Archive for अप्रैल 1st, 2016

अप्रैल 1, 2016

तो तुम लेखक बनना चाहते हो ?

अमेरिकन पिता और जर्मन माता की संतान के रूप में सन १९२० में जन्मे Charles Bukowski २४ वर्ष की उम्र में अपनी पहली कहानी छपवा पाए और उनकी पहली कविता तब छपी जब वे ३५ साल के थे| ३९ वर्ष की आयु में उनकी कविताओं की पहली पुस्तक छपी और १९९४ में मृत्यु होने तक गद्य और पद्य दोनों विधाओं में वे ४५ पुस्तकें लिख चुके थे| १९४१ में लेखक बनने के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी लेकिन १९४६ तक लगातार लिखने के बावजूद उन्हें अपने लिखे को छपवाने में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई और इस असफलता ने १९४६ में उनसे लेखन को दरकिनार कर जीवन यापन के लिए अन्य बहुत से कार्य करवाए| इस असफलता को पचा नहीं पाने के कारण वे शराब के नशे में डूब गये और दस सालों तक तब तक शराब के चंगुल में रहे जब तक वे गंभीर रूप से अल्सर के रोगी न बन गये| उन्होंने लेखन को फिर से अपनाया और इस बार कलम उठा कर नहीं रखी|हालांकि जीवन को सहारा देने के लिए वे अन्य क्षेत्रों में काम करते रहे पर जीवन पर्यंत लेखन को उन्होंने नहीं छोड़ा| उनकी एक बेहद प्रसिद्ध और प्रभावशाली कविता है – So you want to be a writer?

प्रस्तुत है मूल अंग्रेजी की कविता का हिन्दी रूपांतरण :

यदि तुम्हारे भीतर से यह विस्फोट के रूप में बाहर निकल कर नहीं आता

तो लिखने की तीव्र इच्छा और तमाम अन्य कारण

इतने पर्याप्त नहीं कि तुम लिखो|

 

जब तक कि यह तुम्हारे दिल और दिमाग से

और मुँह और आँतों से

अपने आप बाहर निकलने के लिए तत्पर नहीं होता,

तुम्हे इसे लिखने का अधिकार नहीं है|

 

यदि तुम्हे उचित शब्दों के इंतजार में

अपने कम्प्यूटर स्क्रीन को ताकते हुए

या टायप राइटर को घूरते हुए

घंटो बैठना पड़ता है,

तो तुम्हे बिल्कुल ही लिखना नहीं चाहिए|

 

यदि तुम इसलिए लिखना चाहते हो कि

लेखन से तुम्हे संपत्ति या प्रसिद्धि मिलेगी

तो मत लिखो|

या कि तुम इस मोह में लिखना चाहते हो कि

बहुत सी स्त्रियों को तुम अपने लेखन के मोहपाश में बांध कर

अपनी शैया पर लाकर अंकशायिनी बना पाने में कामयाबी पा लोगे

तो तुम हरगिज ही न लिखो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को बैठ कर

बार बार सुधार कर पुनर्लेखन करना पड़े

तो मत लिखो|

 

यदि तुम किसी और जैसा लिखना चाह रहे हो,

तो लिखना भूल ही जाओ|

 

यदि तुम्हे उस वक्त का इंतजार करना पड़े,

जब लेखन तुम्हारे भीतर से गर्जना करता हुआ बाहर आए

तो तुम धैर्य से उस घड़ी का इंतजार करो|

और यदि यह गर्जना करता बाहर नहीं निकलता तो

तुम किसी और उचित काम में अपनी ऊर्जा का उपयोग करो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को पहले अपनी पत्नी, या गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड

या अपने माता-पिता या किसी अन्य को पढ़ कर सुनाना पड़े,

अपने लिखे पर उनका अनुमोदन लेना पड़े,

तब अभी तुम लेखन के लिए अंकुरित नहीं हुए हो,

इसे स्वीकार कर लो कि अभी तुम तैयार नहीं हो|

 

अन्य बहुत से लेखकों की तरह मत बनो,

उन हजारों लोगों की तरह मत बनो

जो स्वयं को लेखक कहते हैं,

बोरियत से भरा और बोझिलता से भारी हो चुका लेखन मत करो,

दिखावा मत करो,

अपने ही प्रति प्रेम से मत घिर जाओ|

 

अगर ऐसे ही लक्षणों से तुम ग्रसित हो

तो स्पष्ट जान लो,

दुनिया भर में पुस्तकालय,

तुम्हारी तरह के कथित लेखकों के कारण पहले से ही निद्रावस्था में हैं,

उनकी मूर्छा में बढोत्तरी मत करो|

मत लिखो|

 

यदि तुम्हारी आत्मा से लेखन

एक राकेट की तरह बाहर नहीं आता,

और यदि तुम्हे ऐसा न लगने लगे

कि तुमने अगर अब नहीं लिखा

तो या तो तुम पागल हो जाओगे

या तुम आत्मघाती हो जाओगे

या हत्यारे ही बन जाओगे

तो तुम मत लिखो|

 

अगर लिखने का वास्तविक समय आ गया है,

और तुम एक माध्यम के रूप में चुने गये हो

तब लेखन स्वयं ही तुम्हारे भीतर से बाहर आ जायेगा

और यह बाहर आता ही रहेगा जब तक कि

या तो तुम ही न मर जाओ

या कि लेखन ही तुम्हारे भीतर न मर जाए|

 

इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है,

कभी भी नहीं रहा!

(Charles Bukowski )

अनुवाद – राकेश

%d bloggers like this: