आचार्य नरेंद्र देव – समाजवादी आंदोलन के पुरोधा

narendradevआचार्य नरेंद्र देव का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था। उनका घर का नाम अविनाशीलाल था। परंतु उनके पिता के दोस्त पं. माधव प्रसाद मिश्र ने उनका नाम नरेन्द्र देव रख दिया। उनके पिता वकालत करते थे। बचपन से ही वे पिता के साथ कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। 1905 में वे पहली बार बनारस कांग्रेस अधिवेशन में गये थे। कांग्रेस ने जब गरम दल बना तब उसमें शामिल हो गये। कांग्रेस के अधिवेशन में 1908 के बाद जाना छोड़ दिया लेकिन उसके बाद 1916 में जब नरम दल व गरम दल फिर एक साथ आ गये तब उन्होंने फिर से कांग्रेस के कार्यक्रमों में आना-जाना शुरू किया। 1915 में एलएलबी पास करके केे फैजाबाद में वकालत शुरू की तथा होमरूल लीग में शामिल होकर फैजाबाद की शाखा के मंत्री चुने गये। जब बनारस में विद्यापीठ खुला तब डा. भगवानदास के प्रस्ताव पर वे उपाध्यक्ष बना दिये गये तथा 1926 में उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया।

आचार्यजी अति संकोची थे। वे पद लेना तथा चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे लेकिन जब उ. प्र. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने से उन्होंने इन्कार कर दिया तथा पं. जवाहर लाल नेहरू के कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल होने के प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था लेकिन बाद में अपने सहयोगियों के आग्रह पर उन्होंने दोनों पद स्वीकार किये। इसी तरह 1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाने का प्रस्ताव जे.पी. ने उनके समक्ष रखा तब उन्होंने सम्मेलन का सभापति बनने से इन्कार किया। बाद में वे कार्यकर्ताओं के आग्रह पर 1934 में सम्मेलन के सभापति बनाये गये। आचार्यजी के कहने पर ही पार्टी का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता रखा गया था। 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें विशेष ट्रेन से अहमदनगर ले जाया गया। 1945 में 14 जून को जवाहर लाल जी के साथ रिहा किये गये। आजादी मिलने के बाद जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होने की चर्चा शुरू हुई तब उन्होंने कहा कि कांग्रेस यदि कोई ऐसा नियम बनाती है जिसमें हम लोगों का कांग्रेस में रहना असंभव हो जाये तो सबसे पहले मैं कांग्रेस छोड़ दूंगा। कांग्रेस के निर्णय के बाद उन्होंने यही किया, कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।

आचार्य नरेंद्र देव मानव समाज के कल्याण और नैतिक जीवन के विकास के लिए अन्याय का विरोध आवश्यक समझते थे उनका विचार था कि शोषणविहीन समाज में सामाजिकता के आधार पर मनुष्य का नैतिक विकास हो सकता है लेकिन स्वार्थ प्रेरणा पर आश्रित वर्ग समाज में सामाजिक भावनाओं का विकास बहुत कुछ अवरूद्ध हो जाता है। ऐसे अन्यायपूर्ण समाज में अन्याय का निरंतर का विरोध नैतिक जीवन और मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी दृष्टि में वही नैतिक है, जो अन्याय के साथ समझौता करने को तैयार न हो, स्वयं अन्याय करने से बचता रहे तथा दूसरे के अन्याय को सहन करने को तैयार न हो। उन्हें इस बात का संतोष था कि वह जीवन भर अन्याय का विरोध करते रहे। उन्हें विदेशियों के द्वारा किया जा रहा अन्याय खटकता था परंतु स्वजनों द्वारा आर्थिक और सामाजिक अन्याय किये जाने की खिलाफत वे लगातार करते थे। इसलिए वे राजनैतिक स्वराज्य के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक स्वराज्य के लिए भी प्रयत्नशील रहे। राजनैतिक स्वतंत्रता मिल जाने के बाद देश में जनतांत्रिक समाजवादी समाज निर्मित करने का प्रयास करते रहे।

आचार्य नरेंद्र देव जी को देश और दुनिया माक्र्सवादी तथा बौद्ध दर्शन का प्रखर विद्वान जानती और मानती है। लेकिन आमतौर पर आचार्य जी का किसान आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान की जानकारी कम लोगों को है। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अवध के 4 प्रमुख जिलों रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर में किसान आंदोलन तेजी से चला। आचार्यजी ने इस आंदोलन का ख्ुालकर समर्थन किया तथा उनके प्रभावशाली भाषण के चलते किसान आंदोलन में डटे रहे। सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में गोली चालन कराया। दमन के बावजूद आंदोलन उग्र रूप धारण कर लगातार चलता रहा तब सरकार को किसानों की बेदखली रोकने वाली मांग स्वीकार करनी पड़ी। अवध आंदोलन भी आचार्यजी की भूमिका के चलते सफल रहा। आंदोलन के दौरान किसानों को यह प्रतिज्ञा करायी गयी कि वे गैरकानूनी टैक्स अदा नहीं करेंगे, बेगार-बिना मजदूरी नहीं करेंगे। पलई, भूसा तथा रसल बाजार भाव पर बेचेंगे तथा नजराना नहीं देंगे। बेदखल खेत को कोई दूसरा किसान नहीं खरीदेगा तथा बेदखली कानून मंजूर होने तक सतत संघर्ष चलाएंगे। 1936 में भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। आचार्यजी को 1939 में गया अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया जिसमें आचार्यजी ने किसान सभाओं और कांग्रेस संगठन के संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के विरोध में दोनों को एक साथ खड़े होकर किसान क्रांति को परिपक्व करने की जरूरत है ताकि किसान जमीन का मालिक बन जाये। राज्य और किसानों के बीच मध्यवर्ती शोषकों का शोषण अंत हो जाय। कर्जे के बोझ से किसानों को छुटकारा मिले तथा श्रम का पूरा लाभ उन्हें मिल सके। 1949 में सोशलिस्ट पार्टी ने पटना में अधिवेशन कर किसान पंचायत संघर्ष समिति बनाई। उ. प्र. का किसान पंचायत क्रांति सम्मेलन आचार्य जी की अध्यक्षता में कानपुर जिले के ग्राम सिठमरा में हुआ। डा. लोहिया की प्रेरणा से सोशल्स्टि पार्टी व किसान पंचायत का संयुक्त अधिवेशन 25 नवंबर 1949 को लखनऊ में हुआ जिसमें 50 हजार किसानों ने भाग लिया। आचार्य नरेंद्र देव ने खुलकर सरकार पर किसानों की उपेक्षा और अन्याय करने का आरोप लगाते हुए जमीदारी खत्म करने, जमीन का बंटवारा करने, सरकारी खेती, ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा, भूमि सेना का गठन, कृषि उत्पादों तथा कपड़ा और सीमेंट की कीमतों में संतुलन, खेतिहर मजदूरों के कर्जे माफ करने तथा जमीनों से बेदखली रोकने का मांग-पत्र सरकार के समक्ष रखा। फरवरी 1950 में डा. लोहिया की अध्यक्षता में रीवा में हिंद किसान पंचायत का पहला अधिवेशन हुआ, तब आचार्य जी ने किसानों का हौसला बढ़ाते हुए किसानों से संगठित होने का आह्वान किया। आचार्य जी ने जमीदारी उन्मूलन कमेटी को 1947 में लिखे स्मृति पत्र में कहा कि जिस तरह से जमीदारों ने किसानों को लूटा, खसोटा और चूसा है यदि उसका हिसाब लगाया जाय तो किसानों के ऋण से मुक्त होना जमीदारों के बूते की बात नहीं। ऐसी हालत में जमीदारों को मुजावजा देने का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। आचार्य जी ने देवरिया सत्याग्रह में किसानों की फसल खराब होने के बाद भागीदारी करते हुए किसानों और सरकारी कर्मचारियों के भेद को समाप्त करने की मांग की। 1950 में पंजाब में भी नरेंद्र देव जी ने हिसार जिले में भी बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया था। आचार्य जी का किसानों का संघर्ष का लंबा इतिहास है जो आज भी किसान आंदोलन को ताकत दे सकता है।

