आत्मविश्वास…(संत सिद्धार्थ)

संत सिद्धार्थ ने सामने बैठे लोगों से कहा| ‘कल कुछ मित्रों ने कहा कि सर्वत्र व्याप्त भ्रष्ट माहौल में आशा से उनका विश्वास डगमगा गया है और वे निराशा से भरे रहते हैं और उन्हें लगता है कि मनुष्य जीवन में बुराई हावी हो चुकी है भलाई पर| उन्होंने समाज और मनुष्य मात्र के इस नैतिक पतन पर बोलने के लिए कहा है| वे कहते हैं कि गर्त में जाते मनुष्य जीवन में ऊँचाई पाना कुछ संतों के ही बस की बात रह गई है और बाकी सब लोगों को भेड़चाल का शिकार देर सबेर होना ही पडता है और सब भ्रष्ट और मूल्यविहीन जीवन जीने लगते हैं|’

उन्होने लोगों से पूछा,” क्या बाकी लोगों को भी रूचि है इस विषय पर चर्चा करने में”|

कुछ ने बोल कर हाँ कहा और कुछ ने स्वीकृति में सिर हिलाया|

संत सिद्धार्थ ने कहा,” तो ठीक है आज इसी मुद्दे पर बात कर लेते हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है कि बुरे व्यक्ति को सफल देख अच्छा आदमी हार मानने लगता है? अच्छा आप ही लोग बतायें इस बारे में आप क्या सोचते हैं?”

‘महात्मन, बुरे को जीतता देख कहीं न कहीं निराशा होती ही है कि जब ऐसों को ही सफल होना है तब अच्छे लोग कैसे अपनी अच्छाई को बनाए रख सकते हैं? बुरे लोग अच्छे लोगों को प्रताड़ित करेंगे या मार ही डालेंगे|’

‘महात्मा जी, जब समाज में चारों तरफ भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को समानित होते देखते हैं तब व्यक्ति को इतनी बड़ी भीड़ के सामने अकेले पड़ जाने का भय ग्रसित कर लेता है और अपने और अपने परिवार के जीवन को सुचारू रूप से चलाये रखने के लिए वह या तो कोने में खड़ा हो जाता है या अपनी सुविधानुसार बुराई को एक आवश्यक तत्व मान कर उसे स्वीकार कर लेता है|’

संत सिद्धार्थ ने कहा,” तो मुख्य बात आपको यह लगती है कि समाज में बुराई जीतती प्रतीत होती है और बुरे लोगों का बहुमत अच्छे लोगों को डरा कर एक किनारे कर देता है”|

थोड़ा रुककर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई,” अच्छा एक बात पर ध्यान दीजिए, आप लोगों ने कहा कि अच्छे लोग भी, मजबूरीवश ही सही पर, भ्रष्ट और बुरे रास्ते को स्वीकार कर लेते हैं और कुछ तो उस पर चलने भी लगते हैं| आपमें से कुछ ने कहा कि बुरों की भीड़ के सामने समाज में अकेले पड़ जाने के भय से भी बहुत से लोग बुरे मार्ग पर चलने लगते हैं, नहीं भी चलते हैं लोग तो बुराई का विरोध करने का साहस ही लोगों के अंदर से समाप्त हो गया प्रतीत होता है|”

उन्होने नजर सामने बैठे लोगों को कुछ क्षण देखा और पूछा,”अच्छा ठीक से सोच कर एक बात बताइये कि जब आप लोग किसी बुराई का विरोध न करके उसे घटते हुए देखते हैं या उसे स्वीकार करके उसके साथ जीने लगते हैं, भले ही आप इसे मजबूरी में किया कृत्य मानें, तो क्या आपको भीतर पीड़ा होती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि आप गलत कर रहे हैं और शुरू में यह भावना तीव्र होती है पर बाद में आप इस भीतरी आवाज या पीड़ा से विमुख होते चले जाते हैं और कुछ समय पश्चात तो आप आदि हो जाते हैं भ्रष्ट मार्ग पर चलने के और अंदर से आवाज ही नहीं आती|”

