किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)

बहुत दिनों बाद किसान खबरों की सुर्खियों में है. सियासी दांव पेंच, वर्ल्ड कप की हार-जीत और शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के मोहपाश में बंधे मीडिया ने मानो एक-दो दिन के लिए किसान दिवस मनाने का फैसला ले लिया है. संसद में गतिरोध,बजट का सन्दर्भ, दिल्ली की हार के बाद मोदी के पैंतरे और फिर अन्ना हजारे. इन तमाम बातों से मीडिया को किसानों का दुःख-दर्द देखने की फुर्सत मिली है.

धीरे-धीरे किसान, खेती और गाँव देश के मानस पटल से ओझल होते जा रहे हैं. देश के कर्णधार, नीतियों के सूत्रधार और बुद्धिजीवी, सब मान चुके हैं कि देश के भविष्य में किसान, खेती और गाँव का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए हमारे भविष्य की योजनाओं में ‘स्मार्ट सिटी’ है, सूचना प्रौद्योगिकी है, फैक्ट्रियां और मॉल हैं, लेकिन गाँव-देहात नहीं है. अगर कुछ है तो बस खेती की जमीन जिससे किसान को बेदखल करके यह सब सपने साकार किए जाने हैं. किसान खेती और गाँव के लिए एक अलिखित योजना है इस देश में. गाँव या तो उजड़ेंगे या फिर शहरों के बीच दड़बों में बंद हो जायेंगे. खेती धीरे धीरे काश्तकार के हाथ से निकलकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथ जायेगी. किसान शहरों की ओर पलायन करेगा, दिहाड़ी का मजदूर बनेगा. इस अलिखित योजना को हर कोई समझता है, बस मुंह से बोलता नहीं. ऐसे में किसान की व्यथा की खबर बूँद बूँद रिसती रहती है, सुर्ख़ियों में नहीं अखबार के अन्दर के पन्नो में किसी हाशिये पर पडी रहती है.

ऐसी ही एक खबर पिछले हफ्ते छपी. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि उसके लिए फसलों के दाम को किसान की लागत से ड्योढ़ा करना संभव नहीं है. किसानों की अवस्था पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर एक याचिका पर सरकार ने यह जवाब दिया. सरकार ने कहा कि किसान को लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने से खाद्यान्न बहुत मंहगे हो जायेंगे. इसे सरकार के सामान्य जवाब की तरह देख कर नज़रंदाज़ कर दिया गया. असली बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मीडिया ने यह नहीं बताया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था. लोक सभा चुनाव और हरियाणा विधान सभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने लिखकर वादा किया था कि किसानो के लिए फसल की उनकी लागत के ऊपर 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जायेगा. बीजेपी चुनाव जीत गयी, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा में इस वादे को भुला दिया गया और सरकार की बेशर्मी देखिए कि उसने भविष्य में भी ऐसा कुछ करने से इनकार कर दिया है. मामला किसान का है इसलिए इस इनकार की खबरों में सुर्खियां नहीं बनीं.

उधर हरियाणा सरकार ने भी गुपचुप किसानों को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. सारे देश में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस हो रही थी. अरुण जेटली कह रहे थे कि अध्यादेश में और कुछ भी बदलाव किया गया हो,कम से कम मुआवजे की रकम घटायी नहीं गयी है. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार 4 दिसंबर को अधिग्रहण का मुआवजा आधा कर चुकी थी. सन २०१३ के नए अधिग्रहण कानून में कहा गया था कि मुआवजा तय करते समय जमीन की कीमत पहले की तरह कलेक्टर रेट या पुरानी रजिस्ट्री के आधार पर आंकी जायेगी. ग्रामीण इलाकों में इस कीमत को दो से गुणा किया जा सकेगा. फिर जो राशि बनेगी उसमें उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यानि अगर जमीन का सरकारी दाम 20 लाख रुपये है तो किसान को कुल मिलाकर 80 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन हरियाणा सरकार ने नए नियम बनाकर दाम को दुगना करने की बजाय य़थावत रखा. यानि हरियाणा में किसान को 80 लाख के बजाय 40 लाख मिलेंगे.

इतना बड़ा फैसला हो गया लेकिन कोई पूरा सच बताने को तैयार नहीं है. हरियाणा के मुख्य- मंत्री का दफ्तर कह रहा है कि यह फैसला औद्योगीकरण के लिए जरूरी था, लेकिन खुद खट्टर जी कह रहे हैं की मुआवजा कम हुआ ही नहीं! हरियाणा से चुने गए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह कह रहे हैं कि उनके रहते मुआवज़े को चार गुणा से कम कोई कर ही नहीं सकता! इधर हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार अधिग्रहण के पुराने मामलों में भी 100 फ़ीसदी सोलेशियम देगी. लेकिन ख्ट्टर साहब की सरकार सिरसा में इसी हफ्ते होने वाले अधिग्रहण में सिर्फ 30 फीसद सोलेशियम देने का आदेश जारी कर रही है!

यही किसान-राजनीति की त्रासदी है. किसान की खबर हाशिये पर दबी है, किसान की विचारधारा टुकड़ों में बंटी है, किसान आन्दोलन खंड- खंड में बिखरा हुआ है| इसलिए, किसान की राजनीति ऐसे चौधरियों के कब्जे में है जो उसका वोट डकारकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन किसान-हित की जगह बिल्डरों, उद्योग और व्यापारियों के हित में काम करते हैं|

आज देश को एक नई किसान-राजनीति की जरूरत है| आज किसानी घाटे का धंधा बन चुकी है| किसान के पास न तो आमदनी है, न ही अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के साधन| ले दे कर उसके उसके पास तीन ही चीजें बची हैं- पाँव के नीचे जमीं का टुकड़ा, उंगली में वोट देने की ताकत और सर पर बेवजह शान की प्रतीक पगड़ी| अपनी पगड़ी की आन को बनाये रखने के लिए किसान को वोट की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी जमीं बचानी होगी| इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चल रहा आन्दोलन किसान राजनीति को बदलने का बहुत बड़ा मौका है| यह मौका है किसान आन्दोलन को पुराने चौधरियों की गिरफ्त से बाहर निकाल कर भविष्य के सवालों से जोड़ने का, एक नया नेतृत्व और एक नई दिशा देने का|

हां, शायद यह आखिरी मौका है|

(योगेन्द्र यादव)

साभार : एक्सप्रेस टुडे

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2 टिप्पणियाँ to “किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)”

  1. सच क्या उसकी सूरत कैसी हैं,यह किसने देखी सच यह हैं आज भी अच्छी और बेसकिमती जमीन पर छोटे छोटे खाता बनाकर जमीदार ही

  2. काबिज है गरीब तो बस उसका मजदूर है भाई हर बात आपकी ही सही हो , ये आप मानते हो सम्पूर्ण भारत नहीं , मजदूर का बेटा तो टेकनीकल शिक्षा लेकर भी बेरोजगार हैं सत्य तो सत्य हैं गरीब की छाती पर लात हर कोई रख रहा बेरोजगारी बढ़ रही हैं इसका मिलकर सब राजनीतिज्ञ दलो को ढूढना ही होगा , आंनदोलन लोकतंत्र में शोभा नहीं देते है, बेरोजगार भले हमारी आवाज से आवाज भरमा कर मिलाये ,शायद कल फिर वह भूखा सोये , भारत माता की जै

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