Archive for ‘जीवन’

फ़रवरी 3, 2017

तुम मेरे बोलने और विरोध करने की स्वतंत्रता मुझसे नहीं छीन सकते : अनुराग कश्यप

anuragkप्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता अनुराग कश्यप केवल शब्दों के ही धनी नहीं हैं वरन वे बेहद साहसी किस्म के भी हैं| अमिताभ बच्चन ने तो फ़िल्म के परदे पर ही अपनी दमदार आवाज में संवाद बोले कि आज मेरी जेब में पांच पैसे भी नहीं और मैं पांच लाख का सौदा करने निकला हूँ| और वास्तविक जीवन में तो अमिताभ बच्चन ने पूरे समाज की बात छोड़ दीजिए कभी फ़िल्मी दुनिया में कायम किसी गलत बात के लिए भी आवाज नहीं उठायी, और यही हाल कमोबेश हिन्दी फ़िल्म उद्योग के ज्यादातर बड़े नामों का है, किन्तु अनुराग कश्यप जब फ़िल्मी दुनिया में वास्तविक जीवन में भी जब बेहद मुश्किल और हालात से गुजर रहे थे तब भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया अमिताभ बच्चन या फ़िल्मी दुनिया में शक्ति केन्द्र बन चुके प्रोडक्शन हाउसेज और बड़े फ़िल्मी लोगों से नेक्सस बनाकर चलने वाले शक्तिशाली फ़िल्म क्रिटिक्स के खिलाफ खुलकर खड़े होकर बोलने में| अनुराग ने परिणाम की परवाह कम ही की है और उनका विरोध और गलत बात से उपजा क्रोध उनकी फिल्मों मे दिखाई भी देता है|
पिछले कुछ समय से जो उन्हें गाल्ट लग रहा है उसके खिलाफ वे मुखर होकर बोल रहे हैं और इंटरनेट संसार के ट्रोल्स (जिनमें पैसा लेकर ऐसा करने वाले किराए के ट्रोल्स भी मौजूद हैं) की भीड़ ने उन पर आक्रमण किये हैं| उन सबका विरोध करते हुए उन्होंने नीचे दिए दो बयान सोशल मीडिया पर चस्पाये|

मैं उस वक्त से अपनी रीढ़ सीधी रखकर खड़ा हो रहा हूँ जब आवाज और चेहरे विहीन लोगों को भीड़ का भ्रम जुटाने के लिए सोशल मीडिया का धरातल उपलब्ध नहीं हुआ करता था| इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे विरुद्ध क्या कहते हो या क्या करते हो, मुझ पर गालियों से आक्रमण करते हो या मुझ पर शारीरिक आक्रमण करते हो, मुझे जो उचित लगेगा मैं उसे कहता रहूंगा| तुम्हारी भीड़ मुझे भयभीत नहीं कर सकती, मैं तुम्हारी किसी धमकी से नहीं डरता, तुम लाख चीख लो चिल्ला लो, मेरी आवाज तुम्हारी भीड़ के सामूहिक शोर से ज्यादा बुलन्द रहेगी| मैं अपने सच को गले लगाता हूँ और मुझे तुम्हारे दवारा लगाए आरोपों से तनिक भी भय नहीं लगता|
मुझे सिखाया गया है कि अपने विवेकानुसार बोलने, तर्क करने और प्रश्न पूछने की आजादी बाकी सारी आजादियों से बड़ी है और मैं अपने इस अधिकार का उपयोग सदैव करता रहूंगा| तुम मुझे परिभाषित नहीं करते, मैं स्वयं और मेरा काम मुझे परिभाषित करते हैं, और यह परिभाषा कुछ भी हो सकती है लेकिन यह सदैव मेरी अपनी होगीI मैं अपने प्रयासों में सफल बनूँ या असफल, जिस भी मात्रा में ये मुझ तक आएं ये मेरी अपनी होंगीं|
मुझे सिखाया गया है कि उन लोगों के सोच विचार और कर्म पर दृष्टि रखो और उनसे प्रश्न पूछते रहो जिन्हें हमने सरकार बनाने के लिए चुना है| और मैं यह तब से करता आ रहा हूँ जबकि मैं एक विधार्थी ही था और देश के प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह हुआ करते थे] उनके बाद कांग्रेस की सरकारें बनीं फिर भाजपा की बनी| मुझे सिखाया गया कि हमें अपने प्रधानमंत्री से प्रश्न करने, उससे उत्तर पाने की अपेक्षा रखने, उसके निर्णयों और किये पर प्रश्न उठाने, उससे तर्क करने का पूरा अधिकार है और उससे भय तो कदापि नहीं रखना है| अगर किसी को उससे भयभीत होना है तो यह बेहद दुखद बात है क्योंकि उसे हमने देश की खुशहाली के लिए स्वयं चुन कर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बिठाया है| सम्मान निर्देश देकर प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे कमाना पड़ता है| मेरा किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं है और कुछ भी मुझे राजनीतिक और सत्ता तंत्र से प्रश्न पूछने से नहीं रोकता|
तुम लोग मुझे कुछ भी कह सकते हो, मेरे ऊपर चिल्ला सकते हो| मेरा अपने संविधान पर पूरा भरोसा है और मुझे पूर्ण-विश्वास अपने अधिकारों और अपनी स्वतंत्रता पर और जहां मुझे आवश्यक लगेगा मैं इनका भरपूर उपयोग करूँगा| तो तुम लोग जितना भी जोर लगा लो, तुम मुझे रोक नहीं पाओगे, तुम्हारे मुझ पर प्रेम उडेलने के लिए धन्यवाद|
और जो लोग ये रट लगा रहे हैं – उस वक्त तुम कहाँ थे, उस घटना के कहाँ तुम क्यों चुप थे, ऐसा पूछने वाली ट्रोल्स की भीड़ के लिए मेरे पास एक ही जवाब है कि मैं यहीं था पर मेरे बोलने की जरुरत इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि जिन्हें बोलना चाहिए या जिनके ऊपर बोलने का उत्तरदायित्व था वे बोल रहे थे| चाहे वह जायरा का मामला हो, जहां सरकार और उसके नुमाइंदें तुरंत बोल पड़े थे और गलत की निंदा की उन्होंने, और चाहे विवेक की फ़िल्म की बात हो जहां राज्य का समर्थन उसके साथ था| | मैं तभी बोलता हूँ जब राज्य सत्ता या तो चुप्पी धारण कर लेती है या मामले को नजरंदाज कर देती है| क्योंकि यही समय होता है जब किसी को बल्कि हम सभी को बोलना चाहिए|
जिस एक वक्त की अपनी चुप्पी का मुझे अभी तक खेद है वह है FTII का मामला| जब यह सब चल रहा था मैं सरकार के साथ काम कर रहा था और मुझे विश्वास दिलाया गया था कि सरकार वास्तव में बिगड़ती जा रही स्थितियों को संभालने की कोशिश में लगी हुयी है और मैंने उनके कहे पर विश्वास किया| और मुझसे ये बातें स्वयं आई एंड बी के कनिष्ठ मंत्री ने कहीं| उन्होंने कहा कि मुझे इस मुददे पर शामिल होने की जरुरत नहीं है और वे लोग समाधान पर काम कर रहे हैं| मैंने उनके कहे पर विश्वास कर लिया| एक और बार मैंने विश्वास किया जब सेंसरशिप का मुद्दा उठा और मैं चुप रहा| और तब मुझे दीवार की ओर ढकेल दिया गया जब “उड़ता पंजाब” प्रदर्शन के लिए तैयार थी और उन सबने मौन धारण कर लिया, मुझसे चुप्पी साध ली| उस वक्त मैं उनके तरीके को समझ पाया कि कैसे शोषण किया जाता है और कैसे मेरे जैसे को उसके विश्वास करने के कारण एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है| तब मैं जागा और तब से मैं यहाँ हूँ और लगातार बोल रहा हूँ उन उन बातों पर जिन पर बहुत से चुप रहे गये| और मैं हर उस बात के लिए बोलूंगा जिस पर बोलना चाहिए और जिस पर सत्ता शक्ति लोगों की चुप्पी चाहती है| मैं इस स्थान पर हूँ और रहूंगा तो तुम सारे लोग जो तोता रटंत लगा रहे हो कि उस वक्त मैं कहाँ था, उस मामले में चुप क्यों रहा, अपनी रट की बत्ती बना लो और ….
धन्यवाद !

