Archive for ‘कहानी’

जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

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दिसम्बर 16, 2014

बच्चे को क्या मालूम … मंटो

kid on gunpoint-001लिबलिबी दबी-पिस्तौल से झुंझलाकर गोली बाहर निकली।खिड़की में से बाहर झाकने वाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।लिबलिबी थोड़ी देर के बाद फिर दबी-दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुंह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में मिलकर बहने लगा।लिबलिबी तीसरी बार दबी-निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज्ब हो गई।चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख भी न सकी और वहीं ढेर हो गई।

पाचवीं और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ न जख्मी। गोलिया चलाने वाला भिन्ना गया। दफ्अतन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया। गोलिया चलाने वाले ने पिस्तौल का मुंह उसकी तरफ मोड़ा। उसके साथी ने कहा: ”यह क्या करते हो?”

गोलिया चलाने वाले ने पूछा: ”क्यों?” ”गोलिया तो खत्म हो चुकी है!”

 

”तुम खामोश रहो.. इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”

 

[मंटो की लघुकथा – बेखबरी का फायदा]

जुलाई 16, 2014

वे बेचते भुट्टे…

BoyGirlCorn-001बला की गर्मी… पारा डिग्री सेल्सियस में अर्द्ध शतक लगाने के एकदम करीब था…सूरज की किरणों की तीव्रता से लग रहा था कि मानो आज अपनी सारी ऊष्मा उड़ेल कर ही दम लेगा| धूप सिर को तपाये दे रहे ही, शरीर को जलाए दे रही थी|
ऐसे में कुछ दूर धूप में पैदल चलना पड़े तो लगे मानों जीते जी भट्टी में झुलस रहे हैं|

पर कई बार वे सब काम करने पड़ते हैं जो व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों में करना नहीं चाहता|

न  काम होता न तपती धूप में पैदल चलना पड़ता|

प्यास से कंठ सूख रहा था|

जहां पहुंचना अथा वह इमारत अभी भी कम से कम आधा किमी दूर थी| सड़क पार करके फुटपाथ पर चलना हुआ तो देखा कि दूर दूर तक छाया का निशां नहेने था और नंगा तपा हुआ फुटपाथ मुँह चिड़ा रहा था|

थोड़ी दूर चलने पर ही देखा तपती धूप में दो बालक भुट्टे बेचते फुटपाथ पर बैठे थे| सात-आठ साल की लड़की भुट्टे भून रही थी और उससे छोटा बालक, जो उसका भाई ही होगा, भुट्टे अपने पास चटाई पर रख बेच रहा था|

उनके थोड़ा पीछे एक छोटा सा पेड़ अवश्य था पर वहाँ एक टेम्पो वाले ने दुपहर को सोने के लिए कब्जा जमा लिया था वरना बच्चे वहाँ जो भी थोड़ी बहुत छाया थी उसी में अपना डेरा जमा सकते थे|

सामने ही एक प्रसिद्द पब्लिक स्कूल का में गेट चमचमा रहा था| इन् निर्धन बच्चों को रोजाना ही अंदर प्रवेश करते अमीर बच्चे दिखाई देते होंगे और वे यहाँ फुटपाथ पर भुट्टे बेचने को अभिशप्त थे| उनके लिए तो अभी से इस देश में दो देश बन गये थे, एक उनका देश था जो बचपन से ही कठोर मेहनत करके उत्पाद उगा रहा था, बना रहा था और बेच रहा अथा और एक दूसरा देश था जिसके बाशिंदें उनसे समां कभी कभी खरीद भी लेते थे वरना दूसरे देश के लिए बाजार भी और ही किस्म के थे, चमचमाते हुए, रोशनी और चकाचौंध से भरपूर|

प्यास से कंठ सूख रहा अथा| पानी भी साथ नहीं लिया था| मन में विचार आया कि क्यों न भुट्टा खा लिया जाए|

पर उससे तो प्यास और बढ़ेगी!

तो क्या, अब मंजिल नजदीक ही है जाकर और ज्यादा पानी पी लिया जायेगा|

पर बच्चों से भुट्टे लेना क्या बाल-मजदूरी का समर्थन नहीं?

पर अगर भुट्टा ना लिया तो क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार होगा?

अगर भुट्टा ले भी लिया तो एक भुट्टे से या कुछ भुट्टे खरीदने से क्या सुधार होगा उनकी स्थिति में?

उनके माता-पिता उन्हें मजदूरी से हटा स्कूल भेजने लगेंगे?

थोड़ी देर ऐसे ही उलझन में घिरा खड़ा रहा|

फिर बच्चों की तरफ देख दो भुट्टे देने को कहा|

कम से कम इस तपती धूप में उन्हें दो भुट्टे बेच पाने का संतोष तो मिलेगा शायद उन्हें खुशी भी हो|

इनका अच्छा भविष्य तो सरकारों के हाथ में है| वे चाहें तो ये बच्चे भी पढ़ लें और भविष्य बना लें|

भुट्टा खाते चलते हुए और बच्चों के बारे में सोचते हुए मंजिल भी आ गई|

उनके बारे में सोच सकने वाले मंत्री बनेंगे नहीं और मंत्री ऐसे बच्चों के पास समय व्यतीत करके उनके बारे में सोचेंगे नहीं|

तो ऐसे बाल-मजदूरों का क्या भविष्य है इस देश में|

क्या ये भुट्टे बेचते और ऐसे अन्य काम करते ही रह जायेंगे?

 

…[राकेश]

 

अप्रैल 30, 2014

दाने दाने पर कहाँ लिखा है जरूरतमंद का नाम?

हैम्बुर्ग पहुंचकर हम एक रेस्त्रां के अंदर गये| अंदर हमने देखा कि ज्यादातर मेजें खाली थीं| एक मेज पर एक युवा जोड़ा खाना खा रहा था| हमने ध्यान दिया कि उनके सामने मेज पर केवल दो तश्तरियाँ और दो ग्लास बीयर के रखे थे|
जर्मनी एक विकसित और औधोगिक देश है| ऐसा अनुमान सहज ही प्रतीत होता है कि ऐसे विकसित देश के निवासी आरामदायक और ऐश्वर्य से भरपूर ज़िंदगी जीते होंगे|

युवा जोड़े को इतना सादा खाना खाते देख लगा कि इस दावत में रोमांटिक भाव कहाँ हैं और निश्चित ही यह युवती इस कंजूस लड़के को जल्द ही अलविदा कह देगी|

एक अन्य कोने की मेज पर कुछ वृद्धाएं बैठी थीं| जब भी वेटर कोई डिश लेकर आता वह उन सबमें उसे बांट देता और महिलायें अपनी प्लेटों में परोसे गये खाने को पूरी तरह से खाकर समाप्त कर देती थीं|

हम लोगों को बहुत भूख लगी थी| स्थानीय साथी ने हम लोगों के लिए बहुत सा खाना आर्डर कर दिया| जब हमने मेज छोड़ी तो हमारे मेज पर कम से कम एक तिहाई से ज्यादा खाना बचा हुआ था|

जब हम रेस्त्रां से निकल रहे थे| एक वृद्धा ने हमसे अंग्रेजी में बात शुरू कर दी| हमें महसूस हुआ कि उन महिलाओं को हमारा मेज पर इतना सारा खाना छोड़ना अच्छा नहीं लगा|

“हमने खाने का पैसा दिया है और यह आप लोगों का मसला नहीं है कि हम कितना खाते हैं या कितना प्लेट में छोड़ देते हैं”| साथी ने थोड़े गुस्से से महिला को जवाब दिया|

महिलायें क्रोधित हो गयीं| उनमें से एक ने तुरंत पर्स से फोन निकाल कर किसी को फोन किया और कुछ ही देर में वर्दी पहने हुए सोशल सिक्योरिटी संस्था का प्रतिनिधि वहाँ हमारे सामने खड़ा था|
मामले को जानकर उसने हम पर 50 यूरो का फैन लगा दिया| हम चुप रहे|
अधिकारी ने गंभीर आवाज में हमें चेताया,” उतना ही आर्डर करो जितना आप लोग खा सकते हो| धन अवश्य ही आपका अपना है पर संसाधन पूरे देश और समाज की सामूहिक संपत्ति हैं| दुनिया में बहुत हैं जिनके पास साधन नहीं हैं और आपको कोई हक नहीं है संसाधनों को नष्ट करने का”|

धनी जर्मनी के लोगों के विचारों ने हमें शर्मिंदगी में धकेल दिया| हमें वाकई गहरे में विचार करने की जरुरत है| हमारा देश एक गरीब देश है| संसाधनों की कमी है|

हम भारी मात्रा में खाना बेकार करते हैं| दावतों में भी और रोजमर्रा के स्तर पर व्यक्तिगत जीवन में भी|

[जर्मनी में एक व्यक्ति के साथ हुये हादसे की कथा]

दिसम्बर 31, 2013

16 दिसम्बर की सर्द रात…

oldman-001बर्फ गिरती है हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में, और दांत किटकिटाने लगते हैं दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के इलाके में रहने वाले जीवों के| इस बरस भी दिसम्बर की दस तारीख क्या निकली सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया था| मजबूरी न हो तो कौन सर्दी की रातों में घर की नर्म-गर्म शरण छोड़कर बाहर सडकों पर ख़ाक छानेगा?

