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सितम्बर 5, 2016

अलबर्ट कामू का आभार पत्र अपने शिक्षक के नाम

camusविश्व प्रसिद्ध दार्शनिक, अल्जीरिया में जन्में और फ़्रांस में वास करने वाले अलबर्ट कामू (7 November 1913 – 4 January 1960) को जब 1957 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्होंने अपने शिक्षक रहे Louis Germain का आभार व्यक्त करने के लिए उन्हें एक खुला पत्र लिखा, क्योंकि उनके अनुसार ये उनके शिक्षक ही थे जिन्होने कामू के अंदर छिपी लेखकीय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोत्साहन दिया जिससे वे बाद में विश्व भर में सम्मान पाने वाले उपन्यासों और निबन्धों की रचना कर सके|

उल्लेखनीय है कि कामू जब शैशवावस्था में ही थे तभी उनके पिता प्रथम विश्व युद्ध में मारे जा चुके थे और उनकी माँ आंशिक रूप से बधिर थीं और अशिक्षित थीं|

प्रस्तुत है कामू दवारा अपने शिक्षक को 19 November 1957 को लिखे पत्र का हिन्दी अनुवाद,

 

Dear Monsieur Germain,

इन दिनों मेरे गिर्द घट रही हलचलों को बहुत हद तक शांत होने का इंतजार करने के बाद मैं आज अपने हृदय की गहराइयों भरे उद्गारों के साथ आपसे मुखातिब हो रहा हूँ| मुझे हाल ही में एक महान पुरस्कार से सम्मानित किया गया है| मैंने न तो इस पुरस्कार की कभी कामना की थी और न ही मैं अपने को इसके योग्य पाता हूँ|

जब मैंने अपने को पुरस्कार दिए जाने की खबर सुनी तो अपनी माँ के बाद मुझे आपके प्रति कृतज्ञता का ही ख्याल आया| आपके बिना, आपके प्रोत्साहन भरे और स्नेहमयी सहारे के बिना और आपके दवारा मुझे उदारतापूर्वक दी गई शिक्षा के बिना मुझ जैसा गरीब बच्चा आज यह सब नहीं पा सकने की हालत में कदापि नहीं पहुँच पाता|

मैं इस सम्मान पर बहुत ज्यादा केंद्रित नहीं होना चाहता लेकिन इसने मुझे यह अवसर तो दिया ही है मैं अपने ह्रदय में आपके स्थान के बारे में अपने भाव आपसे साझा कर सकूं| आप मेरे लिए हमेशा से ही बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं और आज भी हैं| मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपने जो प्रयास स्कूल में पढ़ रहे एक छोटे बालक को शिक्षा और ज्ञान ग्रहण करने के मार्ग पर सुचारू रूप से चलाने के लिए किये थे और जिस कार्य में आपने अपना पूरा उदार हृदय उड़ेल दिया था, उन सब प्रयासों के प्रति आपका यह शिष्य आज भी आपका आभारी है|

आपके प्रति कृतज्ञ भावों से भरे ह्रदय से मैं आपका आलिंगन करना चाहता हूँ|

अलबर्ट कामू

 

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सितम्बर 5, 2016

शिक्षक हो तो ऐसा!

Teacher@UPयह घटना उत्तर प्रदेश के रामपुर के शाहबाद स्थित रामपुरा गांव के एक प्राइमरी स्कूल मास्टर ने अपने छात्रों में शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि मिसाल कायम कर दी और मौजूदा दौर में एक अनूठी कहानी रच दी| एक ऐसे वक्त में जब प्राथमिक शिक्षा का स्तर न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बुरी स्थिति में हैं और शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद लाखों करोड़ों बच्चे प्राथमिक स्तर की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं और जहां प्राथमिक शिक्षा में सुविधाओं का बेहद अकाल है, यह घटना बहुत ज्यादा महत्व की बन जाती है| प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर भारतीय को इस घटना के बारे में जानना चाहिए और सम्बंधित संस्थाओं एवं सरकारों को ऐसे आदर्श शिक्षक को पुरस्कृत करना चाहिए जिसने शिक्षा का ज्ञान से संबंध अपने उच्चतम आदर्श रूप में कायम रखा है|

रामपुरा के स्कूल में जब अध्यापक मुनीश  कुमार की तैनाती बतौर प्राथमिक शिक्षक हुई तो उस  इलाके में बहुत से बच्चे स्कूल नहीं आते थे| ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए उनके बच्चे उनके कामकाज में हाथ बंटाने वाले जीव थे| जितने ज्यादा हाथ उतनी ज्यादा घर की कमाई!

मुनीश कुमार ने गांव में घर-घर जाकर लोगों से सम्पर्क किया| उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी पर धीरे धीरे मुनीश की मेहनत रंग लाई और सभी ग्रामीण  अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे|
स्कूल में विधार्थी लाने के बाद मुनीश कमरतोड मेहनत करके दिन रात एक करके अपने स्कूल के बच्चों को शिक्षित बनाने के काम में जुट गये|

मुनीश का तबादला हुआ तो स्थानीय लोगों को ऐसा लगा मानों उनके बच्चों से उनका अध्यापक और गाइड और उनसे दूर जा रहे हों|

मुनीश  अपने पीछे ज्ञान की ऐसी ज्योति जलती छोड़ गये जो उस इलाके से अज्ञानता के अँधेरे को बहुत सालों तक रोशन करती रहेगी|शिक्षक हो तो ऐसा!

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