सितम्बर 17, 2016

एक अभिनेता की डायरी का पन्ना

तकरीबन  19 बरस की उम्र रही होगी जब मेरी शादी 17 बरस की मेहरुन्निमा के संग हुयी| आजादी के पूर्व के भारत में बड़े होते हुए मैं ब्रितानी संस्कृति से बहुत प्रभावित हो चला था| मैंने बढ़िया तरीके से अंग्रेजी बोलने में पारंगत हासिल कर ली थी, मैंने अंग्रेजी स्टाइल में नफीस सूट पहनने का शौक पाल लिया था, मैंने अंग्रेजों के आकर्षक तौर-तरीके कायदे से समझ कर जीवन में उतार लिए थे| लेकिन मेहरुन्निमा मुझसे एकदम उलट थी – वह एक बिल्कुल घरेलू किस्म की महिला थी| मेरी तमाम सलाहें और चेतावनियाँ उस पर बेअसर रहीं और उसकी मूलभूत प्रकृति में कोई सुधार न आया| वह एक आज्ञाकारी पत्नी थी, बच्चों से स्नेह करने वाली एक बहुत अच्छी माँ थी, और कुल मिलाकर कुशल गृहणी थी| लेकिन मैं तो ऐसी पत्नी नहीं चाहता था|

जितना ही मैं उसे बदलने का प्रयास करता उतनी ही दूरी हम दोनों के मध्य बढ़ती जाती| धीरे धीरे एक खुशनुमा लड़की से वह आत्मविश्वास से रहित खामोश स्त्री में परिवर्तित हो गई| इस बीच मैं अपने साथ काम करने वाली एक अभिनेत्री के प्रति आकर्षित हो गया| वह बिल्कुल वैसी थी जैसी स्त्री को मैं अपनी पत्नी के रूप में देखना चाहता था| विवाह के दस साल बाद मैंने मेहरुन्निमा को तलाक दे दिया और उसे, अपने बच्चों और अपने घर को छोड़कर मैंने अपनी अभिनेत्री साथी के संग शादी कर ली| मेहरुन्निमा और अपने बच्चों की आर्थिक सुरक्षा का इंतजाम मैंने कर दिया था|

6-7 महीनों तक सब सही चला| उसके बाद मुझे एहसास होने लगा कि मेरी दूसरी पत्नी में न तो देखभाल कर सकने की क्षमता थी न ही उसे अपने से इतर किसी से स्नेह था| उसे केवल अपनी खूबसूरती, महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों से मतलब था| कभी कभी मुझे मेहरुन्निमा के लगाव भरे स्पर्श और सदा मेरी और बच्चों की भलाई के लिए उसका प्रयासरत रहना याद आता था| 

जीवन आगे बढ़ता गया| मैं और मेरी दूसरी पत्नी एक मकान में रह रहे थे जहां न जीवंत इंसानों का कोई वजूद था और न ही घर होने का कोई लक्षण| मैंने जीवन में पीछे मुड कर देखा भी नहीं कि मेहरुन्निमा और बच्चे किस हाल में रह रहे थे?


दूसरे विवाह के तकरीबन 6-7 सालों के बाद अचानक एक दिन मैंने एक लेख पढ़ा जो किसी जो कि एक प्रसिद्धि पाती हुयी महिला शैफ के बारे में था, जिसने हाल ही में अपनी व्यंजन विधियों पर किताब लिखी थी| जैसे ही मेरी निगाह, आकर्षक, खूबसूरत, आत्मा विश्वास से लबरेज और गरिमामयी दिखाई देती लेखिका के  फोटो पर पड़ी, मैं स्तब्ध रह गया| मुझे बहुत बड़ा झटका लगा| यह तो मेहरुन्निमा थी! लेकिन यह प्रसिद्द शैफ कैसे मेहरुन्निमा हो सकती थी?

बहरहाल उसके बारे में पता लगाने से मुझे मालूम हुआ कि उसने न केवल दुबारा विवाह कर लिया था बल्कि अपना नाम भी बदल लिया था|

मैं उस वक्त विदेश में फिल्म की शूटिंग में व्यस्त था| मेहरुन्निमा अमेरिका में रहने लगी थी| मैंने अमेरिका जाने के लिए फ्लाईट पकड़ी और मेहरुन्निमा के निवास स्थान आदि का विवरण जुटाकर उससे मिलने उसके घर पहुँच गया| मेहरुन्निमा ने मुझसे मिलने से इंकार कर दिया| मेरे बच्चों, मेरी बेटी 14 साल की हो चुकी थी, और बेटा 12 का, ने मेहरुन्निमा से कहा कि वे एक अंतिम बार मुझसे मिलना और बात करना चाहते हैं|मेहरुन्निमा का वर्त्तमान पति उनकी बगल में बैठा था, वही अब मेरे बच्चों का कानूनी रूप से पिता था|

आज तक भी मैं वह सब नहीं भुला पाता जो मेरे बच्चों ने मुझसे कहा!


उन्होंने कहा – कि उनके नये पिता को सच्चे प्रेम का अर्थ पता है| उसने मेहरुन्निमा को उसके प्राकृतिक रूप में स्वीकार किया और कभी भी उसे अपने जैसा या उसके मूल स्वभाव से अलग स्वभाव का इंसान बनाने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि उसने स्वंय से ज्यादा मेहरुन्निमा से प्रेम किया|  उसने मेहरुन्निमा को सहजता से और उसके अपने तरीके से उसकी अपनी गति से निखरने, खिलने और संवरने का भरपूर मौक़ा दिया और कभी भी उस पर अपनी इच्छा नहीं लादी| उसने मेहरुन्निमा को बिल्कुल उसी रूप में स्वीकार किया और उसे सम्मान दिया जैसी की वह थी| अपने दूसरे पति के निश्छल प्रेम, स्वीकार और बढ़ावा देने से मेहरुन्निमा एक गरीमामयी, स्नेहमयी और भरपूर आत्मविश्वास से भरी हुयी स्त्री के रूप में खिल गई थी|


जबकि मेरे साथ रहने के दौर में मेरे दवारा उस पर अपनी इच्छाएं लादने से, उसके प्राकृतिक स्वभाव और विकास पर हमेशा उंगली उठाने से और मेरी स्वहित देखने की प्रवृत्ति के कारण वह बुझ गई थी और इस सबके बावजूद भी मैंने ही उसे छोड़ दिया था|
शायद मैंने उसे कभी प्रेम किया ही नहीं, मैं तो स्वयं से ही प्रेम करता रहा|

अपने ही प्रेम में घिरे लोग दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर पाते!


(अभिनय से जीवन जीता एक अभिनेता) 

सितम्बर 5, 2016

अलबर्ट कामू का आभार पत्र अपने शिक्षक के नाम

camusविश्व प्रसिद्ध दार्शनिक, अल्जीरिया में जन्में और फ़्रांस में वास करने वाले अलबर्ट कामू (7 November 1913 – 4 January 1960) को जब 1957 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्होंने अपने शिक्षक रहे Louis Germain का आभार व्यक्त करने के लिए उन्हें एक खुला पत्र लिखा, क्योंकि उनके अनुसार ये उनके शिक्षक ही थे जिन्होने कामू के अंदर छिपी लेखकीय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोत्साहन दिया जिससे वे बाद में विश्व भर में सम्मान पाने वाले उपन्यासों और निबन्धों की रचना कर सके|

उल्लेखनीय है कि कामू जब शैशवावस्था में ही थे तभी उनके पिता प्रथम विश्व युद्ध में मारे जा चुके थे और उनकी माँ आंशिक रूप से बधिर थीं और अशिक्षित थीं|

प्रस्तुत है कामू दवारा अपने शिक्षक को 19 November 1957 को लिखे पत्र का हिन्दी अनुवाद,

 

Dear Monsieur Germain,

इन दिनों मेरे गिर्द घट रही हलचलों को बहुत हद तक शांत होने का इंतजार करने के बाद मैं आज अपने हृदय की गहराइयों भरे उद्गारों के साथ आपसे मुखातिब हो रहा हूँ| मुझे हाल ही में एक महान पुरस्कार से सम्मानित किया गया है| मैंने न तो इस पुरस्कार की कभी कामना की थी और न ही मैं अपने को इसके योग्य पाता हूँ|

जब मैंने अपने को पुरस्कार दिए जाने की खबर सुनी तो अपनी माँ के बाद मुझे आपके प्रति कृतज्ञता का ही ख्याल आया| आपके बिना, आपके प्रोत्साहन भरे और स्नेहमयी सहारे के बिना और आपके दवारा मुझे उदारतापूर्वक दी गई शिक्षा के बिना मुझ जैसा गरीब बच्चा आज यह सब नहीं पा सकने की हालत में कदापि नहीं पहुँच पाता|

मैं इस सम्मान पर बहुत ज्यादा केंद्रित नहीं होना चाहता लेकिन इसने मुझे यह अवसर तो दिया ही है मैं अपने ह्रदय में आपके स्थान के बारे में अपने भाव आपसे साझा कर सकूं| आप मेरे लिए हमेशा से ही बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं और आज भी हैं| मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपने जो प्रयास स्कूल में पढ़ रहे एक छोटे बालक को शिक्षा और ज्ञान ग्रहण करने के मार्ग पर सुचारू रूप से चलाने के लिए किये थे और जिस कार्य में आपने अपना पूरा उदार हृदय उड़ेल दिया था, उन सब प्रयासों के प्रति आपका यह शिष्य आज भी आपका आभारी है|

आपके प्रति कृतज्ञ भावों से भरे ह्रदय से मैं आपका आलिंगन करना चाहता हूँ|

अलबर्ट कामू

 

सितम्बर 5, 2016

शिक्षक हो तो ऐसा!

Teacher@UPयह घटना उत्तर प्रदेश के रामपुर के शाहबाद स्थित रामपुरा गांव के एक प्राइमरी स्कूल मास्टर ने अपने छात्रों में शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि मिसाल कायम कर दी और मौजूदा दौर में एक अनूठी कहानी रच दी| एक ऐसे वक्त में जब प्राथमिक शिक्षा का स्तर न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बुरी स्थिति में हैं और शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद लाखों करोड़ों बच्चे प्राथमिक स्तर की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं और जहां प्राथमिक शिक्षा में सुविधाओं का बेहद अकाल है, यह घटना बहुत ज्यादा महत्व की बन जाती है| प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर भारतीय को इस घटना के बारे में जानना चाहिए और सम्बंधित संस्थाओं एवं सरकारों को ऐसे आदर्श शिक्षक को पुरस्कृत करना चाहिए जिसने शिक्षा का ज्ञान से संबंध अपने उच्चतम आदर्श रूप में कायम रखा है|

रामपुरा के स्कूल में जब अध्यापक मुनीश  कुमार की तैनाती बतौर प्राथमिक शिक्षक हुई तो उस  इलाके में बहुत से बच्चे स्कूल नहीं आते थे| ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए उनके बच्चे उनके कामकाज में हाथ बंटाने वाले जीव थे| जितने ज्यादा हाथ उतनी ज्यादा घर की कमाई!

मुनीश कुमार ने गांव में घर-घर जाकर लोगों से सम्पर्क किया| उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी पर धीरे धीरे मुनीश की मेहनत रंग लाई और सभी ग्रामीण  अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे|
स्कूल में विधार्थी लाने के बाद मुनीश कमरतोड मेहनत करके दिन रात एक करके अपने स्कूल के बच्चों को शिक्षित बनाने के काम में जुट गये|

मुनीश का तबादला हुआ तो स्थानीय लोगों को ऐसा लगा मानों उनके बच्चों से उनका अध्यापक और गाइड और उनसे दूर जा रहे हों|

मुनीश  अपने पीछे ज्ञान की ऐसी ज्योति जलती छोड़ गये जो उस इलाके से अज्ञानता के अँधेरे को बहुत सालों तक रोशन करती रहेगी|शिक्षक हो तो ऐसा!

