संभावनाएं : आपातकाल के दौरान “अज्ञेय”

अब आप ही सोचिएagyeya
कितनी संभावनाएं हैं।
– कि मैं आप पर हंसूं
और आप मुझे पागल करार दे दें;
– या कि आप मुझ पर हंसें
और आप ही मुझे पागल करार दे दें;
– या आप को कोई बताये कि मुझे पागल करार दिया गया
और आप केवल हंस दें…
– या कि
हंसी की बात जाने दीजिए
मैं गाली दूं और आप –
लेकिन बात दोहराने से लाभ?
आप समझ तो गये न कि मैं कहना क्या चाहता हूं?
क्यों कि पागल
न तो आप हैं
न मैं;
बात केवल करार दिये जाने की है –
या, हां, कभी गिरफ्तार किये जाने की है।
तो क्या किया जाए?
हां, हंसा तो जाए –
हंसना कब-कब नसीब होता है?
पर कौन पहले हंसे?
किबला, आप!
किबला, आप!
(अज्ञेय)

[ हिंदी के महान कवि अज्ञेय इमरजेंसी के मुखर विरोधी और जयप्रकाश नारायण के सहयोगी थे; जेपी के साप्ताहिक एवरीमेंस वीकली का उन्होंने संपादन किया। अज्ञेय ने इमरजेंसी के खिलाफ कविताएं भी लिखीं। यह मार्च 1976 में लिखी गई थी]

कविता और अज्ञेय की छवि – साभार : श्री ओम थानवी, संपादक “जनसत्ता

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