मैंने जीवन की शराब पी – त्रिलोचन

मैंने जीवन की शराब पी,

बार बार पी|

जब – जब होश हुआ तब-तब ले-लेकर

प्याला ओठों तक पहुँचाया|

अंतस्तल में ढ़ाला उस रस को,

जिसकी संचित सोद्वेग चाह थी सिरा-सिरा में|

जागा, जागकर एक आह को देखा,

मुझको लाकर किस दुनिया में डाला उसने,

जहां भले स्वप्नों तक का तो ठाला रहता है:

खीझा, फिर अपनी नई राह ली|

मैं इस जीवन की शराब को पीते-पीते

वर्षों का पथ,

क्षण की  छोटी-सी सीमा में तय करता चुपचाप आ रहा हूँ|

अंजाने और अपरिचित चेहरे अपने जैसे जीते

जीर्ण-शीर्ण मिलते हैं,

मैं उनका कर थामे देता हूँ जीवन,

जीवन के मधुमय गाने|

(त्रिलोचन)

 

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