अगस्त 9, 2016

रूरल डेवेलपमेंट … (महात्मा गाँधी)

“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा|

इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है|

एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई के रूप में हम एक ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जो कि अपने आप में तो स्व-निर्भरता से परिपूर्ण हो, पर जहां लोग पारस्परिक निर्भरता की डोर से बंधे हुए हों| इस तरह का विचार पूरे संसार में फैले मानवों के बीच एक संबंध कायम करने की तस्वीर प्रस्तुत करता है|

ऐसा कुछ भी शहरों को उत्पादित करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो कि हमारे गाँव उत्पादित कर सकते हों|

स्वतंत्रता बिल्कुल नीचे के पायदान से आरम्भ होनी चाहिए|

और इसीलिए हरेक गाँव को स्व:निर्भर होना ही चाहिए और इसके पास अपने सभी मामले स्वंय ही सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए|

गांवों की ओर लौटना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है|

मेरा आदर्श गाँव मेरी कल्पना में वास करता है|

एक ग्रामीण को ऐसे जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए जैसे किसी मलिन अँधेरे कमरे में कोई जानवर रहता है|

मेरे आदर्श गाँव में मलेरिया, हैजा और चेचक जैसी बीमारियों के लिए कोई जगह नहीं होगी| वहाँ कोई भी सुस्ती, काहिली से घिरा और ऐश्वर्य भोगने वाला जीवन नहीं जियेगा|

मेरा स्पष्ट विचार है कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारत के माध्यम से पूरे संसार को सच्ची स्वतंत्रता का स्वाद चखना है तो हमें गाँवों में झोंपडों में ही रहना होगा न कि महलों में|

गाँव की पंचायत स्थानीय सरकार चलाएगी| और इनके पास पूर्ण अधिकार होंगे| पंचायत के पास जितने ज्यादा अधिकार होंगे उतना लोगों के लिए अच्छा होगा|

पंचायतों का दायित्व होगा कि वे ईमानदारी कायम करें और उधोगों की स्थापना करें|

पंचायत का कर्तव्य होगा कि वह ग्रामीणों को सिखाये कि वे विवादों से दूर रहें और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लें|

यदि हमने सच्चे रूप में पंचायती राज की स्थापना कर दी तो हम देखेंगें कि एक सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा और जहां पर कि सबसे नीची पायदान पर खड़ा भारतीय भी ऊँचे स्थानों पर बैठे शासकों के समां बर्ताव और अधिकार पायेगा|

मेरे आदर्श गाँव में परम्परागत तरीके से स्वच्छता के ऊँचे मानदंड स्थापित होंगे जहां मानव और पशु जनित कुछ भी ऐसी सामग्री व्यर्थ नहीं फेंकी जायेगी जो कि वातावरण को गंदा करे|

पांच मील के घेरे के अंतर्गत उपलब्ध सामग्री से ही ऐसे घर बनाए जायेंगें जो कि प्राकृतिक रूप से ही हवा और रोशनी से भरपूर हों| इन घरों के प्रांगणों में इतनी जगह होगी कि ग्रामीण वहाँ अपने उपयोग के लिए सब्जियां उगा सकें और अपने पशु रख सकें|

गावों की गालियाँ साफ़ सुथरी और धूल से मुक्त होंगी|  हर गाँव में पर्याप्त मात्रा में कुंएं होंगे जिन तक हर गांववासी की पहुँच होगी|

सभी ग्रामीण बिना किसी भेदभाव और भय के पूजा अर्चना कर सकें ऐसे पूजा स्थल होंगें| सभी लोगों के उठने बैठने के लिए एक सार्वजनिक स्थान होगा| पशुओं के चारा चरने के लिए मैदान होंगे| सहकारी डेरी होगी| प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल होंगे जहां व्यावहारिक क्राफ्ट्स और ग्राम-उधोगों की पढ़ाई मुख्य होगी| गाँव की अपनी एक पंचायत होगी जो इसके सभी मामले सुलझाएगी| हरेक गानव अपने उपयोग के लिए दूध, अनाज, सब्जियों, फलों और खाड़ी एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन करेगा|

