‘मुक्तिबोध’ आस्था देते हैं मुक्ति नहीं …

मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है, वह बीते पचास सालों का वह कालखंड है जिसमें हिंदी पट्टी अपने बहुत सारे ठहरावों के बावजूद इतनी बदल गई है कि मेरी तरह के लेखक को मुक्तिबोध बहुत दूर खड़े दिखाई पड़ते हैं। एक प्रातःस्मरणीय पुरखे की तरह उनका सम्मान आसान काम है, एक परंपरा के रूप में उनकी पहचान करना, उनसे रिश्ता-राब्ता जोड़ना मुश्किल है।
लेकिन इतनी सारी मुश्किलें हैं तो हम मुक्तिबोध को छोड़ देने का सबसे आसान काम क्यों नहीं करते? ऐसा तो नहीं है कि हमारी पीढ़ी ने अपने जीवन की सारी चुनौतियों का सामना किया है? उल्टे यह दिखाई पड़ता है कि सवालों के बच निकलने की, बने-बनाए तैयार जवाबों में जा छुपने की, चालू जुमलेबाज़ी की गलियों से अपने लिए रास्ता बनाने की, एक पूरी शैली हमारे पास तैयार है और उस पर हम ख़ूब अमल करते हैं। बल्कि चाहें तो इस रास्ते से मुक्तिबोध का सामना करते हुए भी दिख सकते हैं। बड़ी आसानी से उन समीक्षात्मक निष्कर्षों का सहारा लेते हुए जो मुक्तिबोध के अध्ययन के दौरान विकसित हुए हैं, हम कई जाने-पहचाने सूत्र बता सकते हैं- कि मुक्तिबोध बहुत गहरे अंत:संषर्ष के कवि हैं, कि विवेक और वेदना उनके बीज शब्द हैं, कि उनमें हमारी सभ्यता के संकट झांकते हैं। सच तो यह है कि मुक्तिबोध पर बहुत कुछ इतना अच्छा भी लिखा गया है- उनके एक-एक शब्द और वाक्य को उद्धृत करते हुए उनकी ऐसी व्याख्याएं सुलभ हैं कि उन पर जैसे नए सिरे से लिखना कुछ पुराने प्रयत्नों को दुहराने के बराबर लग सकता है।

इन सबके बावजूद उन पर लिखने की इच्छा होती है तो इसलिए कि हम मुक्तिबोध को भले छोड़ना चाहें, मुक्तिबोध हमें नहीं छोड़ते। किसी घने जंगल सरीखा उनका बहुत उलझा-सुलझ- प्रीतिकर और भयंकर भी- उनका काव्य वितान हमें जैसे किसी जादू में बांध लेता है- अंधेरे में कोई ब्रह्मराक्षस जैसे हमारी आत्मा में उतर आता है, वह कभी लुभाता है, कभी डराता है, कभी हम उसका हाथ छुड़ाकर भागना चाहते हैं लेकिन अक्सर कुछ सहमे हुए उसके पीछे-पीछे चलते जाते हैं- इस उम्मीद में कि इसी यातना भरी यात्रा में वह मोती है जिसमें कविता के होने का मर्म है, मनुष्यता के होने की नियति है। जाहिर है, यह थोपी हुई नहीं, उनकी कविता के भीतर से निकलती उम्मीद है।

यह अनायास नहीं है कि इस अंधेरे में से गुजरते हुए एक पाठक के रूप में हम जो महसूस करते हैं, ‘भोगते’ हैं, जिस प्रक्रिया से गुज़रते हैं, एक लेखक के रूप में मुक्तिबोध कहीं ज़्यादा निर्ममता और तीव्रता के साथ वही सब झेलते, भोगते हैं और उसी प्रक्रिया से गुज़रते हैं। उनकी विडंबना इस मायने में कहीं ज्यादा गहरी और मारक है कि वे इस सबके रचयिता भी हैं- जिस कभी न पाई गई अभिव्यक्ति की चर्चा उनके काव्य के संदर्भ में बहुत रूढ़ ढंग से बार-बार होती है, वह मुक्तिबोध के सामने बार-बार रूप बदल कर आती है- कभी उनके समरूप की तरह, कभी उनके विलोम की तरह, कभी रक्तस्नाता, तो कभी ‘चेहरे पर सुबहें खिलती हैं उसके।‘
अचानक यहां मुक्तिबोध रचना की- यानी सृजन- की वह गिरह खोलते दिखाई पड़ते हैं जो होती हम सबके भीतर है, लेकिन उसे पाने की मुक्तिबोधीय तड़प हमारे भीतर नहीं होती। मुक्तिबोध के यहां सृजन किसी मौलिक कल्पना का सहज उन्मेष नहीं है, बल्कि वह एक दिए हुए पर्यावरण में, एक लगातार रूप बदलती प्रकृति के भीतर सुलभ अवयवों का अनुसंधान और उनका परिमार्जन है। कहना न होगा कि जिसे सृजन, निर्माण या उत्पादन कहते हैं- वह दरअसल, अर्थशास्त्र की ठोस भाषा में- इसी प्रक्रिया का नाम है- एक दी हुई वस्तु का रूप बदल कर उसे उपयोगी बनाना- लकड़ी से मेज़ बनाना, लुगदी से कागज़ बनाना और लोहे से सुई से लेकर तलवार तक बनाना।
लेकिन मुक्तिबोध बनाते क्या हैं? उनकी कविता में मिलने वाला बीहड़ यथार्थ कैसे आकार लेता है? क्या वे अनुभव नाम के लोहे में अपनी निजी वेदना और विवेक का रसायन घोल कर कविता नाम का हथियार तैयार करते हैं? क्या वे ऐसा कुछ तैयार करने की कोशिश करते भी दिखते है? जब हम यह समझने उनकी कविता के कारखाने तक पहुंचते हैं तो पाते हैं कि यह किसी जलती हुई धमन भट्टी जैसा है जिसमें पसीने से लथपथ- लेकिन श्रम की आभा से दमकते हुए मुक्तिबोध, जैसे अपनी हड्डियों का लोहा गला रहे हैं। यहां आकर हम पाते हैं कि कारीगर-कारखाना और कृति एक हो गए हैं, कवि अपनी कविता का कच्चा माल भी है, उस पर पड़ने वाला लोहा भी, उस पर गिरने वाली आग भी। अचानक हमारे सामने एक ऐसी कविता है जो इस धमन भट्टी में लगातार रूप बदल रही है, लेकिन अनवरत जारी है- ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही- क्योंकि वह जितनी कविता है, उससे कहीं ज़्यादा अपने चारों तरफ पसरे हुए जीवन और जंगल की मार्मिक पहचान भी है।
शायद ज़्यादातर बड़ी रचनाओं में यही होता है- कृति और कृतिकार एक हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर लेखक जो चक्रव्यूह बनाते हैं, उससे निकलने का रास्ता भी जानते हैं- या कम से कम इतना जानते हैं कि वह सुरक्षित बिंदु कौन सा है जहां से वापस हो लिया जाए या ख़ुद को बचाकर निकल लिया जाए। मुक्तिबोध बस यह काम नहीं करते। वे अपने रचे हुए चक्रव्यूह में जैसे घूमते, झुलसते रहते हैं- बल्कि उस चक्रव्यूह को और बड़ा करते जाते हैं ताकि बाहर की जो तपिश है, वेदना है, बाहर का जो युद्ध है, वह पूरी तरह कविता में चला आए। ऐसा नहीं कि मुक्तिबोध को निकलना नहीं आता था- न निकलने के जोखिम से भी मुक्तिबोध पूरी तरह परिचित थे- अपने पास बार-बार आती जो अभिव्यक्ति है, उसके सामने उनकी प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि वे भय में भी होते हैं, संशय में भी होते हैं, लेकिन अंततः सबसे ज़्यादा इस निश्चय में होते हैं कि इस तार-तार अभिव्यक्ति को ज्यों का त्यों पा लें, उसकी संपूर्णता में अर्जित कर लें।
‘अंधेर में’ की शुरुआत से ही इस कोशिश का बहुत बहुत मार्मिक और मानवीय संघर्ष दिखता है। अंधकार, वेदना, रहस्य, भय- सब जैसे उनकी कविता के शुरू में ही अपने चरम पर हैं। इन सबको वे बिल्कुल मूर्त और ठोस ढंग से पकड़ने और व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। इस कविता की जो दृश्यबहुलता है, उसे देखते हुए ही शायद प्रभाकर माचवे ने इसे कविता में गुएर्निका करार दिया था, लेकिन यह पेंटिंग नहीं, एक पूरी फिल्म है। मुक्तिबोध जैसे कविता के सेल्युलाइड पर एक ‘हॉरर फिल्म’ बना रहे है। कविता के फॉर्म को छोड़कर, उसे तोड़ कर वे जैसे अपने समय की- और आने वाले समयों की भी- एक विराट पटकथा लिख रहे हैं। इस पटकथा में जिंदगी के कमरों में अंधेरे कोई लगातार चक्कर लगा रहा है जिसकी आवाज़ भर सुनाई देती है, जिसका सिर्फ घूमना महसूस होता है। इस तिलिस्मी खोह में भीत से चूना गिरता है और एक चेहरा बन जाता है- नुकीली नाक और भव्य ललाट वाला (क्या यह ख़ुद मुक्तिबोध हैं- या उनकी आत्मछवि?), इसके बाद शहर की पहाड़ी के पार का तालाब चला आता है, वहां भी अंधेरा है, लेकिन वृक्षों पर बिजलियां नाच रही हैं और इन्हीं के बीच किसी एक तिलिस्मी खोह का शिला द्वार खुलता है और वह ‘रक्तालोक स्नात पुरुष’ प्रगट होता है जिसका तेजोप्रभावमय ललाट देख कवि के अंग-अंग में एक थर-थर जाग उठती है लेकिन अंततः वह पाता है कि ‘वह रहस्यमय व्यक्ति / अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है /…मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव?’
मुक्तिबोध का यह कौन सा खेल है? या यह कैसी यातना है जिसे वे शब्दों में ढाल रहे हैं? यह फिल्मकार के अपनी फिल्म में, कृतिकार के अपनी कृति में दाखिल होने की विवशता है- जो शायद ‘हृदय में रिस रहे ज्ञान’ के इस तनाव से निकली है कि इस पटकथा, कविता या फिल्म के बाहर खड़े रहना उस प्रक्रिया को कुछ अधूरा छोड़ देना है जो अपनी परिपूर्णता में घटित हो रही है- उन प्रश्नों को भी, जिनके बिना जीवन और अभिव्यक्ति के अर्थ में समझ में नहीं आते?
क्योंकि यहां अचानक दृश्य ख़त्म हो जाते हैं और प्रश्न शुरू हो जाते हैं-
‘वह फटे वस्त्र क्यों पहने है?
उसका स्वर्णमुख मैला क्यों?
वक्ष पर इतना बडा घाव कैसे हो गया?
उसने कारावास दुख क्यों झेला?
उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है?
रोटी उसे कौन पहुंचाता है?
कौन पानी देता है?
फिर भी उसके मुख पर स्मित क्यों है?
प्रचंड शक्तिमान क्यों दिखाई देता है?’

मुक्तिबोध इन्हें गंभीर और ख़तरनाक प्रश्न बताते हैं, लेकिन इनके जवाब मिलें- इसके पहले अचानक कुछ और हो जाता है। कवि के मुताबिक ‘बाहर के गुंजान / जंगलों से आती हुई हवा ने / फूंक मार कर एकाएक मशाल ही बुझा दी…/ कि मुझको यो अंधेरे में पकड़ कर / मौत की सज़ा दी।‘

यह कौन सी मशाल है? किसे मौत की सज़ा दी गई है? यह कोई पीछे छूटा डर है जो कवि के भीतर इस तरह उभरता है या आने वाला अंदेशा जो सवालों के तत्काल बाद उसके हिस्से की रोशनी बुझा देता है?
मुक्तिबोध के संदर्भ में इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। मेरी तरह के पाठक को जो अर्थ सबसे ज़्यादा आकृष्ट करता है, वह यही कि मुक्तिबोध का दृष्टिबोध इतना प्रखर है कि वे न सिर्फ बहुत सारी उलझी हुई सच्चाइयों को पहचान लेते हैं, बल्कि यह भी देख लेते हैं कि इस पहचानने को लिख देना बहुत जोखिम भरा है- इतना कि उसके लिए किसी को अंधेरे में पकड़ कर मौत की सज़ा दी जा सकती है।
इस पूरी कविता में यथार्थ, स्वप्न और फंतासी का यह उलझाव भरा जाल और भी बीहड़ रास्तों पर फैला दिखाई देता है- ‘समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या / जागृति शुरू है।‘ हिंदी कविता में अब बहुचर्चित हो चुका आधी रात का वह जुलूस, जिसमें जाने-पहचाने पत्रकार, सैनिक, कर्नल ब्रिगेडियर, जनरल, जगमगाते कवि, उद्योगपति, विचारक, मंत्री और कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद तक शामिल हैं- मुक्तिबोध के इसी दृष्टिबोध का अनुपम साक्ष्य है जिसे उन्होंने साठ के उन शुरुआती दशकों में ही पहचान लिया था और तब भी वे जिसे पहचानने की सज़ा जानते थे- ‘हाय-हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा / इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।‘

ऐसा लगता है, जैसे मुक्तिबोध भविष्य को देख रहे हैं। आधी रात का वह जुलूस हमारे समय में अब चौबीस घंटे चलता रहता है और वाकई उसमें वे सब लगातार मौजूद रहते हैं जिनका ज़िक्र मुक्तिबोध किसी अंधेरे में पचास साल पहले कर गए थे। यह हमारे समय का वह वृत्तांत है जिसे मुक्तिबोध जैसे पूरे ब्योरों के साथ दर्ज कर गए हैं। सच देखने की, सच बोलने की, सच के लिए खड़ा होना चाहने की सज़ाएं क्या हैं- इसका भी बयान है। जैसे मुक्तिबोध ने बिल्कुल अनुभव किया हो कि सत्ता जब थर्ड डिग्री की यातनाएं देती है तो वे कितनी अमानवीय होती हैं।

लेकिन स्वप्न, फंतासी और यथार्थ का यह खेल चलता रहता और मुक्तिबोध अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में खोए अंतर्द्वंद्वों वाले कवि होते तो शायद ‘अंधेरे में’ इतनी बड़ी कविता नहीं होती। कविता बड़ी बारीकी से बदलती है। फिल्म बदलती है, (बकौल मुक्तिबोध, सीन बदलता है) और ‘अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा / मुझे डर लगता है ऊंचाइयों से; / बजने दो सांकल!! / उठने दो अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले / वह जन…वैसे ही / आप चला जाएगा आया था जैसे। / खड्डे के अंधेरे में / मैं पड़ा रहूंगा पीड़ाएं समेटे/’ जैसी अकेलेपन और वेधक बेचारगी से गुज़रने वाली कविता आख़िरकार यह महसूस करती है, ‘अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे / उठाने ही होंगे। / तोड़ने होंगे ही मठ और गढ सब / पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार।‘

