Archive for ‘अखबार जगत से’

सितम्बर 9, 2015

सरकारी स्कूल और इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला : योनेग्द्र यादव

Yogendra Yadavइलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के दो दिन बाद मेरे पास इमेल से एक अनजाने व्यक्ति की चिठ्ठी आयी. लिखनेवाली महिला कभी उत्तर प्रदेश सरकार में काम कर चुकी थीं, आजकल विदेश में हैं.

चिठ्ठी बड़ी ईमानदारी और शालीनता से लिखी गयी थी. चिठ्ठी में उन्होंने पूछा कि हमने और स्वराज अभियान से जुड़े साथियों ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के उस फैसले का स्वागत क्यों किया, जिसमें सभी सांसदों, विधायकों, सरकारी अफसरों सहित सभी सरकारी कर्मचारियों को हिदायत दी है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं? उनका तर्क सीधा था- मैंने ईमानदारी से नौकरी की, कोई भष्टाचार नहीं किया, तो नेताओं और भ्रष्ट अफसरों की करतूतों की सजा मेरे बच्चों को क्यों मिले? अगर मैं ईमानदार रहते हुए अपने बच्चों को बेहतर अवसर दिला सकती हूं, तो मुझे क्यों रोक जाये? क्या यही आपका न्याय है? आप इसको स्वराज कहते हैं?

उनके सवाल तीखे थे, लेकिन अनर्गल नहीं. सवालों ने मेरा अपना अपराध बोध जगाया. मेरी पत्नी और मैंने अपने पहले बच्चे को पड़ोस के सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाने की ठानी थी. शुभचिंतकों ने समझाया कि बच्ची को बस्तियों और झुग्गियों के ‘ऐसे-वैसे’ बच्चों के साथ बैठना पड़ेगा. लेकिन हम तो वही चाहते थे. बताया गया कि स्कूल में सुविधाएं कम होंगी, बच्ची की अंगरेजी कमजोर रहेगी. हमने सोचा कि वो कमी हम घर पर पूरी करवा देंगे.

जब मन बना कर राजकीय सर्वोदय विद्यालय पहुंचे (दिल्ली में सर्वोदय विद्यालय आम सरकारी स्कूलों में बेहतर माने जाते हैं), तो प्रिंसिपल साहब हैरान हुए. फिर खुशी-खुशी हमें अपनी सबसे अच्छी कक्षा दिखाने ले गये. उस ‘आदर्श’ कक्षा में गुरुजी बच्चों को समाज विज्ञान के सवालों के जवाब लिखवा रहे थे.

पूछने पर पता लगा कि कक्षा में अध्याय पढ़ाये नहीं जाते, सिर्फ सवाल-जवाब लिखवाये जाते हैं. एक ही कमरे में आधे बच्चे हिंदी में प्रश्नोत्तर लिख रहे थे, आधे अंगरेजी में. प्रिंसिपल साहब को धन्यवाद कर हम जल्द रवाना हुए. उसके बाद बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने की हिम्मत नहीं हुई. चिठ्ठी लिखनेवाली महिला यह भी पूछ सकती थीं कि अगर खुद नहीं कर पाये, तो दूसरों को सजा क्यों देते हो?

इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के बारे में चल रही बहस में यही दिक्कत है. हर कोई इसे सजा की तरह देख रहा है. जनता खुश है कि उनसे बदतमीजी करनेवाले नेताओं और अफसरों की किसी ने तो नकेल खींची. सरकारी कर्मचारी परेशान हैं कि उन्हें किसी और के किये की सजा मिल रही है. हर कोई मान कर चलता है कि बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना एक सजा है.

देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों के पास साधारण प्राइवेट स्कूलों से बेहतर बिल्डिंग है, ज्यादा जमीन है, ज्यादा डिग्रीवाले और बेहतर वेतन पानेवाले अध्यापक हैं. फिर भी कोई भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता. इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला इस विसंगति को ठीक करने का तरीका है, सरकारी कर्मचारियों से बदला लेने का प्रयास नहीं है.

यह विसंगति पूरे देश में दिखायी देती है. सरकारें शिक्षा पर बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं, नये स्कूल खुलते हैं, बिल्डिंग बनती है. लगभग सभी बच्चे आज स्कूल जा भी रहे हैं.

लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा नहीं है. प्रथम संस्था के असर सर्वेक्षण के 2014 के आंकड़े उत्तर प्रदेश में शिक्षा की बदहाली की तस्वीर पेश करते हैं. उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले अधिकतर बच्चे न भाषा जानते हैं, न गणित. पांचवीं कक्षा के सिर्फ 27 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरी कक्षा की हिंदी की किताब ठीक से पढ़ सकते हैं. पांचवीं के सिर्फ 12 प्रतिशत बच्चे भाग हल कर सकते हैं. तीसरी के महज 7 प्रतिशत बच्चे हासिल से घटाना जानते हैं. सात साल पहले की तुलना में हर आंकड़े में गिरावट आयी है. अन्य राज्यों की स्थिति बहुत अलग नहीं है.

जाहिर है, अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की ओर जा रहे हैं. 2006 में ग्रामीण उत्तर प्रदेश के 30 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे, लेकिन 2014 तक यह संख्या 52 प्रतिशत हो गयी थी. गांव में भी जिसे सामर्थ्य है, वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजता है. गांव के सरपंच का बच्चा गांव के सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता. सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजते हैं.

अफसरों और नेताओं के बच्चे तो ऊंचे दर्जे वाले महंगे प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ते हैं. कुल मिला कर सरकारी स्कूली शिक्षा के तमाम कर्ता-धर्ता लोगों का उन स्कूलों से कोई निजी वास्ता नहीं हैं. स्कूल अच्छे हों या खराब, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहते हैं, जिसके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर परायी.

ऐसे में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला एक ऐतिहासिक फैसला है. यह फैसला िसर्फ एक फैसला भर नहीं, बल्कि यह हमारी सरकारी स्कूली व्यवस्था को बचाने का एक नायाब मौका भी है. जरा कल्पना कीजिये, अगर डीएम साहब की बिटिया खुद सरकारी स्कूल में पढ़ेगी, तो क्या उसमें साफ शौचालय नहीं होगा, महीनों तक विज्ञान के अध्यापक का पद खाली पड़ा रहेगा?

यह फैसला न तो सजा है और न ही कोई सरकारी योजना. यह देश को एक इशारा है, सरकार को एक चेतावनी है. यह फैसला हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में सरकारी स्कूलों की सही शिनाख्त करता है. इस कमजोरी की जड़ में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को चिन्हित करना भी एकदम सही है.

यह फैसला देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे गुनहगारों की ओर उंगली उठाने का साहस करता है. इस फैसले पर बहस करना हमें देश में गैर-बराबरी के नंगे सच से रूबरू होने को मजबूर करता है. इस फैसले पर जितना जल्दी अमल होगा, हमारे देश की कमजोर शिक्षा व्यवस्था के लए उतना ही अच्छा होगा|

(योगेन्द्र यादव)

जुलाई 15, 2015

जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं| बेहतर होता, सरकार बताती कि किस तारीख तक जाति की गिनती को कागज पर अंतिम रूप दे दिया जायेगा, जातिवार आंकड़े सार्वजनिक कर दिये जायेंगे| पर जाति संबंधी आंकड़े जारी न करने को लेकर सरकार की दलील सुनने पर सरकार की नीयत पर शक होता है|

जब जेटली कहते हैं कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी की जानकारी जुटाना है, तो साफ है कि सरकार गोली देने की कोशिश कर रही है| हकीकत यह है कि कांग्रेस या बीजेपी, किसी भी सरकार की मंशा नहीं थी कि जातिवार जनगणना हो| दोनों सरकारों ने इसे रोकने, टालने और मोड़ने की कोशिशें कीं| खैर कहिए कि संसद में बहस हो गयी और सरकार को जातिवार जनगणना की बात सिद्धांत रूप में स्वीकारनी पड़ी| फिर इसे उलझाने के षड्यंत्र रचे गये| जाति की गणना संग सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी नत्थी कर दिया| अब कहा जा रहा है कि असली बात तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की ही थी, जाति की गणना नहीं|

जब रामविलास पासवान जाति गणना को गोपनीय रखने के तर्क देने लगते हैं, तो सरकार की नीयत पर शक और पुष्ट होने लगता है| व्यक्तिगत आंकड़े गोपनीय होते हैं, आप नहीं पूछ सकते कि फलां व्यक्ति ने अपनी जाति क्या बतायी है! पर जाति विषयक कुल तालिकाओं का जोड़-जमा सार्वजनिक करना जरूरी है| यह सब जानते-बूझते जब पासवान जी कहते हैं कि जातियों की गणना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो जान पड़ता है कि सरकार ने इस आंकड़े को दबाने की ठान ली है|

जातिवार जनगणना के आंकड़े से सरकार डरती है, बड़े राजनीतिक दल डरते हैं, और डरते हैं सामाजिक न्याय के वे पक्षधर जो जाति की तहों के भीतर झांकने से कतराते हैं| सबके डर की अपनी-अपनी वजहें हैं|

जाति के आंकड़ों से कांग्रेस-बीजेपी और पूरा राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान डरता है. उन्हें डर है कि जाति का जिन्न बोतल से बाहर आ जायेगा| पिछड़ी जातियों की संख्या सार्वजनिक हो जायेगी और लोगों को आधिकारिक रूप से पता चल जायेगा कि जिस जाति समुदाय की संख्या इस देश में सबसे ज्यादा है, वह शिक्षा और नौकरियों के अवसर के मामले में कितना पीछे है|

उन्हें डर यह है कि जाति और नौकरी के संबंध पर से परदा उठ जायेगा| राजनीति, अफसरशाही और अर्थव्यवस्था पर अगड़ी जाति के वर्चस्व का राज खुल जायेगा| वैसे इसमें कुछ छुपा नहीं है, पर जाति के आंकड़ों के सामने आते ही इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो जायेगी| मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद से मोटा-मोटी जानते तो सब ही हैं कि इस देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल लोगों की संख्या 45 से 50 फीसदी और सवर्ण जाति के लोगों की संख्या 16-20 फीसदी के आस-पास है, पर जाति की आधिकारिक गणना के सार्वजनिक होने से शिक्षा और नौकरियों में संख्या के हिसाब से भागीदारी का सवाल भी पुरजोर तरीके से उठेगा| बराबरी के इसी सवाल को बड़ी पार्टियां और सरकार कभी खुल कर सामने नहीं आने देना चाहते|

जाति के आंकड़ों से मंडल और सामाजिक न्याय के पक्षधरों में भी बेचैनी हो सकती है| उन्हें डर है, सर्वेक्षण कहीं यह न दिखा दे कि जाति सामाजिक अन्याय का एक महत्वपूर्ण कारक तो है, पर एकमात्र कारक नहीं|

ओबीसी में आनेवाली जातियों के बीच शिक्षा और नौकरियों में अवसर के लिहाज से चंद जातियों के वर्चस्व की बात जाति जनगणना के आंकड़ों से आधिकारिक रूप से उजागर हो सकती है| यह भी सामने आ सकता है कि एक ही जाति के बीच वर्ग और लिंग-भेद भी अवसरों की असमानता का बहुत बड़ा कारक है| इन बातों के उजागर होने पर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुराने र्ढे पर चलाना मुश्किल होगा|

जातिवार आंकड़े को सार्वजनिक करना जातिवाद नहीं है, यह जाति के भूत को वश में करने का तरीका है| आरक्षण पर रुक गयी बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का यह एक जरूरी अवसर भी है, बशर्ते हम जाति के भूत से आंखें खोल कर सामना करने को तैयार हों|

(योगेन्द्र यादव – प्रभात खबर में)

जून 7, 2015

‘प. नेहरु’ और ब्रिटिश राज के बाद का भारत

Nehru

[दैनिक जनसत्ता ने ब्रिटिश राज के बाद भारत के प्रति नेहरु के योगदान और उनकी छवि को धूमिल किये जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र पर प्रकाश डालते हुए एक अच्छा लेख (

नेहरू को नकारने के निहितार्थ)

प्रकाशित किया है]

आजादी की लड़ाई पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। नेहरू इस हमले का मुख्य निशाना हैं। नेहरू का नाम आते ही नेहरू परिवार की बात शुरू हो जाती है। देश की हर समस्या, हर मुसीबत का नाम नेहरू के खाते दर्ज किया जाता है। नेहरू को एक सत्ता-लोलुप की तरह पेश किया जाता है, जिन्होंने गांधी को किनारे लगा कर अंगरेजों से सत्ता हथिया ली। या फिर, गांधी की कृपा से वे गांधी के उत्तराधिकारी बने। अगर नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री न होते तो देश की सूरत अलग होती। क्योंकि वे निर्णय लेने में अक्षम थे। वे तो पटेल थे जिनकी लोहे जैसी इच्छाशक्ति ने इस देश को बचा लिया। या फिर इस देश में नेहरू की इकलौती विरासत वंशवाद की नींव रखना था। यह और इस तरह के जाने कितने आरोप एक सांस में नेहरू पर मढ़ दिए जाते हैं। दरअसल, नेहरू कौन थे यह बात आम आदमी की याददाश्त से गायब हो चुकी है। नई पीढ़ी, जिसका सबसे बड़ा स्कूल इंटरनेट है, यू-ट्यूब वाले नेहरू को जानती है। वे नेहरू जो तथाकथित रूप से आला दर्जे के शौकीन आदमी थे।

नेहरू के दुश्मन एक नहीं, अनेक हैं। सांप्रदायिक एजेंडे में वे गांधी की तरह एक रोड़ा हैं। साम्राज्यवादियों और नव-साम्राज्यवादियों के लिए आजादी की पूरी लड़ाई एक झूठ और दिखावा थी, जो कि ब्रिटिश राज की भलाई देखने के बजाय उसकी जड़ खोदने का काम करती थी। सबाल्टर्न इतिहासकारों के हिसाब से नेहरू उस जमात के नेता थे जो अभिजात थी, जिसका नीचे से यानी जनता के भले से कोई लेना-देना नहीं था। रूढ़ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन नेहरू को उस बूर्जुवा नेतृत्व का प्रतिनिधि मानता रहा जिसने समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद क्रांति की ऐतिहासिक संभावनाओं को कमजोर किया।

गांधी की हत्या के बाद गांधीवादियों ने नेहरू से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि वे भी गांधी के अंतिम दिनों की तरह सत्ता से दूर रहेंगे। वे उस गांधी को भूल गए जो अपने हृदय के हर कोने से खांटी राजनीतिक थे। समाजवादियों की जमात ने कभी नेहरू के नेतृत्व में ही समाजवाद का ककहरा सीखा था। आजादी के बाद वही समाजवादी नेहरू की जड़ें खोदने पर आमादा हो गए। पटेल 1950 में स्वर्ग सिधार गए। गांधी की पहले ही 1948 में हत्या हो चुकी थी। बाकी बचे मौलाना आजाद, जो नेहरू के मुश्किल दिनों के साथी थे।

यानी आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग दौर थे। पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी, जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे। लेकिन आजादी के बाद और गांधी की हत्या के बाद सिर्फ नेहरू थे। आजादी और विभाजन के द्वैध को भुगत कर निकला देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शोषण ने देश को अंदर तक खोखला कर दिया था। इस एक तथ्य से ही हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है- 1947 में भारत में औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष थी।

ऐसे कठिन दौर में नेहरू ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दिन-रात काम किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ चार-चार घंटे सोकर बिताया। जिन्हें नेहरू की मेहनत का अंदाजा लगाना हो वे गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध ‘दून घाटी में नेहरू’ पढ़ लें। किसी को आजादी के पहले के नेहरू से एतराज नहीं है। सबकी दिक्कत आजादी के बाद के नेहरू से है। इसलिए यहां बात सिर्फ इसी नेहरू की होनी है। उस नेहरू की, जिस पर आजादी की लड़ाई की समूची विरासत को आजाद भारत में अकेले आगे बढ़ाना था। जिसके हिस्से ‘सत्ता’ का ‘अमृत’ आया था; औपनिवेशिक शोषण और सांप्रदायिकता से टूटे-बिखरे मुल्क में ‘विष’ भी इसी नेहरू के हिस्से आया।

सबसे पहली बात रियासतों के एकीकरण की। इस काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था। जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था। यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया, जिसे पटेल ने गृहमंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया। लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसविदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया। माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए। यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते।

नेहरू यह मसविदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके। उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी। तड़के वे उनसे मिलने पहुंच गए। नेहरू की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसविदा बनाना पड़ा, जिसे तीन जून योजना के नाम से जाना जाता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई। ध्यान रहे पटेल जिस सरकार में गृहमंत्री थे, नेहरू उसके प्रधानमंत्री थे। इस तरह, यह निश्चित रूप से पटेल का नहीं, पटेल और नेहरू का मिलाजुला काम था।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की चुनौती थी। देश सांप्रदायिक वहशीपन के सबसे बुरे दौर से गुजर चुका था। लोगों ने गांधी के जिंदा रहते उनकी बात अनसुनी कर दी थी। जिन्ना ने अपना दार-उल-इस्लाम बना लिया था; मुसलमानों का ‘अपना’ मुल्क पाकिस्तान वजूद में आ गया था। भीषण रक्तपात, विस्थापन के साथ हिंदू और सिख शरणार्थियों के जगह-जगह पहुंचने के साथ ही ‘हिंदू’ सांप्रदायिक दबाव बहुत जबर्दस्त हो गया था। हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव सामने था। यह ऐसा चुनाव था जो सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के मुद््दे पर लड़ा जा रहा था। नेहरू ने ‘जन भावनाओं’ की मुंहदेखी नहीं की। उन्होंने वह कहा जो बहुतों के लिए अलोकप्रिय था। उनमें अलोकप्रिय होने का साहस था।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के हक में आवाज बुलंद की और जनता को अंधेरे समय में रोशनी दिखाई। जनता ने अपने नेता को खुद से ज्यादा समझदार माना। इस चुनाव में नेहरू ने तकरीबन पूरा देश नाप लिया। तकरीबन चालीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया। हर दस में एक भारतीय को सीधा संबोधित किया। यह वक्त हिंदू सांप्रदायिकता के उभार के लिए सबसे मुफीद था। लेकिन इसी समय इसे मुंह की खानी पड़ी। यह चुनाव एक तरह से धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत संग्रह सिद्ध हुया। नेहरू पर एक और बड़ा जिम्मा था। आजादी की लड़ाई के दौरान बोए गए लोकतांत्रिक पौधे की जड़ें मजबूत करने का। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है। नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुन कर ऊब चुके थे। उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं।

नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा। चाणक्य के नाम से ‘द प्रेसिडेंट’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वे सीजर हो जाएं।

मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें बख्शा न जाए। फिर शंकर ने नेहरू पर जो कार्टून बनाए उनका संग्रह इसी नाम से प्रकाशित हुया- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना। उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा। नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद में जरूर पहुंचें, जो हर मौके पर नेहरू पर जबर्दस्त हमला बोलते थे।

उनकी आर्थिक योजना, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं, ने देश को एक मजबूत आधार दिया। जिस वक्त भारत आजाद हुया, उसे नब्बे प्रतिशत मशीनरी बाहर से आयात करनी होती थी। जर्मनी को छोड़ कर हर जगह से तकनीक का आयात किया गया। महालनोबिस योजना का मुख्य उद््देश्य भारी उद्योगों को बढ़ावा देना था। ठहरी हुई खेती के साथ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करना एक बड़ा सवाल था। नेहरू ने लोकतांत्रिक दायरों में रह कर भूमि सुधार किए। डेढ़ सौ साल पुरानी जमींदारी व्यवस्था को खत्म करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी।

गरीबों को ऊपर उठाने के लिए नेहरू और उनके योजनाकारों ने सामुदायिक व्यवस्था का सहारा लिया। नेहरू ने गांवों में ग्राम-सेवकों की पूरी फौज भेज दी। नेहरू उद्योग और कृषि में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीजें थीं। उनको विकास का महत्त्व पता था। वे मानते थे कि गरीबी का बंटवारा नहीं किया जा सकता, सबमें बांटने के लिए उत्पादन जरूरी है। लेकिन उसके लिए वे खेती से समझौता नहीं करते थे।

उन्होंने देश में हरित क्रांति की परिस्थितियां तैयार कीं। देश के पंद्रह जिलों में एक पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। उनकी मृत्यु के बाद शास्त्रीजी ने हरित क्रांति को साकार कर दिया। डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले इक्कीस सालों में किया गया, उतना दो सौ साल किए गए काम के बराबर है। दुनिया के लगभग सारे अर्थशास्त्री- जिन्होंने नेहरू की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया- नेहरू की रणनीति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

नेहरू के विजन में गरीब लोकतंत्र की कसौटी था। उन्होंने तय किया कि गरीबों के हित परिदृश्य से बाहर नहीं फेंके जा सकते। उन्होंने गरीबों के प्रति पक्षधरता का वह बुनियादी सोच पैदा किया कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दबाव के बाजवूद गरीब किसान-मजदूर अब भी बहस का सामान्य मुद्दा बने हुए हैं। नेहरू मानते थे, ‘लोकतंत्र समाजवाद के बिना अधूरा है और समाजवाद लोकतंत्र के बिना’।

बात नेहरू के महिमामंडन की नहीं है। नेहरू की विफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। लेकिन हर नेता अपने समय के संदर्भ में निर्णय लेता है, नीति बनाता है। जो कमियां-कमजोरियां आज हमें दिखाई दे रही हैं, वे नेहरू को नहीं दिख रही थीं। क्योंकि नेहरू अपने युग में बैठ पर दुनिया देख रहे थे। उस पर से तमाम भयानक चुनौतियों के बीच।
हमारे बीच एक बड़ा दंगा, एक बड़ी आपदा, सब-कुछ उथल-पुथल कर देती है। नेहरू ऐसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां विफलता ही नियति थी। एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था- हमने अपनी विफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की।

मोहित सेन ने लिखा है कि तिब्बत सीमा विवाद के वक्त चीन ने नेहरू का कद छोटा करने के लिए उनका चरित्र हनन करना शुरू किया था। चीनी नेतृत्व (इसमें माओ शामिल नहीं थे) का मानना था कि नेहरू से टकराने के लिए, नेहरू का कद घटाना जरूरी है। यही बात सांप्रदायिक दलों पर लागू होती है। क्योंकि नेहरू उनके लिए खतरनाक हैं।

(सौरभ वाजपेयी)  – जनसत्ता 6 जून 2015
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