पथहारा वक्तव्य… अशोक वाजपेयी

हमें पता थाashok vajpai-001

कि खाली हाथ और टूटे हथियार लिए

शिविर में लौटना होगा:

यह भी कि हम जैसे लोग

कभी जीत नहीं पाए-

वे या तो हारते हैं

या खेत रहते हैं-

हम सिर्फ बचे हुए हैं

इस शर्म से कि हमने चुप्पी नहीं साधी,

कि हमने मोर्चा सम्हालने से पहले या हारने के बाद

न तो समर्पण किया, न समझौता:

हम लड़े, हारे और बचे भर हैं!

यह कोई वीरगाथा नहीं है:

इतिहास विजय की कथाएं कहता है,

उसमें प्रतिरोध और पराजय के लिए जगह नहीं होती।

लोग हमारी मूढ़ता पर हंसते हैं-

हमेशा की तरह

वे विजेताओं के जुलूस में

उत्साह से शामिल हैं-

हम भी इस भ्रम से मुक्त होने की कोशिश में हैं

कि हमने अलग से कोई साहस दिखाया:

हम तो कविता और अंत:करण के पाले में रहे

जो आदिकाल से युद्धरत हैं, रहेंगे!

हम पथहारे हैं

पर पथ हमसे कहीं आगे जाता है।

 

[अशोक वाजपेयी)

 

साभार : जनसत्ता

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