Archive for नवम्बर 21st, 2014

नवम्बर 21, 2014

विलक्षण बाल-गायिका और ‘कुमार विश्वास’

१९ नवंबर को किसी ने कविता के मंच के प्रसिद्द हस्ताक्षर और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास को नीचे दिये वीडियो का लिंक भेजा |

 

बालिका की विलक्षण गायन प्रतिभा से कोई संगीत प्रेमी प्रभावित न हो ऐसा संभव ही नहीं है| हर संगीत प्रेमी को लगेगा कि यह बालिका सही प्रशिक्षण पाकर संगीत की ऊँचाइयों को प्राप्त करेगी पर ऐसा होना सबके साथ संभव नहीं होता| कुमार विश्वास भी बालिका के गायन से प्रभावित हुए पर जब पता चला कि इस बालिका का परिवार संभवतः आर्थिक रूप से समर्थ नहीं है तो बहुतों की तरह उन्हें भी भय लगा कि इस अनूठी बाल-गायिका का संगीत कहीं गरीबी के कारण दम न तोड़ दे| तब उन्होंने नीचे दिया सन्देश लिखा|

“कुछ ऐसे फूल हैं जिन्हे मिला नहीं माहौल ,
महक रहे हैं मगर जंगलों में रहते हैं…..!”
किसी ने ये विडिओ भेजा है ! उनके अनुसार विडिओ में दिख रही बच्ची घरेलु सहायक का काम करती है ! दस बार सुन चुका हूँ और आखँ की कोर हर बार भीग रही है ! आप में से कोई अगर इस बेटी का अता-पता निकाल सके तो बड़ी कृपा होगी ! माँ सरस्वती साक्षात इस शिशु-कंठ पर विराजमान है ! जीती रहो स्वर-कोकिला ! बस ये मिल जाये तो इसे सर्वोत्तम शिक्षा और साधना का ज़िम्मा मेरा ! ढूँढो दोस्तों अगली सम्भावना को !

 

सन्देश ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सअप के माध्यमों से लाखों लोगों तक पहुंचा| और बालिका की खोज सम्पन्न हुयी| कुमार विश्वास अपने वादे के मुताबिक़ बालिका के अच्छे भविष्य के लिए प्रयासरत हैं|

 

आद्य शकराचार्य की आविर्भाव भूमि केरल के एक तटीय गावँ में नन्ही जयलक्ष्मी मिल गयी है ! शाम तक उसके माता-पिता से बात भी हो जाएगी ! सब कुछ ठीक रहा तो कुछ ही दिन में, माँ शारदा की यह नन्ही-बेटी विधिवत संगीत-शिक्षा ग्रहण कर रही होगी ! कोशिश करूँगा कि किसी चैनल में उस पर एक शो भी बनवाऊँ ! आभार कोमल,राजश्री और मनोज का इस खोज को अंजाम तक पहुँचाने के लिए
“हर फूल को हक़ है कि चमन में हो क़ामयाब ,
माली को भी ये फ़र्ज़ मगर याद तो रहे.…।”

 

 

 

नवम्बर 21, 2014

भारतीय प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्राओं का सूत्र : शरद जोशी

देश के लिए यह सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की, मगर यह सच है कि भारत के प्रधानमंत्री के पद का दर्जा कुछ महीनों से बहुत तेजी से उठ गया है। जो साधारण सड़कछाप वोटर इस गलतफहमी में थे कि वे अपने लिए एक एमपी या देश का प्रधानमंत्री चुन रहे हैं, उन्हें यह पता लगना चाहिए कि दरअसल उन्होंने एक विश्वनेता चुना था, जो इस समय संसार की समस्याएं सुलझाने में लगा है।

संसार में समस्याएं बहुत अधिक हैं, मगर खेद है कि यह देश अपनी संवैधानिक मजबूरियों के कारण केवल एक प्रधानमंत्री संसार को सप्लाई कर सकता है। काश, हमारे पास चार-पांच प्रधानमंत्री होते, तो हम उन्हें पूरी दुनिया में फैला देते। और तब शायद यह भी संभव होता कि उनमें से एक प्रधानमंत्री हम अपने देश के लिए भी रख लेते, जो असम समस्या, अकाली समस्या, सूखा समस्या, भूखा समस्या टाइप की जो छोटी-मोटी समस्याएं हैं, उनसे माथापच्ची कर लेता। हमारे पास सिर्फ एक प्रधानमंत्री है। इतने सारे देश हैं। उससे जितना बनता है, वही तो करेगा। मुहावरे में कहा जाए, तो अकेली जान क्या-क्या करे! ….

संसार के देश तो चाहते हैं कि हमारे भारत का प्रधानमंत्री पूरे वक्त उनके मुल्कों में ही घूमता रहे और विश्वशांति, परस्पर सहयोग, छोटे देशों की कड़की दूर करने में बड़े देशों का योग आदि नियमित विषयों पर पूरे उत्साह से भाषण देता रहे। अच्छे भाषण सुनना कौन नहीं चाहता! अच्छी अंगरेजी सुनना कौन नहीं चाहता! पर हमारी मजबूरी है कि हमारी प्रधानमंत्री पूरे साल बाहर नहीं रह सकतीं। उन्हें कुछ दिनों देश में भी रहना पड़ता है। लोकसभा का सेशन होता है, कश्मीर में चुनाव आ जाता है। या दीगर ऐसी कुछ बातें हैं, जब भारत के प्रधानमंत्री को भारत में रहना जरूरी है, मजबूरी है। कई बार जवाबी कार्रवाई करने किसी दूसरे देश का प्रधानमंत्री भारत में टपक पड़ता है। तू हमारे देश में भाषण देगा, तो हम तेरे देश में भाषण देंगे बदले की भावना के साथ। उस समय उसका स्वागत तथा दीगर औपचारिकताएं बरतने भारत के प्रधानमंत्री को भारत लौटना पड़ता है। …

भारत का प्रधानमंत्री ऐसी ऊंची चीज है कि वह अब दुनिया का नेता है। वह भारत के काम का नहीं रहा। एक तो ऐसी टुच्ची देसी समस्याओं में उसका माइंड खराब करवाना भी ठीक नहीं है। अगर चाहते ही हो कि भारत का प्रधानमंत्री भारत की समस्या पर ध्यान दे, तो समस्या का लेवल उठाओ। उसे इतनी बड़ी बनाओ कि वह भारत के प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के काबिल लगे। आप चाहते हो कि बंबई की कपड़ा मिलें बंद पड़ी हैं, तो भारत का प्रधानमंत्री उस छोटी-सी बात में लगा रहे। फिर तीसरी शक्ति के देशों की ओर पहली और दूसरी शक्ति का ध्यान कौन चौथी शक्ति खींचेगी, अगर प्रधानमंत्री की एनर्जी बंबई के मजदूरों पर सोचने में चली गई। समस्या का स्तर उठाओ। जब तक वह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का दर्जा नहीं प्राप्त कर लेती, तब तक कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का नेता उर्फ भारत की प्रधानमंत्री उस पर कैसे ध्यान देंगी?

दूसरा तरीका यह है कि आपस में निपट लो। शांति और सद्भाव से निपटो, तो अच्छी बात है। नहीं, तो कोई जरूरी नहीं, क्योंकि ये चीजें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में जरूरी होती हैं। जैसे चाहो निपट लो। जब हमारा प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मामले निपटाने में लगा है, तो हम आपसी मामले तो निपटा ही सकते हैं। एक व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उसके देश के निवासी इतना सहयोग तो कर ही सकते हैं। उसे तंग मत करो। खुद कर लो, क्या करना चाहते हो।

… वह (विदेश) जाता है। बार-बार एक ही बात को कहने जाता है। और न जाए तो बेचारा क्या करे! इस घटिया देश की दो कौड़ी की समस्याओं में सिर चटवाने से तो किसी अंतरराष्ट्रीय जमघट में बड़ी समस्या पर भाषण देना अच्छा है। भारत का प्रधानमंत्री यही करता है। देश की हालत कुछ भी हो, पर यही हमारी महानता है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है।

{शरद जोशी}

[(साप्ताहिक ‘रविवार’: 24-30 जुलाई, 1983 में “सारे जहां का दर्द ” शीर्षक से प्रकाशित)]

%d bloggers like this: