आतंक : आपातकाल पर “अज्ञेय” की कविता (३)

ऊपर agyeya
साँय-साँय
बाहर कुछ
सरक रहा
दबे पाँवः
अंधकार में
आँखों के अँगारे
वह हिले —
वहाँ — क्या उतरा वह?
रोंए सिहर रहे,
ठिठुरा तनः
भीतर कहीं
धुकधुकी —
वह — वह — क्या पसरा वह?
बढ़ता धीरे-धीरे
पथराया मन
साँस रुकी —
हौसला
दरक रहाः
वे आते होंगे —
ले जाएँगे…
कुछ — क्या —
कोई —
किसे —
कौन? …

(अज्ञेय)

छवि एवं कविता : साभार श्री ओम थानवी – संपादक “जनसत्ता”

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