शीशे से पत्थर तोड़ते ‘अरविन्द केजरीवाल’ और ‘आप’

arvind kejriwal-001पत्थर से शीशा तोडना तो रोजमर्रा की बात है, पर बात तो तभी जमती है जब कोई शीशे से पत्थर को तोड़कर उसे तराश कर दिखाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ और उनके दल ‘आप‘ ने विगत में यह करिश्मा करके दिखाया जब उन्होंने पारदर्शी तरीके से चन्दा जुटाया और 20 करोड़ रुपयों में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर 28 सीटें जीतीं, जबकि ऐसा कहा जाता है कि जमे जमाये दल एक विधायक की सीट के लिए भी करोड़ो रूपये खर्च कर देते हैं और यह तो सर्वविदित है ही कि पिछले साढ़े छः दशकों में किसी भी दल ने कभी भी अपने को मिले धन के बारे में पारदर्शिता नहीं दिखाई और कोई नहीं जानता कहाँ से उन्हें सैंकडों करोड़ रूपये मिलते रहे हैं| ‘आप‘ ने भारतीय राजनीति को स्वच्छ बनाने की ओर एक कदम उठा दिया है और अब जनता के हाथ में है कि वह बाकी दलों को भी मजबूर करे कि वे अपने आर्थिक स्रोतों का खुलासा करें और अपनी चन्दा व्यवस्था को पारदर्शी बनाएँ| वरना तो सभी को पता है कि जो धन कुबेर उन्हें करोड़ों दे रहे हैं वे उन्हें मुफ्त में धन नहीं देते रहे और उनकी अपेक्षायें चुनाव में जीतने के बाद उनकी आर्थिक कृपादृष्टि से लाभ पाए दल पूरा करते रहे होंगे| यह विशुद्ध लेन देन वाला व्यापार रहा है| इसी लेन देन की भारतीय राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया ने भारत की तरक्की को असमानता वाला बनाया है क्योंकि धन कुबेरों ने कोई धर्मखाता तो खोल नहीं रखा है| राजनीतिक दलों ने ऐसे ही निर्णय लिए होंगे जिससे धन का लाभ लेने वाले दल उन्ही प्रोजेक्टों को पास करते रहे हैं जिससे उन्हें धन देने वाले कुबेरों का लाभ होता रहे| काले धन की बुनियाद पर खड़ी राजनीतिक व्यवस्था ने भारतीय समाज को आकंठ भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है|

दूसरी बार पत्थर को शीशे से ‘आप‘ ने तोड़ा जब उसने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि बड़े दलों की जातीय, साम्प्रदायिक और तमाम तरह के भेदों वाली राजनीति से परे जाकर चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है| ‘आप‘ के उम्मीदवारों की न मतदाताओं ने जाति देखी, न क्षेत्रीयता और न ही उनका संप्रदाय|

तीसरी बार शीशे से पत्थर को तोड़ने और तराशने का काम ‘आप‘ ने तब किया जब भाजपा और कांग्रेस ने जाल बिछाकर ‘आप‘ को बदनाम करना चाहा कि वे लोगों से झूठे वादे करके चुनाव में इतनी सीटें जीते हैं और अब सरकार न बना कर अपनी खाल बचाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे अपने वादे पूरे नहीं कर पायेंगे|

कर्मठ और ईमानदार आदमी अगर बुद्धिमान भी हो तो भविष्य में बसे संभावित परिणामों में से सबसे बेहतर को हाथ बढ़ा अपने लिए पकड़ लेता है| ताजे दिमाग की भांति ‘आप‘ ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बैकफुट पर भेज दिया सरकार बनाने के लिए दिल्ली की जनता की राय जानने के लिए लोगों से दुबारा समपर्क स्थापित करके| यह बुद्धिमत्ता भरा पूर्ण कदम था जिसने कांग्रेस को थोड़ा कम (क्योंकि उसकी तो केवल आठ ही  सीटें आयी हैं), पर भाजपा को बौखलाहट के स्तर तक दहका दिया और कल तक ‘आप’ को रोज चुनौती दे रही भाजपा के सुर ही बदल गये| वे सीधे सीधे ‘आप‘ पर किस्म किस्म के उलजलूल आरोप मढने लगे|

अब जबकि यह तय हो गया है कि ‘अरविन्द केजरीवालदिल्ली के अगले मुख्यमंत्री बन रहे हैं, भाजपा के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक गयी है| उसकी सरकार किसी भी हालत में नहीं बन पा रही थी| ‘आप‘ द्वारा रचे गये नैतिक माहौल के कारण वह ‘आप‘ के नवनिर्वाचित विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती भी नहीं दिखना चाहती थी और कांग्रेस और ‘आप’ दोनों में से कोई भी दल उसे समर्थन दे नहीं सकता था| उसकी हालत देख पुरानी कहावत “खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे” चिरतार्थ होती दिखाई दे रही है| भाजपा के नेता ‘आप‘ के बारे में केवल तीन चार दिन पहले दिए गये बयानों से उलट वाणी बोल उस पर आक्रमण कर रहे हैं|

यह ‘आप‘ की राजनीति की ही सूक्ष्म कला है कि ‘आप‘ एकदम स्पष्ट शब्दों में बोल रही है कि उसने कांग्रेस से समर्थन नहीं लिया है और कांग्रेस उसकी  या वह कांग्रेस की सहायक पार्टी नहीं है| वह अपनी 28 सीटों के बलबूते सरकार बनाने जा रही है और बिलकुल मुमकिन है कि विधानसभा में पहले ही दिन ‘आप‘ की सरकार विश्वास मत हासिल न कर पाए| वैसे ऐसा लगता नहीं है कि समर्थन की घोषणा करके कांग्रेस पहले ही दिन सरकार गिराने की बदनामी अपने सिर लेना चाहेगी| पूंजीपतियों की नीतियों के हितों की परवाह कर करके कांग्रेस और भाजपा को इस बात की उत्सुकता भी है कैसे ‘आप‘ उन वादों को पूरा कर सकती है जो उसने अपने 70 घोषणापत्रों में किये थे|

सरकार बनाने के बाद ‘आप‘ का अगला कारनामा होगा दिल्ली में बिजली की दरों के मामले में दिल्ली वासियों को बड़ी राहत देना| ‘आप‘ ने भली भांति अध्ययन करके ही इतनी बड़ी घोषणा की है और इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए आगामी दिनों में दिल्लीवासियों को बिजली के मामले में एक बड़ी राहत मिलने वाली है और देश में पहली बार कोई ऐसा मुख्यमंत्री सत्ताधीन होगा जो केवल मुनाफे के लिए जोड़तोड़ करने वाली कंपनियों की हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ के लिए ऐसा कर पाना मुमकिन होगा क्योंकि उन्होंने किसी कम्पनी से धन लेकर चुनाव नहीं लड़ा है और उन पर किसी किस्म का दबाव नहीं है कि वे जनता के हितों को कंपनियों के आलीशान दफ्तरों में गिरवी रख दें|

रोजाना ‘700 लीटर‘ पानी इस्तेमाल करने वाले परिवार को ‘जलमित्र‘ घोषित करना निस्संदेह बेहद बुद्धिमानी का कदम होगा| 701 और उससे ऊपर पानी की मात्रा इस्तेमाल करने वाले परिवार पूरे पानी का धन देंगे और जब वे देखेंगे कि उनसे केवल 1-2 लीटर काम पानी इस्तेमाल करने वाला परिवार मुफ्त में पानी का उपयोग कर पा रहा है तो उसमें अपने आप चेतना आयेगी कि वह भी 700 लीटर पानी में ही गुजारा करे| शुरू में इस कदम के आलोचक इसका अर्थ भले ही न समझ पायें पर अगर यह योजना चल निकली तो एक साल के आंकडें जल सरंक्षण और जल वितरण की दिशा में काम करने वाले लोगों के लिए आँखें खोलने वाले सिद्ध हो सकते हैं| जो छोटे परिवार रोजाना 300-400 लीटर पानी से ही गुजारा करते रहे हैं वे इस योजना के सीधे लाभार्थी होंगे| यहाँ यह जिक्र करना निरर्थक न होगा कि भाजपा और कांग्रेस, जिन्होने ‘आप‘ का घोषणापत्र गहराई से पढ़ने की जहमत नहीं उठाई है और सतही तौर पर पढ़ कर इसकी आलोचना करते रहे हैं, पानी वाले मुद्दे पर ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाकर दरअसल अपने को ही हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा चुके हैं| अगर उन्होंने ढंग से पानी वाला मुद्दा पढ़ा होता तो ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाने के बारे में सोचते भी नहीं|

दिल्ली पुलिस को जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने एक नई परिपाटी की शुरुआत की है| छुटभैये नेता भी इसी जुगाड में लगे रहते हैं कि उन्हें एक दो सरकारी गनर मिल जाएँ जिससे कि वे अपने रुतबे को समाज में दिखा सकें और बाबा रामदेव जैसे अतिमहत्वाकांक्षी योग गुरु और दवा व्यापारी ने तो जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए जी तोड कोशिश की थी| यही हाल भाजपा के प्रधानमंत्री पड़ के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का है जिनके लिए जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए भाजपा ने जमीन आसमान एक कर दिया था| जहां सड़क दुर्घटनाएं आम हों और राजनीतिक विरोधियों को आसानी से ठिकाने लगा दिया जाता रहा हो वहाँ सुरक्षा लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने खतरा उठाया है पर सत्य यह भी है कि अगर गांधी जिंदा होते, सुभाष बोस जिंदा होते या भगत सिंह जिंदा होते और देश के नेता होते तो वे भी कभी सुरक्षा के नाम पर जनता से दूरी न बनाते|

यह भी आज का बहुत बड़ा सत्य है जनता का वह तबका जिसका जमीर राजनीतिक दलों के यहाँ बंधक नहीं है, मौजूदा राजनीतिक माहौल से इस कदर उकता चुका है कि अगर ‘अरविन्द केजरीवाल‘ जैसी नई आशा को खरोंच भी आती है तो पूरा विश्व इस बात का गवाह बन सकता है कि जब आम जनता का गुस्सा फूटता है तो बड़े बड़े तख़्त हिल जाते हैं और बाद एबदे सूरमा धराशायी हो जाते हैं| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब हर राजनीतिक दल की है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को कुछ भी होने की अवस्था में नुकसान राजनीतिक दलों का ही होना है| हो सकता है बहुत से दलों का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाए और उन्हें हमेशा के लिए निर्वासन पर जाना पड़ जाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ का यह कदम वी.आई.पी संस्कृति से बुरी तरह से ग्रसित और दूषित दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक के सुधार की ओर एक बड़ा कदम है| और उनका और उनके मंत्रियों और विधायकों की साधारण जीवन शैली आने वाले दिनों में राजसी जीवन जीने के आदि हो चुके नेताओं के लिए खतरे का सबब बनने वाली है| |

अरविन्द केजरीवाल‘ को अभी बहुत से पत्थरों को शीशे से तोड़ कर तराश कर उन्हें खूबसूरत बुतों का आकार प्रदान करना है|  पर ईमानदारी, सच्चाई का साथ और हौसला उन्हें कामयाबी दिलाएगा बड़े से बड़े मुकाम पाने में|

जान हथेली पर रख निडर होकर आगे बढ़ने वाले सूरमाओं के लिए ही कहा गया है :-

हयाते- जाविदां आई है जां-बाजों के हिस्से में

हमेशा जीने वाले है ये जितने मरने वाले हैं

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One Comment to “शीशे से पत्थर तोड़ते ‘अरविन्द केजरीवाल’ और ‘आप’”

  1. सब दिन होत न एक समाना और फिर राजनीती में?.

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