बंद का समय

सूखी पत्तियों की फिसलन भरी डगर के पारblueumb-002

हरियाली के आँचल में

झुरमुटों के पास से

शाम का धुआँ निकल रहा है

कोई माँ, खाना बना रही है

छौनों के घर लौटने का समय हो गया है|

सड़क के किनारे बनीं छोटी-छोटी फड़ें

बाहर सजा सामान अब समेटा जा रहा है

मैले से सफ़ेद कुर्ते-पाजामे में

कैद छुटा बच्चा

पिता को सामान पकड़ा रहा है

दुकान को बंद करने का समय हो गया है|

Yugalsign1

One Comment to “बंद का समय”

  1. इसीलिए तो किसी शायर ने कहा है –
    सुबह होती है,शाम होती है.
    ज़िन्दगी यूँ ही तमाम होती है
    ज़िन्दगी कि सच्चाई को बयां करती . खूबसूरत प्रस्तुति.

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