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जनवरी 15, 2014

आखिरी ख्वाहिश तुम

आलम-ए-दिल पे कोई फर्क कहाँ?mirrorwoman-001

दूर हो तुम

चाहे बहुत करीब मेरे

पास बुला के भी मजबूर कहने से

कि

दिल में बसते हैं कितने अरमान मेरे…

कहना तो है बहुत कुछ…

मगर कहें कैसे?

लफ्ज़ आते आते लब तक

कही जम जाते हैं

उठते तो हैं तूफान कितने

दिल से,

बस उठते हैं और कहीं थम जाते हैं…

दिल का तो क्या?

चाहे बस कि हरदम

बस इक तुम्हारी ही याद में गुम हो…

बहुत क्या कहना?…

बहुत क्या सुनना?

बस फकत जान लो इतना के…

मेरी आखिरी ख्वाहिश तुम हो…

Rajnish sign

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