हालांकि यह यात्रा इतनी सरल नहीं है। कवि भीषण भय और उत्कट उम्मीद के बीच लगातार जैसे एक तनी हुई नहीं, बल्कि वक़्त के थपेड़ों से बार-बार हिलती हुई रस्सी पर चलने की कोशिश में है। इस कोशिश में वह कभी अपने सिद्धांतवादी और आदर्शवादी मन से पूछता है कि ‘अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!!….दुखों के दागों को तमगे सा पहना, अपने ही खयालों में दिन रात रहना असंग बुद्धि व अकेले में सहना, ज़िंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर, अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!!’ ‘अंधेरे में’ के वक्र-जटिल शिल्प के बीच अचानक आया यह गीतात्मक अंतराल लेकिन देर तक नहीं टिकता, वह फौरन फिर से संशय, एक अंदेशे में ढलता है- ‘गलियों में अंधकार भयावह…./ मानो मेरे ही कारण लग गया / मार्शल लॉ वह, मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया…/ निष्क्रिय संज्ञा किसी मार्शल लॉ की ज़िम्मेदार हो सकती है, यह वही कवि समझ और महसूस कर सकता है जिसे सत्ता-व्यवस्था और जनता के बीच के जटिल रिश्ते की सही और खरी पहचान हो।
‘जीवन क्या जिया’ की तरह की एक और टेक अंधेरे में आती है- ‘भागता मैं दम छोड़ / घूम गया कई मोड़’। जाहिर है, यह देखना-भागना-घूमना वह स्वानुभूत प्रक्रिया है जिसने कवि को उसका यथार्थ दिया है। उसके हिस्से यंत्रणाओं की स्मृतियों और दमन के अंदेशे हैं, वह बार-बार अपनी अभिव्यक्ति तक पहुंचता है. उसे पहचानता है, लेकिन उसे हासिल करने से डरता है- लेकिन अंततः वह सारे डरों के पार जाता है। खास बात ये है कि अब उसकी अभिव्यक्ति किसी तिलिस्मी खोह से, किसी रहस्यमय गुफ़ा से नहीं आती, वह लोगों के बीच से निकलती है, वहीं घूमती है, उन्हीं के बीच कातर पड़ती है, रक्ताक्त होती है, जर्जर होती है लेकिन अंततः वहीं पूर्णता हासिल करती है। ‘परम अभिव्यक्ति / अविरत घूमती है जग में / पता नहीं, जाने कहां, जाने कहां / वह है। / इसलिए मैं हर गली में / और हर सड़क पर / झांक-झांक कर देखता हूं हर एक चेहरा / प्रत्येक गतिविधि, / प्रत्येक चरित्र / व हर एक आत्मा का इतिहास, / हर एक देश, व राजनीतिक स्थिति और परिवेश / प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श, / विवेक प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !! / खोजता हूं पहाड़.. पठार… समुंदर, / जहां मिल सके मुझे / मेरी वह खोई हुई / परम अभिव्यक्ति अनिवार / आत्मसंभवा।‘

यह अंधेरे का अंत है। लेकिन इतना आसान नहीं है। इस अभिव्यक्ति को पहचानना पड़ता है। उसे खोजना पड़ता है, बार-बार साधना पड़ता है। वह मिल जाती है, वह ख़तरे में पड़ती है, जब मिल जाती है तो फिर सांवली हवाओं में काल टहलता है। वह ‘स्वानुभूत आदर्श’ है, यानी किताबी नहीं। महत्त्वपूर्ण बस इतना है कि वह अनिवार्य और आत्मसंभवा है।

हालांकि मुक्तिबोध के ऐसे सरल भाष्य उस विराट अंधेरे की विडंबनामूलक विभीषिका को ख़त्म कर देते हैं जो इस कविता में पर्यावरण की तरह छाया हुआ है। मुक्तिबोध आस्था तो देते हैं, लेकिन मुक्ति नहीं देते। उनकी कविता शब्द-शब्द पढ़ने के लिए नहीं है। वह उस मनोवेग को पहचानने के लिए है जो सत्ता में निहित अन्याय और हिंसा के अंदेशे के बीच संवेदनात्मक तीव्रता से भरे किसी कवि के भीतर पैदा हो सकता है। ‘अंधेरे में’ की महानता इस तथ्य में भी निहित है कि व्यक्ति से समाज तक, निजी से सामूहिक तक, अंतर्भूत वेदना से बहिर्जगत के विवेक तक आवाजाही करते हुए भी उसकी ऊर्जस्वित तीव्रता कभी कम नहीं होती। दूसरी बात यह कि यह पूरी कविता जैसे लगातार बन रही है। जो ‘हॉरर फिल्म’ मुक्तिबोध बना रहे हैं, उसमें बनती-मिटती आकृतियों और आवाज़ों का एक पूरा जंगल है जो ‘अंधेरे में’ को एक अलग आयाम देता है।

दरअसल यहां यह भी खयाल आता है कि ‘अंधेरे में’ को मुक्तिबोध की पूरी काव्य यात्रा में अलग से नहीं पढ़ा जा सकता। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के हवाले से लिखा है कि मुक्तिबोध जीवन भर एक ही कविता ‘अंधेरे में’ लिखते रहे। यह पूरा सच भले न हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस कविता को पढते हुए मुक्तिबोध की कई और कविताओं की बेसाख्ता याद आती है। ‘ चांद का मुंह टेढ़ा है’, ‘भूल गलती’, या ऐसी अन्य कई कविताओं का अंतिम पाठ बनाती यह कविता फिर भी जैसे अंतिम पाठ नहीं लगती। इस लिहाज से लगता है कि ‘असाध्य वीणा’ भले अज्ञेय ने लिखी हो, लेकिन उसे साध मुक्तिबोध रहे थे- बेशक, किसी राजा के आग्रह पर पधारे प्रियंवद गुफागेह केशकंबली की तरह नहीं, बल्कि अपनी गुफा के अंधेरे में बैठे एक तपस्वी की तरह। और जो वह साध गए, वह एक बीहड़ राग है जो हमारी आत्माओं के अंधेरे में अब भी उतरता है और बीच-बीच में ऐसी चमक पैदा करता है जिसकी रोशनी में हम अपनी ही खोई हुई अभिव्यक्ति का सुराग पाते हैं।

इस बात का बहुत बार ज़िक्र किया गया है कि ‘अंधेरे में” में टॉल्स्टाय भी आते हैं और गांधी भी। वे अनायास चले आते हैं या इसलिए भी कि कहीं मुक्तिबोध के अवचेतन में अपनी अभिव्यक्ति, अपने विचार के लिए ये दो मॉडल रहे होंगे? कम से कम मेरे लिए यह बताना मुश्किल है। लेकिन दरअसल मुक्तिबोध अपने काल से बंधे हुए कवि नहीं हैं। वे आसान राजनीतिक-सामाजिक या मानवीय व्याख्याओं के लिए भी नहीं हैं। उनका जटिल काव्य-वितान उन्हें आम लोकप्रिय कवि भी नहीं रहने देता। हालांकि इसके बावजूद यह बात बार-बार कही गई है और शायद बहुत दूर तक सच भी है कि अपने निधन के इन पचास वर्षों में मुक्तिबोध कभी काव्य-परिदृश्य से धूमिल नहीं हुए, बल्कि उनकी कीर्ति कुछ बढ़ी ही है। फिर भी मुक्तिबोध को लोकप्रियता की तलाश न थी, न तब मिली होगी और न आगे मिलेगी। लेकिन लोकप्रियता और प्रासंगिकता दो अलग-अलग चीज़ें हैं। लोकप्रिय होने की परवाह न करने की वजह से ही मुक्तिबोध हमारे इस समय में भी- जब पूरी हिंदी पट्टी की चूलें हिली हुई हैं. मध्यवर्ग उपभोक्ता वर्ग में बदल चुका है, पठन-पाठन का अभ्यास छूट रहा है, सरलीकरणों और सतहीपन का बोलबाला है- इस तरह प्रासंगिक और ज़रूरी लगते हैं कि हम उनसे आंख मिलाने से भी बचते हैं, और फिर उन्हें देखने-पढ़ने भी लगते हैं।

दरअसल मुक्तिबोध जितने रहस्यमय और जादुई दिखते हैं, उतने ही ठोस यथार्थवादी हैं- उनकी कविताओं के गझिन शिल्प के झाड़-झंखाड़ और फूल-पत्ते हटाकर देखें तो जैसे अस्तित्व की असह्य वेदना के बीच मुक्ति के स्वप्न में विचरती और बिल्कुल सूक्तियों में ढलती पंक्तियां मिलती हैं। उनका फलक बहुत विस्तृत है। कभी-कभी वे प्रसाद और निराला की तरह उदात्त हो उठते हैं, अक्सर काफ़्का की तरह संशयशील, कभी शमशेर जैसे सुंदर और अक्सर अपने बीहड़ वितान में ऐसे महाकाव्यात्मक, जिनको ठीक से पढ़ने-समझने के लिए बार-बार उनकी कविता में दाखिल होना पड़ता है। कमाल यह है कि उनका यथार्थ-बोध कई स्तरों पर इतना स्पष्ट और खरा है कि वह हमें अपनी समकालीनता को समझने के सबसे सूक्ष्म उपकरण सुलभ कराता है और कई स्तरों पर इतना मानवीय कि वह हमें एक सुकोमल-सार्वकालिक अनुभव-बोध के बीच छोड़ जाता है।

(प्रियदर्शन, NDTV)

साभार : बहुवचन

Advertisements
टैग: ,

One Comment to “‘मुक्तिबोध’ आस्था देते हैं मुक्ति नहीं …”

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: