Archive for दिसम्बर 18th, 2014

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

दिसम्बर 18, 2014

कट्टरता

कट्टरता कभी दुखी नहीं होती,
कभी खुद पर आन भी पड़े परेशानी की छाया,
तो यह हिंसक हो उठती है
दूसरों के खिलाफ|
दूसरों के दुख,
पर यह अट्टहास लगाया करती है!
इसके डी.एन.ए की संरचना में
विद्रूपता, हिंसा और विध्वंस
गुत्थम-गुत्था रहते हैं|
कट्टरता कभी दुखी नहीं होती!
दीगर बात यह कि
यह करमजली, दिलजली कभी सुखी भी नहीं होती|
जलना और दुनिया को जलाना
यही दो काम इसे आते हैं|
कट्टरता कभी दुखी नहीं होती!

…[राकेश]

दिसम्बर 18, 2014

बच्चे स्कूल जा रहे हैं…

हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से
आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करके सूरज
सुनहरी मलमल की पगडी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ
मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही हैं
घनेरा पीपल गली के कोने से
हाथ अपने हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
फ़रिश्ते निकले हैं रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर एक ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
(निदा फाजली)

दिसम्बर 18, 2014

जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !
सुना है शेर का जब पेट भर जाये
तो वो हमला नही करता ,
दरख्तों की घनी छाओँ जा कर लेट जाता है !
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
सुना है जब किसी नदी के पानी में
हवा के तेज़ झोंके जब दरख्तों को हिलाते हैं
तो मैना अपने घर को भूल कर
कौवे के अंडो को परों से थाम लेती है |
सुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो ,
सारा जंगल जाग जाता है |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
सुना है जब किसी नद्दी के पानी में
बये के घोंसले का गुन्दुमी साया लरज़ता है |
तो नदी की रुपहली मछलियाँ उसको
पडोसी मान लेती हैं |
नदी में बाढ़ आ जाये ,
कोई पुल टूट जाये तो ,
किसी लकड़ी के तख्ते पर
गिलहरी, सांप ,बकरी और चीता
साथ होते हैं |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
ख़ुदा-वंदा , जलील-ओ -मोतबर , दाना-ओ-बीना
मुंसिफ-ओ-अकबर
मेरे इस शहर में
अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िस कर
कोई दस्तूर नाफ़िस कर |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!

(ज़ेहरा निगाह)

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