Archive for ‘प्रेरक कथा’

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

* * * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

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फ़रवरी 13, 2017

कैसे मुसलमां हो भाई…

सितम्बर 5, 2016

अलबर्ट कामू का आभार पत्र अपने शिक्षक के नाम

camusविश्व प्रसिद्ध दार्शनिक, अल्जीरिया में जन्में और फ़्रांस में वास करने वाले अलबर्ट कामू (7 November 1913 – 4 January 1960) को जब 1957 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्होंने अपने शिक्षक रहे Louis Germain का आभार व्यक्त करने के लिए उन्हें एक खुला पत्र लिखा, क्योंकि उनके अनुसार ये उनके शिक्षक ही थे जिन्होने कामू के अंदर छिपी लेखकीय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोत्साहन दिया जिससे वे बाद में विश्व भर में सम्मान पाने वाले उपन्यासों और निबन्धों की रचना कर सके|

उल्लेखनीय है कि कामू जब शैशवावस्था में ही थे तभी उनके पिता प्रथम विश्व युद्ध में मारे जा चुके थे और उनकी माँ आंशिक रूप से बधिर थीं और अशिक्षित थीं|

प्रस्तुत है कामू दवारा अपने शिक्षक को 19 November 1957 को लिखे पत्र का हिन्दी अनुवाद,

 

Dear Monsieur Germain,

इन दिनों मेरे गिर्द घट रही हलचलों को बहुत हद तक शांत होने का इंतजार करने के बाद मैं आज अपने हृदय की गहराइयों भरे उद्गारों के साथ आपसे मुखातिब हो रहा हूँ| मुझे हाल ही में एक महान पुरस्कार से सम्मानित किया गया है| मैंने न तो इस पुरस्कार की कभी कामना की थी और न ही मैं अपने को इसके योग्य पाता हूँ|

जब मैंने अपने को पुरस्कार दिए जाने की खबर सुनी तो अपनी माँ के बाद मुझे आपके प्रति कृतज्ञता का ही ख्याल आया| आपके बिना, आपके प्रोत्साहन भरे और स्नेहमयी सहारे के बिना और आपके दवारा मुझे उदारतापूर्वक दी गई शिक्षा के बिना मुझ जैसा गरीब बच्चा आज यह सब नहीं पा सकने की हालत में कदापि नहीं पहुँच पाता|

मैं इस सम्मान पर बहुत ज्यादा केंद्रित नहीं होना चाहता लेकिन इसने मुझे यह अवसर तो दिया ही है मैं अपने ह्रदय में आपके स्थान के बारे में अपने भाव आपसे साझा कर सकूं| आप मेरे लिए हमेशा से ही बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं और आज भी हैं| मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपने जो प्रयास स्कूल में पढ़ रहे एक छोटे बालक को शिक्षा और ज्ञान ग्रहण करने के मार्ग पर सुचारू रूप से चलाने के लिए किये थे और जिस कार्य में आपने अपना पूरा उदार हृदय उड़ेल दिया था, उन सब प्रयासों के प्रति आपका यह शिष्य आज भी आपका आभारी है|

आपके प्रति कृतज्ञ भावों से भरे ह्रदय से मैं आपका आलिंगन करना चाहता हूँ|

अलबर्ट कामू

 

सितम्बर 5, 2016

शिक्षक हो तो ऐसा!

Teacher@UPयह घटना उत्तर प्रदेश के रामपुर के शाहबाद स्थित रामपुरा गांव के एक प्राइमरी स्कूल मास्टर ने अपने छात्रों में शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि मिसाल कायम कर दी और मौजूदा दौर में एक अनूठी कहानी रच दी| एक ऐसे वक्त में जब प्राथमिक शिक्षा का स्तर न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बुरी स्थिति में हैं और शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद लाखों करोड़ों बच्चे प्राथमिक स्तर की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं और जहां प्राथमिक शिक्षा में सुविधाओं का बेहद अकाल है, यह घटना बहुत ज्यादा महत्व की बन जाती है| प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर भारतीय को इस घटना के बारे में जानना चाहिए और सम्बंधित संस्थाओं एवं सरकारों को ऐसे आदर्श शिक्षक को पुरस्कृत करना चाहिए जिसने शिक्षा का ज्ञान से संबंध अपने उच्चतम आदर्श रूप में कायम रखा है|

रामपुरा के स्कूल में जब अध्यापक मुनीश  कुमार की तैनाती बतौर प्राथमिक शिक्षक हुई तो उस  इलाके में बहुत से बच्चे स्कूल नहीं आते थे| ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए उनके बच्चे उनके कामकाज में हाथ बंटाने वाले जीव थे| जितने ज्यादा हाथ उतनी ज्यादा घर की कमाई!

मुनीश कुमार ने गांव में घर-घर जाकर लोगों से सम्पर्क किया| उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी पर धीरे धीरे मुनीश की मेहनत रंग लाई और सभी ग्रामीण  अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे|
स्कूल में विधार्थी लाने के बाद मुनीश कमरतोड मेहनत करके दिन रात एक करके अपने स्कूल के बच्चों को शिक्षित बनाने के काम में जुट गये|

मुनीश का तबादला हुआ तो स्थानीय लोगों को ऐसा लगा मानों उनके बच्चों से उनका अध्यापक और गाइड और उनसे दूर जा रहे हों|

मुनीश  अपने पीछे ज्ञान की ऐसी ज्योति जलती छोड़ गये जो उस इलाके से अज्ञानता के अँधेरे को बहुत सालों तक रोशन करती रहेगी|शिक्षक हो तो ऐसा!

मार्च 13, 2016

Zero न होता तो ! भारत का शून्य एवं अन्य अंकों से रिश्ता

भारत और शून्य के मध्य संबंध के बारे में ऑक्सफोर्ड विश्वविधालय के विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ Marcus De Sutoy का कथन –


Being in India, I need to ask you, how important is zero to mathematics?
I think that’s a wonderful act of the imagination, and a really key moment. Whenever new numbers are admitted into the canon, it is a very exciting moment. It seems so obvious to us, now of course! First of all, it facilitates computation – in that sense you were not the first to come up with the zero. The Babylonians had a mark for zero, the Greeks and the Romans didn’t get it, but the Mayans had a symbol for zero, but what you had was your abstract idea of creating something to denote nothingness. The Indians were also the first to come up with the idea of negative numbers. I made a programme for BBC, about the history of mathematics called The Story of Maths and we came to India and explored the development of Brahmagupta’s negative numbers. It is interesting that it is all related to a more philosophical view of the world. In Europe, I think they were frightened of nothing or the void. But in the Indian cultural landscape, it was very acceptable to talk about the zero, to talk about the infinite… in 13th century Florence, the use of zero was banned, it was illegal!

अगस्त 9, 2015

जो भारत को जोड़ता है…

कुछ तो बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा

बाहरी ताकतों की तो बात ही क्या, भारतीय ही, चाहे वे सता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग ही क्यों न हों, भारत को नुकसान पहुंचाने वाली बातें कहते और कृत्य करते ही रहते हैं| उनके वचन और कर्म ऐसे होते हैं जिनसे भारत की एकता हमेशा ही कसौटी पर टंगी रहती है पर कहीं न कहीं कोई न कोई कुछ ऐसा कहता और कर जाता है जो कि दर्शा देता है कि क्यों इतने विशाल देश, जो दुनिया में सबसे ज्यादा विभिन्नताओं को अपने में समेटे हुए है, की एकता बनी रहती है|

अनेकता में एकता की बात हवाई नहीं है, इसकी जड़ें भारत में बेहद गहरी हैं| तोड़ने वाले अगर जन्म लेते रहते हैं तो इसे एकता के सूत्र में पिरोने वाले भी जन्म लेते रहते हैं|