अपने बारे में आचार्यजी कहते थे कि मेरे जीवन के अब कुछ वर्ष ही शेष रह गये हैं। शरीर नामक संपत्ति भी अच्छी नहीं है किंतु मन में अभी उत्साह है। जीवन सदा अन्याय से लड़ते जिया है। यह काम कोई छोटा नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और भी आवश्यकता है। अपनी जिंदगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आंखें मुंदेंगी मुझे यह संतोष होगा कि मैंने विद्यापीठ में स्थाई काम किया। यही मेरी पूंजी है। इसके आधार पर मेरी राजनीति चलती है।
आचार्यजी को बीमारी ने आजादी आंदोलन के दौरान ही जकड़ लिया था। शुरू से ही वे दमा के रोग से पीडि़त थे। स्वयं गांधी जी ने वर्धा आश्रम बुलाकर आचार्यजी की प्राकृतिक चिकित्सा भी की थी। आचार्यजी ने 19 फरवरी 1956 को शरीर त्याग दिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आचार्यजी को अजातशत्रु कहा था। उन्होंने कहा था कि आचार्यजी और गांधी जी अतिरिक्त उन्हें अब तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो आदमियत, व्यक्तित्व, इंसानियत, बौद्धिक शक्ति, ज्ञान, वाक्पटुता, भाषण शक्ति, इतिहास और दर्शन की समझ आचार्य नरेंद्रदेव जैसी रखता हो। आचार्य नरेंद्रदेवजी समाजवादी समाज के साथ-साथ समाजवादी सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे। उनका स्पष्ट मत था कि समाजवादी समाज को बनाने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ-साथ जनता के मानस को बदलने की, जागृत करने की, स्वयं अपनी समस्याओं को सुलझाने योग्य बनाने तथा समाजवादी नैतिक मूल्यों के समुचित प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता है।

संपूर्णानंद ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि वे संस्कृत और पाली के उच्च कोटि के विद्वान थे जिन्होंने काशी विद्यापीठ को गरिमा प्रदान की थी। वे हंसमुख थे तथा खूब मजाक किया करते थे। उनका सेंस आॅफ ह्यूमर अद्वितीय था।
राहुल सांकृत्यायन ने आचार्यजी के बारे में कहा था कि उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ थी। बौद्ध दर्शन पर उनकी किताब ‘अभिकोश भाष्य’ को उन्होंने ऐतिहासिक ग्रन्थ बताया था। कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो का अनुवाद भी आचार्य जी और राहुल जी ने मिलकर शुरू किया था। जिसके कुछ अंश प्रेमचंद जी की प्रेस में छपे भी थे। लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सका।

डा. राममनोहर लोहिया ने आचार्य के बारे में कहा था कि वे बौद्ध दर्शन, बौद्ध साहित्य, बौद्ध इतिहास के साथ-साथ राजनीति की गहराई से जानकारी रखने वाले विद्वान थे। मंत्री पद न लेना, लखनऊ विश्वविद्यालय का वाईस चांसलर बनने से इंकार करना उनके लिए छोटी बात थी। आचार्यजी के भाषण शिक्षाप्रद और जोशीले होते थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ में हजारों विद्यार्थियों को समाजवादी विचार से शिक्षित किया।

चंद्रशेखर जी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि आचार्य जी ऋषिकुल परंपरा के ऐसे संत थे जिनका जीवन कठोर साधना में बीता। जिन्होंने सुख-दुख को समान समझा। उनकी पीड़ा आमजन के प्रति थी। अतीत में जो कुछ शुभ है उसको अक्षुण रखने का संकल्प था। लेकिन विकृतियों, अंधविश्वासों तथा रूढि़वादिता के खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे। उन्होंने बुद्ध की करूणा तथा माक्र्स के दर्शन को जीवन का संबल बनाया था।

आचार्यजी की पुण्य तिथि आज 19 फरवरी 2015 को देशभर में मनाई जा रही है। आचार्यजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके पथ पर समाजवादी समाज की रचना के लिए न केवल किसानों, मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित करें, बल्कि पठन-पाठन करते हुए नैतिकता आधारित जीवन जीते हुए स्वयं के आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयासरत रहें।

डाॅ सुनीलम
पूर्व विधायक, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम

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