Women Warriors in Indian History : भारतीय इतिहास की दस जांबाज लड़ाकू शासिकाएं

wpmen-warriorsक्या यह अचरज की बात नहीं कि गार्गी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, सूर्या, सावित्री, सुलभा, एवं कात्यायिनी जैसी मनीषी स्त्रियों की चर्चा तो पुरातन भारतीय कालों में थोड़ी मिथकीय और थोड़ी ऐतिहासिक स्त्रियों के रूप में मिलती है परन्तु स्त्री योद्धाओं की कोई चर्चा कहीं नहीं मिलती| ऐसा तो नहीं ही रहा होगा कि इस उपमहाद्वीप की धरती पर इंसानी आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा वीरता और शौर्य दिखाने के क्षत्रिय गुणों से वंचित रहा होगा और उनमें से बहुतों ने शासन न किये होंगे या पुरुषों की ही भांति शस्त्र के माध्यम से अपना वर्चस्व न मनवाया होगा| जब शास्त्र और ज्ञान के क्षेत्र में स्त्री शक्ति ने अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त किया तो शूरवीरता या राजनीति और कूटनीति के क्षेत्र में ऐसा न किया होगा यह मानने का कोई वाजिब सा कारण मिलता नहीं और अगर रजिया सुल्तान के बाद के इतिहास पर दृष्टि डालें तो अगर इस युग के बाद रानी लक्ष्मी बाई तक बहुत सी ऐसी स्त्री योद्धाओं की आमद इतिहास के पटल पर दिखाई देती है जिन्होने अपने अपने समय में इतिहास को अपने अपने तरीके से प्रभावित करके उस काल को अपना बनाया, तब रजिया से पहले ऐसा न हुआ होगा यह संदेहास्पद बात है| किसी विशेष योजना के तहत वीरांगनाओं की कहानियों को मिसाल न बनने दिया गया हो तो यह अलग बात है पर यह भूमि सदियों और शताब्दियों तक वीर स्त्रियों के शौर्य प्रदर्शन से वंचित रही होगी यह बात आसानी से मानी जा सकने वाली बात है नहीं| जैसे आधुनिक भारत के इतिहास से प्रधानमंत्रियों की सूची से इंदिरा गाँधी का उल्लेख हटा दिया जाए तो सौ दो सौ साल बाद की पीढ़ी में नगण्य सी संख्या में लोगों को उनके बारे में ज्ञात होगा कि वह भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक रहीं| पर इंदिरा गाँधी का जिक्र न किये जाने से यह बात सच नहीं हो जाती कि स्त्रियाँ शीर्ष पदों के राजनीति में उच्चतम स्थान पर नहीं पहुंचीं|

सदियों तक भारत में इतिहास लिखने की परम्परा ही नहीं रही और वाचिक परम्परा के माध्यम से ही पुराने काल के लोगों की कथाएं नये युगों में प्रवेश करती रहीं| जिनमें यह तय था कि मूल कथाओं में जोड़-घटाव सुनाने वाले की व्यक्तिगत छाप के आ जाने से होगा ही होगा| एक ही चरित्र के बारे में विभिन्न बातें सुनी जाना भी ऐसी स्थिति में स्वाभाविक बात बन जाती है और ऐसे में यह और ही ज्यादा स्वाभाविक है कि कई काल खण्डों के बाद कथा के चरित्र का बहुत सा चित्रण असली व्यक्ति से बहुत अलग बन जाए क्योंकि नये युग में वाचक अपने काल की जरूरतों के अनुसार नायक के चरित्र चित्रण में कुछ बातें जोड़ देता रहा होगा या घटा देता रहा होगा|

इन सब लेखकीय या वाचकीय परिवर्तनों के बावजूद मूल चरित्र के कुछ मूलभूत गुणात्मक आधार होते हैं जो हमेशा उस चरित्र की रीढ़ का ढांचा बने रहते हैं| इतिहास लेखन जहां क़ानून एवं अदालत की भांति, जो तथ्य सामने हैं उनके आधार पर, विवरण बनाता जाता है, और अक्सर ही यह इतिहास के विधार्थियों के अलावा अन्यों के लिए नीरस किस्म का होता है, साहित्य उसी नीरस इतिहास के टुकड़ों को उठाकर रसमयी और पठनीय सामग्री ही तैयार नहीं करता वरन घटनाओं एवं व्यक्तियों के बारे में पाठक की समझ इतिहास से ज्यादा गहन तरीके से प्रस्तुत करता है| इतिहास जहां उपस्थित सुबूतों के धेरे से बाहर न देख पाने की सीमितता से बंधा रहता है वहीं साहित्य के पास कल्पना की उड़ान होती है जो चरित्र और घटनाओं दोनों के सच को और ही ढंग से विश्लेषित करके मनोविज्ञान और कुछ भी क्यों हुआ से लेकर कैसे हुआ तक के विवरण को विस्तार प्रदान कर जाता है| इतिहास का अपना स्थान है मानव जीवन में परन्तु साहित्य का स्थान विशिष्ट है क्योंकि आज के ही घटित के बारे में अलग अलग विवरण अलग-अलग कथित प्रत्यक्षदर्शी दे सकते हैं और ऐसा बिल्कुल दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि जो बताया गया या दिखाया गया वही एकमात्र सच संस्करण है| साहित्य एकमात्र सच होने के दावे नहीं करता तब भी सच के करीब ले जाने का संकेत बहुत मजबूती से कर देता है|

