Archive for ‘संत सिद्धार्थ’

फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

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जनवरी 17, 2014

आत्मविश्वास…(संत सिद्धार्थ)

संत सिद्धार्थ ने सामने बैठे लोगों से कहा| ‘कल कुछ मित्रों ने कहा कि सर्वत्र व्याप्त भ्रष्ट माहौल में आशा से उनका विश्वास डगमगा गया है और वे निराशा से भरे रहते हैं और उन्हें लगता है कि मनुष्य जीवन में बुराई हावी हो चुकी है भलाई पर| उन्होंने समाज और मनुष्य मात्र के इस नैतिक पतन पर बोलने के लिए कहा है| वे कहते हैं कि गर्त में जाते मनुष्य जीवन में ऊँचाई पाना कुछ संतों के ही बस की बात रह गई है और बाकी सब लोगों को भेड़चाल का शिकार देर सबेर होना ही पडता है और सब भ्रष्ट और मूल्यविहीन जीवन जीने लगते हैं|’

उन्होने लोगों से पूछा,” क्या बाकी लोगों को भी रूचि है इस विषय पर चर्चा करने में”|

कुछ ने बोल कर हाँ कहा और कुछ ने स्वीकृति में सिर हिलाया|

संत सिद्धार्थ ने कहा,” तो ठीक है आज इसी मुद्दे पर बात कर लेते हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है कि बुरे व्यक्ति को सफल देख अच्छा आदमी हार मानने लगता है? अच्छा आप ही लोग बतायें इस बारे में आप क्या सोचते हैं?”

‘महात्मन, बुरे को जीतता देख कहीं न कहीं निराशा होती ही है कि जब ऐसों को ही सफल होना है तब अच्छे लोग कैसे अपनी अच्छाई को बनाए रख सकते हैं? बुरे लोग अच्छे लोगों को प्रताड़ित करेंगे या मार ही डालेंगे|’

‘महात्मा जी, जब समाज में चारों तरफ भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को समानित होते देखते हैं तब व्यक्ति को इतनी बड़ी भीड़ के सामने अकेले पड़ जाने का भय ग्रसित कर लेता है और अपने और अपने परिवार के जीवन को सुचारू रूप से चलाये रखने के लिए वह या तो कोने में खड़ा हो जाता है या अपनी सुविधानुसार बुराई को एक आवश्यक तत्व मान कर उसे स्वीकार कर लेता है|’

संत सिद्धार्थ ने कहा,” तो मुख्य बात आपको यह लगती है कि समाज में बुराई जीतती प्रतीत होती है और बुरे लोगों का बहुमत अच्छे लोगों को डरा कर एक किनारे कर देता है”|

थोड़ा रुककर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई,” अच्छा एक बात पर ध्यान दीजिए, आप लोगों ने कहा कि अच्छे लोग भी, मजबूरीवश ही सही पर, भ्रष्ट और बुरे रास्ते को स्वीकार कर लेते हैं और कुछ तो उस पर चलने भी लगते हैं| आपमें से कुछ ने कहा कि बुरों की भीड़ के सामने समाज में अकेले पड़ जाने के भय से भी बहुत से लोग बुरे मार्ग पर चलने लगते हैं, नहीं भी चलते हैं लोग तो बुराई का विरोध करने का साहस ही लोगों के अंदर से समाप्त हो गया प्रतीत होता है|”

उन्होने नजर सामने बैठे लोगों को कुछ क्षण देखा और पूछा,”अच्छा ठीक से सोच कर एक बात बताइये कि जब आप लोग किसी बुराई का विरोध न करके उसे घटते हुए देखते हैं या उसे स्वीकार करके उसके साथ जीने लगते हैं, भले ही आप इसे मजबूरी में किया कृत्य मानें, तो क्या आपको भीतर पीड़ा होती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि आप गलत कर रहे हैं और शुरू में यह भावना तीव्र होती है पर बाद में आप इस भीतरी आवाज या पीड़ा से विमुख होते चले जाते हैं और कुछ समय पश्चात तो आप आदि हो जाते हैं भ्रष्ट मार्ग पर चलने के और अंदर से आवाज ही नहीं आती|”

