भारतीय राजनीति में “आम आदमी पार्टी” की भूमिका: एडमिरल रामदास एवं ललिता रामदास

aap new logoमीडिया में आवाजों और क्रोध भरी चिल्लाहटें हिंसक होती जाती हैं और कष्टदायक लगने लगती हैं…बल्कि एक हद के बाद असहनीय होने लगती हैं…

हमारे करीबी और दूर रहने वाले लोग फोन करते हैं, चिट्ठियाँ भेजते हैं, ई-मेल करते हैं और पूछते हैं,”आप बता सकते हैं कि आम आदमी पार्टी” में क्या हो रहा है, हमें पता नहीं चल रहा कि क्या सोचें और क्या निर्णय लें, पार्टी में रहें या इसे छोड़ दें?”
मैं और रामू बर्मादे की खामोशी में बैठ कर सुनहरे-नारंगी रंग में रंगे पूरे चाँद को नारियल के पेड़ों के बीच से अपनी पूरी आभामय खूबसूरती के साथ उदय होते हुए देखते हैं और उसकी छटा हमें हर बार आश्चर्यचकित कर जाती है| अपने पूरे शबाब के साथ चन्दा हमारी इस आश्रय स्थली को चमका देता है जो हमने बीस साल के अथक प्रयासों से बनाई है और जिसे तहस नहस करने, लूटने और छीनने के लिए लालची शिकारी, और लुटेरे  प्रयासरत रहे हैं| हमने वे लड़ाइयां लड़ी और जीती हैं जिनके बारे में हमने कभी नहीं सोचा था| स्वयंभू कथित देशभक्तों ने हम पर देश द्रोही और गद्दार होने के आरोप लगाए हैं क्योंकि हमने परमाणु हथियार और परमाणु ऊर्जा के खिलाफ बोला, पाकिस्तान के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाने पर जोर दिया और पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध कायम करने के सिद्धांतों पर गंभीर होकर काम करने के लिए कहा| और अपने साहसिक अभियान के अंतिम चरण में हमें स्पष्ट आभास हुआ कि अगर हम जैसे लोग घर से बाहर नहीं निकलते और देश के आमजन- स्त्री और पुरुष,  के लिए आशा की किरण बन कर उभरी नई शक्ति को अपना सक्रिय समर्थन नहीं देते तो यह अपने पूर्वजों और आजाद मुल्क के माताओं और पिताओं के सपनों के साठ विश्वासघात के बराबर होगा और हमने निर्णय लिया नई आशा के साथ जाने का| हमें साथ जाना पड़ा, जमीर की आवाज पर|

हमारे दिमाग में कहीं कोई भ्रम नहीं है कि हम क्यों “आप” के साथ हैं| इसके साथ साथ थोड़ी चिंता भी है कि लोगों में “आप” को लेकर प्रश्न, भ्रम और संदेह भी उठ रहे हैं ऐसा इसलिए भी है क्योंकि  “आप” पुरानी अवधारणाओं को, कि राजनीति कैसी होनी चाहिए और आन्दोलन कैसे होने चाहियें, खारिज करती है और अपनी ही एक नयी परिपाटी बिछाती चलती है|  उत्तेजना और व्यथा से घिरे माहौल के मध्य आप सबसे वे बातें साझा करनी हैं जो एक ऐसे छोटे पर जुनूनी समूह ने लिखी हैं, जिसने अपने संदेह, अविश्वास और अलग अलग विचारधाराओं को सम्मिलित करके उन सब प्रश्नों से मुखातिब होने का प्रयास किया है जो कि बहुत सारे लोगों को मथ रहे हैं| यदि आपको इन विचारों के साथ कोई सामंजस्य दिखाई दे तो इन् बातों अको और बहुत से लोगों के साथ साझा करें…

रामू एवं ललिता दास – उन सब लोगों को धन्यवाद के साथ जिन्होने यह प्रयास किये हैं और जो गुमनाम ही रहना चाहते हैं …


“आप” की भूमिका भारतीय लोकतंत्र में :

सदस्यों और समर्थकों से एक अपील
1. “आप” की चुनावी सफलता की सार्थकता
“आप” द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनावों में पाई गई सफलता से भारत की राष्ट्रीय पार्टियों के विरुद्ध जनता में उपजे माहौल की सनद मिलती है और यह माहौल राजनीतिक परिवर्तन के पक्ष में दिखाई देता है| अछूता रहने वाले मध्य-वर्ग ने, शहरी गरीबों ने और कामकाजी लोगों ने इस परिवर्तन के लिए अपना मत और समर्थन दिया| य निश्चित ही यह संकेत देता है कि अगर लोगों के सामने एक गंभीर और सार्थक विकल्प उपस्थित हो तो वे उसे वोट देंगें| एक साफ़-सुथरी सरकार देने के वादे पर टिके “आप” के चुनाव प्रचार ने हर वर्ग के भारतीयों को छुआ है| “आप” का उदय राष्ट्रीय महत्त्व की घटना है और “आप” क्षेत्रवाद, जाति और सम्प्रदाय से घिरे मुद्दों से परे ले जाती है भारतीय राजनीति को|
क्या “आप” विचारधारा से रहित पार्टी है? विचारधारा की अनुपस्थिति यह नहीं दर्शाती कि विचारों और आदर्श की भी अनुपस्थिति है| “आप” ने वास्तव में निम्नलिखित मुद्दों पर अपनी राजनीतिक दृष्टि जाहिर और निश्चित की है:
अपनी सरकार के प्रति नागरिकों की जिम्मेदारी
भारतीय संविधान को लागू करने के प्रति नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी
जन-संस्थाओं को जनहित के प्रति वास्तविक रूप में जवाबदेह बनाए जाने की आवश्यकता
अहिंसक और लोकतान्त्रिक तरीकों से संवाद और भागीदारी बनाकर संस्थानिक बदलाव लाने की संभावना
सो पार्टी लोकतंत्र की रक्षा, देश के क़ानून का पालन, और भारतीय संविधान के रक्षा हेतु प्रतिबद्ध है| “आप” के ये संकल्प यह भी दर्शाते हैं कि अब तक मौजूद राजनीतिक दल इन कर्तव्यों का निर्वाह करने में असफल रहे हैं| यह भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे अपने संविधान में ही ऐसे प्रावधान और आदर्श उपस्थित हैं जो कि अगर सही तरीके और सही भावना से लागू किये जाएँ तो भारतीय समाज और संस्कृति की बहुत सी समस्याएं हल हो सकती हैं|
2. आप और उदार भारतीय राष्ट्रवाद
“आप” को मिला जनसमर्थन आश्चर्य में डालने वाला था|  1977 में जनता पार्टी को मिले जन समर्थन से “आप” की तुलना की गई| हालांकि जनता पार्टी जल्दी में पहले से उपस्थित बहुत से समूहों को मिलाकर बनाया गया गठबंधन था|  “आप” का विकास भारतीय जनता के हितों के लिए एकदम से उभरी नई पार्टी का उदय है|  एक दृष्टि से 1920 के दशक में जब महात्मा गांधी द्वारा जन समूह को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जोड़ने के लिए चवन्नी देकर मेंबर बनने की योजना चलाई जाने के बाद कांग्रेस एक मध्य-वर्ग की पार्टी से आम-जन-समूह की पार्टी बन गई थी, उस प्रक्रिया से “आप” का उभार समझा जा सकता है|
जाति, भाषा और सम्प्रदाय की सार्थकता के बावजूद भारतीय राजनीति ने राष्ट्रीय चेतना के छाते तले काम किया है| इसलिए राष्ट्रीय दलों के ह्रास के बावजूद अभी तक वे किसी भी गठबंधन की धुरी रहे हैं| इस चेतना के दो मूल रहे हैं –  महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया “सम्मिलित और मध्यमार्गीय राष्ट्रवाद” और अतिवादी एवं कट्टर समूहों द्वारा प्रचलित “संकीर्ण  राष्ट्रवाद”
कांग्रेस ने हमेशा यह दावा किया कि वह गांधी द्वारा दिखाए मार्ग पर चलती रही है| लेकिन अस्सी के दशक के बाद हुयी घटनाओं ने बहुत से लोगों को यह स्वीकारने के लिए विवश किया है कि इसने अपने आदर्शों के साथ विश्वासघात किया है| दलों और उनके द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे मंचों में बहुत बड़ा अंतर होता है| दल से संबद्धता से बहुत बड़ा होता है विचार!
राजनीति पार्टियों को छोड़ दिया जाए तो भारतीय नागरिको के सामने दो विकल्प हैं – उदारतावाद  बनाम अतिवाद!  अतिवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद या सम्प्रदायवाद किसी भी रूप में सामने आ सकता है| यह बाजार की अंध-भक्ति के रूप में भी सामने आ सकता है, खासकर तब जबकि ठेकेदारों और कोर्पोरेट्स के हितों को सारे भारतीयों के हित के रूप में प्रचारित करता है इन तत्वों द्वारा संचालित मीडिया| अतिवादी विचार और राजनीति अक्सर देश को हिंसा की आग में झोंक देते हैं|
“आप” उदारवाद और अहिंसा का पुरजोर समर्थन करती है| भारतीय लोकतंत्र में “आप” की जगह  बनाने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण और केन्द्रीय मुद्दा है|  “आप” उदार, अहिंसा और सबको साथ  लेकर चलने वाले राष्ट्रवाद में यकीन करने वाले नागरिकों की अपेक्षाओं का राजनीतिक प्रतिविम्ब है|  “आप”  प्रतिनिधित्व करती है जो कि बहुत लंबे समय से हाशिए पर रखे गये हैं| इसकी खुली सदस्यता और इसकी लचीली विचारधारा इसके बहुत बड़े आकर्षण हैं|
3. आप पर आक्रमण और हमारी अंदुरनी समस्याएँ
आप पर छिपे हुए वामपंथी दल होने का आरोप लगाकर आक्रमण किये जा रहे हैं| य प्रवृत्ति फिर से सिद्ध करती है कि कैसे राजनीतिक साजिश के तहत शहरी गरीबों, कामगारों (नियमित और अनियमित और गैरपरम्परागत), मुकदमे झेल रहे आदिवासियों, सामाजिक न्याय, पर्यावरण को हानि से सम्बंधित मुद्दे, और स्त्री-विरोधी हिंसा, आदि सभी मुद्दों को कम्युनिज्म से सम्बंधित मामलों का रूप दे दिया जाता है| हमें यह बात उठानी चाहिए कि सत्ता विरोधमात्र के प्रति असहिष्णु हो चुकी है और सत्ता तंत्र ने ऐसी आर्थिक नीतियां लागू की हैं जिससे समाज के बहुत बड़े तबके के हित नष्ट हो रहे हैं| अराजक होने के स्थान पर “आप” मध्यमार्ग और उदारता में विश्वास रखती है जबकि सत्ता तंत्र इसके उलट राजनीतिक, पर्यावरण और संप्रदायों से सम्बंधित मामलों में अतिवादी हो चुका है|
मध्य-वर्गीय भारतीयों के अलावा श्रमिक, गरीब और सुविधाओं से वंचित, शोषित भारतीय “आप” के उदय से उत्साहित और प्रेरित हैं| हमारे आर्थिक और राजनीतिक अभिजात्य वर्ग को एक बात स्पष्ट रूप से समझने की जरुरत है कि ये दबे-कुचले लोग और इनकी समस्याएं और उन्हें उठाने वाले आंदोलनकर्मी गायब नहीं होने वाले हैं वामपंथी दलों के ह्रास के कारण| उन सब लोगों से, जो “आप” पर अपनी मर्जी से कई तरह के लेबल चिपकाना चाहते हैं, हम कहना चाहते हैं कि  हाँ शोषित भारतीयों की जरूरतों, उनकी अभिलाषाओं और उनके संघर्षों को बहुत से लोग और संस्थाएं रेखांकित करते रहे हैं और हम उनकी राजनीतिक मुखरता का स्वागत करते हैं और हम भी उनके मुद्दों को उठाने वालों में से एक हैं| और हम यहाँ जमने आए हैं हमारा संघर्ष लंबा है और हम मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हैं| हम पूर्ण बदलाव का सपना लेकर आए हैं और लक्ष्यपूर्ति करे बगैर हम थकने वालों में से नहीं हैं|
4. क्या आप भ्रमित है और एकत्रित ढाँचे के रूप में रहने में असमर्थ है? हमें क्या करना चाहिए? 
“आप” की तेजी और अनवरत रूप से बढ़ती सदस्य संख्या और इसकी भिन्न अभिलाषाओं के कारण बहुत से लोग भविष्यवाणियां करते रहते हैं कि “आप” जल्द ही टूट जायेगी, बिखर जायेगी| हो सकता है यह संभव हो पर हमें एक लाओक्तान्त्रिक आंदोलन के धनात्मक पहलुओं और इसके समर्थकों की जिम्मेदारियों के बारे में सोचना चहिये| सत्य, अहिंसा और सामाज के सबसे गरीब और साधनहीन व्यक्तियों के बारे में गांधीजी द्वारा रखे गये आदर्श हमारे लिए दिशासूचक का कार्य कर सकते हैं| “आप” भले ही अपनी नवजात स्थिति में हो पर जो लोग इस्स्में सम्मिलित हो रहे हैं वे अनुभवी हैं| यह उन सबके अनुभवों से पोषित होगी और अलग-अलग क्षेत्रों और विचारधाराओं से आए लोगों के निरंतर संवाद से उत्पन्न ज्ञान से समृद्ध होगी|
क्या है जो हमें जोड़ता है? 
हमारे समाज के साधनसम्पन्न लोगों की संकीर्णता से उलट हम लोग उदारवाद में विश्वास रखते हैं| हम लोग अतिवादी नहीं हैं| हम भारतीयों में आर्थिक, पर्यावरण, और सुरक्षा संबंधी उन मसलों पर खुली बहस चाहते हैं जिन्होने हममें से बहुत से लोगों के जीवन को कठिनाइयों से भर दिया है| ऐसी बहस एक ऐसे माहौल में ही हो सकती है और होनी चाहिए जहां पारस्परिक रूप से आदर का भाव हो| “आप” के सदस्यों को प्रेरित किया जाता है वे भारतीयों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को भली भांति समझें और उसके बाद आपस में और अन्य लोगों के साथ उन मुद्दों पर बातचीत प्रारम्भ करें| ऐसी सार्थक बहसों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हमें आपस में जोड़ती हैं|
भारत में आर्थिक नीति का मामला हो या पर्यावरण संबंधी मामले हों हम चाहते हैं कि इनसे सम्बंधित नीतियों की समय सामी पर समुचित समीक्षा होती रहनी चाहिए और इनमें समयानुसार धनात्मक बदलाव लाते रहने चाहियें| नियमित समीक्षा न होने की वजह से इन् मुद्दों ने देश के सामने बहुत बड़ी बड़ी समस्याएं खड़े कर दी हैं|
हमारी न्यायिक व्यवस्था में ह्रास, स्त्रियों पर आक्रमण, और मानवीय अधिकारों के प्रति हमारे अनादरपूर्ण भाव ने भारतीय समाज में कड़वाहट और भय का समावेश किया है| समाज के सभी वर्गों को सभी ज्वलंत मुद्दों पर मुक्त संवाद को बढ़ावा देना चाहिए| हम उन सभी तत्वों से अपील करते हैं,जिन्होने राज्यसत्ता के खिलाफ हथियार उठा लिए हैं, कि वे हिंसा का मार्ग त्याग कर खुले दिमाग से संवाद करने का मार्ग अपनाएँ|   भारतीय संविधान को हिंसा के माध्यम से उलट देने के विचार से उलट हमें ऐसे अहिंसक जन-आंदोलन की जरुरत है जो भारतीय संविधान को पूर्णरुपेण लागू करे|  यह भी एक आदर्श है जो हमें जोड़ता है|
देश में विखंडन “आप” के कारण नहीं बल्कि सड़े गले तंत्र की यथास्थिति बनाए रखने की जिद के कारण है| मौजूदा तंत्र के सनक भरे व्यवहार के उलट “आप” आशा और जनसेवा के आदर्श की ताजी बयार के रूप में सामने आई है|  यही सब योग्यताएं हैं जो देश को विखंडित होने से बचा सकती हैं| The “आप” देश को पुनर्जीवित करने वाले प्रतिनिधि के रूप में सामने आई है|  यह दक्षिण एशिया में हमारे पड़ोसियों को प्रेरित कर सकती है कि वे भी ऐसे प्रयोग शुरू करें और ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि ऐसा होना आरम्भ भी हो चुका है|  इस तरह से “आप” हमारे उपमहाद्वीप में औरों के नजदीक जाने के लिए पुल का काम कर रही है|  हम क्षेत्र में शान्ति के संदेशवाहक बन सकते हैं|

“आप” केवल एक राजनीतक दल मात्र नहीं है| इससे भी ज्यादा यह राष्ट्रीय जनांदोलन है| यह अलग अलग तरह के उन लोगों के बीच परस्पर संवाद की शुरुआत है, जो कि भारतीय हैं और जो हमेशा भारतीय ही रहेंगे| हम सदस्यों, समर्थकों से अपील करते हैं कि वे उन भारतीय नागरिकों, जो हमसे अलग राय रखते हैं, से मित्रतापूर्ण संवाद कायम करें और पूरी शिद्दत से उन्हें समझाएं कि हम लोग साथ में अपने समाज को बदल सकते हैं और इसकी बुराइओं को खत्म करके इसकी बीमारियों का इलाज कर सकते हैं|

– रामू और ललिता रामदास

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