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फ़रवरी 19, 2015

स्वाइन फ़्लू : लक्षण, रक्षा और उपचार

क्या है स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है, जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच1 एन1 के नाम से जाना जाता है और मौसमी फ्लू में भी यह वायरस सक्रिय होता है। 2009 में जो स्वाइन फ्लू हुआ था, उसके मुकाबले इस बार का स्वाइन फ्लू कम पावरफुल है, हालांकि उसके वायरस ने इस बार स्ट्रेन बदल लिया है यानी पिछली बार के वायरस से इस बार का वायरस अलग है।

कैसे फैलता है

जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। यह कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, कीबोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी यह वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया हो।

शुरुआती लक्षण

– नाक का लगातार बहना, छींक आना, नाक जाम होना।

– मांसपेशियां में दर्द या अकड़न महसूस करना।

– सिर में भयानक दर्द।

– कफ और कोल्ड, लगातार खांसी आना।

– उनींदे रहना, बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।

– बुखार होना, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना।

– गले में खराश होना और इसका लगातार बढ़ते जाना।

नॉर्मल फ्लू से कैसे अलग

सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के वायरस में एक फर्क होता है। स्वाइन फ्लू के वायरस में चिड़ियों, सूअरों और इंसानों में पाया जाने वाला जेनेटिक मटीरियल भी होता है। सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के लक्षण एक जैसे ही होते हैं, लेकिन स्वाइन फ्लू में यह देखा जाता है कि जुकाम बहुत तेज होता है। नाक ज्यादा बहती है। पीसीआर टेस्ट के माध्यम से ही यह पता चलता है कि किसी को स्वाइन फ्लू है। स्वाइन फ्लू होने के पहले 48 घंटों के भीतर इलाज शुरू हो जाना चाहिए। पांच दिन का इलाज होता है, जिसमें मरीज को टेमीफ्लू दी जाती है।

कब तक रहता है वायरस

एच1एन1 वायरस स्टील, प्लास्टिक में 24 से 48 घंटे, कपड़े और पेपर में 8 से 12 घंटे, टिश्यू पेपर में 15 मिनट और हाथों में 30 मिनट तक एक्टिव रहते हैं। इन्हें खत्म करने के लिए डिटर्जेंट, एल्कॉहॉल, ब्लीच या साबुन का इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी भी मरीज में बीमारी के लक्षण इन्फेक्शन के बाद 1 से 7 दिन में डिवेलप हो सकते हैं। लक्षण दिखने के 24 घंटे पहले और 8 दिन बाद तक किसी और में वायरस के ट्रांसमिशन का खतरा रहता है।

चिंता की बात

इस बीमारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है दिमाग से डर को निकालना। ज्यादातर मामलों में वायरस के लक्षण कमजोर ही दिखते हैं। जिन लोगों को स्वाइन फ्लू हो भी जाता है, वे इलाज के जरिए सात दिन में ठीक हो जाते हैं। कुछ लोगों को तो अस्पताल में एडमिट भी नहीं होना पड़ता और घर पर ही सामान्य बुखार की दवा और आराम से ठीक हो जाते हैं। कई बार तो यह ठीक भी हो जाता है और मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसे स्वाइन फ्लू था। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जिन लोगों का स्वाइन फ्लू टेस्ट पॉजिटिव आता है, उनमें से इलाज के दौरान मरने वालों की संफ्या केवल 0.4 फीसदी ही है। यानी एक हजार लोगों में चार लोग। इनमें भी ज्यादातर केस ऐसे होते हैं, जिनमें पेशंट पहले से ही हार्ट या किसी दूसरी बीमारी की गिरफ्त में होते हैं या फिर उन्हें बहुत देर से इलाज के लिए लाया गया होता है।

यह रहें सावधान

5 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं। जिन लोगों को निम्न में से कोई बीमारी है, उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए :

– फेफड़ों, किडनी या दिल की बीमारी

– मस्तिष्क संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी मसलन, पर्किंसन

– कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग

– डायबीटीजं

– ऐसे लोग जिन्हें पिछले 3 साल में कभी भी अस्थमा की शिकायत रही हो या अभी भी हो। ऐसे लोगों को फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

– गर्भवती महिलाओं का प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) शरीर में होने वाले हॉरमोन संबंधी बदलावों के कारण कमजोर होता है। खासतौर पर गर्भावस्था के तीसरे चरण यानी 27वें से 40वें सप्ताह के बीच उन्हें ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है।

अकसर पूछे जाने वाले सवाल

– अगर किसी को स्वाइन फ्लू है और मैं उसके संपर्क में आया हूं, तो क्या करूं?

सामान्य जिंदगी जीते रहें, जब तक फ्लू के लक्षण नजर नहीं आने लगते। अगर मरीज के संपर्क में आने के 7 दिनों के अंदर आपमें लक्षण दिखते हैं, तो डॉक्टर से सलाह करें।

– अगर साथ में रहने वाले किसी शफ्स को स्वाइन फ्लू है, तो क्या मुझे ऑफिस जाना चाहिए?

हां, आप ऑफिस जा सकते हैं, मगर आपमें फ्लू का कोई लक्षण दिखता है, तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं और मास्क का इस्तेमाल करें।

– स्वाइन फ्लू होने के कितने दिनों बाद मैं ऑफिस या स्कूल जा सकता हूं?

अस्पताल वयस्कों को स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखने पर सामान्यत: 5 दिनों तक ऑब्जर्वेशन में रखते हैं। बच्चों के मामले में 7 से 10 दिनों तक इंतजार करने को कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति को 7 से 10 दिन तक रेस्ट करना चाहिए, ताकि ठीक से रिकवरी हो सके। जब तक फ्लू के सारे लक्षण खत्म न हो जाएं, वर्कप्लेस से दूर रहना ही बेहतर है।

– क्या किसी को दो बार स्वाइन फ्लू हो सकता है?

जब भी शरीर में किसी वायरस की वजह से कोई बीमारी होती है, शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उस वायरस के खिलाफ एक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। जब तक स्वाइन फ्लू के वायरस में कोई ऐसा बदलाव नहीं आता, जो अभी तक नहीं देखा गया, किसी को दो बार स्वाइन फ्लू होने की आशंका नहीं रहती। लेकिन इस वक्त फैले वायरस का स्ट्रेन बदला हुआ है, जिसे हो सकता है शरीर का प्रतिरोधक तंत्र इसे न पहचानें। ऐसे में दोबारा बीमारी होने की आशंका हो सकती है।

दिल्ली में इलाज के लिए कहां जाएं

सरकारी अस्पताल

जीटीबी अस्पताल, दिलशाद गार्डन

एलएनजेपी अस्पताल, दिल्ली गेट

सफदरजंग अस्पताल, रिंग रोड

राम मनोहर लोहिया अस्पताल, बाबा खड़क सिंह मार्ग

दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, हरिनगर

संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल, मंगोलपुरी

लाल बहादुर शास्त्री हॉस्पिटल, खिचड़ीप़ुर

पं. मदन मोहन मालवीय अस्पताल, मालवीय नगर

बाबा साहब आंबेडकर हॉस्पिटल, रोहिणी

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय, गीता कॉलोनी

भगवान महावीर अस्पताल, रोहिणी

महर्षि वाल्मीक अस्पताल, पूठ खुर्द

बाबू जगजीवन राम मेमोरियल अस्पताल, जहांगीरपुरी

अरुणा आसफ अली अस्पताल, राजपुर रोड

एयरपोर्ट हेल्थ ऑर्गनाइजेशन हॉस्पिटल, आईजीआई एयरपोर्ट

प्राइवेट हॉस्पिटल

मूलचंद हॉस्पिटल, लाजपतनगर

सर गंगाराम हॉस्पिटल, राजेंद्र नगर

अपोलो हॉस्पिटल, सरिता विहार

ऐक्शन बालाजी हॉस्पिटल, पश्चिम विहार

सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल, तीस हजारी

एनसीआर में स्वाइन फ्लू सेंटर

नोएडा: डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, नोएडा

गुड़गांव: सिविल हॉस्पिटल, ओल्ड गुड़गांव

फरीदाबाद: बादशाह खान (बीके) हॉस्पिटल, फरीदाबाद

गाजियाबाद: एमएमजे हॉस्पिटल, जसीपुरा मोड़, गाजियाबाद

स्वाइन फ्लू से बचाव और इसका इलाज

स्वाइन फ्लू न हो, इसके लिए क्या करें?

– साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही सावधानी बरती जाए, तो इस बीमारी के फैलने के चांस न के बराबर हो जाते हैं।

– जब भी खांसी या छींक आए रूमाल या टिश्यू पेपर यूज करें।

– इस्तेमाल किए मास्क या टिश्यू पेपर को ढक्कन वाले डस्टबिन में फेंकें।

– थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ को साबुन और पानी से धोते रहें।

– लोगों से मिलने पर हाथ मिलाने, गले लगने या चूमने से बचें।

– फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

– अगर फ्लू के लक्षण नजर आते हैं तो दूसरों से 1 मीटर की दूरी पर रहें।

– फ्लू के लक्षण दिखने पर घर पर रहें। ऑफिस, बाजार, स्कूल न जाएं।

– बिना धुले हाथों से आंख, नाक या मुंह छूने से परहेज करें।

आयुर्वेद

ऐसे करें बचाव

इनमें से एक समय में एक ही उपाय आजमाएं।

– 4-5 तुलसी के पत्ते, 5 ग्राम अदरक, चुटकी भर काली मिर्च पाउडर और इतनी ही हल्दी को एक कप पानी या चाय में उबालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

– गिलोय (अमृता) बेल की डंडी को पानी में उबाल या छानकर पिएं।

– गिलोय सत्व दो रत्ती यानी चौथाई ग्राम पौना गिलास पानी के साथ लें।

– 5-6 पत्ते तुलसी और काली मिर्च के 2-3 दाने पीसकर चाय में डालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

– आधा चम्मच हल्दी पौना गिलास दूध में उबालकर पिएं। आधा चम्मच हल्दी गरम पानी या शहद में मिलाकर भी लिया जा सकता है।

– आधा चम्मच आंवला पाउडर को आधा कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिएं। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

स्वाइन फ्लू होने पर क्या करें

यदि स्वाइन फ्लू हो ही जाए तो वैद्य की राय से इनमें से कोई एक उपाय करें:

– त्रिभुवन कीर्ति रस या गोदंती रस या संजीवनी वटी या भूमि आंवला लें। यह सभी एंटी-वायरल हैं।

– साधारण बुखार होने पर अग्निकुमार रस की दो गोली दिन में तीन बार खाने के बाद लें।

– बिल्वादि टैब्लेट दो गोली दिन में तीन बार खाने के बाद लें।

होम्योपैथी

कैसे करें बचाव

फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखने पर इन्फ्लुएंजाइनम-200 की चार-पांच बूंदें, आधी कटोरी पानी में डालकर सुबह-शाम पांच दिन तक लें। इस दवा को बच्चों समेत सभी लोग ले सकते हैं। मगर डॉक्टरों का कहना है कि फ्लू ज्यादा बढ़ने पर यह दवा पर्याप्त कारगर नहीं रहती, इसलिए डॉक्टरों से सलाह कर लें। जिन लोगों को आमतौर पर जल्दी-जल्दी जुकाम खांसी ज्यादा होता है, अगर वे स्वाइन फ्लू से बचना चाहते हैं तो सल्फर 200 लें। इससे इम्यूनिटी बढ़ेगी और स्वाइन फ्लू नहीं होगा।

स्वाइन फ्लू होने पर क्या है इलाज

1: बीमारी के शुरुआती दौर के लिए

जब खांसी-जुकाम व हल्का बुखार महसूस हो रहा हो तब इनमें से कोई एक दवा डॉक्टर की सलाह से ले सकते हैं:

एकोनाइट (Aconite 30), बेलेडोना (Belladona 30), ब्रायोनिया (Bryonia 30), हर्परसल्फर (Hepursuphur 30), रसटॉक्स (Rhus Tox 30), चार-पांच बूंदें, दिन में तीन से चार बार।

2: अगर फ्लू के मरीज को उलटियां आ रही हों और डायरिया भी हो तो नक्स वोमिका (Nux Vomica 30), पल्सेटिला (Pulsatilla 30), इपिकॉक (Ipecac-30) की चार-पांच बूंदें, दिन में तीन से चार बार ले सकते हैं।

3: जब मरीज को सांस की तकलीफ ज्यादा हो और फ्लू के दूसरे लक्षण भी बढ़ रहे हों तो इसे फ्लू की एडवांस्ड स्टेज कहते हैं। इसके लिए आर्सेनिक एल्बम (Arsenic Album 30) की चार-पांच बूंदें, दिन में तीन-चार बार लें। यह दवा अस्पताल में भर्ती व ऐलोपैथिक दवा ले रहे मरीज को भी दे सकते हैं।

योग

शरीर के प्रतिरक्षा और श्वसन तंत्र को मजबूत रखने में योग मददगार साबित होता है। अगर यहां बताए गए आसन किए जाएं, तो फ्लू से पहले से ही बचाव करने में मदद मिलती है। स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले अभ्यास करें:

– कपालभाति, ताड़ासन, महावीरासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन, मंडूकासन, अनुलोम-विलोम और उज्जायी प्राणायाम तथा धीरे-धीरे भस्त्रिका प्राणायाम या दीर्घ श्वसन और ध्यान।

– व्याघ्रासन, यानासन व सुप्तवज्रासन। यह आसन लीवर को मजबूत करके शरीर में ताकत लाते हैं।

डाइट

– घर का ताजा बना खाना खाएं। पानी ज्यादा पिएं।

– ताजे फल, हरी सब्जियां खाएं।

– मौसमी, संतरा, आलूबुखारा, गोल्डन सेव, तरबूज और अनार अच्छे हैं।

– सभी तरह की दालें खाई जा सकती हैं।

– नींबू-पानी, सोडा व शर्बत, दूध, चाय, सभी फलों के जूस, मट्ठा व लस्सी भी ले सकते हैं।

– बासी खाना और काफी दिनों से फ्रिज में रखी चीजें न खाएं। बाहर के खाने से बचें।

मास्क की बात

न पहने मास्क

– मास्क पहनने की जरूरत सिर्फ उन्हें है, जिनमें फ्लू के लक्षण दिखाई दे रहे हों।

– फ्लू के मरीजों या संदिग्ध मरीजों के संपर्क में आने वाले लोगों को ही मास्क पहनने की सलाह दी जाती है।

– भीड़ भरी जगहों मसलन, सिनेमा हॉल या बाजार जाने से पहले सावधानी के लिए मास्क पहन सकते हैं।

– मरीजों की देखभाल करने वाले डॉक्टर, नर्स और हॉस्पिटल में काम करने वाला दूसरा स्टाफ।

– एयरकंडीशंड ट्रेनों या बसों में सफर करने वाले लोगों को ऐहतियातन मास्क पहन लेना चाहिए।

कितनी देर करता है काम

– स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए सामान्य मास्क कारगर नहीं होता, लेकिन थ्री लेयर सर्जिकल मास्क को चार घंटे तक और एन-95 मास्क को आठ घंटे तक लगाकर रख सकते हैं।

– ट्रिपल लेयर सजिर्कल मास्क लगाने से वायरस से 70 से 80 पर्सेंट तक बचाव रहता है और एन-95 से 95 पर्सेंट तक बचाव संभव है।

– वायरस से बचाव में मास्क तभी कारगर होगा जब उसे सही ढंग से पहना जाए। जब भी मास्क पहनें, तब ऐसे बांधें कि मुंह और नाक पूरी तरह से ढक जाएं क्योंकि वायरस साइड से भी अटैक कर सकते हैं।

– एक मास्क चार से छह घंटे से ज्यादा देर तक न इस्तेमाल करें, क्योंकि खुद की सांस से भी मास्क खराब हो जाता है।

कैसा पहनें

– सिर्फ ट्रिपल लेयर और एन 95 मास्क ही वायरस से बचाव में कारगर हैं।

– सिंगल लेयर मास्क की 20 परतें लगाकर भी बचाव नहीं हो सकता।

– मास्क न मिले तो मलमल के साफ कपड़े की चार तहें बनाकर उसे नाक और मुंह पर बांधें। सस्ता व सुलभ साधन है। इसे धोकर दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

ध्यान रखें कि

– जब तक आपके आस-पास कोई मरीज या संदिग्ध मरीज नहीं है, तब तक मास्क न लगाएं।

– अगर मास्क को सही तरीके से नष्ट न किया जाए या उसका इस्तेमाल एक से ज्यादा बार किया जाए तो स्वाइन फ्लू फैलने का खतरा और ज्यादा होता है।

– खांसी या जुकाम होने पर मास्क जरूर पहनें।

– मास्क को बहुत ज्यादा टाइट पहनने से यह थूक के कारण गीला हो सकता है।

– अगर यात्रा के दौरान लोग मास्क पहनना चाहें तो यह सुनिश्चित कर लें कि मास्क एकदम सूखा हो। अपने मास्क को बैग में रखें और अधिकतम चार बार यूज करने के बाद इसे बदल दें।

कीमत
– थ्री लेयर सजिर्कल मास्क : 10 से 12 रुपये

– एन-95 : 100 से 150 रुपये

swainflu

फ़रवरी 19, 2015

आचार्य नरेंद्र देव – समाजवादी आंदोलन के पुरोधा

narendradevआचार्य नरेंद्र देव का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था। उनका घर का नाम अविनाशीलाल था। परंतु उनके पिता के दोस्त पं. माधव प्रसाद मिश्र ने उनका नाम नरेन्द्र देव रख दिया। उनके पिता वकालत करते थे। बचपन से ही वे पिता के साथ कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। 1905 में वे पहली बार बनारस कांग्रेस अधिवेशन में गये थे। कांग्रेस ने जब गरम दल बना तब उसमें शामिल हो गये। कांग्रेस के अधिवेशन में 1908 के बाद जाना छोड़ दिया लेकिन उसके बाद 1916 में जब नरम दल व गरम दल फिर एक साथ आ गये तब उन्होंने फिर से कांग्रेस के कार्यक्रमों में आना-जाना शुरू किया। 1915 में एलएलबी पास करके केे फैजाबाद में वकालत शुरू की तथा होमरूल लीग में शामिल होकर फैजाबाद की शाखा के मंत्री चुने गये। जब बनारस में विद्यापीठ खुला तब डा. भगवानदास के प्रस्ताव पर वे उपाध्यक्ष बना दिये गये तथा 1926 में उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया।

आचार्यजी अति संकोची थे। वे पद लेना तथा चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे लेकिन जब उ. प्र. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने से उन्होंने इन्कार कर दिया तथा पं. जवाहर लाल नेहरू के कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल होने के प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था लेकिन बाद में अपने सहयोगियों के आग्रह पर उन्होंने दोनों पद स्वीकार किये। इसी तरह 1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाने का प्रस्ताव जे.पी. ने उनके समक्ष रखा तब उन्होंने सम्मेलन का सभापति बनने से इन्कार किया। बाद में वे कार्यकर्ताओं के आग्रह पर 1934 में सम्मेलन के सभापति बनाये गये। आचार्यजी के कहने पर ही पार्टी का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता रखा गया था। 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें विशेष ट्रेन से अहमदनगर ले जाया गया। 1945 में 14 जून को जवाहर लाल जी के साथ रिहा किये गये। आजादी मिलने के बाद जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होने की चर्चा शुरू हुई तब उन्होंने कहा कि कांग्रेस यदि कोई ऐसा नियम बनाती है जिसमें हम लोगों का कांग्रेस में रहना असंभव हो जाये तो सबसे पहले मैं कांग्रेस छोड़ दूंगा। कांग्रेस के निर्णय के बाद उन्होंने यही किया, कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।

आचार्य नरेंद्र देव मानव समाज के कल्याण और नैतिक जीवन के विकास के लिए अन्याय का विरोध आवश्यक समझते थे उनका विचार था कि शोषणविहीन समाज में सामाजिकता के आधार पर मनुष्य का नैतिक विकास हो सकता है लेकिन स्वार्थ प्रेरणा पर आश्रित वर्ग समाज में सामाजिक भावनाओं का विकास बहुत कुछ अवरूद्ध हो जाता है। ऐसे अन्यायपूर्ण समाज में अन्याय का निरंतर का विरोध नैतिक जीवन और मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी दृष्टि में वही नैतिक है, जो अन्याय के साथ समझौता करने को तैयार न हो, स्वयं अन्याय करने से बचता रहे तथा दूसरे के अन्याय को सहन करने को तैयार न हो। उन्हें इस बात का संतोष था कि वह जीवन भर अन्याय का विरोध करते रहे। उन्हें विदेशियों के द्वारा किया जा रहा अन्याय खटकता था परंतु स्वजनों द्वारा आर्थिक और सामाजिक अन्याय किये जाने की खिलाफत वे लगातार करते थे। इसलिए वे राजनैतिक स्वराज्य के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक स्वराज्य के लिए भी प्रयत्नशील रहे। राजनैतिक स्वतंत्रता मिल जाने के बाद देश में जनतांत्रिक समाजवादी समाज निर्मित करने का प्रयास करते रहे।

आचार्य नरेंद्र देव जी को देश और दुनिया माक्र्सवादी तथा बौद्ध दर्शन का प्रखर विद्वान जानती और मानती है। लेकिन आमतौर पर आचार्य जी का किसान आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान की जानकारी कम लोगों को है। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अवध के 4 प्रमुख जिलों रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर में किसान आंदोलन तेजी से चला। आचार्यजी ने इस आंदोलन का ख्ुालकर समर्थन किया तथा उनके प्रभावशाली भाषण के चलते किसान आंदोलन में डटे रहे। सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में गोली चालन कराया। दमन के बावजूद आंदोलन उग्र रूप धारण कर लगातार चलता रहा तब सरकार को किसानों की बेदखली रोकने वाली मांग स्वीकार करनी पड़ी। अवध आंदोलन भी आचार्यजी की भूमिका के चलते सफल रहा। आंदोलन के दौरान किसानों को यह प्रतिज्ञा करायी गयी कि वे गैरकानूनी टैक्स अदा नहीं करेंगे, बेगार-बिना मजदूरी नहीं करेंगे। पलई, भूसा तथा रसल बाजार भाव पर बेचेंगे तथा नजराना नहीं देंगे। बेदखल खेत को कोई दूसरा किसान नहीं खरीदेगा तथा बेदखली कानून मंजूर होने तक सतत संघर्ष चलाएंगे। 1936 में भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। आचार्यजी को 1939 में गया अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया जिसमें आचार्यजी ने किसान सभाओं और कांग्रेस संगठन के संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के विरोध में दोनों को एक साथ खड़े होकर किसान क्रांति को परिपक्व करने की जरूरत है ताकि किसान जमीन का मालिक बन जाये। राज्य और किसानों के बीच मध्यवर्ती शोषकों का शोषण अंत हो जाय। कर्जे के बोझ से किसानों को छुटकारा मिले तथा श्रम का पूरा लाभ उन्हें मिल सके। 1949 में सोशलिस्ट पार्टी ने पटना में अधिवेशन कर किसान पंचायत संघर्ष समिति बनाई। उ. प्र. का किसान पंचायत क्रांति सम्मेलन आचार्य जी की अध्यक्षता में कानपुर जिले के ग्राम सिठमरा में हुआ। डा. लोहिया की प्रेरणा से सोशल्स्टि पार्टी व किसान पंचायत का संयुक्त अधिवेशन 25 नवंबर 1949 को लखनऊ में हुआ जिसमें 50 हजार किसानों ने भाग लिया। आचार्य नरेंद्र देव ने खुलकर सरकार पर किसानों की उपेक्षा और अन्याय करने का आरोप लगाते हुए जमीदारी खत्म करने, जमीन का बंटवारा करने, सरकारी खेती, ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा, भूमि सेना का गठन, कृषि उत्पादों तथा कपड़ा और सीमेंट की कीमतों में संतुलन, खेतिहर मजदूरों के कर्जे माफ करने तथा जमीनों से बेदखली रोकने का मांग-पत्र सरकार के समक्ष रखा। फरवरी 1950 में डा. लोहिया की अध्यक्षता में रीवा में हिंद किसान पंचायत का पहला अधिवेशन हुआ, तब आचार्य जी ने किसानों का हौसला बढ़ाते हुए किसानों से संगठित होने का आह्वान किया। आचार्य जी ने जमीदारी उन्मूलन कमेटी को 1947 में लिखे स्मृति पत्र में कहा कि जिस तरह से जमीदारों ने किसानों को लूटा, खसोटा और चूसा है यदि उसका हिसाब लगाया जाय तो किसानों के ऋण से मुक्त होना जमीदारों के बूते की बात नहीं। ऐसी हालत में जमीदारों को मुजावजा देने का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। आचार्य जी ने देवरिया सत्याग्रह में किसानों की फसल खराब होने के बाद भागीदारी करते हुए किसानों और सरकारी कर्मचारियों के भेद को समाप्त करने की मांग की। 1950 में पंजाब में भी नरेंद्र देव जी ने हिसार जिले में भी बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया था। आचार्य जी का किसानों का संघर्ष का लंबा इतिहास है जो आज भी किसान आंदोलन को ताकत दे सकता है।

अपने बारे में आचार्यजी कहते थे कि मेरे जीवन के अब कुछ वर्ष ही शेष रह गये हैं। शरीर नामक संपत्ति भी अच्छी नहीं है किंतु मन में अभी उत्साह है। जीवन सदा अन्याय से लड़ते जिया है। यह काम कोई छोटा नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और भी आवश्यकता है। अपनी जिंदगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आंखें मुंदेंगी मुझे यह संतोष होगा कि मैंने विद्यापीठ में स्थाई काम किया। यही मेरी पूंजी है। इसके आधार पर मेरी राजनीति चलती है।
आचार्यजी को बीमारी ने आजादी आंदोलन के दौरान ही जकड़ लिया था। शुरू से ही वे दमा के रोग से पीडि़त थे। स्वयं गांधी जी ने वर्धा आश्रम बुलाकर आचार्यजी की प्राकृतिक चिकित्सा भी की थी। आचार्यजी ने 19 फरवरी 1956 को शरीर त्याग दिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आचार्यजी को अजातशत्रु कहा था। उन्होंने कहा था कि आचार्यजी और गांधी जी अतिरिक्त उन्हें अब तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो आदमियत, व्यक्तित्व, इंसानियत, बौद्धिक शक्ति, ज्ञान, वाक्पटुता, भाषण शक्ति, इतिहास और दर्शन की समझ आचार्य नरेंद्रदेव जैसी रखता हो। आचार्य नरेंद्रदेवजी समाजवादी समाज के साथ-साथ समाजवादी सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे। उनका स्पष्ट मत था कि समाजवादी समाज को बनाने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ-साथ जनता के मानस को बदलने की, जागृत करने की, स्वयं अपनी समस्याओं को सुलझाने योग्य बनाने तथा समाजवादी नैतिक मूल्यों के समुचित प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता है।

संपूर्णानंद ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि वे संस्कृत और पाली के उच्च कोटि के विद्वान थे जिन्होंने काशी विद्यापीठ को गरिमा प्रदान की थी। वे हंसमुख थे तथा खूब मजाक किया करते थे। उनका सेंस आॅफ ह्यूमर अद्वितीय था।
राहुल सांकृत्यायन ने आचार्यजी के बारे में कहा था कि उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ थी। बौद्ध दर्शन पर उनकी किताब ‘अभिकोश भाष्य’ को उन्होंने ऐतिहासिक ग्रन्थ बताया था। कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो का अनुवाद भी आचार्य जी और राहुल जी ने मिलकर शुरू किया था। जिसके कुछ अंश प्रेमचंद जी की प्रेस में छपे भी थे। लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सका।

डा. राममनोहर लोहिया ने आचार्य के बारे में कहा था कि वे बौद्ध दर्शन, बौद्ध साहित्य, बौद्ध इतिहास के साथ-साथ राजनीति की गहराई से जानकारी रखने वाले विद्वान थे। मंत्री पद न लेना, लखनऊ विश्वविद्यालय का वाईस चांसलर बनने से इंकार करना उनके लिए छोटी बात थी। आचार्यजी के भाषण शिक्षाप्रद और जोशीले होते थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ में हजारों विद्यार्थियों को समाजवादी विचार से शिक्षित किया।

चंद्रशेखर जी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि आचार्य जी ऋषिकुल परंपरा के ऐसे संत थे जिनका जीवन कठोर साधना में बीता। जिन्होंने सुख-दुख को समान समझा। उनकी पीड़ा आमजन के प्रति थी। अतीत में जो कुछ शुभ है उसको अक्षुण रखने का संकल्प था। लेकिन विकृतियों, अंधविश्वासों तथा रूढि़वादिता के खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे। उन्होंने बुद्ध की करूणा तथा माक्र्स के दर्शन को जीवन का संबल बनाया था।

आचार्यजी की पुण्य तिथि आज 19 फरवरी 2015 को देशभर में मनाई जा रही है। आचार्यजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके पथ पर समाजवादी समाज की रचना के लिए न केवल किसानों, मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित करें, बल्कि पठन-पाठन करते हुए नैतिकता आधारित जीवन जीते हुए स्वयं के आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयासरत रहें।

डाॅ सुनीलम
पूर्व विधायक, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम

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