जब देश में हर जगह हिंदू मुसलमान के मध्य अविश्वास की खाई गहरी करने के कृत्य हर जगह हो रहे हैं, ऐसी जादू की झप्पी ही ऐसी साजिशों का जवाब हो सकती थी और है…

जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

जून 13, 2015

बिना पैर ऊँची उड़ान

एक बच्ची जन्मती है पर और बच्चों की तरह उसके पैर नहीं हैं, उसके जैविक माता-पिता इस घबराहट में कि वे बिना पैरों की बच्ची का लालन-पालन कैसे करेंगें, बच्ची को त्याग देते हैं| शारीरिक रूप से अपंग बच्ची को एक अन्य दयालू दंपत्ति गोद लेते हैं और उसे बचपन से सिखाते हैं कि असम्भव जैसा कुछ नहीं होता और वह बच्ची इस बात को अपने आत्मविशवास, दृढ-निश्चय और कड़ी मेहनत से सच सिद्ध करके दिखाती है|

मानव जीवन में इससे प्रेरक कुछ नहीं हो सकता जहां शारीरिक कमी कतई कोई बाधा उत्पन्न न कर पाई हो मानव के सम्मुख और मानव ने हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करके शारीरिक रूप से पूर्णतया सक्षम मानवों को पीछे करके उपलब्धियां कमाई हों और वह भी ऐसे क्षेत्रों में जहां शारीरिक अंगों के सार्थक इस्तेमाल पर बात ठहरती हो|

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अक्टूबर 30, 2014

ईश्वर की दलाली

अगर वह टाल पाता तो वह माँ के साथ मंदिर न जाता| पहले कभी नहीं गया था, पर आज फंस गया था, कोई और ले जाने वाला था नहीं सो उसे ही जाना पड़ा|
मंदिर के बाहर बहुत भीड़ थी| लोग लाइन लगा कर मंदिर में प्रवेश करने का इंतजार कर रहे थे| लाइन देख कर अंकित को लगा कि घंटो लग जायेंगे ऐसे तो|
वह माँ के साथ कार से उतरा और उसकी माँ, महिलाओं की पंक्ति में खड़ी हो गई|
वह कार के पास ही खड़ा रहा|
थोड़ी देर बाद ही धोती कुर्ता और माथे पर चन्दन का टीका लगाए हुए एक युवक उसके पास आया| वह लिबास से पुजारी सरीखा लग रहा था|
युवक ने उसने अंकित से पूछा,” मंदिर में भगवान की पूजा अर्चना करनी है?

हाँ, मेरी माँ को करनी है| पर भीड़ बहुत है|
युवक मुस्कराते हुए बोला,” हाँ भीड़ तो बहुत है, पर आप चाहो तो आपकी माता जी के लिए मंदिर में जल्दी प्रवेश करने की व्यवस्था हो सकती है”|
“कैसे”|
एक अन्य द्वार है मंदिर में प्रवेश करने के लिए| खास भक्त उधर से ही प्रवेश करते हैं और संतुष्टिपूर्वक पूजा करने का समय भी दिया जाता है खास भक्तों को|
ऐसा कैसे?
युवक धीमी आवाज में बोला,” हजार रुपया फीस है शीघ्र प्रवेश की”|
“आप पुजारी हैं मंदिर के?”
नहीं, मेरे मामा जी हैं मुख्य पुजारी|
और खास पूजा का क्या रेट है?
५ हजार| बिल्कुल नजदीक से शान्ति से अकेले में पन्द्रह- बीस मिनट पूजा कर सकते हैं|

और ये जो भीड़ बाहर खड़ी है ये दिक्कत नहीं करेगी?

नहीं नहीं, इसका इंतजाम है, मंदिर के सुरक्षा कर्मचारी इन्हे रोके रखते हैं जब भी कोई खास आदमी पूजा करता है|

अंकित ने कुछ देर सोचा और कहा,” कैसे इस बात को माँ लिया जाए”|
आप मेरे साथ आइये मैं मामा जी से आपको मिलवा देता हूँ|

चलिए आपके मामा जी अगर यही बात कह देंगे तो बात बने|

युवक अंकित को लेकर मंदिर के पीछे की ओर आ गया| और एक छोटे से द्वार से, जिस पर एक सुरक्षा कर्मचारी खड़ा पहरा दे रहा था, अंदर प्रवेश कर गया| पांच मिनट बाद युवक मंदिर के पुजारी के साथ आया|

पुजारी ने अंकित को देख कहा,”आप ईश्वर के विशेष दर्शन कर सकते हैं और उनकी पूजा कर सकते हैं, मेरे भांजे ने जो कहा उसके अनुसार व्यवस्था हो जायेगी|

पुजारी जी, मैं २५ हजार रूपये दूंगा अगर आप ईश्वर को बाहर लाकर मेरी माँ को उनके विशेष दर्शन करवा दें और पूजा करवा दें|

ये क्या बात कर रहे हो? भगवान कैसे बाहर आ जायेंगे?

आपके कहने से आ ही जायेंगे| आप जब भक्तों को अंदर उनसे मिलवा रहे हो| आप मुझसे पंच लाख रूपये ले लो अगर आप ईश्वर को मेरे घर लाकर माँ को उनके दर्शन करवा असकें|

पुजारी ने गुस्से में अपने भांजे को डपटा,” अरे मूर्ख किस पागल आदमी को ले आया पकड़ कर| भगाओ इसे यहाँ से|”

अंकित ने तेज स्वर में पुजारी से कहा,” पुजारी जी, ईश्वर की दलाली बंद कीजिए| कम से कम मंदिर को तो भ्रष्टाचार और घूसखोरी से मुक्त रखिये”|

पुजारी पहरेदार को अंकित को वहाँ से भगाने का आदेश देकर तेजी से मंदिर के अंदर भाग गया|

अक्टूबर 26, 2014

प्रेम भरे दो जीवन…

LoveStoryदोस्तों के आने से काफी पहले ही विक्टर रेस्त्रां पहुँच गया था| अंदर प्रवेश किया तो पाया कि पूरे रेस्त्रां में सिर्फ एक वृद्ध एक कोने में बैठा अकेले ही खा रहा था| थोड़ा नजदीक गया तो पाया कि उसने सामने मेज पर एक महिला की तस्वीर रखी हुयी थी और वह उस तस्वीर को लगातार देखते हुए खा रहा था|

विक्टर को लगा कि वृद्ध अवसाद से ग्रस्त है और तस्वीर में मौजूद महिला उसकी कोई खास रही होगी और शायद अब इस दुनिया में नहीं है और उसकी याद में वृद्ध दुखी है| उसने सोचा कि जब तक उसके दोस्त नहीं आते वह वृद्ध से बातें करके उसका मूड ठीक कर सकता है|

विक्टर वृद्ध के पास चला गया|

“माफ कीजिये, मैं थोड़ी देर आपके पास बैठ सकता हूँ?”

वृद्ध ने उसकी तरफ देखा, कुछ पल सोचा और कहा, “आओ बैठो यंगमैन”|

विक्टर ने तस्वीर की ओर इशारा करते हुए पूछा,” मेरा नाम विक्टर है| आप बड़े प्यार और दुख के साथ इस तस्वीर को निहार रहे थे, क्या यह  आपकी…?”

वृद्ध ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा,” यह मेरी पत्नी की तस्वीर है| जेनिफर”|

“क्या अब वे आपके साथ नहीं हैं?”

“है तो साथ| मैं उसी के साथ हूँ”|

फिर आप इतने दुख से क्यों इस तस्वीर को देख रहे थे?

वृद्ध जैसे समय में कहीं खो गया|

“हम दोनों सत्रह साल के थे जब हम मिले| हमें एक दूसरे से प्यार हो गया| पर समय की करनी| युद्ध छिड़ गया था और मैं सेना में भर्ती हो गया| युद्ध के दौरान भी मैं उसी के बारे में सोचता रहता था| युद्ध के बाद मैं वापिस आया तो पाया कि उसका परिवार कहीं और चला गया था| मैंमें उसे तलाशने की बहुत कोशिश की पर किसी को उसके और उसके परिवार के बारे में नहीं पता था| दस साल मैं उसे खोजता रहा, किसी दूसरी युवती की और कभी आँख भर कर नहीं देखा, मिल कर बात करना तो दूर की बात है| लोग मुझे पागल कहने लगे| मैं उनसे कहता कि मैं वाकई पागल हो गया हूँ जेनिफर के प्यार में पागल!”

वृद्ध कुछ देर खामोश रहा तो विक्टर ने कुरेदा,”फिर?”

“मैं शहर शहर उसे खोजता रहा, जिस भी जगह जाता उसे खोजता| एक दौरे पर मैं केलिफोर्निया गया वहाँ एक सेलून में बाल कटवाते हुए मैं नाई से अपनी प्रेम कहानी और जेनिफर की खोज के बारे में बता बैठा| नाई सेलून में एक कोने में रखे फोन की तरफ गया और फोन पर अपनी बेटी से सेलून में आने को कहा|”

विक्टर के लिए वृद्ध की खामोशी एक पल के लिए भी अखर रही थी| उत्तेजना से भर उसने पूछा,” वही?”

वृद्ध की आँखों में चमक आ गई,” जेनिफर मेरे सामने खड़ी थी| उसने भी दस साल किसी युवक के साथ डेटिंग नहीं की| वह मेरा इंतजार करती रही| उसने अपने पिता और परिवार की एक नहीं सुनी और मेरा इंतजार किया|”

विक्टर को अपनी ओर उत्सुकता से देखता हुआ पाकर वृद्ध ने कहा'” मैंने वहीं जेनिफर के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और उसके सहमति देने पर उसके पिता से अनुमति ली| अगले ही दिन हमने विवाह कर लिया| पचपन साल हम लोग विवाह के बाद साथ रहे| ”

“अब कहाँ हैं जेनिफर”|

“पांच बरस हुए, उसे अपना शरीर छोड़े| पर मेरे साथ वह हरदम बनी रहती है|  मैं विवाह की वर्षगाँठ और जेनिफर का जन्मदिन हमेशा सेलिब्रेट करता हूँ| मैं हमेशा उसकी तस्वीर अपने साथ रखता हूँ| रत को उसकी तस्वीर को चूमकर उसे शुभरात्री कह कर सोता हूँ|”

“दस साल आप दोनों ने एक दूसरे का इंतजार किया? अगर केलिफोर्निया में भी आपको जेनिफर न मिलती और दस साल और गुजर जाते तो?”

तो क्या? मैं तो सारी उम्र उसे तलाशता| वह भी मेरा इंतजार करती”|

“वाह! मैंने आज तक ऐसी प्रेम कहानी नहीं सुनी”|

“ये कहानी नहीं है यंगमैन| हमारा जीवन है”|

अब तो लोग दो चार साल भी विवाह के बंधन में नहीं ठहर पाते| तलाक ले लेते हैं|

“हम दोनों के बीच बहुत बहसें होती थीं पर कभी भी कुतर्क नहीं चले| मैं कुछ बातें कहूँ तुमसे यंगमैन”|

“जी कहिये”|

“मैं बहुत धनी रहा, पैसे के कारण नहीं बल्कि प्रेम के कारण| अपनी पत्नी से रोज इस बात को जाहिर करो कि तुम उससे प्रेम करते हो| लोग जलती हुयी मोमबत्ती की तरह होते हैं| हवा का झोंका आकर लौ बुझा सकता है इसलिए जब तक प्रकाश है उसका भली भांति आनंद लो, उसका सम्मान करो|”

वृद्ध ने अपनी पत्नी की तस्वीर उठाते हुए कहा,” अब मैं चलता हूँ|  मेरी बातें याद रखना|”

 

 

 [ एक सच्ची कथा – परिवर्तित रूप में ]

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