सबको इस बात में गर्व महसूस करना चाहिए कि वे कहीं भी और कभी भी उन उपलध वस्तुओं का प्रयोग करते है जो गाँवों में निर्मित की गयी हैं| अगर ठीक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो गाँव हमारी जरुरत की सभी वस्तुएं हमें बना कर दे सकते हैं| अगर हम एक बार गानव को अपने दिल और दिमाग में स्थान दे देंगें तो हम पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं करेंगें और मशीनी औधोगीकरण की ओर अंधे बन कर नहीं भागेंगें|”

 

अप्रैल 7, 2016

कठफोड़वा : दक्षतम बढ़ई कलाकार

शहर शहर सुरसा के मुख समान अनवरत फैलते सीमेंट के जंगलों में वास करती, बड़ी होती पीदियों में संभवतः लगभग सभी लोगों ने कभी भी कठफोड़वा नामक पक्षी को पेड़ के तने में अपनी मजबूत चोंच से छेद करते न देखा होगा और शायद अपनी आँखों से कठफोड़वा देखा ही न हो| सीमेंट के जंगल ने पेड़-पौधों से गुलज़ार जंगलों के असली जानवरों एवं पक्षियों में से बहुत सी किस्मों को मनुष्य की आँखों से ओझल ही कर दिया है|

कठफोड़वा के कलाकारी कृत्य का आनंद लें और शायद इससे कठफोड़वा को असल में देखने की चाह उभरे और उसके दर्शन भी कभी हो जाएँ||

टैग:
फ़रवरी 24, 2016

महात्मा गांधी एवं परमहंस योगानंद

 

अगस्त 9, 2015

जो भारत को जोड़ता है…

कुछ तो बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा

बाहरी ताकतों की तो बात ही क्या, भारतीय ही, चाहे वे सता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग ही क्यों न हों, भारत को नुकसान पहुंचाने वाली बातें कहते और कृत्य करते ही रहते हैं| उनके वचन और कर्म ऐसे होते हैं जिनसे भारत की एकता हमेशा ही कसौटी पर टंगी रहती है पर कहीं न कहीं कोई न कोई कुछ ऐसा कहता और कर जाता है जो कि दर्शा देता है कि क्यों इतने विशाल देश, जो दुनिया में सबसे ज्यादा विभिन्नताओं को अपने में समेटे हुए है, की एकता बनी रहती है|

अनेकता में एकता की बात हवाई नहीं है, इसकी जड़ें भारत में बेहद गहरी हैं| तोड़ने वाले अगर जन्म लेते रहते हैं तो इसे एकता के सूत्र में पिरोने वाले भी जन्म लेते रहते हैं|

जब देश में हर जगह हिंदू मुसलमान के मध्य अविश्वास की खाई गहरी करने के कृत्य हर जगह हो रहे हैं, ऐसी जादू की झप्पी ही ऐसी साजिशों का जवाब हो सकती थी और है…

अगस्त 3, 2015

फेसबुक से बाहर वास्तविक जीवन में फेसबुकीय सिद्धांतों का नतीजा

lifeoutoffacebook

जून 13, 2015

बिना पैर ऊँची उड़ान

एक बच्ची जन्मती है पर और बच्चों की तरह उसके पैर नहीं हैं, उसके जैविक माता-पिता इस घबराहट में कि वे बिना पैरों की बच्ची का लालन-पालन कैसे करेंगें, बच्ची को त्याग देते हैं| शारीरिक रूप से अपंग बच्ची को एक अन्य दयालू दंपत्ति गोद लेते हैं और उसे बचपन से सिखाते हैं कि असम्भव जैसा कुछ नहीं होता और वह बच्ची इस बात को अपने आत्मविशवास, दृढ-निश्चय और कड़ी मेहनत से सच सिद्ध करके दिखाती है|

मानव जीवन में इससे प्रेरक कुछ नहीं हो सकता जहां शारीरिक कमी कतई कोई बाधा उत्पन्न न कर पाई हो मानव के सम्मुख और मानव ने हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करके शारीरिक रूप से पूर्णतया सक्षम मानवों को पीछे करके उपलब्धियां कमाई हों और वह भी ऐसे क्षेत्रों में जहां शारीरिक अंगों के सार्थक इस्तेमाल पर बात ठहरती हो|

टैग:
%d bloggers like this: