सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

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