कुछ देर पश्चात बहुत से लोगों ने कहा,” जी ऐसा ही होता है, ऐसा ही होता रहा है| बहुत बार बहुत से ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें करने को मन कभी गवाही नहीं देता पर दुनिया में ऐसी बातों का चलन होने के कारण इन् बातों के साथ होना पड़ता है| कष्ट तो होता है महात्मन|”

संत आगे बोले, ” ठीक, अब इस बात पर भी गौर करें| अच्छा ऐसा करें कि बहुत बड़ी बातों को छोड़ दें कुछ मिनटों के लिए, और यह सोच कर देखें और बताएं कि बुराई से अलग भी क्या आप जीवन की बहुत सी अन्य बातों में औरों का अनुसरण नहीं करने लगते जबकि ऐसा हो सकता है कि आपको वास्तव में वैसा करना भाता न हो पर तब भी आप औरों की नक़ल करने लगते हैं”|

कुछ लोग बोले,”जी, महाराज, ऐसा होता तो है| कई बार बहुत सारे लोग किसी बात को कर रहे हैं तो हम भी वैसा करने लगते हैं”|

‘शायद सभी लोगों की समझ में बात आई नहीं, तभी कुछ ही लोगों ने उत्तर दिया इस बात का| चलिए इसे इस तरह से देखते हैं| बहुत छोटी बात से लेते हैं| जैसे कपड़ों की ही बात लें, व्यक्तिगत तौर पर आपको किसी किस्म के कपड़े पहनना सुविधाजनक लगता होगा पर फिर भी आप कपड़ों के वैसे तरीके अपनाते हैं जिनका कि उस समय में चलन होता है क्योंकि आपको गता है कि चलन वाले तरीके के कपड़े नहीं पहनेंगे तो आप अलग-अलग से दिखाई देंगें और आप कहीं न कहीं हीन भावना से ग्रसित होकर प्रचलित तरीके वाले कपड़े पहनने शुरू कर देते हो”|

लगभग सभी लोगों ने इस बात को माना,” यह तो एकदम सही बात है| कपड़े ही क्यों बहुत सी बातें हम इसलिए अपनाते हैं क्योंकि समाज में उनका प्रचलन है”|

“तो यह तो तय है कि दूसरे लोग और सामाजिक परिस्थितियाँ, दोनों तत्व अधिकतर लोगों को प्रभावित करते हैं और लोग इनसे प्रेरित होकर या इनके दबाव में अपने जीवन में बदलाव ले आते हैं| अब ऐसा हो सकता है कि ये बदलाव आदमी को अंदर से पसंद न भी हों पर वह प्रचलन के विपरीत जाने का साहस नहीं दिखा पाता| क्या आप सोच कर बता सकते हैं कि ऐसा क्यों होता है? क्यों लोग दूसरों की नक़ल करते हैं या क्यों दूसरों से होड़ करके अपने जीवन में बदलाव लाने लगते हैं भले ही ये बदलाव उन्हें अंदर से आनंदित न कर पाते हों?”

कुछ देर सोच कर कुछ लोगों ने कहा,” शायद अकेले पड़ जाने के भय से ऐसा करते हैं हम लोग”|

“मसले की जड़ में जाएँ अगर हम तो ये सब मुद्दे हैं आत्मविश्वास से सम्बंधित| हरेक को एक स्वभाव, प्रकृति मिलती है जन्म के साथ| तुम जैसे हो, वैसा ही अपने स्वभाव के साथ जीना, किसी और से होड़ न करना, औरों जैसा बनने का प्रयास न करके अपने ही स्वभाव में आनंदित होकर हरेक स्थिति में जीवन जीना ही आत्मविश्वास है| विश्वास से काम करना योग्यता है| आत्म -विश्वास … अपने अंतस पर विश्वास| तुम्हारी अपनी आत्मा में विश्वास| प्रकृति ने तुम्हे मनुष्य रूप में जन्माया है तो तुम्हे एक स्वभाव दिया है| तुम्हे जीवन में अपने स्वभाव को पहचान कर उस पर अडिग रह कर अध्यात्मिक विकास करना होता है| पर लोग तो बहुत छोटी छोटी बातों में भी अपने अंतर्मन की आवाज न सुनकर दूसरों जैसा बनने लगते हैं| हो सकता है कि एक किशोर की प्रवृत्ति कुछ और करने की हो पर वह और उसका परिवार उसे ऐसे कामों की ओर धकेल देते हैं जहां उन्हें लगता है कि ज्यादा सम्पन्नता हासिल करने में ज्यादा सफलता मिलेगी| धन-सपदा और सफलता प्राप्त करना ज्यादा बड़े लक्ष्य हो जाते हैं आत्मिक संतोष और प्रसन्नता की तुलना में और मनुष्य के भीतर विभाजन शुरू हो जता है और आत्मा क्षीण होने लगती है| यह एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार है जो बहुत से लोग अपनाते हैं| प्रसिद्धि और धन के मामले में अमीर लोगों को देखिये जब उन्हें यश, सम्मान और एक खास स्तर से ऊपर का धन कमाने के आदत हो जाती है और उनकी प्रसिद्धि उस क्षेत्र विशेष में कम होने लगती है तो बहुत से राजनीति में चले जाते हैं कि वहाँ वे सब कुछ फिर से कमा लेंगे| अगर राजनीति उनका जूनून होती तो वे पहले ही क्यों नहीं राजनीति में गये| वे सिर्फ अपने अहं को तुष्ट करने के लिए राजनीति में जाते हैं जबकि उनकी कोई अंदुरनी रूचि राजनीति में नहीं होती| बहुत से ऐसे लोग हैं जो इसलिए अभिनेता बन जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह यश, सम्मान, धन और सफलता पाने का अच्छा जरिया है और इसके द्वारा बहुत शीघ्र ही यह सब कुछ अर्जित किया जा सकता है| जिनके अंदर अभिनय को लेकर प्यास है वे अलग ही अभिनेता होते हैं| ऐसा ही खेलों बल्कि सरे जीवन के सारे क्षेत्रों के साथ भी है|”

थोड़ा रुक कर वे फिर बोले,” अपने स्वभाव को पहचानने के लिए बहुत जरूरी है कि औरों जैसा बनने का प्रयास बंद कर देना चाहिए| जब निरर्थक खोल गिर जायेंगे तब असली स्वभाव ऊपर उभर आएगा| कपड़े, जूते, मेकअप, विचार और कहीं की सदस्यता आदि बातें ओढ़े हुए खोल हैं| और आत्मविश्वास को किसी क्षेत्र में दक्षता पाने से न मिला देना| अपनी कला में बेहद प्रवीण एक कलाकार, जिसे उस कला को साधने में बेहद प्रसन्नता होती है और वह अंतर्मन के स्तर पर संतोष प्राप्त करता है, जरूरी नहीं कि बहुत अच्छा वक्ता भी हो अगर वह बहुत कोशिश के उपरान्त भी इसमें दक्षता हासिल नहीं करता तो उसे हीनभावना से भरने की जरुरत नहीं है| वक्ता बनना उसका स्वभाव नहीं है| उसका क्षेत्र कला है| उसे औरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए| जीवन में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां आप सभी  थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो समझ जायेंगे कि आपके स्वभाव वाला मार्ग कौन सा है और तब आप ऐसे जैसे जियेंगे जैसे आपको जीना चाहिए|  ”

“आत्मविश्वास को आप साध लें, समझ लें तो  आपका जीवन एकदम मौलिक हो जाएगा| तब आप किसी भेडचाल का हिस्सा नहीं बनेंगे|”

नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

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मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

जुलाई 28, 2011

चिंता जहर, चिंतन संजीवनी (संत सिद्धार्थ)

मित्रों, आज कुछ देर बात हो जाये चिंता पर। चिंता दीमक समान है जीवन के लिये और यह धीरे-धीरे मानव की चेतना को खाकर जीवन को पूर्णतया नष्ट कर देती है। आप गौर से अपने स्वभाव को देखना, अपने आसपास के लोगों के स्वभाव को देखना, चिंता करना धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है।

चिंता उपजती है भय से। भय कि कल क्या होगा। चिंता उपजती है अहंकार से जन्मी निराशा से कि जीवन की बागडोर हाथ से निकल रही है… जैसे कि जगत में सब कुछ मानव की इच्छा से हो रहा है! क्या मानव हर बात को नियंत्रित कर सकता है?

आज में न जीकर, अभी न जीकर जब लोग भविष्य में जीना शुरु कर देते हैं, भूत काल के भूतों के साथ रहना शुरु कर देते हैं तब चिंता को उनके अंदर वास करने का मौका मिल जाता है। कभी किसी जानवर को चिंता करते देखा है? अगर कोई खतरा आन पड़ा है तो वे वे बस क्षण में निर्णय लेते हैं। उस खतरे के पूर्वाभास में चिंता में नहीं गले रहते।

एक और बात स्पष्ट कर लें। चिंता और चिंतन एक ही बात नहीं है। चिंता निराशाजनक है…प्राणघातक है, भय में इसका मूल छिपा होता है। चिंता ऋणात्मक भाव है। चिंता सुप्त मस्तिष्क का भाव है। चिंता ऐसे सारी ऊर्जा सोख लेती है जैसे कि बहुत से पेड़ और लतायें भू-जल सोख कर आसपास की जमीन की उर्वरा क्षमता को भी खा जाती हैं। चिंता से होकर जाने वाला रास्ता चिता की ओर ले जाता है। चिंता करने की आदत वाला व्यक्त्ति जीवन में परेशानियों का सामना नहीं करता बल्कि उनके बारे में सोचता रहता है। वह नदी किनारे बैठा रहता है कि अगर पानी में उतर गया तो गीला हो जायेगा, ठण्ड लग जायेगी, बीमार पड़ जायेगा। वह कभी नदी के उस पार नहीं जा पाता और वहाँ क्या क्या बसा है इसे देखने, जाने और समझने से वंचित ही रह जाता है। चिंता करने वाला व्यक्त्ति जीवन के बहुत सारे पहलुओं से अनभिज्ञ ही रह जाता है।

चिंतन के साथ ऐसा कोई ऋणात्मक वातावरण नहीं उपजता। चिंतन का मूल साहस में छिपा होता है। चिंतन चेतन मस्तिष्क की उपज है। कुछ परेशानी आये जीवन में तो चिंतन करने वाला व्यक्त्ति रास्ता खोजता है आगे बढ़ने का। चिंतन करने वाला व्यक्त्ति प्रबंधन करने में कुशल होता जाता है। वह जीना सीख लेता है। वह हर पल भय में नहीं जीता कि कल क्या होगा। वह अपने को तैयार करता रहता है, गुणों से भरता रहता है ताकि जीवन में किसी भी परिस्थिति में वह और उसका मस्तिष्क तत्परता से सक्रियता दिखा सके। हार-जीत, सफलता-असफलता से परे वह जीने में विश्वास करने लगता है।

ऐसा नहीं कि चिंतन करने वाला व्यक्त्ति भविष्य के प्रति उदासीन रहेगा। पर वह चिंता करने वाले की भांति भविष्य का भय वर्तमान पर लाद कर आज और अभी के पलों को नष्ट नहीं करेगा।

चिंता करते वक्त्त मस्तिष्क में बेकार के विचार ही घूमते रहते हैं। मस्तिष्क कोई भी उपयोगी विचार उत्पन्न नहीं कर पाता और चिंतित व्यक्त्ति अंत में हार मानकर बैठ जाता है कि अब उससे कुछ न हो सकेगा।

बहुत से व्यक्त्ति ऐसे भी हैं जो इसलिये चिंता को अपना लेते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि अगर वे चिंता न करें तो वे सक्रिय नहीं रह पायेंगे और चिंता उन्हे हमेशा कुछ न कुछ करने की ओर धकेलती है और वे वे बुरे से बुरे विचार सोचते रहते हैं और फिर चिंता की वर्तुलाकार गति में उलझे रह जाते हैं।

चिंता जीवन में जो कुछ भी अच्छा है उस सबकी ओर से व्यक्त्ति की आँखें बंद करवा देती है। धीरे-धीरे चिंता व्यक्त्ति को अवसाद, उदासी, और तनाव से भरे ऋणात्मक वातावरण में ले जाती है और वह नींद और सुख-चैन से हाथ धो बैठता है। और किस कारण यह सब? सिर्फ मस्तिष्क में ऊट-पटांग सोचते रहने के कारण। चिंता करने की आदत रखने वाला हर बात में चिंता करने की गुंजाइश खोज लेता है। वह हरेक बात से परेशान रहता है।

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है। भले ही कभी कभी ही सही तो जागरुक होने की आवश्यकता है। चिंता को चिंतन में बदलने का प्रयास करें। समझ कर प्रयास करेंगे तो धीरे-धीरे ही सही पर आप चिंता से दूर होकर चिंतन की ओर बढ़ना शुरु कर देंगे और जीवन जीना शुरु कर देंगे।

चाहे तो इसे इस तरह से मान लें कि चिंता के साथ हर तरह की हानि आती है जीवन में और चिंतन के साथ लाभ आते हैं। कोई क्यों हानि भरा जीवन जीना चाहेगा?

जगत से भयभीत न हों। जीवन से भय न रखें। जीवन के उतार-चढ़ावों से न घबरावें। जीवन में मौसम के बदलाव से चिंतित न हों। जीवन की अनिश्चितता से भयभीत होकर जीवन में घुन न लगा लें।

जब एक घंटे का या कुछ घंटों का खेल खेलते हो तो क्या इस बात से भयभीत होकर मैदान से बाहर ही बैठे रहते हो कि हार जाओगे? या हे भगवान चोट लग जायेगी या कैसे सब कुछ होगा।

नहीं आप मैदान में उतरते हो…खेल खेलते हो और जैसी परिस्थितियाँ खेल के दौरान सामने आती हैं उसी के अनुरुप प्रदर्शन करने की कोशिश करते हो। बस यही जीवन का भी खेल है।

जैसे खेल के लिये अपने को गुणी बनाते हो, तैयार करते हो, वैसे ही जीवन में भी करने की जरुरत है।

गौर से देखना आप विचारों को रोक सकते हो, उनकी दिशा बदल सकते हो। जब तक आप रेडियो ऑन नहीं करते तब तक कोई स्टेशन नहीं लगता और यह आपके हाथ में है किस स्टेशन को आप सुनना चाहें, कहीं गीत आ रहे हैं, कही वार्ता चल रही है, कहीं नाटक चल रहा है। आप जो चाहते हो सुनते हो। मानव मस्तिष्क भी कुछ कुछ ऐसा ही है। हजारों-लाखों तरह के स्टेशन रुपी विचार तैर रहे हैं और मानव मस्तिष्क उन्हे पकड़ लेता है। अभ्यास से अपने मस्तिष्क को ऐसा बनायें कि यह उपयोगी बातें विचारने लगे।

विचार को रोकना या बदलना सीखें। जब आपको लगे कि चिंता आपको ग्रसित कर रही है। कुछ शारीरिक काम ही करने लग जायें, या कुछ भी और करें… ध्यान बँट जायेगा…विचार दूसरी ओर केंद्रित हो जायेंगे। ऊर्जा सही रुप में उपयोग होने लगेगी। धीरे-धीरे आपको विचारों पर नियंत्रण करना आ जायेगा।

ध्यान रखें हमेशा कि जीवन तो चुनौतियाँ देता रहेगा। और यह मानव को सोचना है कि वह क्या करना चाहता है नयी परिस्थितियों के साथ?

अगर जीना है तो उसे कमर कसनी होगी कि रास्ते खोजे आगे बढ़ने के और मस्तिष्क का सही प्रयोग करेगा तो रास्ते मिल ही जायेंगे।

जीवन को चिंता से दूर ले जाकर चिंतन की ओर मोड़ें। यही एकमात्र वास्तविक प्रबंधन है जीवन में।

फ़रवरी 25, 2011

उपलब्धि का अहंकार…(संत सिद्धार्थ)

मित्रों!

उपलब्धियाँ अक्सर एकांगी होती है और इनसे प्राप्त अहंकार जीवन को एकरंगी बना देता है। जीवन तो भिन्न- भिन्न अनुभव लेने से समृद्ध होता है।

एक क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करके चादर तान के सो गये और मन में सोच लिया कि संसार फतेह कर लिया तो बहुत बड़ी भूल-भूलैया में फँस गये।

दौलत तुमने बहुत कमा ली या माता-पिता से मिल गयी और इसी कारण फूले-फूले रहने लगे तो तब तो तुम बहुत बड़े गरीब रह गये जीवन में। धन की अधिकता में तुमसे जीवन भर यह अहसास तो अनछुआ ही रह जायेगा कि अभाव क्या है?

बहुत बड़े पद पर पहुँच गये हो तो इस बात का अहंकार मत करना कि बस अब सारा जीवन तुम्हारी मुट्ठी में आ गया है, तुम अपने विभाग के सबसे छोटे पद पर काम करने वाले कर्मचारी के जीवन से एकदम अपरिचित हो। वह क्या सोचता है? उसकी क्या सीमायें हैं?

पाने का ही नाम जीवन नहीं है बल्कि अभाव भी एक जीवंत अनुभव है।

तुम बहुत बड़े कवि बन गये हो, पर जरा सोचो तो कि कितने अच्छे अच्छे गद्य लेखक दुनिया में तुम्हारे साथ ही विचरण कर रहे हैं और तुमने अभी तक श्रेष्ठ किस्म का गद्य रचने का आनंद नहीं लिया।

तुम तो सिर्फ अपने जैसा जीवन जानते हो। दिन के बहुत सारे घंटे व्यवसाय में ऊँचाई पाकर किसी बड़े पद पर आसीन होने की मह्त्वाकांक्षा का पीछा करने में खर्च हो जाते हैं तो ऐसी जीवनशैली से उत्पन्न व्यस्तता और अहंकार से तुम बहुत सारे अन्य तरह के भावों से अनभिज्ञ ही रह जाओगे।

अपने से अलग लोगों को, भले ही वे तुम्हारे सामने आर्थिक रुप से गरीब हों, उपलब्धियों में कमतर लगते हों, निम्न भाव से न देखना, किसी न किसी मामले में वे तुमसे ज्यादा उपलब्धि रखते होंगे।

केवल सफलतायें तुम्हे बहुत गहरे नहीं ले जा सकतीं। तुम्हे इसे भी जानना है कि असल में असफलता क्या है?

जब तक एक ही भाव के दोनों पूरक हिस्सों को नहीं जान लोगे तब तक दोनों ही से परे होने का अहसास नहीं जान पाओगे।

न पाने में अटकना है और न ही अभाव में। किसी भी एक भाव में अटक गये तो जीवन बेकार ही जाने के पूरे पूरे आसार बन जाते हैं। जीवन तो इन सब भावों से परे जाने के लिये है और इसके लिये एक भाव के दोनों परस्पर विपरित रुपों को जानना, पहचानना और जीना आवश्यक है।

किसी भी क्षेत्र में उपलब्धि पाना बहुत बड़ी योग्यता है और इसके लिये जीतोड़ प्रयास करो पर उपलब्धियों का अहंकार भूल कर भी न करो।

वास्तव में उपलब्धि जनित अहंकार का अकेला तत्व ही मनुष्य के जीवन को गरीब बना कर छोड़ देता है। इस अहंकार की उपस्थिति में आध्यात्मिक विकास असंभव है।

ये सब साधारण उपलब्धियाँ, जो तुम्हे बहुत बड़ी लगती हैं, और ये सारे अभाव जो तुम्हे बहुत बड़े लगते हैं, ये सारी बातें माध्यम हैं तुम्हे एक बड़े लक्ष्य की यात्रा से दूर रखने के। इन्ही सब बातों में अटक गये तो इन्ही के होकर रह गये।

जब जीवन में साधारण उपलब्धियों और अभावों से गुजर जाओगे तब तुम्हे आभास होगा उस अभाव का जिसे भरने के लिये की गयी यात्रा ही मनुष्य जीवन में सार्थकता ला पाती है।

बस साक्षी बने रहो, एक दिन वह प्यास जगेगी जरुर, एक दिन तुम उस परम यात्रा पर निकलोगे जरुर।

जनवरी 13, 2011

पात्रता और वाणी का संयम …(संत सिद्धार्थ)

बहुत समय पहले की बात है। देवताओं ने एक व्यक्त्ति की प्रार्थनाओं से परेशान होकर मुख्य देवता से कहा,” देव, यह व्यक्त्ति बिल्कुल भी वर देने योग्य नहीं है परंतु यह लगातार प्रार्थना कर रहा है सो अब इसे टाला भी नहीं जा सकता। इसके साथ दिक्कत यह है कि यह वर पाने के बाद उसका दुरुपयोग कर सकता है”।

मुख्य देव ने कुछ देर प्रार्थनारत व्यक्त्ति के बारे में विचारा और कहा,” घबराने की बात नहीं है इसे वर दे दो”।

देवताओं ने उस व्यक्त्ति से कुछ माँगने को कहा।

व्यक्त्ति ने तीन इच्छायें पूरी करने के लिये वर देने की माँग की।

देवताओं ने उसे अंडे जैसे नाजुक तीन गोले दे दिये और कहा,” जब भी तुम्हे अपनी इच्छा की पूर्ती करनी हो, एक गोले को जमीन पर गिराकर फोड़ देना और जो भी चाहो माँग लेना। तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायेगी। ध्यान रखना कि एक गोला सिर्फ एक ही बार काम करेगा अतः सोच समझकर ही इन्हे उपयोग में लाना”।

व्यक्त्ति को तो जैसे सारा जहाँ मिल गया वह खुशी और उत्साह से भागता हुआ घर पहुँचा।

वह तुरंत अपने कमरे में जाकर वर माँगना चाहता था। वह कमरे में घुस ही रहा था कि उसका छोटा सा बेटा भागकर आया और उससे लिपट गया। इस अचानक हमले से व्यक्त्ति के हाथों का संतुलन बिगड़ गया और एक गोला नीचे गिर कर फूट गया। उसके क्रोध का ठिकाना न रहा और उसने क्रोधित होकर बेटे को डपटा,”तेरी आँखें नहीं हैं”।

व्यक्त्ति पर यह देखकर गाज गिर गयी कि इतना कहते ही उसके बेटे के चेहरे से दोनों आँखें गायब हो गयीं।

व्यक्त्ति तो जैसे आसमान से गिरा। वह रोने लगा। उसे बाकी दोनों गोले याद आये।

उसने एक और गोला अपने हाथ में लिया और आँखें बंद करके गोला जमीन पर गिराकर फोड़ दिया और माँगा,” मेरे बेटे के चेहरे पर आँखें लग जायें”।

उसने आँखें खोलीं तो यह देखकर वह आश्चर्य और दुख से भर गया कि उसके बेटे के सारे चेहरे पर आँखें ही आँखें लग गयीं थीं और वह विचित्र लग रहा था। अब व्यक्त्ति को माँगने में गलती करने का अहसास होने लगा।

मरता क्या न करता। उसने तीसरा गोला भी फोड़ा और माँगा कि उसके बेटे का चेहरा सामान्य हो जाये और पहले की तरह केवल दो ही आँखें सामान्य तरीके से उसके चेहरे पर रहें।

इस तरह से उसके कमाये गये तीनों वर बेकार हो गये।

पात्रता और वाणी का संयम दोनों बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं जीवन में।

पात्रता कमायें और कदापि भी न अनर्गल बोलें न विचारें।

नवम्बर 25, 2010

सच्चे मित्र सच्ची मित्रता … (संत सिद्धार्थ)

संत सिद्धार्थ ने कमरे में प्रवेश करते ही वहाँ पहले से मौजूद लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और अपने लिये नियत स्थान पर बैठ गये।

उन्होने लोगों से पूछा कि वे किस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं?

एक सज्जन ने कहा,” महात्मन, कुछ मित्रता पर बताने का कष्ट करें। क्यों ऐसा होता है कि जिन लोगों को हम मित्र समझते हैं वही हमें धोखा देते हैं, हमें दुख पहुँचाते हैं। दुनिया में मित्रता के नाम पर इतनी धोखाधड़ी क्यों है?

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है आज मित्रता और मित्र पर बात कर लेते हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि मित्र कौन है? आप लोग बतायें आप लोगों के लिये मित्र की परिभाषा क्या है?

महात्मन, जो सुख दुख में साथ रहे वही मित्र है।
जो संकट में साथ दे, सहायता करे वही मित्र है।
जो दुनिया के लाख विरोध के बाद भी साथ दे वही सच्चा मित्र है।
जो दिल से आपका भला चाहे वही मित्र है।
जो ईमानदारी से दोस्ती का रिश्ता निभाये वही सच्चा मित्र है।

लोगों ने अपनी समझ से मित्रता की भिन्न-भिन्न परिभाषायें कह दीं।

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है, मित्र होने के कई लक्षण आप लोगों ने गिना दिये। आप लोगों ने कहा कि जो संकट में साथ दे वह सच्चा मित्र है, पर ऐसा देखा गया है कि सहायता करने वाले व्यक्ति के साथ कालांतर में सम्बंध ठीक नहीं रहते, कहीं न कहीं विगत में की गयी सहायता का अहसान ही तथाकथित मित्रों के मध्य दरार पड़ने का माध्यम बन जाता है। क्या ऐसा भी कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति संकट में सहायता करता है वह मित्र बन सकता है? तब समाज सेवियों को क्या कहियेगा?

थोड़ा रुककर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई,” मित्र और मित्रता की बात को यूँ समझते हैं… आपकी तरफ से कौन आपका मित्र हो सकता है? आप किस व्यक्ति के सच्चे मित्र हो सकते हैं? मित्रता एक तरफ से नहीं हो सकती। आपके विचार और भावनायें आदि भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

उन्होने नजर सामने बैठे लोगों पर दौड़ाई और कहा,” मोटे तौर पर एक बात तय कर लें कि वह क्या भाव है जिसके पार करने पर सच्ची मित्रता की बुनियाद मजबूत हो जाती है? आप लोगों में मित्रता को लेकर निराशा है तो स्पष्ट है कि जितनी भी कसौटियाँ हैं आप लोगों के सामने मित्रता को परखने के लिये वे खरी नहीं उतरतीं क्योंकि अंत में आपको मित्रों से ठेस ही लगती है।

लोगों को चुप देखकर उन्होने कहा,” आप सबसे ज्यादा परेशान होते हैं उस मित्र से जो आपके अहं को ठेस पहुँचाता है। यह अंतिम और सबसे बड़ी कसौटी है जिसे पार करने के बाद ही सच्ची मित्रता की बुनियाद पड़ती है। इसे पार करे बगैर मित्रता में कोई सच्चाई उत्पन्न नहीं होती। इससे पहले सारी तथाकथित मित्रतायें भुरभुरे महल ही हैं जो जल्दी ही गिर जाते हैं। अगर आपके तथाकथित मित्रों में ऐसा कोई है जिसके सामने आपका अहं पिघल जाता है, वही आपकी तरफ से आपका मित्र बन सकता है।

इस अवस्था से पहले यदि कोई आपकी सहायता करता है तो गहरे में आपके अहं को ठेस लगती है। यदि आप ही किसी की सहायता कर रहे हैं तो आपके अंदर भी यह भावना जन्म लेती है कि आपने उस व्यक्ति के ऊपर अहसान किया है। अगर वह आपसे कुछ गलत व्यवहार करता है या आपकी उपेक्षा करता है तो आपको लगता है कि आपने तो उस पर अहसान किया और वह आपको ही उपेक्षित समझ रहा है। आप चाहते हैं कि वह आपके द्वारा की गयी सहायता को हमेशा याद रखे, पर यही बात आप तब लागू नहीं करना चाहते जब कोई आपकी सहायता करता है।

साधारण रिश्तों में व्यक्ति का अहंकार मौजूद रहता है अतः रिश्ते गहरायी नहीं पा पाते।

सच्चा मित्र आपके अहंकार की परवाह किये बगैर आपको टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आपके साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आपको चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आपको सत्य मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा। वह आपको गलत कर्म को करने के लिये साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा क्योंकि वह कटिबद्ध है आपको गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिये।

जो हर कर्म में, चाहे वे गलत ही क्यों न हों, साथ देते दिखायी देते हैं वे चापलूस होते हैं, सच्चे मित्र नहीं। सच्चा मित्र कैसे आपको पाप के मार्ग पर चलने देगा?

सच्चा मित्र वही है, जो भरपूर ईमानदारी से आपके अहंकार को ठेस पहुँचाये और तब भी आप उसके साथ के लिये अपने अंतर्मन में इच्छा को जिंदा पायें। बाकी सब तरह की मित्रतायें अवसरवादी हैं, सतही हैं, कम आयु की हैं।

कभी ऐसा ईमानदार मित्र मिल जाये जो मित्रता निभाने में भी उतना ही ईमानदार हो तो ऐसे सच्चे मित्र की मित्रता पाने के लिये अपने को भाग्यशाली समझना और उस मित्रता की रक्षा हर हाल में करना। और स्वयं भी ऐसा ही ईमानदार मित्र बनने की चेष्टा करना, बल्कि आपकी पहल ही ज्यादा महत्वपूर्ण है, आप स्वयं की ही दिशा तो संचालित कर सकते हैं। इस अवस्था के बाद मित्रता दुख नहीं देगी, ठेस नहीं पहुँचायेगी।

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