हर प्रीत नूतन है!

पांच बरस लंबी सड़क पर AB-001

पता नहीं सोता सा चला था शायद !

कि,

हर नया दिन,

पुराने का हिस्सा नहीं लगता|

लगता है, सड़क भी बनी है,

टुकड़ों-टुकड़ों में!

कल की याद ही नहीं कुछ-

बस अहसास भर होता है कि

कुछ गुजरा भर था|

मुझे कुछ याद नहीं है-

न परिणय

न चुम्बन

न कलह

जब तुमसे मिलता हूँ,

लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं

फिर नया सवेरा है

और हर बात,

हर प्रीत नूतन है|

Yugalsign1

One Comment to “हर प्रीत नूतन है!”

  1. जब तुमसे मिलता हूँ, लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं / फिर नया सवेरा है / और हर बात, / हर प्रीत नूतन है|
    प्रेम में ऐसा ही होने वाला ठहरा बल!

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