Archive for अप्रैल 28th, 2014

अप्रैल 28, 2014

ब्याहना

बाबा!Daughter-001
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी

मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे !

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत

बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल

जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे ।

(निर्मला पुतुल)

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अप्रैल 28, 2014

(नये) ईश्वर का चुनाव : अशोक वाजपेयी

Modi ishvar

साभार जनसत्ता

अप्रैल 28, 2014

“आम आदमी पार्टी” को कितनी सीटें? : शरद शर्मा (NDTV)

AKbanaras1कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की ?

कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की?
पिछले कुछ महीनों से लोग अक्सर मुझसे ये सवाल करते हैं और ये बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि मै आम आदमी पार्टी कवर करता हूँ इसलिये लोग जानना चाहते हैं कि मेरा क्या आंकलन है इस पार्टी को लेकर|

लेकिन बात इतनी सीधी नहीं होती लोग पहले मुझसे पूछते हैं और फिर बिन मांगे अपनी राय भी दे देते हैं…और राय ज़्यादातर ये होती है कि कुछ ना होना केज़रीवाल और उसकी पार्टी का, अब कहानी खत्म है|

मैं मन ही मन सोचता हूँ कि ये लोग पूछने आये थे,
बताने आये थे,
या फिर बहस करने आये थे?

असल में ये लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने आते हैं जिसके अलग अलग काऱण हैं

लेकिन ज़रा सा अपने दिमाग पर ज़ोर डालें तो आप देखेंगे कि आजकल शादी में जाओ तो राजनीति डिस्कस हो रही है, बस में, ट्रेन में, दफ्तर में, गली मोहल्ले में राजनीती पर ही चर्चा चल रही है|
क्या पहले ऐसा होता था?
क्या लोग राजनीती जैसे ऊबाऊ विषय पर अपने दिल की बात बोला करते थे?

एक दौर आया था जब न्यूज़ चैनल्स को देखनेवाले लोगों की संख्या घट रही थी और लोग न्यूज़ चैनल देखने की कोई ख़ास ज़हमत नहीं उठाते थे|
लेकिन आज से तीन साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर से जो आंदोलन शुरू हुआ उसने आम लोगों को वापस राजनीती के बारे में बात करने के लिए विवश किया, आम लोग बहुत समय के बाद घर से बाहर निकलकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ खुलकर नारे लगाते और टीवी पर बोलते दिखे|

और वहीँ से सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ जो आज इस मोड़ पर आ गया है कि लोगों में इस बात पर शर्त लग रही है कि कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा तीन डिजिट में जायेगा या दो में ही रह जाएगा|

वहीँ से लोगों में एक बार फिर न्यूज़ चैनल देखने वाले लोगों की तादाद बढ़ी
वहीँ से बहुत से न्यूज़ चैनल…. न्यूज़ और डिबेट दिखाने को मजबूर हो गए वरना याद कीजिये उससे पहले कुछ चैनल्स क्या दिखाया करते थे?
उसके बाद से आजतक चुनाव में पहले से ज़्यादा मतदान हो रहा है और पोलिंग के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं|

हाँ ये जनलोकपाल का आंदोलन था जिसने समाज को कुछ नया सोचने और उम्मीद पालने का जज़्बा दिया|

अण्णा हज़ारे इस आंदोलन का चेहरा रहे, जबकि अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी इस आंदोलन का दिमाग|
जो उम्मीद इस आंदोलन से आम जनता को बंधी वो समय के साथ टूटती दिखी
अपनी विचारधारा और काम करने के तरीके को लेकर इस आंदोलन के कर्ता धर्ताओं में मतभेद की खबरें आम थी|
और फिर एक दिन सामजिक आंदोलन पोलिटिकल पार्टी की तरफ बढ़ गया और नतीजा हुआ कि ये टीम दो हिस्सों में बंट गई पोलिटिकल और नॉन पोलिटिकल
और लगा कि सब खत्म क्योंकि जब साथ रहकर कुछ न कर पाये तो अलग होकर क्या करेंगे?

लेकिन धीरे धीरे एक उम्मीद फिर दिखाई दी, ये उम्मीद थी अण्णा के अर्जुन कहे जाने वाले अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने आम आदमी पार्टी बनायी और धीरे धीरे दिल्ली के अंदर आम आदमी के मुद्दे इस क़दर उठाये कि बहुत समय के बाद…कम से कम दिल्ली के आम आदमी को गरीब आदमी को किसी पार्टी से या यूँ कहें कि किसी नेता से कुछ उम्मीद हो गयी और इसी उम्मीद की वजह से आम आदमी पार्टी दिल्ली में 70 में से 28 सीटें जीत गयी, कांग्रेस ने बिन मांगे समर्थन दे दिया और देखते ही देखते अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए|

आम लोगों से बातचीत के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि केजरीवाल के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम हुआ, बिजली और पानी के दाम भी ज़रूर घटे थे|

लेकिन केजरीवाल के इस्तीफा देने से उन उम्मीदों को धक्का लगा जो लोगों को अपने इस नए नेता से थी , असल में जिसने वोट दिया था और जिसने वोट नहीं भी दिया था सब के सब महंगाई और भ्रष्टाचार से तंग तो थे ही…. इसलिए सब को केजरीवाल से उम्मीद थी …..ये नेता कुछ करके दिखायेगा!

दिल्ली और देश के जिस हिस्से में मैं गया वहां इस पार्टी या इस नेता के लिए बस एक ही नेगेटिव पॉइन्ट दिखता है, एक ही सवाल है कि सरकार क्यों छोड़ी? क्या लोकसभा चुनाव लड़ने का लालच आ गया था मन में ? या लग रहा था कि जैसे मुख्यमंत्री बन गया वैसे ही प्रधामंत्री बन जाऊँगा?

खैर केजरीवाल ने इसके जवाब अपने हिसाब से दिए भी लेकिन जनता कितना उसको कितना समझ पायी है या समझेगी इस पर साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि कुछ लोग नाराज़गी के चलते कह रहे हैं ‘आप‘ की गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद और एक तबका ऐसा भी है जो कहता कि दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है

वैसे केजरीवाल के काम करने का तरीका हमेशा चर्चा और विवाद में रहा हो लेकिन उनकी ईमानदार आदमी की छवि पर कोई डेंट नहीं है ये सब मानते हैं और उनकी ईमानदारी पर शक़ होता तो लोग उनके इस्तीफे पर कहते कि अच्छा हुआ राहत मिली एक खाऊ मुख्यमंत्री और उसकी सरकार से, जबकि लोग अभी कह रहे हैं कि सरकार नहीं छोड़नी चाहिए थी। मैं सोचता हूँ कि ईमानदारी तो ठीक है लेकिन उसका जनता क्या करेगी अगर आप उसको अच्छा शासन ना दिखा पाएं

खैर अब बात फिर वहीँ आती है कि आप की कितनी सीटें आ रही हैं? तो जवाब ये है कि इस पार्टी का वोटर साइलेंट रहता है इसलिए पार्टी का जनाधार पता लगाना या फिर आंकलन कर पाना बहुत कठिन है। दिल्ली चुनाव से पहले कौन कह रहा था कि केजरीवाल शीला को हराएंगे और वो भी एकतरफा? या केजरीवाल की पार्टी 28 सीटें जीतेगी और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन जाएंगे?

और बात आजकल ये भी हो गयी है कि वोटर आसानी से बताता नहीं है की वो किसको वोट देगा या फिर दे चुका है ? क्योंकि वो अपने इलाके के किसी दूसरी पार्टी के नेता, विधायक, सांसद जो शायद उसका दोस्त, जानने वाला, पडोसी वगैरह भी हो सकता है लेकिन वोट उसको नहीं किसी दूसरी पार्टी को देना चाहता है ऐसे में आपको बताकर वो उसका बुरा नहीं बनना चाहता|

यही नहीं आजकल तो हालत ये हो गए हैं की दिल्ली में एक परिवार के सारे वोट एक पार्टी को चले जाएँ ये पक्का नहीं है…… मेरे एक पत्रकार मित्र जो बीजेपी कवर करते हैं उन्होंने दिल्ली में वोटिंग वाले दिन मुझसे पहले तो दिल्ली की स्थिति पर चर्चा करी और फिर बताया कि हालात जैसे दिख रहे थे वैसे असल हैं नहीं , मैंने पूछा क्या हुआ ….. बोले यार हद हो गयी …. मैं बीजेपी को वोट देकर आया हूँ लेकिन मेरे घर के 4 झाड़ू (आप) को चले गए|

मेरे लिए ये कोई अचम्भा नहीं था क्योंकि मैं दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में देख चुका था कि जो परिवार सालों से बीजेपी को वोट दे रहे थे उसमे इस बार माँ बाप तो कमल का बटन दबाकर आये थे लेकिन बच्चे झाड़ू चलकर आये थे जिसकी वजह से बीजेपी के हाथ से उसके गढ़ शालीमार बाग़, रोहिणी जैसी सीटें निकल गयी थी

इसलिए कोई सीटों का आंकड़ा दिए बिना मैं मानता हूँ कि ये पार्टी 8 दिसंबर की तरह 16 मई को चौंका दे तो मुझे हैरत नहीं होगी .

Sharad Sharma, Journalist NDTV

अप्रैल 28, 2014

श्रीमती अरविंद केजरीवाल आपको डर नहीं लगता अपने पति के लिए?

Arvindwifeलोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि तुम अरविंद की पत्नी होने में कैसा महसूस करती हो?

क्या तुम्हें डर नहीं लगता?

मैं उन्हें मुस्कुरा कर जवाब देती हूँ कि नहीं, मुझे डर नहीं लगता|

मगर सच्चाई ये है कि मुझे कभी कभी थोड़ा डर महसूस होता है|

खास तौर से तब जब अरविंद घर पर नहीं होते|

आधी रात को उठ कर अपने दोनों बच्चों के बेड के पास जाकर घंटों खड़ी रहती हूँ| कभी कोई बुरा ख़याल आ जाता है तो खामोशी से रो लेती हूँ|

शायद ये स्वाभाविक भी है|

पहले पहले दिल करता था कि अरविंद से कह दूं कि देश की चिंता छोड़ो.

अपने बच्चों की चिंता करो,

अपनी पत्नी की,

अपने बूढ़े माँ-बाप की चिंता करो|

देश की चिंता के लिए भगवान किसी और को खड़ा कर देगा…

मगर अब मुझे अपनी उस सोच पर शर्म आती है…

अब मुझे अपनी किस्मत पर गर्व होता है

कि अरविंद ने मुझे अपना जीवनसाथी चुना है|

अरविंद के साथ रह कर मेरा ये विश्वास भी पक्का हो गया कि आख़िर में जीत

सच्चाई की ही होती है|

हाँ…अरविंद

सच्चाई के इस रास्ते पर मैं

तुम्हारे साथ हूँ और हमेशा रहूंगी|

भगवान मेरा सुहाग सलामत रखेगा, और तुम्हें बहुत सारे लोग मिलेंगे जो इस सच्चाई के रास्ते में तुम्हारा साथ देंगे|

अप्रैल 28, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी में नामांकन

Neetish@Modi

भीड़ दोनों तरफ है फर्क बस इतना है

एक तरफ आई हुई है

दूसरी तरफ लाई हुई है

हवा दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ बनी हुई है

दूसरी तरफ पैसे के दम पर बनाई हुई है

जीत का विश्वास दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ आम लोगो के दम पर है

दूसरी तरफ अंबानी अडानी के दम पर है

चर्चा दोनों तरफ की है

फर्क बस इतना है

एक तरफ की चर्चा आम जनता में है

दूसरी तरफ मीडिया ने बनाई हुई है

AKvsModi@Benaras

लगता है कि बनारस में कारपोरेट मीडिया/भाजपा समर्थित कथित ‘सुनामी’ के सबसे पहले शिकार ख़ुद पत्रकार हो गए हैं और यह ‘सुनामी’ उन्हें पूरी तरह बहा ले गई है.

सबूत चाहिए तो कल टीवी पर और आज के अखबारों में बनारस में नमो के नामांकन की रिपोर्टिंग पढिए. जिस श्रद्धा और भक्ति से रिपोर्टिंग की गई है, उसमें सबसे पहले तथ्यों को अनदेखा किया गया है|

उदाहरण के लिए टाइम्स आफ इंडिया और इकनामिक टाइम्स की रिपोर्टों में तथ्यों में फ़र्क़ है| उनकी तुलना बाक़ी अख़बारों की रिपोर्टों से करें तो उन सबके बीच तथ्यों का फ़र्क़ साफ़ दिखने लगता है.

कुछ साल मैंने भी बनारस में गुज़ारे हैं. कुछ सवाल सिर्फ तथ्यों के बारे में. पहली बात यह है कि अगर मलदहिया से मिंट हाउस,नदेसर की दूरी गूगल मैप के मुताबिक़ १.७ किमी है, उसे २ किमी भी मान लिया जाए और उसे पूरी तरह लोगों से भरा हुआ भी मान लिया जाए तो उसमें ४० हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं होंगे. वह लाखों और कुछ अख़बारों/चैनलों में ३ लाख तक कैसे पहुँच गई? थोड़ा सा गणित का इस्तेमाल कीजिए,आपको वहाँ पहुँची भीड का अंदाज़ा लग जाएगा|

susheel modi tweetयह ज़रूर ‘सुनामी’ का ही असर है! श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएँ तो किमाश्चर्यम?

एक आदमी को खड़े होने के लिए एक हाथ लम्बी और एक हाथ चौड़ी जगह तो चाहिए ही. मतलब 18 इंच गुने 18 इंच. यानी लगभग 50 cm x 50 cm. यानि कि 1 sq meter में अधिकतम ४ आदमी

वाहन के आस पास के 200 meter में 1 sq meter में ४ आदमी घनत्व, उसके पिछले 300 meter में 1 sq meter में केवल 2 आदमी का घनत्व तथा बाकी 1500 meter में 2 sq meter में 3 आदमी के घनत्व के हिसाब से मलदहिया से कचहरी के बीच की सड़क को 60 फीट (यानि 18 meter) चौड़ी मानते हुए ये संख्या होगी [(200x18x4)+(300x18x2)+(1500x18x2/3)] यानी कुल 14400+10800+18000 = 43200

अगर ये मान भी लिया जाए कि 7-8 हजार लोग लंका, काशी विद्यापीठ और मलदहिया और बीच के रास्ते में ही रह गये और जुलूस में शामिल नहीं हुए तो जुलूस की पूरी संख्या 50 हजार कही जा सकती है

अब अगर इसमें से बनारस की अन्य लोकसभा क्षेत्रों, पूर्वांचल के अन्य लोकसभा क्षेत्रों और बिहार से आये हुए लोगों की संख्या (जैसा सुशील मोदी का दावा है) को, यानि की कुल 25 लोकसभा क्षेत्रों के लिए @ 1000 के हिसाब से तथा गुजरात और अन्य राज्यों से आकर बनारस में कैम्प कर रहे 5 हजार लोग यानी कुल बाहरी संख्या को 30 हजार भी मानकर घटा दिया जाए तो यह तथाकथित सुनामी बनारस संसदीय क्षेत्र से केवल 20 हजार लोगों को ही बटोर पाई.” [Anand Pradhan]

…..

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी रोज चार से छह रैलियां करते हैं। वह देश के कोने-कोने जाकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, रात अपने बंगले में ही बिताते हैं। (यह भी एक रहस्य की बात है!) उन्हे उड़ाने के लिए तीन जहाजों का बेड़ा हमेशा तैनात रहता है। इनमें एक जेट प्लेन और दो चॉपर शामिल हैं। ये विमान अदाणी ग्रुप और डीएलएफ जैसी कंपनियों के हैं।

मोदी को उड़ाने के लिए अहमदाबाद एयरपोर्ट पर हर सुबह एक एंब्रेयर एयरक्राफ्ट EMB-135BJ तैयार रहता है। यह जेट विमान करनावती एविएशन का है, जो अदाणी ग्रुप की ही एक कंपनी है। मोदी के हवाई बेड़े में अगस्ता AW-139 चॉपर भी शामिल है। यह डीएलएफ ग्रुप का विमान है। इनके अलावा निजी कंपनी के चॉपर बेल 412 से भी मोदी ने उड़ानें भरी हैं। बिहार और यूपी जैसे राज्योंु के लिए मोदी ने अगस्ता AW-139 चॉपर का इस्ते माल किया था।

विशेषज्ञों के मुताबिक एक इंजन के चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 70,000 से 75000 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। दो इंजन वाले चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 1 से 1.2 लाख प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। वहीं जेट विमान के जरिए उड़ान भरने की कुल लागत करीब 3 लाख रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। नरेंद्र मोदी देशभर में अब तक तकरीबन 150 रैलियां कर चुके हैं। इस दौरान उन्हों ने 2.4 लाख किमी की यात्रा की है। यानी, रोज लगभग 1,100 किमी का सफर। हिसाब लगाइये की कम्पनियां कितना पैसा खर्च कर रही हैं।

अब देश की समझदार जनता विचार करे की मोदी के ऊपर इतना पैसा खर्च करने वाली कंपनियां मोदी के सत्ता में आते साथ ही किस तरह से अपनी रकम की कई गुना वसूली करने का जालिमाना तरीका अपनाएंगी![Anurag Ojha]

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