पर तुम तो घबराए बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

मन के सूने से आँगन में

गीत तुम्हारे गाये बहुत …

खुली-खुली वे जुल्फें तेरी

नभ में जैसे छाई बिजली

साफ़ चमकती दंत-पंक्तियाँ

चमक उठी हो जैसे बिजली

मैंने दृष्टि रोक दी तुम पर

तुम मन में शरमाये बहुत …

पहली बार हुआ कुछ ऐसा

जब मैं पहुंचा पास तुम्हारे

आहट-आहट में सिहरन थी

नयनों में थे आंसू खारे

मैंने हाथ बढ़ाया ही था

पर तुम तों घबराये बहुत …

शायद रात न भूलेगी वो

संग-संग जब चन्दा देखा

एक दूसरे के नयनों में

हमने गंगा-जमुना देखा

पावन संगम की तृष्णा में

दृग अपने भर आये बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

{कृष्ण  बिहारी}

One Comment to “पर तुम तो घबराए बहुत …”

  1. मन को छू गया ………..

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