उससे अधिक कुंआरे हो तुम

जितनी बाल्मिकी की कविता

जितनी उद्गम पर हो सरिता

जितनी किरन चांदनी

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी पावन यहाँ प्रकृति है

जितनी सुन्दर धवल कृति है

जितनी घड़ी सावनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी सिहरन सीधी सीधी

जितनी मनहर कोई वादी

जितनी मधुर रागिनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी क्षमाशील है धरती

जितनी शमा हवा से डरती

जितनी नरम रोशनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

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