Archive for नवम्बर 21st, 2013

नवम्बर 21, 2013

जो चाहे करो कातिल मेरे

रात अंगारों पे बीती कल की मेरीmanrain-001

तुम को तो नींद आई होगी…

जलते देखा है किसी को तुमने ओस की बूंदों  से?

कल मुझे देखा होता…

बहुत देर भीगा बाहर लेकिन

तुम्हारी रेशमी तपन से बहुत देर तक जला बदन

रात ने एक पल को भी पलकें नहीं मूँदी

जागती पडी रही बिस्तर पे मेरे

कम न हुयी फिर भी  सीने की जलन

कल अगर सीने से तुम लगती

तो ख़त्म हो जाते मैं और तुम, हम में

या तो अब पास आ जाओ तुम मेरे

या कुछ बुलाने का सामान करो

मसीहा मान लिया है अपना

खुद अपने कातिल को मैंने

अब मर्जी पे तुम्हारी है

जो जी में आये करो मेरा…

(रजनीश)

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नवम्बर 21, 2013

एक टुकड़ा सच

कल नहीं होंगे विषादvon-001

जब हम-तुम याद करेंगे

कि-

जीवन जितना भी देता है

सहेजने- संजोने को होता है

सखे, पीड़ा का सत्व

सुखकर होगा अवश्य ही|

कल,

जब हम-तुम संधान कर चुकेंगे

कि –

होती है एक छोटी सी मुलाक़ात भी,

सम्पूर्ण

नहीं होता है सब कुछ बेमानी

मौन भी है बोलता कभी-कभी

प्रिये,

अमूल्य हैं पोरों पर अटके ये मोती

कल फिर मिलेंगे हम,

तो जानेंगे कि-

हमने जिया है

एक टुकड़ा सच

साथ-साथ

Yugalsign1

नवम्बर 21, 2013

आदत में पिन्हा तुम…मजबूर अपनी से हम

रात की कालिख बहुत घनी थीtum-001

बहुत लड़ा

तेरी यादों का रौशन दिया

आँख में रात भर धंसती रहीं

सपनो की किरचें

हर पल करवटों का

रात सलवटों की गूंगी गवाह

बहुत रोये

बहुत माँगा

मगर…

रात

एक कतरा भी नींद का

तुमने लेने न दिया…

दिन को बुनता हूँ जो भी ,

हर रात उसका  भरम तोड़ती रहो तुम

अपनी आदत में पिन्हा रहो तुम

मजबूर अपनी से रहेंगे हम!

(रजनीश)

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