अरविंद केजरीवाल : अकेला ‘धरना’ क्या भाड़ झोंकेगा!

arvindkअरविंद केजरीवाल एक संवैधानिक पद पर हैं और इस छोटी अवधि वाले आंदोलन से उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे आप के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री दोनों के रूप में जनता के हितों को साधने के अपने धर्म की रक्षा भली भांति कर सकते हैं| उन्होंने एक बार कहा था कि वे और आप पुराने दलों और नेताओं को राजनीति सिखाने आए हैं और उन्होंने इसे सिद्ध भी कर दिया|

किरण बेदी जैसे एक्टीविस्ट लोग, जो ईर्ष्या और “अंगूर खट्टे हैं” वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं, जब टीवी पर विलाप करते हुए चीखते हैं कि मीडिया को हटा लो और फिर देखो कितने लोग वहाँ रहते हैं तो वे भूल जाते हैं कि 20 जनवरी की सुबह अरविंद केजरीवाल तो गृहमंत्री के दफ्तर के बाहर अपने छह मंत्रियों के साथ धरना देने चले थे और उन्होंने आम जनता को वहाँ आने से मना किया था| चार हजार पुलिस वाले अगर परिंदे को भी पर नहीं मारने देते रेल भवन पर तब भी अरविंद केजरीवाल अपने छह साथियों के साथ डटे रहते| मीडिया को तो खबर चाहिए और आज की तारीख में अरविंद केजरीवाल से बढ़कर कोई नहीं है जो उन्हें एक्सक्लूसिव बाईट दे|

26 जनवरी की तारीख देखते हुए अरविंद केजरीवाल का 20 तारीख को धरने पर बैठने का निर्णय दुधारी तलवार जैसा था और यही हालत केन्द्र सरकार की भी थी| अरविंद केजरीवाल को रेल भवन पर रोकने का निर्णय केन्द्र सरकार का था जिसके बाद ही अरविंद केजरीवाल ने अपील की कि धरने के समर्थक वहाँ पहुंचें| अगर गृहमंत्री दिल्ली के मंत्रियों को अपने मंत्रालय के बाहर बैठने देते तो बहुत से टकराव टाले जा सकते थे| पर केन्द्र सरकार को तो अरविंद केजरीवाल को बदनाम करना था सो सुबह से ही मेट्रो के चार स्टेशन बंद कर दिए गये| उन्हें अपने चार हजार पुलिस वालों पर भरोसा नहीं था कि वे जनता को वहाँ जाने से रोक पायेंगे|

कुछ लोग दलीलें दे रहे हैं कि कम समर्थक वहाँ उमड़े इसलिए अरविंद केजरीवाल ने निराश होकर धरना वापिस ले लिया| लोग भूले दे रहे हैं कि धरना सोमवार से शुरू हुआ था और कामकाजी वर्ग को धरने पर जाने में बहुत मुश्किलें आनी थीं| और लोगों को वहाँ आने की अपील सोमवार दोपहर के आसपास की गयी| एकदम से तो लोग पहुँच नहीं पायेंगे तब विशेष रूप से जब पुलिस ने वहाँ छावनी बना डाली हो| इसके बाद भी यही धरना अगर शुक्रवार को शुरू होता तो आधी से ज्यादा दिल्ली वहीं नजर आनी थी| पिछले साल दामिनी मामले में शनिवार और रविवार को उत्पन्न हुए जमावड़े को याद कर लें तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी और अरविंद केजरीवाल का यह कदम इतना अजूबा था आम जनता के समझने के लिए कि जब तक वे इसके लाभ, नुकसान और अर्थ को समझ पाते, धरना ही खत्म हो गया|

अरविंद केजरीवाल और आप का लचीला रुख सामने आया जो फिर से भाजपा और कांग्रेस के दुष्प्रचारों पर कुठाराघात था| इन्हें आशा थी कि अरविंद केजरीवाल अड़ियल आदमी की तरह अड़े रहेंगे और सत्ता तंत्र  उन्हें कुचल देगा|

अरविंद केजरीवाल  की तुरंत निर्णय लेने की क्षमता (या आलोचक उतावली कहना चाहें तो कह सकते हैं), उनके इस धरने से स्पष्ट हो जाती है|

गांधी भी अपने आंदोलनों को एक अवधि के बाद वापिस लिया करते थे जिसका एक बड़ा कारण स्पष्ट है कि जनता की भागीदारी वाले आंदोलन बहुत लंबे समय तक नहीं खींचे जा सकते क्योंकि हरेक की अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याएं गुरुत्वाकर्षण बल का काम करती हैं व्यक्ति की आंदोलनकारी प्रवृत्ति पर|

अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ पर मौजूदा राजनीतिक तंत्र की तरह से किये जा रहे हमलों के कारण राजेश जोशी की एक प्रसिद्द कविता की कुछ पंक्तियाँ बेहद प्रासंगिक दिखाई देती हैं|

बरदाश्त नहीं किया जायेगा

किसी की कमीज हो

उनकी कमीज से ज्यादा सफेद।

जिसकी कमीज पर

दाग नहीं होंगे

मारे जायेंगे।

इस समय

सबसे बड़ा अपराध है

निहत्था और निरपराध होना।

जो

अपराधी नहीं होंगे

मारे जायेंगे। 

कांग्रेस की यह चाल थी कि आप की सरकार बनाकर वह इसकी कमीज को भी पुराने दलों जैसी गंदी साबित कर देगी और फिर से सालों के लिए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित कर लेगी| किसी भी मामले पर कमेटी बैठा देना, जांच समिति बैठा देना इस आशा में कि कुछ दिनों में जनता भूल जायेगी और मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा, ऐसा अभी तक सारे राजनीतिक दल करते आए थे| पुराने राजनीतिक तंत्र द्वारा सारी कवायद यही चल रही है कि देश के सामने यह जल्दी से जल्दी सिद्ध कर दिया जाए कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथी भी उतने ही भ्रष्ट हैं, अगर यह नहीं होता तो देश को दिखाया जाये कि ये लोग अक्षम हैं सरकार चलाने में| कांग्रेस रोज ही राग अलापती है कि वह ‘आप‘ को तब तक समर्थन देगी जब तक वे जनहित के काम करते रहेंगे पर अंदरखाने वह किसी भी तरह ‘आप‘ कुछ भी ऐसा नहीं करने देना चाहती जिससे कि इनकी छवि बने या निखरे| कांग्रेस ने पहले हाँ करके अब अरविंद केजरीवाल को उनकी भ्रष्टाचार रोधी शाखा के लिए उपयुक्तत अधिकारी देने में असमर्थता दिखाई है| कुछ ही दिन पहले एक टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे कॉमनवेल्थ खेल घोटाले को उजागर करने के लिए सम्बंधित फाइलें देख रहे हैं और कांग्रेस पछताएगी कि उसने क्यों ‘आप‘ को समर्थन दिया| कांग्रेस को ‘आप‘ की सरकार को समर्थन एक जाल है और ‘आप‘ को इस चक्रव्यूह को तोड़कर ही अपनी श्रेष्ठता दिखानी है|

अगर केन्द्र सरकार और पुराने राजनीतिक दल ये सोच रहे हैं कि वे अरविंद केजरीवाल को अपने जैसा बना लेंगे तो यह धरना उनकी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा होने वाला है नहीं|  अरविंद केजरीवाल के धरने ने स्पष्ट जता दिया है कि उनके साथ और उनके रहते भारत में ऐसा हो पाना कठिन होगा और आगे तो यह असंभव हो जाएगा| जो गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि धरना अराजक था उन्हें अपने सिद्धान्त और अपने विचार फिर से खंगालने की जरुरत है| अरविंद केजरीवाल राजनीति में पुराने की जगह बैठ कर वही सब करने नहीं आए हैं जो चलता आ रहा है| वह इस खेल के सारे नियम बदलने आए हैं| इसमे कतई अतिशयोक्ति नहीं कि अगर ऐसा उस समय होता जब गांधी, सुभाष और भगत सिंह जिंदा थे तो शत प्रतिशत तीनों क्रांतिकारी नेता इस धरने के मंच पर बैठे दिखाई देते|

इस धरने ने कांग्रेस को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि वह ‘आप‘ की बांह मरोड कर राजनीति नहीं कर सकती और ‘आप‘ चांटा खाकर दूसरा गाल आगे करने वाली है नहीं वह कांग्रेस के दोनों गाल जनता के सामने शर्म से लाल करवा देगी ज्यादा बुद्धिमत्ता दिखाकर| अभी कांग्रेस की एक चाल ‘आप‘ पर भारी रही है मेट्रो को बंद करके कांग्रेस ने पूरा इंतजाम कर दिया कि आम लोग ‘आप‘ के खिलाफ हो जाएँ| हो सकता है इस बात ने ‘आप‘ को बहुत प्रभावित किया हो पर थोड़ी अवधि में लोग असल बात समझ जायेंगे|

भाजपा को सन्देश दे दिया कि अब मुद्दे ‘आप‘ निश्चित करेगी और भाजपा की मजबूरी रहेगी ‘आप‘ के उठाये मुद्दों पर प्रतिक्रया देकर या उसकी नक़ल करके उसकी पिछलग्गू पार्टी बनने की|

किरण बेदी जैसे किसी खास भावना से ग्रस्त हो चुके दिमाग ही यह सोच सकते हैं कि सोमनाथ भारती के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए यह धरना आयोजित किया गया था| उनकी जानबूझ कर बंद की हुयी आखें देख पाने में असमर्थ हैं कि सोमनाथ भारती का मुद्दा क्या भुला दिया गया, क्या वह पार्श्व में चला गया? बल्कि वह तो और ज्यादा सामने आ गया है| सोमनाथ भारती की आड़ में पुरानी राजनीति ‘आप‘ पर और तीव्र हमले करगी| हो सकता हो सोमनाथ भारती की गलती हो पर क्या सिर्फ इसलिए कि यह मुद्दा ‘आप’ सरकार से जुड़ा हुआ है, एक ड्रग्स और देह व्यापार से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण मसले को रंगभेद और नस्लीय अंतर का मामला करार देकर देश की छवि से खेल सकते हैं पुराने दल? सोमनाथ भारती बलि चढ़ जायंगे या नहीं मुद्दा यह नहीं है|

वास्तविक  मुद्दा यही है कि भारतीय राजनीति में बदलाव की क्रिया शुरू हो चुकी है| या तो पुरानी राजनीति अपने आचार व्यवहार और सोच में परिवर्तन लाकर सच में समाज में अंतिम व्यक्ति के हितों की रक्षा करने के प्रयास करेगी, या जनता ही इन्हें सुधरने पर मजबूर कर देगी और वे दोनों ही तेरीकों से नहीं सुधरते तो धरती पर जीवन का इतिहास बताता है कि अस्तित्व तो यहाँ बेहद शक्तिशाली डायनासोर का भी नहीं रहा, भ्रष्ट राजनीति भी अप्रासंगिक हो दफा हो जायेगी|

पुराने राजनीतिक दलों, उनके थिंक टैंक, बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार, लेखक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी, कोई ऐसा नहीं है जो पहले से अनुमान लगा ले कि अरविंद केजरीवाल और योगेन्द्र यादव एवं साथी क्या करने वाले हैं, इनकी दिशा क्या है? ये लोग जब कुछ कर देते हैं तब बुद्धिजीवी मंथन शुरू कर देते हैं| दो बातें संभव हैं – या तो जहां इनकी  किताबी सिद्धांत आधारित बुद्धि खत्म हो जाती है उससे परे का ‘आप‘ पार्टी के कर्ता-धर्ता सोच रहे हैं या वे इतना साधारण सोच रहे हैं और इन बुद्धिजीवियों को नाक और आँखें नीचे करके सोचने का तरीका ही नहीं आता सो वे देख और समझ ही नहीं पा रहे हैं अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक  रणनीति, जो खुलेआम कदमताल करती हुयी समाज के सबसे निम्न वर्ग की ओर बढ़ती जा रही है, और रास्ते से सभी वर्गों की सहूलियत के लिए भ्रष्टाचार पर झाडू फेरती जा रही है|