कुछ देर पश्चात बहुत से लोगों ने कहा,” जी ऐसा ही होता है, ऐसा ही होता रहा है| बहुत बार बहुत से ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें करने को मन कभी गवाही नहीं देता पर दुनिया में ऐसी बातों का चलन होने के कारण इन् बातों के साथ होना पड़ता है| कष्ट तो होता है महात्मन|”

संत आगे बोले, ” ठीक, अब इस बात पर भी गौर करें| अच्छा ऐसा करें कि बहुत बड़ी बातों को छोड़ दें कुछ मिनटों के लिए, और यह सोच कर देखें और बताएं कि बुराई से अलग भी क्या आप जीवन की बहुत सी अन्य बातों में औरों का अनुसरण नहीं करने लगते जबकि ऐसा हो सकता है कि आपको वास्तव में वैसा करना भाता न हो पर तब भी आप औरों की नक़ल करने लगते हैं”|

कुछ लोग बोले,”जी, महाराज, ऐसा होता तो है| कई बार बहुत सारे लोग किसी बात को कर रहे हैं तो हम भी वैसा करने लगते हैं”|

‘शायद सभी लोगों की समझ में बात आई नहीं, तभी कुछ ही लोगों ने उत्तर दिया इस बात का| चलिए इसे इस तरह से देखते हैं| बहुत छोटी बात से लेते हैं| जैसे कपड़ों की ही बात लें, व्यक्तिगत तौर पर आपको किसी किस्म के कपड़े पहनना सुविधाजनक लगता होगा पर फिर भी आप कपड़ों के वैसे तरीके अपनाते हैं जिनका कि उस समय में चलन होता है क्योंकि आपको गता है कि चलन वाले तरीके के कपड़े नहीं पहनेंगे तो आप अलग-अलग से दिखाई देंगें और आप कहीं न कहीं हीन भावना से ग्रसित होकर प्रचलित तरीके वाले कपड़े पहनने शुरू कर देते हो”|

लगभग सभी लोगों ने इस बात को माना,” यह तो एकदम सही बात है| कपड़े ही क्यों बहुत सी बातें हम इसलिए अपनाते हैं क्योंकि समाज में उनका प्रचलन है”|

“तो यह तो तय है कि दूसरे लोग और सामाजिक परिस्थितियाँ, दोनों तत्व अधिकतर लोगों को प्रभावित करते हैं और लोग इनसे प्रेरित होकर या इनके दबाव में अपने जीवन में बदलाव ले आते हैं| अब ऐसा हो सकता है कि ये बदलाव आदमी को अंदर से पसंद न भी हों पर वह प्रचलन के विपरीत जाने का साहस नहीं दिखा पाता| क्या आप सोच कर बता सकते हैं कि ऐसा क्यों होता है? क्यों लोग दूसरों की नक़ल करते हैं या क्यों दूसरों से होड़ करके अपने जीवन में बदलाव लाने लगते हैं भले ही ये बदलाव उन्हें अंदर से आनंदित न कर पाते हों?”

कुछ देर सोच कर कुछ लोगों ने कहा,” शायद अकेले पड़ जाने के भय से ऐसा करते हैं हम लोग”|

“मसले की जड़ में जाएँ अगर हम तो ये सब मुद्दे हैं आत्मविश्वास से सम्बंधित| हरेक को एक स्वभाव, प्रकृति मिलती है जन्म के साथ| तुम जैसे हो, वैसा ही अपने स्वभाव के साथ जीना, किसी और से होड़ न करना, औरों जैसा बनने का प्रयास न करके अपने ही स्वभाव में आनंदित होकर हरेक स्थिति में जीवन जीना ही आत्मविश्वास है| विश्वास से काम करना योग्यता है| आत्म -विश्वास … अपने अंतस पर विश्वास| तुम्हारी अपनी आत्मा में विश्वास| प्रकृति ने तुम्हे मनुष्य रूप में जन्माया है तो तुम्हे एक स्वभाव दिया है| तुम्हे जीवन में अपने स्वभाव को पहचान कर उस पर अडिग रह कर अध्यात्मिक विकास करना होता है| पर लोग तो बहुत छोटी छोटी बातों में भी अपने अंतर्मन की आवाज न सुनकर दूसरों जैसा बनने लगते हैं| हो सकता है कि एक किशोर की प्रवृत्ति कुछ और करने की हो पर वह और उसका परिवार उसे ऐसे कामों की ओर धकेल देते हैं जहां उन्हें लगता है कि ज्यादा सम्पन्नता हासिल करने में ज्यादा सफलता मिलेगी| धन-सपदा और सफलता प्राप्त करना ज्यादा बड़े लक्ष्य हो जाते हैं आत्मिक संतोष और प्रसन्नता की तुलना में और मनुष्य के भीतर विभाजन शुरू हो जता है और आत्मा क्षीण होने लगती है| यह एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार है जो बहुत से लोग अपनाते हैं| प्रसिद्धि और धन के मामले में अमीर लोगों को देखिये जब उन्हें यश, सम्मान और एक खास स्तर से ऊपर का धन कमाने के आदत हो जाती है और उनकी प्रसिद्धि उस क्षेत्र विशेष में कम होने लगती है तो बहुत से राजनीति में चले जाते हैं कि वहाँ वे सब कुछ फिर से कमा लेंगे| अगर राजनीति उनका जूनून होती तो वे पहले ही क्यों नहीं राजनीति में गये| वे सिर्फ अपने अहं को तुष्ट करने के लिए राजनीति में जाते हैं जबकि उनकी कोई अंदुरनी रूचि राजनीति में नहीं होती| बहुत से ऐसे लोग हैं जो इसलिए अभिनेता बन जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह यश, सम्मान, धन और सफलता पाने का अच्छा जरिया है और इसके द्वारा बहुत शीघ्र ही यह सब कुछ अर्जित किया जा सकता है| जिनके अंदर अभिनय को लेकर प्यास है वे अलग ही अभिनेता होते हैं| ऐसा ही खेलों बल्कि सरे जीवन के सारे क्षेत्रों के साथ भी है|”

थोड़ा रुक कर वे फिर बोले,” अपने स्वभाव को पहचानने के लिए बहुत जरूरी है कि औरों जैसा बनने का प्रयास बंद कर देना चाहिए| जब निरर्थक खोल गिर जायेंगे तब असली स्वभाव ऊपर उभर आएगा| कपड़े, जूते, मेकअप, विचार और कहीं की सदस्यता आदि बातें ओढ़े हुए खोल हैं| और आत्मविश्वास को किसी क्षेत्र में दक्षता पाने से न मिला देना| अपनी कला में बेहद प्रवीण एक कलाकार, जिसे उस कला को साधने में बेहद प्रसन्नता होती है और वह अंतर्मन के स्तर पर संतोष प्राप्त करता है, जरूरी नहीं कि बहुत अच्छा वक्ता भी हो अगर वह बहुत कोशिश के उपरान्त भी इसमें दक्षता हासिल नहीं करता तो उसे हीनभावना से भरने की जरुरत नहीं है| वक्ता बनना उसका स्वभाव नहीं है| उसका क्षेत्र कला है| उसे औरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए| जीवन में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां आप सभी  थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो समझ जायेंगे कि आपके स्वभाव वाला मार्ग कौन सा है और तब आप ऐसे जैसे जियेंगे जैसे आपको जीना चाहिए|  ”

“आत्मविश्वास को आप साध लें, समझ लें तो  आपका जीवन एकदम मौलिक हो जाएगा| तब आप किसी भेडचाल का हिस्सा नहीं बनेंगे|”

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