Archive for ‘कृष्ण लीला’

अगस्त 26, 2016

कृष्ण कन्हाई… हसरत मोहानी

Krishna1मन तोसे प्रीत लगाई कन्हाई

कहु और की सुरति अब काहे को आई

गोकुल ढूंढ बृंदाबन ढूंढो

बरसाने लग घूम के आई

तन मन धन सब वार के हसरत

मथुरा नगर चली धुनि रमाई

(My heart has fallen in love with Kanhaiya; Why should it think of anyone else? We searched for him in Gokul and Brindaban, let’s now go to Barsana and check that too. Sacrifi ce for him, Hasrat, all that is yours, Then go to Mathura and become a jogi)

– Hazrat Maulana Hasrat Mohani (Rahmatullah Alaih), Poem 2 (2 October 1923; Dīvān 8)

 

अगस्त 25, 2016

श्री कृष्ण — (नज़ीर अकबराबादी)

Krishna1

है सबका ख़ुदा सब तुझ पे फ़िदा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।
हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला !
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इसरारे हक़ीक़त यों खोले ।
तौहीद के वह मोती रोले ।
सब कहने लगे ऐ सल्ले अला ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

सरसब्ज़ हुए वीरानए दिल ।
इस में हुआ जब तू दाखिल ।
गुलज़ार खिला सहरा-सहरा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

फिर तुझसे तजल्ली ज़ार हुई ।
दुनिया कहती तीरो तार हुई ।
ऐ जल्वा फ़रोज़े बज़्मे-हुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुट्ठी भर चावल के बदले ।
दुख दर्द सुदामा के दूर किए ।
पल भर में बना क़तरा दरिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

जब तुझसे मिला ख़ुद को भूला ।
हैरान हूँ मैं इंसा कि ख़ुदा ।
मैं यह भी हुआ, मैं वह भी हुआ ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी ।
हर गुल में तेरे रुख़सार की बू ।
घूँघट जो खुला सखियों ने कहा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

दिलदार ग्वालों, बालों का ।
और सारे दुनियादारों का ।
सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इस हुस्ने अमल के सालिक ने ।
इस दस्तो जबलए के मालिक ने ।
कोहसार लिया उँगली पे उठा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मन मोहिनी सूरत वाला था ।
न गोरा था न काला था ।
जिस रंग में चाहा देख लिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

तालिब है तेरी रहमत का ।
बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा ।
तू बहरे करम है नंद लला ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।।                                   (नज़ीर अकबराबादी)

फ़रवरी 4, 2015

कृष्ण को क्यों याद करे दुनिया?

Krishna 2दुनिया युद्ध, नफरत, आतंकवाद, पर्यावरण के ह्रास और मानवता में गिरावट जैसे मुद्दों से विनाश की ओर अग्रसर है तो ऐसे में अवसाद से घिरी मानवता को बचाने के लिए क्या वही सब कुछ याद न करना पड़ेगा जो मानव जीवन में श्रेष्ठ रहा है, जिसने जीवन को समृद्ध किया है!

श्याम, कान्हा, कृष्ण…मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं वे जीवन के।

क्या मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है?

कृष्ण को न याद करें तो किसे करें?

    “कान वो कान है जिसने तेरी आवाज सुनी

     आँख वो आँख है जिसने तेरा जलवा देखा

कृष्ण की कथा का रसास्वादन अदभुत है| क्या तो आनंद है बाल-गोपाल की कथा कहने में, सुनने में, और देखने में|

और थोड़े बड़े हो चुके कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी सदियों से मनुष्य को लुभाता आ रहा है|

सिर पर मोर मुकुट, गैया के पास थोड़े तिरछे खड़े, एक पैर पर दूसरा पैर रखे, बांसुरी बजाते कान्हा… वर्णन सुनने में हर बार लगता है जैसे गोकुल ही पहुँच गये हों… परम आनंद की अनुभूति होती है|

* * * * * * * * * * * * * * *  * *

अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर मथुरा का राजा बन बैठा अत्याचारी कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को उसके विवाहोपरांत ससुराल पहुंचा कर आने के लिए अपने महल से निकल कर बाहर आया ही था कि एक ऋषिवर वहाँ आए और कहा,” राजन, आपके सैनिकों ने वन प्रदेशों में आतंक मचा रखा है, वे तपस्वियों की साधना भंग करते हैं| कई गुरुकुलों को तहस नहस कर चुके हैं| आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कन्याओं को ही नहीं वरन अब तो ऋषि कन्याओं को भी उठा लेने का दुस्साहस कर रहे हैं|

कंस ने कहा,” ऋषि बेकार की बातें मत करो| मेरे सैनिक वीर हैं और उनकी वीरता पर मुग्ध होकर वन प्रदेशों की कन्याएं स्वयं ही उनके साथ चली जाती होंगी| और मेरे राज्य की सीमाओं के अंदर रहने वाले सभी लोग, चाहे वे तपस्वी हे क्यों न हों, मेरे अधीन हैं, अगर वे मेरे सैनकों को कर नहीं देंगे, उनका कहना नहीं मानेंगे तो मेरे सैनिक उन्हें दंड देंगे ही|

“राजन, सत्ता का इतना नशा ठीक नहीं किसी राजा के लिए”|

“सुनो ऋषि अभी मैं अपनी बहन को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा हूँ| किसी और दिन आना और मेरे सैनिकों के विपरीत बातें करके उनकी छवि बिगाड़ने का प्रयास ना करो| जाकर तपस्वियों को समझाओ कि मेरे सैनिकों से न उलझें और वीर हमेशा ही धरती पर हर सुख को भोगते हैं| उन्हें कोई कन्या पसंद आयेगी तो वे उसे पाने का प्रयास करेंगे ही| आप लोगों में साहस हो तो उनसे लड़ो और पराजित करो उन्हें और अपनी कन्याओं की रक्षा कर लो| अब मेरा मार्ग छोड़ो”

कंस स्वयं ही रथ को हांकने बैठ गया|

रथ के चलने की आवाज और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजों के शोर के मध्य बादल गडगडाने की आवाज आती है|… ऋषि ने कंस को चेताते हुए कहा

 “हे कंस, जिस बहन के प्रति तू इतना लाड दिखा रहा है, याद रखना इसकी आठ संतानों में से एक संतान – एक पुत्र, ही तेरे काल का कारण बनेगी

कंस क्रोध और कुंठा से विचलित होते हुए गरजता है,” ऋषि अपनी वाणी पर नियंत्रण रखो और मेरी निगाह के सामने से दूर हो जाओ”|

ऋषि चला जाता है| कंस कुछ सोच में पड़ जाता है और कुछ पल पश्चात गरज कर कहता है,” देवकी, रथ से नीचे उतरो, तूने उस ऋषि की वाणी सुनी| मुझे, तुम दोनों, तुझे और तेरे पति, को मारना ही पड़ेगा, मैं जोखिम नहीं उठा सकता|”

देवकी रोने लगती है “भईया…”

वसुदेव याचना करते हुए कहता है,” महाराज, आप शक्तिशाली हैं, आपको ज्ञात ही है- आपको हमारी संतान से ख़तरा बताया गया है, आपकी बहन देवकी से तो आपको कोई जोखिम नहीं| उसे मारकर अपनी नवविवाहिता बहन को मारने का पाप आप क्यों अपने सिर लेते हैं| जब भी हमारे संतान होगी मैं स्वयं उसे लेकर आपके सामने उपस्थित हो जाउंगा|

कंस चेतावनी देता है,” देवकी, वासुदेव मुझसे कपट करने का प्रयास कदापि न करना, आज मैं तुम्हे जीवित छोड़े दे रहा हूँ| पर अब से तुम दोनों मथुरा में ही मेरे सैनिकों की देखरेख में रहोगे|”

कंस ने देवकी की छह संतानों को उनके जन्म लेते ही मार दिया| किसी तरह से देवकी और वासुदेव कंस से देवकी के सातवीं बार गर्भधारण होने की बात छिपाने में सफल रहे और वासुदेव द्वारा गोकुल में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहाँ सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने हेतु अनुरोध करने पर कंस ने सैनिकों की देखरेख में पति-पत्नी को गोकुल जाने दिया, जहां देवकी का गर्भ, कंस के भय से गोकुल में अज्ञातवास में रह रही वासुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया गया| वापिस मथुरा आकर देवकी ने फिर से गर्भवती होने और शिशु के गर्भ में ही मृत हो जाने की बात उड़ा दी| देवकी की आठवीं संतान के समय कंस कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था अतः उसने देवकी और वासुदेव को बंदी बना कर, कड़े सुरक्षा से घिरे अपने कारागृह में भेज दिया|

…जारी

….[राकेश]

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