यह धरना समाज के अंतिम व्यक्ति का महत्व भारतीय राजनीति के सम्मुख बढाने की ओर पहला कदम है|

गांधी ने कहा था कोई भी योजना बनाने से पहले समाज के अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचना कि क्या यह योजना उसे लाभान्वित करेगी अगर नहीं तो योजना बेकार है| अरविंद केजरीवाल उसी ओर बढते नजर आ रहे हैं| उच्च वर्ग को तो अरविंद केजरीवाल से बहुत दिक्कतें होने वाली हैं क्योंकि दशकों से जो घोषित एवं अघोषित सब्सिडी विभिन्न सरकारों से लेकर उन्होंने अपनी सम्पन्नता को बरकरार रखा है वह सुविधा खत्म हो जायेगी अगर आप केन्द्र की राजनीति में अपना दखल बढाती है| एफ.डी.आई पर दिल्ली राज्य में आप सरकार द्वारा निर्णय लेते ही मीडिया चैनलों और अखबारों की तोपें आप सरकार की तरफ स्पष्ट रूप से गोले दागने लगीं|

सुविधाभोगी वर्ग को बेहद तकलीफ होती है जब कोई विकेन्द्रीकरण की बात करता है क्योंकि उनके लिए आसान है एक खास वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखना परन्तु अगर आम जनता में शक्ति फ़ैल जाए तो उन्हें बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है, कठोर परिश्रम करना पड़ता है|

पूरे देश ने देखा होगा एक युवक को जो धरना स्थल पर पुलिस के समूह में घूम घूम कर तलाश कर रहा था कि किस पुलिस वाले ने उसे मारा था| क्या कोई सोच सकता था ऐसा हो पाना अब से पहले? पुलिस ने अपनी छवि एक दुर्दांत समूह की बना ली है| बहरहाल इतना तय है कि इस धरने के बाद दिल्ली पुलिस न तो अरविंद केजरीवाल सरकार को और न ही आम जनों की समस्याओं को टालने की हिम्मत कर पायेगी| उसे एक्शन लेना ही पड़ेगा वरना जनता में उसके खिलाफ असंतोष बढ़ता ही जाएगा और मुखरित भी होने लगेगा| आखिरकार जनता को इतना तो समझ में आता ही है अब कि चाहे पुलिस का सिपाही हो या कमिश्नर, दिल्ली में गृह सचिव हो या उनके दफतर में कार्यरत सबसे छोटा सरकारी कर्मचारी, सबक वेतन जनता के दिए धन से ही चुकाए जाते हैं और उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है| भ्रष्ट तंत्र ने ऐसा माहौल बना दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को जनता के प्रति उत्तरदायित्व होना चाहिए ऐसी धारणा ही खत्म हो चली थी| इस धरने से बहुत से सरकारी कर्मचारी अपने आप ही अपने उत्तरदायित्व का पालन करते नजर आयेंगे क्योंकि उन्हें दिख गया होगा कि अब जनता ज्यादा जागरूक हो गई है|

आप पर हमले बढते जा रहे हैं| रोचक बात है कि आप जनता की लड़ाई लड़ रही है और जनता खुद आप के लिए लड़ रही है| दीवार पर इबारत साफ़ साफ़ लिखी है जिन बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं दे रही उन्हें भी कुछ महीनों में दिखने लगेगी|

ऐसा भी संभव है कि पुरानी राजनीति अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ को समाप्त कर दे या हरा दे पर अब इस क्रान्ति के बीज को पनपने से रोका नहीं जा सकता|

किसी और से ज्यादा ये पंक्तियाँ अरविंद केजरीवाल और आप के लिए ज्यादा मुनासिब दिखाई देती हैं|

मेरी हिम्मतें अभी झुकी नहीं,

मेरे शौक अभी बुलंद रहे

मुझे हार-जीत से क्या गरज

मेरी जंग थी मैं लड़ा किया!

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