साहित्य जनमानस में एकदम ही खलनायक या अमानवीय छवि लिए हुए चरित्र के भी नजदीक जाने का और उसके जीवन के किसी विशेष काल खंड में उसकी मनोस्थिति समझने का अवसर प्रदान करता है ताकि समझा जा सके कि उसने जो किया, क्यों किया होगा और इस तरह साहित्य समाज और मानव की समझ का दायरा ही विकसित नहीं करता बल्कि मानवता और मानवीयता का घेरा भी बढाता है| इस दृष्टिकोण से देखें तो इतिहास केवल इतिहास की खुश्क सी विषय (टैक्स्ट) पुस्तकों में ही सीमित रह जाए तो समाज का हर काल में बड़ा नुकसान हो जाए क्योंकि ऐसा होने पर इतिहास के विधार्थीगण ही इसे पढ़ पाते हैं और उनमें से भी बहुतायत ऐसे विधार्थियों का रहेगा जो इसे रस्मी तौर पर अंक लाने के लिए पढते हैं| साहित्य को सदैव इतिहास के साथ जुगलबंदी करते रहना पड़ता है ताकि इतिहास के झरोखों से कच्चा माल उठाकर वह अपने समय की सभ्यता और अपने समय के समाज को उपयोगी सामग्री प्रदान कर सके|

पद्य एवं गद्य लेखक युगल जोशी, जिन्होने अपने पहले उपन्यास Ram : The Soul Of Time में राम कथा का अन्वेषण एक भिन्न लेखकीय दृष्टि से सफलतापूर्वक किया था, ने मध्य युगीन इतिहास से लेकर अंग्रेजी काल तक के काल खंड से दस शूरवीर स्त्री शासकों को अपनी लेखनी का माध्यम बनाया है अपनी दूसरी पुस्तक – Women Warriors of Indian History, में|

सहज एवं सुगम भाषा में उन्होंने रजिया सुल्तान, रुद्रम्बा, दुर्गावती, चाँद बीबी, अब्बाक्का, चेनम्मा, अवंतीबाई, और लक्ष्मी बाई के चरित्रों और उनके दवारा अपने अपने काल खण्डों को प्रभावित करने वाले उनके कारनामों को रोचक स्वरूप में प्रस्तुत किया है| चूँकि ये सभी चरित्र राजसी पृष्ठभूमि से सम्बंधित रहे सो सता पाने या इसे बनाए रखने के लिए उन्हें मुखर पुरुष विरोध और महलों की अंदुरनी साजिशों से हर स्तर पर लड़ाइयां लड़नी पड़ी, और यह पुस्तक उनके उत्थान और पतन दोनों की कहानियां बड़े ही रोमांचक कलेवर में पाठक के समक्ष प्रस्तुत करती है|

अपनी पहली पुस्तक में मिथकीय काल को सफलतापूर्वक संभाल कर युगल जोशी अपने दूसरे लेखकीय प्रयास में ज्ञात और सर्वत्र स्वीकृत इतिहास को दक्षता से खंगाल कर पाठकों के समक्ष एक समृद्ध पुस्तक प्रस्तुत करते हैं| पुस्तक चुने गये चरित्रों का जबरन महिमामंडन नहीं करती वरन उनके गुणों और दोषों दोनों को छूते हुए उन्हें रोचक चरित्रचित्रण प्रदान करती है| यह ऐसा पुस्तकीय प्रयास है जो इतिहास को साहित्य की ओर ले जाने वाला पुल भी बनता है और साथ ही  मंजिल भी| इस पुस्तक की हर कहानी अपने आप में एक स्वतंत्र उपन्यास सरीखे बड़े कथानक वाली पुस्तक की संभावना की ओर इशारा करती है|

ऐसी पुस्तकें अनिवार्य हैं रचा जाना ताकि यह जाना जा सके कि कैसे कैसे व्यक्तियों ने समय समय पर विभिन्नताओं से भरे इस देश के विभिन्न स्थानों को भिन्न काल खण्डों में किस तरह से दिशा दी और कब क्या हुआ और क्यों हुआ| स्कूल, कालेज के विधार्थियों से लेकर साहित्य के पूर्ण वयस्क और अनुभवी पाठक के लिए किताब रोमांचकारी और स्तरीय कथ्य लेकर आती है|

पुस्तक                     – Women Warriors in Indian History

लेखक                     – Yugal Joshi

प्रकाशक                   – Rupa Publications

 

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