बाँट सकूं, ऐसा आत्म-ज्ञान कहाँ से लाऊं ?

jhulaghat-001आज उसका फोन आने पर एकबारगी ख्याल आया कि पिछले तीस सालों में लगभग हर दस सालों में उससे एक भेंट हुयी है और इन भेंटों ने याद के एक कोने में सुरक्षित स्थान घेर लिया है|

दस बरस पूर्व उससे हुयी मुलाक़ात याद आ गयी|

* * * * * * *

वह मंडली में नाच रहा था| सहसा उसकी दृष्टि मुझ पर पडी और वह लपक कर मेरे पास आ गया|

बीस साल पहले अजय घिल्डियाल और मैं एक ही कक्षा में पढ़ा करते थे, पढ़ने के दौरान भी कोई खास दोस्ती उससे नहीं रही थी| छोटी सी पर्वतीय जगह, तकरीबन एक बड़े गाँव जैसी, में सभी एक दूसरे को जानते ही हैं, एक दूसरे की आदतों को पहचानते हैं, गुणों -अवगुणों की जानकारी रखते हैं| याद आता है कई मर्तबा वह कक्षा न लगने के कारण खाली समय में या मध्यांतर में लंच के दौरान मेरे पास आ बैठता था और कुछ न कुछ बात बताता रहता था| मैं भी उसकी बातों के सिलसिले को आगे बढ़ा दिया करता था|

उसके कुछ करीबी मित्र उसे स्नेह से ‘जलया’ बुलाया करते थे पर याद नहीं पड़ता मैंने कभी उसे इस नाम से पुकारा हो| मेरे लिए वह हमेशा अजय ही रहा| स्कूल के बाद पढ़ने मैदानी इलाकों में आ गया और छुट्टियों में घर जाना होता तो कभी कभार उससे भी मुलाक़ात हो जाती थी|बाद में नौकरी करने लगा तो घर जाना भी उतना जल्दी जल्दी नहीं हो पाता था| पर उसके बारे में पता चला था कि वह भी इंटर कालेज में अध्यापक बन गया था|

आज बरसों बाद, कम से कम दस बरस बाद उससे मिल रहा था|

विचारों की श्रंखला उसके स्पर्श और बोलने से टूटी| वह कह रहा था,

“यार, मैं कुछ दिनों से तेरे ही बारे में सोच रहा था, मुझे विश्वास था कि तू इस शादी में जरुर ही आएगा, आखिर तेरे चचेरे भाई की शादी ठहरी|”

मैं मुस्कराया,”हाँ आना ही पड़ा, महेश ने दिल्ली आकर ऐसा माहौल मेरे इर्दगिर्द रच दिया कि कोई और चारा था ही नहीं| फिर खुद भी सर्दी में घर आना चाहता था| बरसों हो गये पहाड़ की सर्दी में समय बिताए हुए…दिन में धूप सेके| कुछ थक भी गया था दिल्ली की चहल-पहल भरी जिंदगी से सो अपनी बैटरी चार्ज करने आ गया| जहाज का पंछी जहाज पर आएगा ही”|

अजय हंस पड़ा| पर उसकी हँसी हँसी जैसी नहीं थी| लगा जैसे वह वहाँ था ही नहीं और कोई और ही हंस रहा था और वह कहीं दूर खड़ा था| उसके चेहरे पर व्यथा के चिह्न साफ़ दिखाई पड़ रहे थे|

उसने गहरी निगाहों से मुझे देखा और धीमे स्वर में बोला,

“यार, ये मत सोचना कि शराबी बन गया हूँ| चार पैग लगाये हैं, तब तुझसे बात करने की हिम्मत जुटा पाया हूँ| उतर जायेगी तब थोड़े ही न तुझसे बात कर पाउँगा|”

उसका चेहरा रुआंसा हो चला था|

वह कह रहा था,” तब तो शर्म आयेगी न”|

मैं कुछ चौकन्ना हो गया| मुझे ऐसी किसी मुलाक़ात की आशा नहीं थी| मैंने हल्के से बातों का रुख पलट कर वहाँ से खिसकना चाहा पर वह प्रयास मुझे व्यर्थ लगा| उसने मुझे नहीं छोड़ा और खाना खाने की और बांह पकड़ कर ले गया|

हम लोग साथ साथ बैठ गये|

“यार तू तो जानकार ठहरा|”

मैंने प्रश्नात्मक दृष्टि उस पर डाली|

मेरी निगाहें पढकर वह बोला,”देख यार पांच सौ लोगों के सामने मुझे मत रुला| बस मेरी इस शंका का समाधान कर दे यार, मुझे रास्ता बता दे भाई|”

“देख यार दस साल पहले भी मैंने तुझसे यही पूछा था पर तू टाल गया था| अब बता दे यार, वरना मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा|”

अब उसने वाकई रोना शुरू कर दिया| मेरी हालत अजीब थी, मैंने शास्त्रीय औपचारिकता अपनाते हुए उसे सामान्य बनाने की कोशिश की| पर सब व्यर्थ|

वह रोते रोते कह रहा था,”देख यार मुझे बहलाने की कोशिस मत कर| दस साल पहले भी तूने ऐसे ही मुझे दिलासा दे दिया था|”

मैंने समझाने की गरज से पहली बार उसे उस नाम से पुकारा जिससे उसके घनिष्ठ मित्र पुकारा करते थे, अब भी पुकारते होंगे|

” यार, जलया, सब कुछ तो ठीक है| बीवी है बच्चे हैं, घर है, नौकरी है| क्या तकलीफ है…कुछ भी तो नहीं|”

“देख यार, जलया कह कर ज्यादा भावुकता मत दिखा| मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ|”

“तू कौन है?”

“देख यार क्यों मुझे रुला रहा है| बता दे मुझे आत्मिक संतोष कैसे मिलेगा| कैसे मेरी सोल सेटिसफाई होगी?”

उसने फिर से रोना शुरू कर दिया|

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ| उसके ऊपर गुस्सा भी आ रहा था| इच्छा तो हुयी कि कहूँ कि भरी शादी में कई तरफ की कुंठाओं के नीचे दबा हुआ है क्या आत्मिक संतोष, जो परतें हटाकर ऊपर उभर आएगा?|

अपनी आवाज से इस आकस्मिक, मैत्रीपूर्ण हमले से उत्पन्न हैरानी और हल्की नाराजगी के असर को दबाकर उससे कहा,”देख यार, मुझे ऐसा लगता है कि जहाँ तक आत्मिक संतोष की बात है, मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि मुझमे, तुझमे, और इन सबमें, उधर हमारे से पहली पीढ़ी के और इधर हमसे बाद वाली पीढ़ी के लोग, जो खाने में रस ले रहे हैं, किसी में भी कोई अंतर नहीं है| किसी  के पास आत्मिक जागृति का कोई अनुभव नहीं है| तुम्हारे अंदर इसे जानने की जिज्ञासा है, अभी तक न जान पाने की पीड़ा भी है, हम सबमें तो वह भी नहीं है| हम सब बस जिए जा रहे हैं|”

मेरे इतना बोलने से वह आंसू पोछकर एकटक मेरी ओर देखने लगा|

अपनी ओर उत्सुकता से देखता पा मैंने आगे उसे कहा,” ऐसा लगता है कि हम सबको जीवन में एक सुपरिभाषित फ्रेम मिलता है और उस फ्रेम के अंदर हम सबको अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयत्न करना चाहिए और गाहे-बेगाहे उस फ्रेम के बाहर झांककर अपने जीवन की परिधि को बढ़ाने का प्रयास भे एकारना चाहिए|”

“देख, अजय, एकदम सच सच कहूँ तो तेरी बात से मेरे अंदर गुस्सा उत्पन्न हो रहा है| यह सब ज्ञान देते हुए मुझे ऐसा लग रहा है जैसे खुद कुछ भी न जानते हुए भी मैं तुझे बता रहा हूँ| होता क्या है कि जब हम दूसरों के दुख सुनते हैं और दुखड़ों के समाधान सुझाने का प्रयत्न करते हैं तो चीजें हमें एकदम दुरुस्त, समझ में आ जाने वाली लगती हैं और शब्द सरस्वती के बोलों की तरह झरते हैं|”

मेरी बात सुन वह कुछ हैरानी से मेरी ओर देख रहा था|

“कितना सरल लगता है सुझाव देना, यह सब कहना| परन्तु वास्तविक जीवन में लक्ष्य निर्धारित करना बेहद कठिन काम है| अगर मंजिल पता हो तो मानव राह तो किसी न किसी तरह खोज लेता है बना लेता है पर असल समस्या उसी मंजिल की तो है जिसको पाने से हम वास्तव में ऐसा महसूस कर सकें कि हाँ अब कुछ किया, अब सच्ची स्थायी खुशी मिली| ऐसी मंजिल दिखाई नहीं पड़ती सो हम छोटे-छोटे संतोष देने वाली मंजिलों को चुनकर उन पर चलकर अच्छा महसूस करने लगते हैं|”

* * * * * * *

कुछ ऐसा ही दर्शन देकर मैंने उस मुलाक़ात का समापन किया था| बाद में दिल्ली आ गया और  नौकरी और जीवन के अन्य कार्यों में व्यस्त होने से उसकी और उस मुलाक़ात की स्मृति हल्की पड़ कर एक कोने में पसर गयी|

इन दस बरसों में लगभग दस ही बार घर जाना हुआ तो उसके बारे में परिचितों से पता चला कि वहाँ से उसका स्थानांतरण हो गया और अब वह दूसरी जगह दूसरे स्कूल में पढाता है|

आज उसके फोन ने उससे जुडी स्मृतियाँ ताजी कर दीं|

उसने बताया कि उसके बेटे को आई.आई.टी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए दिल्ली रहना है और उसे कोचिंग में प्रवेश दिलवाने और उसके रहने खाने का बंदोबस्त करने वह दिल्ली आ रहा है| मेरा फोन उसने घर पर मेरे पिताजी से लिया| उसने मुझसे पूछा कि अगर मुझे असुविधा न हो तो वह मेरे घर एक रोज ठहर कर यह सब इंतजाम करके वापस लौट जाएगा| मैंने उसे निसंकोच दिल्ली में मेरे घर आने को कहा और कहा कि मैं उसके बेटे के लिए कोचिंग आदि के प्रबंध करने में उसकी मदद कर दूंगा|

अगले  हफ्ते वह आएगा| पर अब मुझे कुछ उत्सुकता भी है और भय भी कि अगर उसकी आत्मिक संतोष की भावना अभी तक उसे पीड़ा देती है तो क्या वह फिर से मुझसे समाधान पूछेगा?

मैं क्या समाधान दूंगा?

मैंने इन दस बरस में कितनी आत्मिक प्रगति कर ली है?

आंतरिक जगत में मैंने ऐसा क्या खोज लिया है जो मैं उसे दे पाउँगा?

कार्यक्षेत्र में और दुनियावी मामलों में दैनिक स्तर पर समस्याएं आती हैं , एक से एक जटिल लोग मिलते हैं पर उन सबसे निबटने में कभी कोई परेशानी नहीं होती|

पर अजय के आने की बात ने मुझे अंदर से थोड़ा हिला दिया है|

जीवन में सफलता पाने की आपाधापी में क्या मैंने पाया है जिससे अजय को ज्ञान दे सकूंगा?

उसके आने की प्रतीक्षा भी है और एक भय भी है|

अपनी मानसिक समस्या उसने मुझे दे दी है क्या?

Yugalsign1

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