‘समय से मीटिंग खत्म हो जाती तो घर पहुँच जाता’|  बस से उतर कर बस स्टॉप पर चढ़ते हुए अमित भुनभुनाया|

भूख अलग परेशान कर रही थी| उसने समय देखा|

साढ़े नौ बजने ही वाले थे| दुकानदार दुकानें बंद कर अपने अपने घर जाने लगे थे| कुछ ही मिनटों में बस स्टॉप सुनसान लगने लगा| अमित को एहसास हुआ कि वह अकेला ही बस स्टॉप पर मौजूद था| यही तो वक्त रहा होगा पिछले बरस की 16 दिसंबर की रात जब ऐसे ही एक बस स्टॉप से दामिनी और उसके मित्र को कुछ वहशी दरिंदों ने भुलावा देकर अपनी बस में बैठा लिया था और हैवानियत की सभी हदें पार करके एक खिल उठने की भरपूर संभावना लिए हुए जीवन को कुचल दिया था| उस रात भी वह सड़क पर ही था और उस हादसे की खबर उसे सुबह उठने पर टीवी पर आ रहे समाचारों के जरिये ही हुयी थी|

बस स्टॉप पर हल्की सी आहट से उसकी विचार श्रंखला टूटी| उसने देखा कोट पहने और मंकी कैप और मफलर में ढके हुए एक बुजुर्गवार बस स्टॉप पर आ पहुंचे थे| उन्होंने कोट की जेब से एक मोमबत्ती और माचिस की एक डिबिया निकाली और माचिस की एक तिल्ली निकाल कर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करने लगे, पर हवा चलने के कारण मोमबत्ती जल पाती उससे पहले ही माचिस की तिल्ली बुझ गई| उन्होंने दूसरी तिल्ली जलाई, इस बार मोमबत्ती जल गई और वे उसे बस स्टॉप के एक कोने पर लगाने लगे पर हवा ने इस बार भी काम दिखा दिया और मोमबत्ती बुझ गई|

अमित ने देखा कि कोई पिज्ज़ा खाकर उसका डिब्बा बस स्टॉप में लगी एकमात्र बैंच पर छोड़ गया था| उसने डिब्बा उठाकर बुजुर्गवार से कहा,” सर, इसकी ओट में जलाइए मोमबत्ती शायद काम बन जाए|”

कैप और मफलर से लगभग पूरी तरह ढके बुजुर्गवार के चेहरे से झांकती उनकी आँखों में मुस्कान की झलक सी दिखाई दी|

‘ले आओ बेटा इसे इधर ले आओ, यहाँ कोने में लगा देता हूँ’

अमित गत्ते का डिब्बा लेकर बस स्टॉप के एक कोने पर खड़े बुजुर्गवार के पास चला गया| उसने डिब्बे को खोल दिया और अब वह काफी बड़े हिस्से को गत्ते की दीवारों से रोक सकता था| उसे एहसास हो गया था कि बुजुर्गवार दामिनी की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं|

बुजुर्गवार ने मोमबत्ती जलाई और एक कोने में थोड़ा मोम टपका कर फर्श पर टिका दी और आँखें बंद करके हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगे| मिनट भर ऐसे ही प्रार्थना जैसा कुछ करके वे पीछे हटे तो अमित ने गत्ते के डिब्बे को मोमबत्ती के सामने इस तरह टिका दिया जिससे हवा का प्रवाह रोका जा सके|

बुजुर्गवार ने बैंच पर बैठ हल्की आवाज में कहा,” बहुत बुरा हुआ था उसके साथ”|

“जी”, अमित के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल सका|

बुजुर्गवार कुछ देर सड़क पर दूर कुछ देर देखते रहे| अमित को अब तक बस आने का इन्तजार था पर अब बुजुर्गवार के आने से अकेलेपन का एहसास खत्म हो चला था|

‘बहुत साल हो गये…ऐसी ही एक रात थी…पर सर्दी अभी आने को थी| नवंबर के शुरुआती दिन होंगे|’

बुजुर्ग ने धीमे स्वर में मानों अपने आप से कहा हो| अमित ने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो उन्हें कहीं खोया हुआ पाया| उसकी समझ में नहीं आया कि वे उससे कह रहे थे या खुद से ही बुदबुदा कर बात कर रहे थे|

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा,” तीसरी मंजिल पर स्थित घर में अकेला था, बीमार भी था,  रात का खाना खाकर बालकनी में टहल रहा था| रात के कोई साढ़े नौ बजे होंगे| कमरे और बालकनी की बत्तियाँ बंद करके घूम रहा था| नीचे कुछ दूर स्ट्रीट लाईट जल रही थी| एक कार आकर रुकी और उसमें से दो नौजवान उतरे| उन्होंने देखा उनकी पार्किंग की जगह कोई कार खड़ी हुयी थी| पार्किंग को लेकर झगडा होना लगभग रोजमर्रा की बात थी वहाँ| उन्होंने कुछ देर अपनी कार का हार्न बजाया जिससे कि जो भी वहाँ कार खड़ी करके गया हुआ है वह झाँक कर देख सके| पर कहीं कोई हलचल न देख कर उन्होंने वहाँ खड़ी कार को धक्का लगाकर हटाना चाहा पर उसमें हेण्ड ब्रेक लगा हुआ था| क्रोधित होकर उन्होंने आपस में कुछ बात की और एक नौजवान अपने घर में अंदर चला गया| वापिस आया तो उसके हाथ में गुप्ती, या बर्फ तोड़ने वाले सुए जैसा कुछ चमक रहा था| उन्होंने इधर उधर देखा, ऊपर आसपास के सब घरों की ओर देखा| अन्धेरा होने के कारण वे मुझे नहीं देख सकते थे पर मैं उनकी सभी हरकतें देख सकता था|’

अमित को उनके वृतांत में रस आने लगा था| वह उत्सुकता से उनकी बातें सुनने लगा| आखिर पार्किंग की समस्या तो शहर में ज्यों की त्यों बनी हुयी थी, बल्कि हालात पहले से बदतर ही हो रहे थे| स्कूटर खड़े करने वाले फ्लैटों में एक एक घर में रहने वाले लोग दो से चार कारें  रखने लगे थे|

‘एक युवक ने अपनी पार्किंग की जगह खड़ी कार की ड्राइविंग सीट की तरफ वाले दरवाजे में खिड़की के कांच के पास अपना हथियार घुसा दिया और कुछ पल बाद ही उसने कार का दरवाजा खोल दिया| उसने हेण्ड ब्रेक खोला और दोनों युवकों ने कार को आगे धकेल कर बाड़ के पास लगे पाइप से सटाकर खड़ा कर दिया और हेण्ड ब्रेक पहले की तरह लगा कर दरवाजा बंद कर दिया| एक युवक ने कार के दोनों साइड मिरर हाथ मारकर तोड़ दिए|  दूसरे युवक ने उस कार के पीछे अपनी कार पार्क कर दी| अब आगे वाली कार न पीछे निकल सकती थी और न ही आगे जा सकती थी| युवकों ने कार को अपनी कार और बाड़ के बीच ट्रैप कर दिया था|

दोनों युवक अपने घर के अंदर चले गये|

सब तरफ शान्ति थी| सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था| मैं भी घर में चला गया| टीवी देखने लगा| पर मन नीचे सड़क पर ही लगा हुआ था| किसकी कार होगी, कैसे निकालेगा? क्या इन् लोगों में झगडा होगा…जैसे प्रश्न दिमाग में उठ रहे थे| बीच बीच में बालकनी में जाकर नीचे झाँक लेता था| कार अभी भी सेंडविच बनी खड़ी थी| तकरीबन चालीस-पैंतालीस मिनट बाद बाहर गया तो देखा कि एक युवती उस कार के पास खड़ी इधर उधर देख रही थी| उसने देख ही लिया था कि उसकी कार के साइड मिरर तोड़ दिए गये थे और कार को खिसका कर आगे कर दिया गया था| ऐसा लगता था कि वह किसी से मिलने वहाँ आयी थी और खाली जगह देख कर कार यहाँ खड़ी कर गई थी| सड़क पर अब भी कोई नहीं था| लगभग निश्चित था कि जिस घर में वह मिलने आई थी वह उस ब्लॉक में न होकर पास वाले किसी ब्लॉक में था| तभी उसे छोड़ने कोई नहीं आया था, वह अकेली ही वहाँ आई होगी, अपने मेजबानों से उनके घर के बाहर ही विदा लेकर|

युवती ने अपनी कार के पीछे खड़ी कार का मुयायना करना शुरू किया| उसे पीछे वाले शीशे पर मकां नंबर वाला स्टीकर दिख गया होगा| उसने अपने पर्स से छोटी से टार्च निकाल कर उसे पढ़ा और इधर – उधर  मकानों के नंबर पढकर वह युवकों के घर की तरफ चल पड़ी|

मेरी बालकनी के एकदम नीचे ग्राउंड फ्लोर पर युवकों के घर का दरवाजा होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था| पर दरवाजा खुलने और कुछ पल के बाद ऐसी अस्पष्ट आवाजें आईं जिससे लगा कि युवती और उन युवकों के बीच बहस जैसा कुछ घटित होता प्रतीत हो रहा था| कुछ पल ऐसी ही अस्पष्ट आवाजें आती रहीं और फिर दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया| युवती वापिस अपनी कार के पास नहीं आई| मैं काफी देर वहाँ खड़ा रहा पर युवती को आते नहीं देखा|

एक घंटे बाद भी युवती की कार वहीं फंसी खड़ी थी| रात के लगभग बारह तक भी कार वहीं खड़ी थी| मैं टीवी देखते देखते किसी समय सो गया| सुबह पांच बजे नींद खुली तो सबसे पहले बालकनी में जाकर नीचे झांका तो देखा कार वहाँ नहीं थी| युवकों की कार भी वहाँ नहीं थी| मतलब वे भी या तो रात में ही या सुबह सुबह ही कहीं चले गये थे|  पर अगर युवकों ने बारह बजे के आसपास भी अगर युवती को कार निकालने दी होगी तब भी एक घंटे से ज्यादा समय वह उनके घर में उपस्थित रही होगी| मुझे ऐसा ख्याल आया कि युवती के साथ कुछ न कुछ गलत तो कल रात हुआ था|

दिन में नीचे सड़क पर गया तो ऐसे ही युवकों के घर की तरफ झाँक लिया पर वहाँ ताला लगा था| शाम को और फिर रात को भी उनकी कार नीचे नहीं दिखाई दी| इसका मतलब था वे घर नहीं लौटे थे| उससे अगले रोज भी उनकी कार नहीं दिखाई दी|

तीन-चार दिन बाद मैं शहर से बाहर चला गया पर उस रात की घटना मेरे जेहन में समाई रही| दस-बारह दिन बाद लौटा तो पता चला कि चार-पांच दिन पहले एक रोड एक्सीडेंट में ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक मर गये|

मुझे हमेशा लगता रहा कि उस रात कुछ न कुछ गडबड तो युवकों ने उस युवती के साथ की थी और शायद उस एक्सीडेंट के पीछे भी उस रात की घटना का कोई हाथ हो| घर आकर मैंने उस रात के बाद के दिनों के सारे अखबार खंगाल डाले…क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं न कहीं शायद किसी युवती की आत्महत्या या ह्त्या की कोई खबर जरुर छपी होगी| खबर मुझे पढ़ने को मिली उस रात के बाद वाले पांचवे दिन के अखबार में जिसमें जिक्र था एक सभ्रांत परिवार की युवती की आत्महत्या का| खबर के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों से वह बेहद परेशान थी|

इतने सालों में मैंने कभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया| पर पिछले साल निर्भया कांड के बाद उस रात की स्मृतियाँ मेरे दिमाग में बार बार उथल पुथल मचाने लगीं| आज जाने क्यों तुमसे सब कह दिया|’

अमित उनकी कहानी में खोया हुआ था कि बस आकर रुकी और उसका ध्यान बस की ओर गया| वह बस में चढ़ने के लिए बैंच से उठा तो देखा कि बुजुर्ग बस स्टैंड से उतर कर सड़क पर चलने लगे थे| वह बस में चढ़ गया और पीछे देखा तो अँधेरे में एक साया जाता हुआ दिखाई दिया|

“हैलो, भाईसाहब उतरना नहीं है क्या| बस इससे आगे नहीं जायेगी|”

अमित हडबडा कर उठा तो पाया कि वह बस में बैठा हुआ था और कंडक्टर उसे झिंझोड कर उठा रहा था| वह पसीने से तरबतर था|

ओ माई गॉड!

तो क्या वह सो गया था? सपना देख रहा था? यह सब कुछ सपने में घटा? बस से उतर कर उसने इधर उधर देखा मानो अभी भी महसूस करने की कोशिश कर रहा हो कि बुजुर्गवार सपने में नहीं वास्तव में उससे मिले थे|

  …[राकेश]

दिसम्बर 13, 2013

सफाई बाबा…

safai baba 2-001चौंकना स्वाभाविक बात है जब सुबह उठकर हमेशा गंदी रहने वाली सड़क साफ़ दिखाई दे| ऐसा नहीं कि पहले बहुत साफ़ सुथरे रहते थे भारत के शहर और गाँव-कस्बों के गली-कूचे और मोहल्ले, पर पौलीथीन बैग्स के आगमन के बाद और लगभग हर सामान छोटे छोटे प्लास्टिक पाउच में मिलना आरम्भ होने के बाद तो हिन्दुस्तान की हर जगह की हर सड़क सिर्फ कूड़े से लबलबाती नज़र आती है|

ऊपर से भारतीयों का कुत्ते पालने का शौक| रहने को फ़्लैट भी मुश्किल से मयस्सर हो पा रहे हैं पर बंगलों में रहने वाले अंग्रेजों के शौक हम भारतीयों ने पोषित कर लिए हैं| और फिर दिक्कत क्या है – कुत्तों से गंदा करवाने के लिए सड़कें तो हैं ही| कुत्ते को सड़क पर लेकर निकल आइये और इधर उधर देख जब कोई न देख रहा हो तब कुत्ते को कहीं हल्का होने दीजिए| पुरुष तो पहले ही कहीं भी हल्के होने के लिए खड़े हो ही जाते हैं, उनके लिए ( और शायद सरकारों के लिए भी, जो इस ओर ध्यान नहीं देती और जन-सुविधाएँ नहीं बनवातीं) तो पूरा देश शायद मूत्रालय ही है|

कुत्तों के लिक्विड यूरिया के वेस्ट ट्रीटमेंट का जिम्मा सड़क पर खड़े वाहनों का होता है और कुत्तों के सौलिड वेस्ट मैनेजमेंट का भार सड़क, सड़क किनारे की कच्ची-पक्की जमीन (फुटपाथ) और नीचे देख न चल पाने वाले लोगों के जूतों और चप्पलों पर रहता है|

भांति भांति के कूड़े घरों से निकल सड़कों की शोभा बढाते रहते हैं| किसी राज्य में किसी की सरकार हो, नगर निगम किसी दल का हो या निर्दलियों से भरा हो, सफाई अब इनके कर्तव्यों से बाहर की वस्तु है| इनके पुनीत कर्तव्य क्या हैं इसे उनके मतदाता भी नहीं जानते जो इन्हें चुनते हैं| ऐसे ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनकी सात पुश्तों में किसी ने कभी झाडू को हाथ नहीं लगाया पर उनके निठल्ले रिश्तेदारों के नाम सफाई कर्मचारियों को निर्धारित वेतन हर माह आ जाता है| सफाई तो किन्ही और लोगों का काम है|

नवम्बर के अंत और दिसम्बर के शुरू में ठण्ड न इतनी अधिक होती है कि रात या सुबह घर में अंदर ही दुबक कर बैठे रहें और न ही इतनी कम होती है कि सड़क पर ही चहलकदमी करते रहें|

हर आदमी की अपनी सनक होती है और उसका दिमाग किसी किसी मामले में औरों से ज्यादा चलता है| एक सुबह ऐसा पाया कि घर के सामने वाली सड़क अपेक्षाकृत साफ़ लग रही है तो हल्का आश्चर्य हुआ| कालोनी वाले तो चौकीदार तक के लिए चन्दा देने को तैयार नहीं सफाई कर्मचारी रखने के लिए कौन जेब ढीली करेगा?

जब अगली सुबह पहले से भी ज्यादा साफ़ सड़क नज़र आयी तो आश्चर्य की मात्रा भी बढ़ गई|

अडोस पड़ोस में एक दो से पूछा तो उन्होएँ साफ़ सड़क देख संतोष जाहिर किया और मामले में रूचि न ली| एक सज्जन ने सोचा और विचार प्रकट किया कि हो सकता है हर व्यक्ति ने अपने घर के बाहर सफाई की हो या करवाई हो| उनसे पूछा कि क्या उन्होंने ऐसा किया अपने घर के सामने तो उन्हें अपने सिद्धांत की सच्चाई पर सौ प्रतिशत संदेह हो आया| वे भी जानते थे कि इस कालोनी के लोग वे हस्ती हैं जो  मौक़ा मिले तो एक हफ्ते में ग्रीस का गाजीपुर डेरी बना डालें|

लगातार तीन सुबह जगह जगह कूड़े से सजी गली अगर साफ़ दिखाई दे तो आँखों से जिसे सही दिखता हो और दिमाग की खिड़की जिसकी खुली हो उसे तो बात की गंभीरता दिखाई देगी ही|

इन सफाई हादसों की चौथी रात, कोई पौने बारह बजे का समय होगा, कम्प्यूटर पर पढते पढते और काम करते करते आँखें भी थक गई थीं और हाथ की मासपेशियाँ भी एक खुली अंगड़ाई का खिंचाव मांगती थीं| हर ओर लगभग सन्नाटा सा पसरा था|

उठकर पानी पीया और मध्यम  आवाज में एफ.एम रेडियो चालू किया तो प्रस्तोता अपनी लगातार बकबक से कूड़ा बिखेर रहा था पर अच्छी बात यही कि ऐसे कूड़े में फेंक देने के हकदार कार्यक्रम में भी बीच बीच में अच्छे गीत  सुनने को मिल जाते हैं|

प्रस्तोता की तथ्यहीन बकवास बंद हुयी तो गीत शुरू हुआ…  श्री 420 फिल्म का शैलेन्द्र लिखित, मुकेश द्वारा गाया  गीत शुरू हुआ|…

मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंग्लिस्तानी

सर पे लाल टोपी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

….

गीत के सौंदर्य में मन खोया ही था कि इसकी एक पंक्ति  ‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पे अपना सीना ताने’ सुनकर दिमाग की चेतना के दरवाजे खुलो गये और सड़क की सफाई की बात याद आ गयी|

इच्छा हुयी कि जाकर सड़क को देखा जाए| कमरे से बाहर निकल पाया कि अच्छा अन्धेरा था| मेन गेट खोल कर सड़क पर पहुंचना हुआ तो  देखा कि घर के सामने ही नहीं अगल बगल तीन चार स्ट्रीट बल्ब नहीं जल रहे थे| गली के इस छोर से उस छोर तक कोई हलचल न दिखाई दी| मेन गेट बंद करके गली के घर के पास वाले मुहाने तक पहुँच अगली गली के सामने बने छोटे से पार्क तक जाने की इच्छा हुयी| पार्क भी सुनसान पड़ा प्रतीत होता था| पार्क न बहुत बड़ा था और न ही छोटा| चारों कोनों में एक एक स्ट्रीट लाईट जाली हुयी थी जो पार्क में थोड़ा थोडा प्रकाश बिखेर रही थीं| पार्क में बनी एक बैंच पर बैठना हुआ तो उसकी ठंडक ने सूचित किया कि मौसम में ठण्ड बढ़ती ही जायेगी दिन प्रति दिन|

बैठे बैठे आँखें बंद हो गयीं| कुछ समय बाद एकदम से चेतना लौटी तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही पलों के लिए सही पर एक गहन निद्रा छा गई थी मन-मस्तिष्क पर| आँखें खोलीं तो पार्क के सामने वाले हिस्से पर पैदल चलने के लिए बने पक्के रास्ते पर एक साया हिलता डुलता दिखाई दिया| पहले तो वहीं बैठे बैठे देखने, जानने और पहचानने की कोशिश की कि इस वक्त कौन हो सकता है पार्क में| दूरी और सर्द रात के अँधेरे के कारण कुछ साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दिया तो उत्सुकतावश उस ओर बढ़ चला|

साये से थोड़ा दूरी तक पहुँच रुक कर उसे देखा तो पाया कि वह झाडू से रास्ते को बुहार रहा था और रास्ते में पड़े कूड़े को उठा एक थैले में डाल  रहा था| इस ओर उसकी पीठ थी सो उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था पर उसके शरीर से ऐसा अनुमान लगाना मुश्किल न था कि साया किसी बुजुर्ग का था|

और पास पहुंचना हुआ तो आहट पाकर साया पलटा| वे वाकई एक बुजुर्गवार थे जो श्वेत वस्त्र धारण किये हुए पार्क की सफाई कर रहे थे| उनका चेहरा शान्ति के नूर से कांतिमान था|

अपने आप ही मुँह से निकला,”बाबा!… इतनी रात को आप यहाँ सफाई कर रहे हैं?”

बुजुर्ग ने मुस्कराकर देखा और काम में मशगूल रहे|

क्या आपने ही इस कालोनी की सड़कें पिछले दिनों साफ़ की थीं?

हाँ, बेटा!

आप अगर बुरां न माने, तो क्या आपसे पूछ सकता हूँ कि आप क्यों इस सफाई के काम में लगे हुए हैं और वह भी रात को?

वे रुक गये, और अपनी गहरी आँखों से देखते रहे| शायद उन्हें उत्सुकता सच्ची लगी हो, वे बोले आओ बेंच पर बैठते हैं|

बेंच पर बैठ कर वे बोले,”सीधे मुद्दे की बात करें तो इर्द-गिर्द सफाई हो तो अच्छा लगता है कि नहीं”|

जी, बिलकुल मन प्रसन्न हो जाता है सफाई देख कर और अगर सुबह सबह सफाई ही रहे आँखों के सामने तो दिन भर एक खुशनुमा एहसास छाया रहता है मन पर|

सफाई तो हरेक आदमी ओ अच्छी लगती होगी पर क्या कारण है कि हमारा देश एक कूड़ेदान में परिवर्तित होता जा रहा है|

जी, आपने सही कहा| चारों तरफ गन्दगी का ही साम्राज्य ही दिखाई देता है| शायद हम लोग खुद सफाई रखते नहीं है और इस काम के लिए जिम्मेदार विभागों के पास या तो कर्मचारी नहीं है, या अगर वे हैं तो वे काम करना नहीं चाहते या विभागों के पास पैसा नहीं है| या शायद नये दौर के कूड़े से निबटने के लिए हमारे पास न तो तकनीकी योग्यता है न ही दूरदृष्टि| अतः हमने अपने को कूड़े के साथ रहने के लिए अभिशप्त मान लिया है| घर के बाहर नालियां अत जाती हैं, बड़े नाले सडांध मारते रहते हैं,  पर हम घर बैठे सिर्फ इस बारे में नाक मुँह सिकोड़ कर शिकायत करते रहते हैं| करते कुछ नहीं| फिर एक बात और भी है कि हरेक आदमी के पास वक्त की कमी है और लगभग हरेक व्यक्ति सोचता है कि वही क्यों गंदगी में हाथ डाले|

मेरे अंदर शायद इस समस्या को लेकर बहुत कुछ दबा हुआ था इसलिए बुजुर्ग के पूछने पर वह लावे की तरह बह निकला|

अच्छा बेटा, एक बात बताओ| क्या किसी को अपने आप को साफ़ करना गंदा लगता है?

नहीं, हर आदमी अपने शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है और इस ओर प्रयास करता ही है|

माता-पिता को क्या गंदा लगता है अपने बच्चे को साफ़ करना? या दूसरे शब्दों में कहें तो क्या गंदा हुआ बच्चा क्या माता-पिता को खराब लगता है? क्या उन्हें अच्छा महसूस नहीं होता अपने बच्चे को साफ़ करके? क्या माता-पिता का वात्सल्य भाव महत्वपूर्ण नहीं होता|

जी हाँ, आपने एकदम सही कहा|

बस बेटा, एक तो मुझे ऐसा लगा कि हमारा देश बेहद गंदा होता जा रहा है और इस काम की शुरुआत लोगों को खुद ही करनी पड़ेगी| मैं किससे कहता, किसे साथ लेता, मैंने अपने आप जो मुझसे हो सकता था उसे करने निकल पड़ा| दूसरे अब इस काम को करते करते मुझे इतना अरसा हो गया है कि मेरे अंदर ऐसी भावनाएं जन्म ले चुकी हैं जहां मुझे ऐसा ही लगता है कि मैं अपने बच्चों को ही साफ़ कर रहा हूँ| मेरे अंदर वात्सल्य भाव घर कर चुका है| मैं दिन-रात कभी भी समय पाकर किसी न किसी जगह सफाई में लग जाता हूँ| अब यही मेरे बचे जीवन का लक्ष्य है|

पर आप अकेले क्या क्या कर सकते हैं?

जितना कर सकता हूँ उतना तो करूँगा ही मरते दम तक| फिर मुझे लगता है कि जैसे गंदगी में रहने की आदत हो गयी है ऐसे ही जहां भी मैं कुछ दिन सफाई करता हूँ वहाँ रहने वाले लोगों को सफाई में रहने की आदत हो जायेगी और शायद किसी के अंदर सफाई करने की ज्योति जाग्रत हो जाए| शायद इस जगह तुम ही इस विरासत को आगे ले जाओ|

वे चुप हो गये|

मेरे मन ने प्रण किया कि उनका सफाई का यह अभियान अब रुकना नहीं चाहिए| क्या समिति बनाकर पूरी कालोनी की सफाई का जिम्मा लिया जाए?

वहीं खड़े खड़े प्रण ये भी किये कि जल,थल और वायु तीनों में से किसी को भी अपनी ओर से गंदा और दूषित नहीं करूँगा और ‘सफाई बाबा’ के इस मिशन को और आगे बढाने और ज्यादा लोगों में फैलाने का कार्य करूँगा|

मुझे मौन विचारों में मग्न देख, वे बोले|

अच्छा बेटा अब मैं अपना काम खत्म कर लूँ| उम्र हो चली है, बाद में कल को जीने के लिए ऊर्जा पाने के लिए आराम भी करना है|

वे उठे और सफाई के काम में लग गये|

समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? क्या उनका हाथ बटाऊँ? पर सब कुछ इतना अप्रत्याशित ढंग से घटित हुआ था कि किंकर्तव्यविमूढ़ ही खड़ा रहा|

कुछ पल बाद होश आया तो देखा वे पार्क से जा चुके थे|

घर आकर सो गया|

सुबह सोकर उठा तो लगा कि रात शायद कोई सपना देखा था| भागकर पार्क गया तो पार्क का फुटपाथ वाकई साफ़-सुथरा था|

महसूस हुआ सपना तो नहीं था|

रात को फिर से पार्क, और आसपास की सड़कों पर उन्हें खोजा पर वे दिखाई नहीं दिए| अगली रात फिर से जाकर देखा पर उनसे मुलाक़ात न हो पायी|

शायद किसी और जगह अलख जगा रहे होंगे| मेरी तरह उन्हें कई और लोग मिलते रहे होंगे और मिलते रहेंगे और वे सबको अपने इरादों से स्वच्छ करते ही रहेंगे|

…[राकेश]

नवम्बर 15, 2013

बाँट सकूं, ऐसा आत्म-ज्ञान कहाँ से लाऊं ?

jhulaghat-001आज उसका फोन आने पर एकबारगी ख्याल आया कि पिछले तीस सालों में लगभग हर दस सालों में उससे एक भेंट हुयी है और इन भेंटों ने याद के एक कोने में सुरक्षित स्थान घेर लिया है|

दस बरस पूर्व उससे हुयी मुलाक़ात याद आ गयी|

* * * * * * *

वह मंडली में नाच रहा था| सहसा उसकी दृष्टि मुझ पर पडी और वह लपक कर मेरे पास आ गया|

बीस साल पहले अजय घिल्डियाल और मैं एक ही कक्षा में पढ़ा करते थे, पढ़ने के दौरान भी कोई खास दोस्ती उससे नहीं रही थी| छोटी सी पर्वतीय जगह, तकरीबन एक बड़े गाँव जैसी, में सभी एक दूसरे को जानते ही हैं, एक दूसरे की आदतों को पहचानते हैं, गुणों -अवगुणों की जानकारी रखते हैं| याद आता है कई मर्तबा वह कक्षा न लगने के कारण खाली समय में या मध्यांतर में लंच के दौरान मेरे पास आ बैठता था और कुछ न कुछ बात बताता रहता था| मैं भी उसकी बातों के सिलसिले को आगे बढ़ा दिया करता था|

उसके कुछ करीबी मित्र उसे स्नेह से ‘जलया’ बुलाया करते थे पर याद नहीं पड़ता मैंने कभी उसे इस नाम से पुकारा हो| मेरे लिए वह हमेशा अजय ही रहा| स्कूल के बाद पढ़ने मैदानी इलाकों में आ गया और छुट्टियों में घर जाना होता तो कभी कभार उससे भी मुलाक़ात हो जाती थी|बाद में नौकरी करने लगा तो घर जाना भी उतना जल्दी जल्दी नहीं हो पाता था| पर उसके बारे में पता चला था कि वह भी इंटर कालेज में अध्यापक बन गया था|

आज बरसों बाद, कम से कम दस बरस बाद उससे मिल रहा था|

विचारों की श्रंखला उसके स्पर्श और बोलने से टूटी| वह कह रहा था,

“यार, मैं कुछ दिनों से तेरे ही बारे में सोच रहा था, मुझे विश्वास था कि तू इस शादी में जरुर ही आएगा, आखिर तेरे चचेरे भाई की शादी ठहरी|”

मैं मुस्कराया,”हाँ आना ही पड़ा, महेश ने दिल्ली आकर ऐसा माहौल मेरे इर्दगिर्द रच दिया कि कोई और चारा था ही नहीं| फिर खुद भी सर्दी में घर आना चाहता था| बरसों हो गये पहाड़ की सर्दी में समय बिताए हुए…दिन में धूप सेके| कुछ थक भी गया था दिल्ली की चहल-पहल भरी जिंदगी से सो अपनी बैटरी चार्ज करने आ गया| जहाज का पंछी जहाज पर आएगा ही”|

अजय हंस पड़ा| पर उसकी हँसी हँसी जैसी नहीं थी| लगा जैसे वह वहाँ था ही नहीं और कोई और ही हंस रहा था और वह कहीं दूर खड़ा था| उसके चेहरे पर व्यथा के चिह्न साफ़ दिखाई पड़ रहे थे|

उसने गहरी निगाहों से मुझे देखा और धीमे स्वर में बोला,

“यार, ये मत सोचना कि शराबी बन गया हूँ| चार पैग लगाये हैं, तब तुझसे बात करने की हिम्मत जुटा पाया हूँ| उतर जायेगी तब थोड़े ही न तुझसे बात कर पाउँगा|”

उसका चेहरा रुआंसा हो चला था|

वह कह रहा था,” तब तो शर्म आयेगी न”|

मैं कुछ चौकन्ना हो गया| मुझे ऐसी किसी मुलाक़ात की आशा नहीं थी| मैंने हल्के से बातों का रुख पलट कर वहाँ से खिसकना चाहा पर वह प्रयास मुझे व्यर्थ लगा| उसने मुझे नहीं छोड़ा और खाना खाने की और बांह पकड़ कर ले गया|

हम लोग साथ साथ बैठ गये|

“यार तू तो जानकार ठहरा|”

मैंने प्रश्नात्मक दृष्टि उस पर डाली|

मेरी निगाहें पढकर वह बोला,”देख यार पांच सौ लोगों के सामने मुझे मत रुला| बस मेरी इस शंका का समाधान कर दे यार, मुझे रास्ता बता दे भाई|”

“देख यार दस साल पहले भी मैंने तुझसे यही पूछा था पर तू टाल गया था| अब बता दे यार, वरना मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा|”

अब उसने वाकई रोना शुरू कर दिया| मेरी हालत अजीब थी, मैंने शास्त्रीय औपचारिकता अपनाते हुए उसे सामान्य बनाने की कोशिश की| पर सब व्यर्थ|

वह रोते रोते कह रहा था,”देख यार मुझे बहलाने की कोशिस मत कर| दस साल पहले भी तूने ऐसे ही मुझे दिलासा दे दिया था|”

मैंने समझाने की गरज से पहली बार उसे उस नाम से पुकारा जिससे उसके घनिष्ठ मित्र पुकारा करते थे, अब भी पुकारते होंगे|

” यार, जलया, सब कुछ तो ठीक है| बीवी है बच्चे हैं, घर है, नौकरी है| क्या तकलीफ है…कुछ भी तो नहीं|”

“देख यार, जलया कह कर ज्यादा भावुकता मत दिखा| मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ|”

“तू कौन है?”

“देख यार क्यों मुझे रुला रहा है| बता दे मुझे आत्मिक संतोष कैसे मिलेगा| कैसे मेरी सोल सेटिसफाई होगी?”

उसने फिर से रोना शुरू कर दिया|

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ| उसके ऊपर गुस्सा भी आ रहा था| इच्छा तो हुयी कि कहूँ कि भरी शादी में कई तरफ की कुंठाओं के नीचे दबा हुआ है क्या आत्मिक संतोष, जो परतें हटाकर ऊपर उभर आएगा?|

अपनी आवाज से इस आकस्मिक, मैत्रीपूर्ण हमले से उत्पन्न हैरानी और हल्की नाराजगी के असर को दबाकर उससे कहा,”देख यार, मुझे ऐसा लगता है कि जहाँ तक आत्मिक संतोष की बात है, मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि मुझमे, तुझमे, और इन सबमें, उधर हमारे से पहली पीढ़ी के और इधर हमसे बाद वाली पीढ़ी के लोग, जो खाने में रस ले रहे हैं, किसी में भी कोई अंतर नहीं है| किसी  के पास आत्मिक जागृति का कोई अनुभव नहीं है| तुम्हारे अंदर इसे जानने की जिज्ञासा है, अभी तक न जान पाने की पीड़ा भी है, हम सबमें तो वह भी नहीं है| हम सब बस जिए जा रहे हैं|”

मेरे इतना बोलने से वह आंसू पोछकर एकटक मेरी ओर देखने लगा|

अपनी ओर उत्सुकता से देखता पा मैंने आगे उसे कहा,” ऐसा लगता है कि हम सबको जीवन में एक सुपरिभाषित फ्रेम मिलता है और उस फ्रेम के अंदर हम सबको अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयत्न करना चाहिए और गाहे-बेगाहे उस फ्रेम के बाहर झांककर अपने जीवन की परिधि को बढ़ाने का प्रयास भे एकारना चाहिए|”

“देख, अजय, एकदम सच सच कहूँ तो तेरी बात से मेरे अंदर गुस्सा उत्पन्न हो रहा है| यह सब ज्ञान देते हुए मुझे ऐसा लग रहा है जैसे खुद कुछ भी न जानते हुए भी मैं तुझे बता रहा हूँ| होता क्या है कि जब हम दूसरों के दुख सुनते हैं और दुखड़ों के समाधान सुझाने का प्रयत्न करते हैं तो चीजें हमें एकदम दुरुस्त, समझ में आ जाने वाली लगती हैं और शब्द सरस्वती के बोलों की तरह झरते हैं|”

मेरी बात सुन वह कुछ हैरानी से मेरी ओर देख रहा था|

“कितना सरल लगता है सुझाव देना, यह सब कहना| परन्तु वास्तविक जीवन में लक्ष्य निर्धारित करना बेहद कठिन काम है| अगर मंजिल पता हो तो मानव राह तो किसी न किसी तरह खोज लेता है बना लेता है पर असल समस्या उसी मंजिल की तो है जिसको पाने से हम वास्तव में ऐसा महसूस कर सकें कि हाँ अब कुछ किया, अब सच्ची स्थायी खुशी मिली| ऐसी मंजिल दिखाई नहीं पड़ती सो हम छोटे-छोटे संतोष देने वाली मंजिलों को चुनकर उन पर चलकर अच्छा महसूस करने लगते हैं|”

* * * * * * *

कुछ ऐसा ही दर्शन देकर मैंने उस मुलाक़ात का समापन किया था| बाद में दिल्ली आ गया और  नौकरी और जीवन के अन्य कार्यों में व्यस्त होने से उसकी और उस मुलाक़ात की स्मृति हल्की पड़ कर एक कोने में पसर गयी|

इन दस बरसों में लगभग दस ही बार घर जाना हुआ तो उसके बारे में परिचितों से पता चला कि वहाँ से उसका स्थानांतरण हो गया और अब वह दूसरी जगह दूसरे स्कूल में पढाता है|

आज उसके फोन ने उससे जुडी स्मृतियाँ ताजी कर दीं|

उसने बताया कि उसके बेटे को आई.आई.टी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए दिल्ली रहना है और उसे कोचिंग में प्रवेश दिलवाने और उसके रहने खाने का बंदोबस्त करने वह दिल्ली आ रहा है| मेरा फोन उसने घर पर मेरे पिताजी से लिया| उसने मुझसे पूछा कि अगर मुझे असुविधा न हो तो वह मेरे घर एक रोज ठहर कर यह सब इंतजाम करके वापस लौट जाएगा| मैंने उसे निसंकोच दिल्ली में मेरे घर आने को कहा और कहा कि मैं उसके बेटे के लिए कोचिंग आदि के प्रबंध करने में उसकी मदद कर दूंगा|

अगले  हफ्ते वह आएगा| पर अब मुझे कुछ उत्सुकता भी है और भय भी कि अगर उसकी आत्मिक संतोष की भावना अभी तक उसे पीड़ा देती है तो क्या वह फिर से मुझसे समाधान पूछेगा?

मैं क्या समाधान दूंगा?

मैंने इन दस बरस में कितनी आत्मिक प्रगति कर ली है?

आंतरिक जगत में मैंने ऐसा क्या खोज लिया है जो मैं उसे दे पाउँगा?

कार्यक्षेत्र में और दुनियावी मामलों में दैनिक स्तर पर समस्याएं आती हैं , एक से एक जटिल लोग मिलते हैं पर उन सबसे निबटने में कभी कोई परेशानी नहीं होती|

पर अजय के आने की बात ने मुझे अंदर से थोड़ा हिला दिया है|

जीवन में सफलता पाने की आपाधापी में क्या मैंने पाया है जिससे अजय को ज्ञान दे सकूंगा?

उसके आने की प्रतीक्षा भी है और एक भय भी है|

अपनी मानसिक समस्या उसने मुझे दे दी है क्या?

Yugalsign1

नवम्बर 13, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1) से आगे…

देखिये कामना जी आप इसे मेरे द्वारा आपका मजाक उड़ाने की चेष्टा के रुप में न लें अतः यहाँ सीधे-सीधे रुप में जोड़ना चाहता हूँ यौन- शिक्षा के मुद्दे को, जो कि सम-सामायिक मसला है और आपकी कहानियों की नायिकाओं के शारीरिक सम्बंधों को लेकर दृष्टिकोण से सीधे-सीधे सम्बंध रखता है।

अनिल जी, यौन शिक्षा एक अलग मामला है। उन्होने आँखें तरेर कर गुस्से से कहा।

पर फिर भी किशोर लड़कियाँ तो शिक्षा लेंगी ही आपकी कहानियों से कि खूब शारीरिक सम्बंध बनाओ, कुछ नहीं होता, सब वैसे ही डराते हैं। और यौन शिक्षा अलग मुद्दा नहीं है। आपने खुद ही अपने एक लेख में एक सर्वे को कोट करते हुये लिखा है कि कैसे गरबा खेलने के महीने के बाद कुछ प्रांतों में गर्भपात करवाने के मामलों में बढोत्तरी हो जाती रही है और इस बरस उन प्रांतों में गरबा के महीने में गर्भ निरोधक सामग्रियों की बिक्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है। तो एक तरफ तो इतनी जागरुकता आ रही है और आप जाने क्या कहना चाहती हैं अपनी कहानियों के माध्यम से।

लेखिका ने कुछ हथियार डालते हुये कहा,” आपके कुछ तर्कों से मैं सहमत हूँ पर मौटे तौर पर अभी भी कहूँगी कि कहानी के चरित्र समाज से ही लिये जाते हैं और अगर ये चरित्र समाज को गलत रुप में प्रभावित करते तो अज्ञेय, जैनेंद्र, यशपाल, मण्टो, और मृदुला गर्ग आदि इतने प्रसिद्ध लेखक न बनते। इन लेखकों ने भी स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधों को खुलकर अपनी कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया है। और भी बहुत सारे लेखक एवम लेखिकायें हैं जिन्होने ऐसा किया है।

कामना जी, जैनेंद्र जी का साफ साफ आग्रह अपनी नायिकाओं को घर से बाहर के क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष स्थापित करने का था। वे ऐसी महिलायें स्थापित करना चाहते थे जो अपने फैसले खुद ले सकें और पुरुषों की ही भाँति समाज निर्माण में भागीदारी कर सकें। अज्ञेय, नदी के द्वीप में अगर रेखा को विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंधों में सलंग्न होते हुये दिखाते हैं तो वे उसे पहले गर्भवती होने और बाद में गर्भपात की यातनामयी वेदना से गुजरते हुये भी दिखाते हैं। वे बहुत जागरुक और जिम्मेदार लेखक के रुप में सामने आते हैं। और आप ऐसा एक भी उदाहरण दे दें जहाँ आपने पाया हो कि कोई पुरुष मण्टो की खोल दो या ठण्डा गोश्त जैसी कहानियाँ पढ़कर कामुकता के भाव से जाग्रत हो गया हो।

लेखिका इस विश्लेषण पर कुछ और गुस्से से भर गयीं| उन्हें आभास हो गया कि उनके लेखन की तुलना इन्ही लेखकों के लेखन से आने ही वाली है| वे चुप रहीं|

कामना जी,  दर्पण झूठ नहीं बोला करता| आप कहती हैं कि कहानियां और चरित्र समाज से ही लिए जाते हैं और कहानियां समाज को दर्पण दिखाती हैं| कहानियां समाज को दर्पण तब दिखाती हैं जब वे एक जिम्मेदार भूमिका निभाएं| क्षमा कीजियेगा आपकी ज्यादातर कहानियां आजकल के सनसनी फैलाने के तौर तरीकों का अनुसरण करती ज्यादा दिखाई देती हैं| आप अपनी किसी भी एक कहानी का उदाहरण दे दें जहां आपकी कहानी की नायिका या नारी चरित्र ने विवाह पूर्व और विवाह से बाहर जाकर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए हों और आपने उस चरित्र को ऐसी संभावना के आसपास से भी गुजारा हो जहां इस तरह के संबंधों से उत्पन्न दुष्परिणामों से उनका पाला पड़ता हो| आपने तो ऐसे संबंधों के इर्दगिर्द आनंद का ऐसा मिथ्या वातावरण रचा है जैसा कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोर पाठकों के लिए झूठे रोमांटिक किस्से कहानी और उपन्यास रचते रहे हैं|

लेखिका का चेहरा क्रोध से अजीब से भूरेपन से रंग गया था| वे कुछ कहना चाहती थीं पर शायद उन्हें शब्द नहेने मिल पा रहे थे या वे अपने गुस्से के कारण नहीं बोल पा रही थीं| उनके हाव भाव ऐसे हो चले थे मानो आँखों से ही भस्म कर देंगी|

उनकी एक शिष्या उनके बचाव में मैदान में कूदी और तीखे तेवर के साथ बोली|

कहानी समाज के घटनाक्रमों से उठायी जाती हैं और लेख इनके व्यक्तिगत विचार को प्रकट करते हैं| अतः आपके द्वारा इनकी आलोचना गलत है|

महोदया पहले तो आप एक सुधार कर लें मैं इनकी आलोचना कर रहा हूँ| में कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ जैसा कि मैंने शुरू में भी निवेदन किया था कि कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर महिला रचनाकारों को खोजने चाहियें| आज सुबह ही कार्क्रम में मंच से तो कामना जी भी औरों के लिखे हुए पर पचास किस्म के प्रश्न उठा रही थीं|

शिष्या के तेवर कुछ कमजोर पड़े और वह पहले से धीमे स्वर में बोली|

लेखक का दायित्व समाज सुधार का तो होता नहीं|

महोदया, हो सकता है आपकी बात सही हो पर मुझे लगता है कि यह बात तभी तक सच है जब तक कि लेखक कल्पित संसार में विचरण कर रहा है और इसी संसार में कविता,कहानी और उपन्यासों के रचनाशील कर्म में सलंग्न है पर अगर वही लेखक लेखों के द्वारा नैतिक-अनैतिक के सवाल पर समाज में चीख पुकार मचा रहा है और अपने को नैतिकता का ठेकेदार के रूप में प्रचारित कर रहा है तो समाज को भी देखना होगा कि ऐसा रचनाकार असल में रच क्या रहा है और समाज एं अपने लेखन से क्या फैला रहा है| अभी तो हो क्या रहा है कि नशा बेचने वाले खुद ही ढोल पीट रहे हैं कि  लोग नशे के आदि हो रहे हैं| अरे इतना ख्याल है समाज का तो नशा बेचना और बनाना बंद करो पहले|

शिष्या ने अपनी गुरु के तमतमाते चेहरे को देखा और नये शब्दों से आक्रमण करना चाहा, पर तर्क के अभाव में कम शब्दों के साथ शिकायती बन गयी|

यह तो लेखक की व्यक्तिगत आलोचना हो गयी|

…जारी

…[राकेश]

नवम्बर 10, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1)

विरोध की हल्की सी झलक पाते ही लेखिका कम सम्पादक कम विभागाध्यक्ष महोदया – प्रोफ़ेसर कामना बिफर उठीं। चेहरा आवेश में लाल हो गया। मेज पर रखे मोबाइल को उठाकर उसमें कुछ देखा और फिर उसे वापस मेज पर रखते हुये बोलीं,” देखिये अनिल जी, कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी समाज को दर्पण दिखाती है और लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों को प्रकट करते हैं।”

कुछ हद तक आपका कहना ठीक है कामना जी परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आप सोचकर बतायें कि क्या कहानी के पात्र स्वतंत्र होते हैं? कौन उन्हे विचार देता है? क्या वे अपनी मनचाही दिशा में भ्रमण करने के लिये स्वतंत्र होते हैं? या लेखक उन पर उनकी प्रत्येक किस्म की गति, चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है?

लेखिका कुर्सी पर बैठे बैठे बिलबिलाने लगीं, उनका क्रोध और बढ़ गया। ऊँचे स्वर में कहने लगीं।

लेखक समाज में से ही तो चरित्रों को लेता है, वह उन्हे संवाद और मनोस्थिति देता है पर वह उन्हे ऐसी दिशा में ही नियंत्रित करता है जिससे समाज को कुछ बातें कह सके।

कामना जी, अगर कहानी समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने का ही नाम है फिर तो यह काम एक साधारण पत्रकार बहुत सस्ते में कर देता है और अपने लिखे पर उसे ऐसा बहुत ज्यादा गर्व भी नहीं होता जैसा कि अपनी एक भी कहानी कहीं छपने वाला लेखक दर्शाने लगता है। पत्रकार के व्यवहार में तो यह चाह भी नहीं दिखायी देती कि उसे चिंता है कितने लोग उसके लिखे को पढ़ेंगे और इस पर उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं।

अनिल जी, मैं आप से फिर से कह रही हूँ कि कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी में जहाँ लेखक का कोई सामाजिक दायित्व नहीं होता वहीं लेख में वह अपने नितांत व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर सकता है।

तो फिर कामना जी, डबल स्टैंडर्ड वाली बात कहाँ तक झूठ है? एक तरफ तो आपकी कहानियों के चरित्र खासकर महिला चरित्र विवाहपूर्व और विवाहेत्तर सभी प्रकार के शारीरिक संबंधों में सलंग्न रहते हैं और दूसरी ओर आपके लेख हद दर्जे की चिंता में घुले जाते हैं कि लड़कियों को इन सब तरह के शारीरिक सम्बंधों से दूर रहना चाहिये। आपकी लगभग हर कहानी की नायिका विवाह से पूर्व और विवाह के बाद वैवाहिक जीवन से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने में सलंग्न दिखायी देती है पर वास्तविक जीवन की तरह वह कभी भी गर्भवती नहीं होती। ऐसा क्यों? अब यह मानने का तो कोई कारण है नहीं कि आपकी कहानियों में एकदम से स्थापित इन शारीरिक सम्बंधों की मुठभेड़ों से निबटने के लिये आपके नायक या नायिका अपने साथ गर्भ निरोधक साधन साथ लेकर घूमते होंगे? आपकी कहानियाँ ऐसा तो कोई संकेत नहीं देतीं। क्या किशोर पाठक आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसी प्रेरणा नहीं लेगें कि ठीक बात है कि विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंध हानिकारक नहीं हैं लड़कियों के लिये।

अनिल जी, मेरी नायिकायें पच्चीस की वय को पार कर चुकी वयस्क नारियाँ हैं जो अपना भला बुरा बखूबी समझती हैं।

कामना जी सच पूछें और मुझे सच बोलने की अनुमति दें तो मेरी इच्छा हो रही है कि मैं इस बात का जवाब कुछ यूँ दूँ कि एकदम से हुये इन सैक्स एनकाऊंटर्स में नारी पात्रों की परिपक्वता गर्भ निरोधक का कार्य तो करेगी नहीं। शुक्राणु और अंडाणु को क्या मतलब नर-नारी की मानसिक परिपक्वता से? वे तो मिलन का मौका छोड़ने से रहे और देखा तो ऐसा गया है कि अगर युगल अविवाहित हैं तो इनके मिलन कुछ जल्दी ही हो जाते हैं।

अनिल ने लेखिका की ओर देखा तो वे गुस्से से उसकी ओर ही देख रही थीं और उनके इर्द गिर्द बैठी और खड़ी उनकी शिष्यायें भी गुस्से से भरी साँसें और क्रुद्ध दृष्टिपात उसकी ओर फेंक रही थीं।

उन्हे हल्के मूड में लाने के लिये अनिल ने मुस्कुराते हुये कहा।

आपने देखा ही होगा प्रकाश झा की राजनीति में कि भारत में स्त्री-पुरुष की फर्टीलिटी पॉवर कितनी ज्यादा है! इस फिल्म की तीन स्त्रियाँ एक ही बार के संसर्ग में गर्भवती हो गयीं और विवाह पूर्व बनाये ऐसे संबध ने कितना बड़ा हत्याकांड करवा दिया। प्राचीन काल से ही महाभारत आदि भी इस बात की गवाही देते रहे हैं।

अनिल के इस उदाहरण से न चाहते हुये भी लेखिका और उनकी शिष्य मंडली के मुख मंडलों पर तिर्यक रेखायें खिंच गयीं पर वे ढ़ील देना नहीं चाहती थीं सो गम्भीर मुद्रा ही बनाये रहीं।

…जारी

…[राकेश]

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

मई 26, 2013

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

Train to Pak

सादत हसन मंटो ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे और इससे उपजी हिंसा पर बेहद प्रभावशाली कहानियां लिखी हैं और नफ़रत के ऐसे माहौल में इंसानियत कितना गिर सकती है इस बात को अपनी कहानियों के जरिये दुनिया को बताया है| अज्ञेय ने भी पनी संवेदनशीलता के बलबूते बंटवारे के समय उपजे अमानवीय हालात में एक मनुष्य की विवशता और दूसरे मनुष्य के अहंकार के संघर्ष को बड़े प्रभावी तरीके से इस बेहतरीन कहानी – मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई, में दर्शाया है| सैधान्तिक रूप से भले ही इस्लाम कहता हो कि सभी इंसान (और कम से कम मुसलमान) बराबर हैं पर मनुष्य बेहद चालाक जीव है और वह ऐसे उपदेशों को सिर्फ बोलने के लिए मानता है, इन पर अमल नहीं करता| धनी मुसलमान औरतें और मर्द ही ही मजलूम मुस्लिम औरतों की मदद नहीं करते बल्कि उन्हें अपने पद, और धन के रसूख से उपजे अहंकार के कारण बेइज्जत भी करते हैं| मंटो लिखते तो शायद इसी कहानी में धनी पुरुष की लालची और वासनामयी दृष्टि गरीब औरतों के जिस्म को खंगाल कर उससे बलात्कार करने लगती पर अज्ञेय की लेखनी अलग ढंग से काम करती है और यहाँ धनी पुरुष गरीब स्त्री के चरित्र पर घटिया संवादों से आक्रमण करता है|

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

छूत की बीमारियाँ यों कई हैं; पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक, कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? – और मारती है तो स्वयं नहीं, दूसरी बीमारियों के ज़रिये। कह लीजिए कि वह बला नहीं, बलाओं की माँ है…

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है, वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष, और कमीनापन आ घुसते हैं, और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

वबा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा। छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है; सरदारपुरे में इस छूत का लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक – रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट, दंगे-फ़साद, और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं, और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे – दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे। पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाजों और मेवों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं – ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। कवेल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या… फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो ही लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं…

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े। दरवाजों से, खिड़कियों से, जो जैसे घुस सका, भीतर घुसा। जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये, छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये। जाना ही तो है, जैसे भी हुआ, और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो…

गाड़ी चली गयी। कैसे चली और कैसे गयी, यह न जाने, पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!

और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल, जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े, कुछ रोगी, कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली, जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा, ‘‘या अल्लाह, क्या जाने क्या होगा।’’

अमिना बोली, ‘‘सुना है एक ट्रेन आने वाली है – स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी – उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न? उसी में क्यों न बैठे?’’

‘‘कब जाएगी?’’

‘‘अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..’’

जमीला ने कहा, ‘‘उसमें हमें बैठने देंगे? अफ़सर होंगे सब…’’

‘‘आखिर तो मुसलमान होंगे – बैठने क्यों न देंगे?’’

‘‘हाँ, आखिर तो अपने भाई हैं।’’

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर। अमिना, जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं। उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी… तीनों के स्वामी बाहर थे – दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे – उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा! सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी, उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी। अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे; जमीला का खाविन्द शादी के बाद से ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये ही चार बरस हो गये थे। अब… तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं, और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक… न जाने कब क्या हो – और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है, अभी उन्होंने देखा ही क्या है? सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी, सौ अब वह भी नहीं, न जाने कब क्या हो… अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही…

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई, और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना, सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था, एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली। जो कुछ गहना-छल्ला था, वह ट्रंक में अँट ही सकता था, और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे। और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, ‘‘वह उधर ज़नाना है!’’ – और तीनों उसी ओर लपकीं।

ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं, दो की गोद में बच्चे थे। एक ने डपटकर कहा, ‘‘हटो, यहाँ जगह नहीं है।’’

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, ‘‘बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे – मुसीबत में हैं…’’

‘‘मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ, आगे देखो…’’

जमीला ने कहा, ‘‘इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।’’

‘‘जाना है तो जाओ, थर्ड में जगह देखो। बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!’’ और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर, उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा। बोली, ‘‘इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं…’’

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया। उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं, पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे, नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा, ‘‘तो बुला लो न गार्ड को। आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।’’

‘‘जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न! कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल, ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है, पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि…’’ एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, ‘‘भैया! ओ अमजद भैया! देखो ज़रा, इन लोगों ने परेशान कर रखा है…’’

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये। चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले, ‘‘क्या है?’’

‘‘देखो न, इनने तंग कर रखा है। कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं। कहा कि स्पेशल है, सेकंड है, पर सुनें तब न। और यह अगली तो…’’

‘‘क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-’’

जमीला ने कहा, ‘‘क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं, पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और…’’

‘‘और टिकट?’’

‘‘और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?’’

अमिना ने कहा, ‘‘मुसीबत के वक्त मदद न करे, तो कम से कम और तो न सताएँ! हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? – हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर – या अल्लाह!’’

‘‘अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?’’

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाल कर चिकटनी खोले, दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें। जिधर जमीला थी, उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, ‘‘खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को…

सकीना ने तड़पकर कहा, ‘‘कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया…’’

‘‘बड़ी पाक़-दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच से भागकर जा रही हो, आखिर कैसे? उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने…’’

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, ‘‘छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!’’

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, ‘‘या अल्लाह!’’

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, ‘‘थूः!’’ और क्षण-भर बाद फिर, ‘‘थूः!’’

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, ‘‘गयी पाकिस्तान स्पेशल। या परवरदिगार!’’

(इलाहाबाद, 1947)

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