मेरे सपनो की ताबीर

एक ख़याल पे मुहर धर दीwoman-001

कल रात ने,

मेरी सुबह ओ’ शाम-

बस जैसे तुम्हारा जगना, सोना

तुम्हारी सुबह-

मेरी तमन्नाओं का जगना

तुम्हारी रात-

मेरे ख्वाबों को पर लगना

लेकिन कल

स्याही गहरी हुयी

एक और हकीकत की भी –

न तुम थीं,

न तुम हो,

न तुम होगी,

मेरे लिए

मेरी,

मेरे सपनो की ताबीर कभी…

अक्सर मैं तुम्हारी

बेजारी पढता हूँ…

तुम ढँक नहीं पाती

झल्लाहट,

खिजलाहट…

तुम न चाहो तो भी

लफ्ज़

कोई न कोई

कर ही जाता है

इन्हें बयाँ…

Rajnish sign

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: