मित्र उम्र में उनसे कम से कम पच्चीस साल छोटा रहा ही होगा और इंजीनियर होते हुये भी वह नौकरी छोड़कर संगीत संग्रह नामक दुकान चलाता था, दुकान कहना तो सही नहीं होगा क्योंकि वह तो संगीत के प्रति दीवानगी के चलते ऐसा कर रहा था और अपने इस शौक को ही उसने व्यवसाय भी बना लिया था। उसके पास भी दुर्लभ संगीत का खजाना था। संगीत के व्यसनी कैसा भी दुर्लभ संगीत पाने के लिये उसके पास जाया करते थे और यह बात सिर्फ कुछ गिने चुने लोगों को ही पता थी कि अगर संगीत का कोई नमूना, जिसके लिये उसके पास कोई दीवाना पहुँचता था, उसके पास नहीं भी होता था तो भी वह नसरुद्दीन के संगीत संग्रह के भरोसे ब्लांइड खेल जाता था और मेहमान से दो तीन दिन में आने के लिये कह देता था कि वह उसके द्वारा मांगा गया गीत या संगीत टेप करके दे देगा। इतना विश्वास उसे नसरुद्दीन के संगीत संग्रह पर था और वह कभी निराश भी नहीं हुआ।

घर से बाहर भी संगीत सुनने के लिये नसरुद्दीन ने एक वॉकमैन ले रखा था और अब वे कैसेट्स भी जुटाने में लगे रहते थे और संगीत संग्रह वाला मित्र इस काम में उनकी मदद करता था। उन्ही के संग्रह से तवे लेकर वह उन्हे कैसेट्स में रेकार्ड कर देता था।

एक पुरानी कहावत को वह नसरुद्दीन की शान में कुछ यूँ कहता था “जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे हमारे नवी“। पुरानी कहावत के कवि की तर्ज पर वह नसरुद्दीन को “नवी” कहता था और उसका कहना गलत भी नहीं था संगीत के मामले में नसरुद्दीन ने न दिन देखा न रात, न आँधी न तूफान, न दूरी देखी न धन, बस कहीं अच्छे संगीत का कार्यक्रम देखना सुनना है तो नसरुद्दीन वहाँ पहुँच ही जाते थे। किसी नायाब संगीत के रेकार्ड के बारे में पता चल जाये जो उनके पास न हो तो रात दिन एक कर देते थे उसे पाने के लिये।

नसरुद्दीन तो क्या शास्त्रीय और क्या अर्द्ध शास्त्रीय, क्या भजन और क्या गज़ल, सब तरह के संगीत की गहरी जानकारी रखते थे। फिल्मी दुनिया से निकले अच्छे संगीत के भी वे कद्रदान थे। हाँ संगीत में कमियाँ उन्हे बर्दाशत नहीं होती थीं। एक बार फिल्मी दुनिया के एक बड़े संगीतकार के बहुत बड़ी शोहरत पाने वाले एक गीत को सुनकर उन्होने रेकार्ड कम्पनी के पते पर संगीतकार को चिट्ठी लिख भेजी थी कि मियाँ आप और आपकी गायिका ने यहाँ गलती कर दी है। मेरे मित्र, आपके गुरु, आज जिंदा होते तो आपका कान उमेठ देते, कैसे उनका शिष्य ऐसी गलती कर सकता है?

संगीतकार ने शर्मिंदा होकर चिट्ठी लिखकर गलती मानी और उनके शहर आने पर उनसे मिलने की गुजारिश भी की।

नसरुद्दीन के बच्चों में तो संगीत के प्रति ज्यादा शौक कभी नहीं रहा, हो सकता है पिता के तवे सुन सुन कर ही उनका शौक बचपन में ही पूरा हो गया हो। पर नसरुद्दीन के नाती पोतों ने जरुर उनकी नाक में दम कर दिया एक अच्छा स्टीरियो म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने के लिये। बच्चों की न भी सुने आदमी पर नाती पोतों की बात टालना जरा टेढ़ी खीर है।

सन 1992 के अक्टुबर माह के अंतिम दिन थे या नवम्बर माह के शुरुआती दिन। नसरुद्दीन ने हथियार डाल दिये बच्चों के सामने और वे स्टीरियो म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने के लिये राजी हो गये। बच्चों ने ही उन्हे बताया कि फलां फलां म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने पर दुकान वाला दस कैसेट्स फ्री दे रहा है। उन्होने अपनी अपनी पसंद की कैसेट्स के नाम दे दिये कि फ्री वाले कोटे से इन कैसेट्स को ले आना और दादा पर मेहरबानी करते हुये उन्हे भी दस में से दो कैसेट्स अपनी पसंद की लाने की पेशकश कर दी।

नसरुद्दीन का संगीत संग्रह वाला मित्र अपने परिवार में अनायास उत्पन्न किसी परेशानी के कारण दो माह के लिये अपने पैतृक गाँव गया हुआ था तो उससे सलाह करने का मौका भी नही था।
नसरुद्दीन म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने दुकान पर पहुँच गये। मॉडल आदि तो सब बच्चों ने पहले ही तय कर दिया था। जब नसरुद्दीन दुकानदार को बच्चों द्वारा मंगायी गयी कैसेट्स की लिस्ट दे रहे थे तो कुछ लड़के लड़कियाँ हल्ला गुल्ला मचाते दुकान के अंदर आये।

आते ही उन्होने दुकानदार से कहा,” बाबा सहगल देना एक“।

दुकानदार ने उनसे कहा कि जरा मैं भाईसाहब को कैसेट्स दे दूँ

अरे हमें भी जल्दी है, पार्टी में पहुँचना है जल्दी से। हमें बाबा सहगल दे दो, इन्हे देते रहना बाद में।

नसरुद्दीन ने कुछ चकित होकर नौजवानों की भीड़ को देखा और दुकानदार से बच्चों को उनकी कैसेट देने को कहा।

नौजवानों के जाने के बाद नसरुद्दीन ने लगभग खुश होते हुये दुकानदार से कहा,” कमाल है आजकल के बच्चे भी ऐसा संगीत सुनते हैं! ”

दुकानदार ने ज्यादा ध्यान न देते हुये कहा,”हाँ भाईसाहब आजकल तो यही चल रहा है इन नौजवानों में“।

नसरुद्दीन ने दुकानदार से कहा कि वह बच्चों की लिस्ट में मौजूद आठ कैसेट्स के सिवा एक कैसेट बेगम अख्तर या मल्लिका पुखराज की दे दे और उन्हे भी एक कैसेट बाबा सहगल की दे दे और ये दोनो कैसेट्स एक अलग लिफाफे में बंद कर दे।

दुकानदार ने आठ कैसेट्स एक पैकेट में और बाकी दो कैसेट्स एक अलग पैकेट में बंद करके उन्हे दे दीं और वे म्यूजिक सिस्टम और कैसेट्स के पैकेट उठाये बाहर आ गये। वे खुश थे और अपने आप से ही कह रहे थे,” नौजवान पीढ़ी उतनी भी बिगड़ नहीं रही है संगीत के मामले में जितना वे सोचते थे आजकल के शोर शराबे वाले बेसुरे संगीत को सुनकर। चलो अदब से तो नहीं बोल रहे थे दुकान पर पर कम से कम सहगल को बाबा तो कह रहे थे।

रास्ते भर वे कितने ही गानों की पंक्तियाँ गुनगुनाते रहे।

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये…,
ग़म दिये मुस्तकिल…,
ऐ दिल ए बेकरार झूम…,
दुख के अब दिन बीते…,
दिया जलाओ जगमग जगमग…,
मेरे सपनों की रानी…,

घर पहुँच कर उन्होने बच्चों को म्यूजिक सिस्टम और उनकी कैसेट्स का पैकेट दे दिया|  बच्चे तो तभी अपनी पसंद के गाने बजाकर उधम मचाने लगे।

नसरुद्दीन अपनी कैसेट्स अपने कमरे में रखकर किसी और काम से फिर बाहर चले गये। उस दिन सारा समय वे खुशी खुशी सहगल के गाये कितने ही गीत गुनगुनाते रहे। उनसे मिलने वाले भी उन्हे खुश देखकर खुशी पा रहे थे।

अगले दिन दोपहर में अपने संगीत सुनने के समय में उन्होने बड़े प्यार से नयी कैसेट्स का पैकेट निकाला और सहगल वाली कैसेट हाथ में ली। कैसेट पर छपा फोटो उन्हे कुछ अलग लगा फिर उन्होने सोचा कि हो सकता है बाजार वालों ने अपनी कारस्तानी दिखा दी हो।

कैसेट उन्होने अपने वॉकमैन में लगायी और आरामकुर्सी पर आँखे बंद करके अधलेटे हो गये।
पर मिनट ही बीता थी कि वे लगभग कूद कर उठ खड़े हुये। ईयर फोन उनके कान से निकल गये और उनमें से हल्की हल्की आवाज आ रही थी

ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी
प्यास लगी है तो बुझानी भी है
ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी

नसरुद्दीन भौचक्के से खड़े एक बार वॉकमैन को देखते और एक बार कुर्सी के पास रखी छोटी मेज पर पड़ी कैसेट को जिस के कवर से बाबा सहगल की आँखें उन्हे ही देख रही थीं। उन्हे लगा मानो वे आँखे शरारत से उन्हे चिड़ा रही हों।

ईयर फोन से आवाज आ रही थी –

ध्यान मुझे आया मैने पूछा नहीं नाम।

नसरुद्दीन ने जैसे होश में आते हुये वॉकमैन बंद किया। उन्होने कैसेट को कवर में बंद करके, पैकेट में रख दिया।

कहीं गीत बज नहीं रहा था पर उनके कान सहगल की आवाज सुन पा रहे थे

चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था

बच्चे कभी नहीं जान पाये कि दादा जी ने दसवीं कैसेट कौन सी ली थी? उन्हे तो यही लगा कि शायद वे रास्ते में ही गिरा आये दसवीं कैसेट। नसरुद्दीन ने बाद में संगीत संग्रह वाले मित्र को किस्सा तमाम सुनाया जो उसने नसरुद्दीन के देहांत के कई बरस बाद उनकी याद में उनके जन्म दिवस पर हर साल आयोजित होने वाले एक छोटे मगर विशिष्ट संगीत समारोह में सुनाया, जिसमें सिर्फ और सिर्फ विशुद्ध किस्म के संगीत प्रेमी ही शिरकत करते हैं।

…[राकेश]

जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

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