‘आप’ 1920-30 की कांग्रेस जैसा आन्दोलन बन रही है…

aap

किस्मत की खूबी देखिये टूटी कहाँ कमंद,

दो  चार हाथ जब के लबे बाम रह गया|

कमल के फूल के निशान के साथ राजनीतिक जीवन जीने वाले जाने कितने ही नेता उपरोक्त्त  शेर से परिचित होंगे तो इसे बार बार दुहरा रहे होंगे|

आम आदमी पार्टी” ने अगर पवित्र लोकतंत्र की अवधारणा की कल्पना, जहां जोड़ तोड़ की राजनीति से परहेज हो, जहां पारदर्शी तरीके से राजनीति की जाए,  भारतीय परिवेश में न चलाई होती

तो बड़े राजनीतिक दलों के लिए सरकार बनाने के लिए आठ दस विधायकों या सांसदों का प्रबंध करना बाएं हाथ का खेल बन चुका था|

आप’ के रचे माहौल का ही असर है कि भाजपा लगभग नारे लगाने की आवाज में घोषित कर रही है कि वह विपक्ष में बैठने को तैयार है पर जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनाएगी|

काश कि ऐसा संयम वे आगामी लोकसभा चुनाव में भी अपना सकें|

कांग्रेस हो, भाजपा हो या तीसरा मोर्चा हो, देश ने सभी किस्म के दलों को विगत में जोड़तोड़ से सरकारें बनाते पाया है| यह अवसरवादी राजनीति ऐसे ही चलती रहती अगर भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर ‘आप‘ का उभार न हुआ होता|

गर्त की ओर तेजी से अग्रसर भारतीय राजनीति पर पहली बार ऐसा कुठाराघात हुआ है कि यह दबाव में सही अच्छा दिखने के लिए अभिनय करती दिखाई दे रही है| आज अभिनय हो रहा है कल यह अच्छापन जरुरत बन जाएगा तो असल में बड़े राजनीतिक दलों को शुचिता का पालन करना पडेगा|

आप‘ के असर से दिल्ली की सियासत की बिसात के पैदल से लेकर रानी और मंत्री और तमाम महत्वपूर्ण मोहरे बदल गये हैं और अगर शीघ्र ही बड़े दलों के अंदर बड़े संगठनात्मक बदलाव देखने को मिल जाएँ तो कुछ आश्चर्य नहीं होना चाहिए| कांग्रेस ने तो इसकी बाकायदा शुरुआत भी कर दी है| इन्डियन एक्सप्रेस में छपा मणि शंकर अय्यर का लिखा हुआ लेख बहुत कुछ इंगित करता है| अब अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कांग्रेस संभवतः राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी| आगामी चुनाव में फिर किसी और कांग्रेसी नेता को आगे किया जाएगा| मीरा कुमार (महिला+दलित) भी एक ऐसा नाम हो सकता है जिन्हें आगे बढ़ा कर चुनाव लड़ा जाए|  अभी तो नंदन नीलकेणी जैसे कई नाम हवा में गुंजाये जायेंगे, जनता का मन टटोलने के लिए| मणि शंकर अय्यर ने अखबार में लेख लिख कांग्रेसी  संगठन को मजबूत करने के अरसे से रुके प्रोजेक्ट  को जगजाहिर करके राहुल गांधी की संभावित भूमिका की ओर इशारा कर ही दिया है| राहुल गांधी ने भी ‘आप‘ की अप्रत्याशित सफलता (उनके लिए) देख पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे ऐसे बदलाव कांग्रेस संगठन में करेंगे जिसकी कल्पना भी लोग नहीं कर सकते|

जोड़-तोड़ की राजनीति के माहिर नेताओं के सामने इस बात को पचाने में मुश्किल खड़ी हो गई है कि अब साफ़-सुथरी राजनीति भारत में भी जड़े जमा सकती है क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो इन्हें अपनी दुकान बंद करके निर्वासन पर जाना होगा| इसलिए विभिन्न दलों के नेता अपने अपने तरीके से ‘आप‘ पर चौतरफा आक्रमण कर रहे हैं| ऐश्वर्य का जीवन छोड़ कर सामान्य देशवासी जैसा जीवन जीने की कल्पना ही भयावह हो सकती है नेताओं के लिए| ‘आप‘ के नेताओं की साधारण जीवनशैली अपना कर राजनीति करने की घोषणा बाकी दलों के नेताओं के लिए अभी से कष्टकारी सिद्ध हो रही है|

आप‘ ने फंड एकत्रित करने और उसका ब्योरा देने में जो पारदर्शिता दिखाई है वह भारतीय राजनीति में अभूतपूर्व है और व्यावहारिक राजनीति में यही एक कदम ‘आप‘ को साफ़-साफ़ अन्य राजनेतिक दलों से ज्यादा पाक साफ़ निर्धारित कर देता है|

आप‘ को क्षणिक उभार मान लेना न तो नेताओं के हित में है और न ही राजनीतिक विश्लेषकों के लिए उचित| दिल्ली के चुनाव के अनुभव से इतना तो राजनीतिक दलों और राजनीतिक विश्लेषकों को मान ही लेना चाहिए कि

अब 2014 के लोकसभा चुनाव में एजेंडा और मूल्य ‘आप‘ निर्धारित करेगी और  बाकी दलों को ‘आप‘ द्वारा घोषित बातों पर प्रतिक्रया स्वरूप ही कुछ करना होगा|

भाजपा दिल्ली में ‘आप‘ के मेनिफेस्टो की कॉपी कैट बन कर रह गयी थी और जो कुछ ‘आप‘ ने सोमवार को घोषित किया उसे मंगल बुध तक भाजपा ने अपनी लाइन घोषित कर दिया| अब नैतिक रूप से ‘आप‘ भारत में लोगों के अंदर आशा का संचार करने वाली सबसे प्रभावशाली पार्टी बनती जा रही है|

आप‘ उस लहर पर सवार हो गई है, जो राजनेता मात्र के प्रति जनता के आक्रोश से उपजी है और अब जनता का यही आक्रोश ‘आप‘ को दिल्ली से निकाल कर देशव्यापी फिनोमिना बनाएगा|

भूलना नहीं चाहिए कि कुछ बड़े कोर्पोरेटस के सक्रिय दबाव के कारण बड़े मीडिया घरानों ने ‘आप‘ का बायकॉट किया हुआ था और टीवी चैनलों पर कवरेज न मिल पाने का बावजूद ‘आप‘ ने अपना वजूद बना कर दिखाया और अंत में उन्ही चैनलों को उन्हें कवरेज देनी ही पड़ी|

बड़े दल और क्षेत्रीय दल सोच कर अपने आप में ही खुश और निश्चिंत हो सकते हैं कि दिल्ली के बाहर ‘आप‘ की हवा निकल जायेगी पर उन्हें जनता के मौजूदा राजनीति से आक्रोश का अंदाजा नहीं है|

जैसे जैसे ‘आप‘ दिल्ली से बाहर किसी अन्य क्षेत्र में जायेगी वहाँ की हवा धीरे धीरे बदलती जायेगी| ‘आप‘ के पास  भारी-भरकम नाम नहीं होंगे किसी भी जगह पर क्षेत्रीय जनता खुद किसी उचित उम्मीदवार को उभार देगी| दिल्ली की तरह लोकसभा चुनाव में पूरे देश में जमे जमाये राजनीतिक पहलवान धराशायी हो जाएँ तो अप्रत्याशित न होगा|

एक तरह से देखा जाए तो भारतीय जनता का एक बहुत बड़ा तबका राजनेताओं और राजनीतिक दलों के अहंकार से पीड़ित है और जनता को यही अहंकार तोडना है और जनभावना को यह मौक़ा अगामी लोकसभा चुनावों में मिलने जा रहा है| जो जनता के सेवक होने चाहिए थे वे जनता के शासक बन कर बैठ गये हैं और अब इस चक्र को वापसी की ओर घूमना है अब राजनीति से शासक के विदा होने का समय आ गया है|

आप‘ इस जनभावना पर खरी उतरती है और नेताओं और दलों के अहंकार को तोड़ने में जनता का माध्यम बन सकती है बल्कि बन रही है|

दिल्ली चुनाव में ‘आप‘ की सीमित सफलता से एक बात और पता चलती है कि बहुत दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि ‘आप‘ के उम्मीदवार की न तो लोगों ने जाति देखी न धर्म, न व्यवसाय और न ही क्षेत्रीय पहचान|

भारत में कितने लोग होंगे जो इस बात के प्रति उत्सुक हैं कि ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की जातिगत या क्षेत्रीय पहचान क्या है? और यही बात ‘आप‘ की सबसे बड़ी खूबी बनने वाली है|

यह भी ध्यान देने योग्य पहलू है कि बहुजन समाज पार्टी के मैदान में होने के बावजूद और मायावती के रैली करने के बावजूद ‘आप‘ ने कई सुरक्षित सीटें दिल्ली में जीती हैं|

भारत भिन्न राजनीतिक दलों की कुटिल और तुच्छ राजनीति के कारण जाने कितने टुकड़ों में बाँट चुका है|

 ‘आप‘ का उदय भारत को फिर से एक सूत्र में पिरोने के लिए भी हुआ है|

स्थापित राजनीतिक दल या तो किन्ही परिवार विशेषों के नियंत्रण वाले व्यक्तिगत दल बन चुके हैं या कुछ खास लोग उन्हें संचालित कर रहे हैं और साधारण स्तर से उठकर किसी का इन दलों में नेता बन जाना लगभग असंभव है क्योंकि रिक्त स्थान नेताओं के परिवार वालों के लिए सुरक्षित है|

आप‘ यहाँ भी शून्य को भरती है और स्वच्छ राजनीति करने के इच्छुक नये लोग ‘आप‘ के माध्यम से राजनीति में प्रवेश करके देशसेवा कर सकते हैं|

एक तरह से देखा जाए तो ‘आप’ को अब पिछली सदी के बीस और तीस के दशक वाली कांग्रेस की भूमिका मिलती जा रही है| वह भी एक आंदोलन था यह भी एक आंदोलन है|

बस ‘आप‘ के पास गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल जैसे बड़े नाम नहीं हैं पर ‘आम‘ आदमी खुद अपना स्तर ऊपर उठाकर इस कमी को महसूस ही नहीं होने देगा|

गांधी भी ‘आप‘ के उदय से बेहद खुश होते|

ऐसा नहीं है कि ‘आप‘ का रास्ता एकदम सुगम है| अभी तो एक शुरुआत भर हुयी है और अथाह समुद्र बाकी है पार करने को|

अभी तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि

अभी तो ली अंगडाई है

आगे असली लड़ाई है

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4 टिप्पणियाँ to “‘आप’ 1920-30 की कांग्रेस जैसा आन्दोलन बन रही है…”

  1. AAP ka uday aur utthan romanchak sambhavanaon wala hai. Bahut hi vyapak vishleshan hai. Sadhuvad! Bhagwan kare, iske neta, 1920-30 ke andolano ki galatiyon se sikhenge ki yudhh jitane se kathin yudhh ke baad ki vyavastha banana hota hai. Charaiveti…

  2. फिर भी कहूंगा बहुत कठिन है डगर पनघट की.

  3. Yugal,
    सत्य वचन! अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता पाने के संघर्ष का इतिहास यह कीमती सीख देता ही है|

  4. Mahendra Ji,
    सच है न केवल (बहुत कठिन है डगर पनघट की)
    बल्कि ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ भी

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